जल का अधिकार व्यापक परिवर्तन की राजनीति

Submitted by HindiWater on Tue, 01/27/2015 - 12:37
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गंगा, बुढ़ी गंडक, बागमती, कमला और महानन्दा ​जैसी नदियाँ बिहार में बहती हैं। विविधता के लिहाज से उत्तर बिहार के क्षेत्र में पानी जहाँ 15 फीट पर उपलब्ध है तो दूसरे इलाके में 60 फीट पर पानी उपलब्ध है। राज्य में 107642 हैण्डपम्प हैं। सुरक्षित जल, अब एक चुनौती है। राज्य के 13 जिले आर्सेनिक और 11 जिले फ्लोराइड से प्रभावित हैं। इसके अतिरिक्त कई जिलों के जल में आयरन है। साफ जल हर व्यक्ति का मौलिक अधिकार है, भारतीय संविधान के अनेक अनुच्छेद में इसकी विभिन्न रूपों में चर्चा है। बावजूद इसके जल के अधिकार को वैधानिक ढाँचा का रूप नहीं दिया गया है। इसी को केन्द्र में रखकर ‘जल एवं स्वच्छता का अधिकार’ पर पटना के होटल विंडसर के सभागार में 21-22 जनवरी 2015 को वाटर एड, फोरम फॉर पॉलिशी डॉयलॉग ऑन वाटर कन्फीलिक्ट इन इण्डिया, साकी वाटर एवं मेघ पाईन अभियान और ‘हिन्दी इण्डिया वाटर पोर्टल’ की ओर से आयोजित कार्यशाला के प्रथम दिन का केन्द्र बिन्दु जल का अधिकार रहा।

पुणे से आए सोसाइटी फॉर प्रमोटिंग पार्टिसिटेव इको सिस्टम मैनेजमेंट (सोप्पेकॉम) के के.जे. राय ने कहा कि देश में जल तथा स्वच्छता के अधिकार को लेकर काम हो रहा है। अब तक जितने भी अधिकार हासिल किए गए हैं, सब संघर्ष करके ही हासिल किए गए हैं। चाहे सूचना का अधिकार हो या वन अधिकार। जल के अधिकार को व्यापक परिवर्तन की राजनीति से जोड़कर देखा जाना चाहिए।

भारतीय परिप्रेक्ष्य में जल के अधिकार पर चर्चा करते हुए फोरम फॉर पॉलिशी डॉयलॉग ऑन वाटर कन्फीलिक्ट इन इण्डिया की सरिता भगत और सोसाइटी फॉर प्रमोटिंग पार्टिसिटेव इको सिस्टम मैनेजमेंट (सोप्पेकॉम) के के.जे. राय ने कहा कि भारत में जलस्रोत समाज से जुड़ा था। 1990 के बाद से पानी की परिभाषा बदलती जा रही है और जलस्रोत अतिक्रमित किए जा रहे हैं। इसके बाद निजीकरण का दौर चला तो पानी के तमाम स्रोत प्रदूषित हो गए। अब पानी का इस्तेमाल लोगों के पीने और सिंचाई के लिए नहीं बल्कि औद्योगीकरण के लिए किया जा रहा है। उड़ीसा में हीराकुण्ड डैम को लेकर जो संघर्ष चल रहा है, वह सिर्फ इसलिए कि इसके पानी का इस्तेमाल उद्योग के लिए किया जाएगा।

इसी तरह की दास्तान केरल के प्लाचीमाड़ा की है, जहाँ कोला कोला कम्पनी के खिलाफ लोग संघर्षरत हैं। ये सारी स्थितियाँ अनिश्चित भविष्य की ओर ले जा रहे हैं। ऐसी स्थिति में भारत में जल के अधिकार का वैधानिक ढाँचा तैयार होना चाहिए। यह ढाँचा जल के अधिकार से ही सम्भव है। हरेक व्यक्ति के लिए नियत मात्रा में पानी की उपलब्धता हो। पानी का सवाल आवश्यकता, आजीविका, पर्यावरण के दृष्टिकोण और सामाजिक तथा सांस्कृतिक तौर पर जुड़ा हुआ है।

