यमुना की वजह से संकट में ताज

Submitted by HindiWater on Tue, 02/03/2015 - 12:57
.आगरा का ताजमहल अब केवल एक ऐतिहासिक इमारत, या दुनिया के सात अजूबों में से एक ही नहीं रह गया है, प्रेम की यह निशानी अब भारत की राजनयिक सम्बन्धों की मिलन स्थली बन गया है। पिछले महीने भारत आए अमेरिका के राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा भी वहाँ जाना चाहते थे। इससे पहले कई देशों के ताकतवर राष्ट्राध्यक्ष वहाँ जा चुके हैं।

भले ही ताजमहल दुनिया में प्यार की निशानी हो लेकिन स्थानीय लोगों के लिए यह त्रासदी बनती जा रही है। इसकी चमक बरकरार रखने के लिए पुश्तों से यहाँ रह रहे लोगों पर तमाम बन्दिशें लगाई जाती हैं, जबकि हकीक़त यह है कि ताजमहल के अस्तित्व को खतरे का मूल कारण बेपानी व जहरीली हो रही यमुना नदी है।

ताजमहल के सफेद संगमरमर के पीला पड़ने पर सरकार चिन्तित है। एक संसदीय दल वहाँ के हालात देखने को भेजा जा रहा है। आगरा में गोबर के उपलों को जलाने पर रोक की योजना है ताकि सदियों से प्रेम का सन्देश दे रहे ताजमहल की सफेद रंग बरकरार रखा जा सके। इन दिनों ताजमहल को ‘फेस पैक’ लगाया जा रहा है, कोशिश है कि