हर एक इलाके की अपनी आवश्यकता है। इसकी समस्या से जहाँ महिलाएँ प्रभावित हो रही हैं, वहीं आदिवासियों को दायित्व बताया जा रहा है, तो कहीं दलितों को पानी के हक से वंचित किया जा रहा है। इसलिए इसे विकेन्द्रित करने की आवश्यकता है, जिसमें जनभागीदरी सुनिश्चित की जाए। उन्होंने कहा कि सरकार की नीतियों में विरोधाभास है। एक तरफ औद्योगीकरण है तो दूसरी ओर गंगा सफाई दोनों में विरोधाभास है। पानी पर समाज की मालिकी हो।

बाढ़ के परिप्रेक्ष्य में जल के अधिकार की चर्चा करते हुए घोघरडीहा स्वराज विकास संघ के रमेश भाई ने कहा कि संविधान की धारा 21, 32 और 47 में जल के अधिकार की बात कही गई है। बाढ़ग्रस्त क्षेत्र की समस्या को नजरअन्दाज कर जल के अधिकार की बात नहीं की जा सकती है। आपदा प्रबन्धन की नीतियों के कारण बाढ़ का दायरा बढ़ता जा रहा है। देश के 22 राज्य और केन्द्र शासित अण्डमान निकोबार द्वीप समूह बाढ़ से प्रभावित हैं।

673 जिले में 133 जिले बाढ़ से प्रभावित हैं। इसी तरह बिहार के 25 जिले के 2225 पंचायत प्रभावित रहते हैं। जल जमाव का दायरा भी बढ़ा है। हैण्डपम्प और बोरवेल के कारण जलस्रोत दूषित हो गए हैं। इस स्थिति में समुदाय आधारित भागीदारी से जल के अधिकार को सुनिश्चित किया जा सकता है।

बहस में भाग लेते हुए नवजन लोक के मोहन ठाकुर ने कहा कि बाढ़ प्रभावित क्षेत्र के प्रदूषित जल के जिलावार आँकड़े के आधार पर रणनीति तय की जानी चाहिए। वहीं पूर्वी चम्पारण से अमर ने गंगा और अन्य नदियों के बहाव की चर्चा करते हुए कहा कि पाँच वर्षों से राज्य में सूखे की स्थिति है। जबकि सतीश कांसा ने कहा कि पानी का बाजारीकरण और बीज पर एकाधिकार सुनियोजित चाल है। ऐसे में गरीबों के पक्ष में नीति की आवश्यकता है। उन्होंने सवालिया लहजे में कहा कि आज भी आबादी का बड़ा हिस्सा 15 रुपए में बोतलबन्द पानी खरीदकर पीने की स्थिति में नहीं है। रघुपति जी ने 87 के बाढ़ के अनुभव को साझा किया। वहीं हिन्दी इण्डिया वाटर पोर्टल की मीनाक्षी अरोड़ा ने कहा कि किसका हक और ​किसकी जवाबदेही। नदी जोड़ परियोजना के माध्यम से अतिरिक्त जल को ले जाने की बात की जा रही हैं, लेकिन इसका पर्यावरण सन्तुलन पर क्या प्रभाव पड़ेगा इस पर भी गौर करना होगा।

कोशी मुक्ति संघर्ष के शम्भू ने कहा कि पानी की उपलब्धता और स्वच्छता में अन्योनाश्रय सम्बन्ध है। बहस में कोसी सेवा सदन के राजेन्द्र झा, खगड़िया के प्रेम भाई, सुनील कुमार मण्डल, मंजू झा, लाजवन्ती झा ने हिस्सा लिया। इस सत्र की अध्यक्षता रामजी ने की।

कार्यशाला के दूसरे सत्र में पर्यावरण विधि शोध संस्था (ईएलआरएस) सुजीथ कोयान ने ​जल अधिकार के वैधानिक एंव संस्थागत पहलुओं पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भारत में जल संसाधनों के उपयोग और प्रबन्धन से जुड़े कानून और नीतिगत ढाँचे में कम-से-कम पिछले एक दशक में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं। भारत में हो रहे परिवर्तनों के विस्तार को देखते हुए विभिन्न कानून और नीतिगत पहलों के अध्ययन और मूल्यांकन की आवश्यकता है। अधिकार हनन् की स्थिति में कानून उसकी शिनाख्त करते हैं। उन्होंने कहा कि जलनीति में अधिकार की बात कही गई है।

साथ ही सरकारी जवाबदेही की बात है। उन्होंने कहा कि जल का अधिकार मौलिक अधिकार के रूप में है। इस परिप्रेक्ष्य में उन्होंने कई राज्यों के उच्च न्यायालयों और उच्चतम न्यायालय के फैसले का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय जलनीति 2002 और अधिकांश राज्यों की जलनीतियों में पेयजल पहले और सिचाई को दूसरे स्थान पर रखा गया है।

2012 में भी जल की प्राथमिकता, आवश्यकता, स्वास्थ्य, स्वच्छता, नदियों की पारिस्थितिकीय जरूरतें और गरीबों की आजीविका की बात कही गई है। इतना ही नहीं जल और स्वच्छता के सन्दर्भ में संविधान के अनुच्छेद 243 जी और 243 डब्ल्यू की 11वीं और 12वीं अनुसूचियों में भी इसका जिक्र है। उन्होंने कहा कि अलग-अलग क्षेत्रों के लिए जल की अलग- अलग आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि पेयजल आपूर्ति को सरकारी संसाधनों की उपलब्धता पर निर्भर नहीं बनाया जा स​कता है।

उनके प्रस्तुतिकरण के सन्दर्भ में पुष्यमित्र, रमाशंकर, चन्द्रशेखर, सन्तोष द्विवेदी ने अपने सवाल रखे।

तीसरे सत्र में साकी वाटर के कार्तिेक सेशान ने आर्सेनिक के सन्दर्भ में ज्ञान कार्यप्रणाली, नेटवर्क और भविष्य की कार्ययोजना के सन्दर्भ में प्रस्तुतिकरण के माध्यम से बताया कि 2013 में आर्सेनिक नॉलेज नेटवर्क की स्थापना की गई। देश केे असम, छत्तीसगढ़, झारखण्ड, उत्तर प्रदेश, बिहार, मणिपुर के साथ-साथ गंगा तथा ब्रह्मपुत्र के मैदानी इलाके के भूजल में आर्सेनिक है। कई जगहों पर तो यह खतरे के मानकों को भी पार कर चुका है।

यह कई तरह की बीमारियों का कारक है। 2004 और 2005 में असम तथा पश्चिम बंगाल में आर्सेनिक को लेकर जो काम किए गए उस अनुभव को बताया। उन्होंने कहा कि असम के जोरहाट और तेजपुर सर्वाधिक आर्सेनिक प्रभावित है। एक कार्ययोजना बनाई जा रही है। आर्सेनिक के सन्दर्भ में चिकित्सकों, आशा कार्यकर्ताओं का ज्ञान सीमित है।

Regional Level workshop on Right to Water and Sanitation held at Patna on 21st and 22nd January, 2015हिन्दी इण्डिया वाटर पोर्टल के सिराज केसर ने सर्वप्रथम पुष्यमित्र के प्रस्तुतिकरण को प्रस्तुत किया। इसके उपरान्त उन्होंने आर्सेनिक और फ्लोराइड से प्रभावित क्षेत्रों के अध्ययन का जिक्र करते हुए कहा कि फ्लोराइड के कारण विकलांगता उत्पन्न होती है। मध्य प्रदेश के झाबुआ में पाया गया कि चकवड़ के सेवन से इसका असर कम होता है। इसके अतिरिक्त गंगा बेसिन के आसपास के क्षेत्रों जल में आर्सेनिक की मात्रा मानक से अधिक है। उत्तर प्रदेश के कई हिस्सों में मानक से कई गुणा अधिक आर्सेनिक है। लोगों को यह पता तक नहीं है कि कितना जहरीला पानी पी रहे हैं। पंजाब के कई हिस्सों में पानी मेें यूरेनियम पाया गया है। उन्होंने कहा कि आर्सेनिक, फ्लोराइड को लेकर जो शोध हो रहे हैं, उसे हिन्दी इंडिया वाटर पोर्टल सार्वजनिक करेेगा, ताकि उससे लोग लाभान्वित हो सकें। उन्होंने कहा कि जल से सम्बन्धित पूरी प्रक्रिया में लोगों को जोड़ने की आवश्यकता है। वहीं अशोक घोष ने जनभागीदारी ​और क्रियान्वयन के मुद्दे पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि जिस लिहाज से सरकारी खर्च बढ़ता जा रहा है, उस हिसाब से आम लोगों को योजनाओं का लाभ भी मिलना चाहिए। वहीं विनय कुुमार ने आर्सेनिक से प्रभावित उत्तर बिहार के क्षेत्रों में प्रभावी उपाय नहीं किए जाने की चर्चा की। उन्होंने कुँओं की सफाई की भी बात कही। जबकि खगड़िया के प्रेम भाई ने कहा कि आर्सेनिक किट्स की बात तो की गई, लेकिन जाँच महत्वपूर्ण है। जल के ज्यादा दोहन के कारण आर्सेनिक पाया जा रहा है। आर्सेनिक की मात्रा कुँओं में कम पाई जाती है। लोकस्वास्थ्य अभियन्त्रण विभाग के कार्यपालक अभियन्ता विनय कुमार ने बिहार की स्थिति को रेखांकित करते हुए बताया कि गंगा, बुढ़ी गंडक, बागमती, कमला और महानन्दा ​जैसी नदियाँ बिहार में बहती हैं। विविधता के लिहाज से उत्तर बिहार के क्षेत्र में पानी जहाँ 15 फीट पर उपलब्ध है तो दूसरे इलाके में 60 फीट पर पानी उपलब्ध है। राज्य में 107642 हैण्डपम्प हैं। सुरक्षित जल चुनौती है। राज्य के 13 जिले आर्सेनिक और 11 जिले फ्लोराइड से प्रभावित हैं। इसके अतिरिक्त कई जिलों के जल में आयरन है। उन्होंने कहा कि 80 मीटर के नीचे की गहराई में आर्सेनिक की मात्रा नहीं है। विशाखा भंजना ने समुद्री तट उड़ीसा की स्थिति को रखा और बताया कि किस कदर वहाँ के 8 जिले जल-जमाव से प्रभावित हैं। उन्होंने लवण और गाद की समस्या को विस्तार से रेखांकित किया। बाढ़ग्रस्त क्षेत्र की चर्चा के क्रम में कश्मीर से आए अक्षय कौल ने कश्मीर की तबाही का जिक्र करते हुुए जल निकासी के प्रबन्धन न होने की चर्चा की।

कार्यशाला में पहली बार बिहार के मुंगेर से आए तुषार ने अपने अनुभव के सन्दर्भ में कहा कि कार्यशाला में जिन बिन्दुओं की चर्चा की गई, उससे अब भी लोग बेखबर हैं। यह कार्यशाला जल के सन्दर्भ में ज्ञान का आधार रहा।

कार्यशाला के आरम्भ में मेघ पाईन अभियान के एकलव्य प्रसाद ने कार्यशाला के मकसद को रेखांकित करते हुए कहा कि प्रथम दिन जल के अधिकार पर चर्चा होगी। बिहार के इलाके बाढ़ से प्रभावित रहे हैं। प्राय: देखा गया है कि जहाँ भी बाढ़ आती है, उन क्षेत्रों में जल के अधिकार का हनन् होता है। जहाँ बाढ़ नहीं आती है या जो इन मुद्दों से अनभिज्ञ हैं। उन्हें जल के अधिकार से अवगत् कराना है। उन्होंने कहा कि यह कार्यशाला बिहार में बाढ़ के परिप्रेक्ष्य को लेकर आयोजित की गई है।

बिहार के बाढ़ प्रभावित क्षेत्र में बाढ़ से पहले, बाढ़ के दौरान एवं बाढ़ के बाद जल एवं स्वच्छता अधिकार से वंचित लोगों की समस्याओं को उजागर करना। जहाँ भी बाढ़ आती है, उन क्षेत्रों में जल, स्वच्छता अधिकार का हनन होता है। जहाँ बाढ़ नहीं आती है या जो इन मुद्दों से अनभिज्ञ है। उन्हें जल, स्वच्छता अधिकार से अवगत् कराना है एवं इन मुद्दों से सभी को अवगत कराना है ताकि किसी भी आपदा में लोग जल एवं स्वच्छता के अधिकार को समझ सकें और यह एक बड़े अभियान का हिस्सा बने।

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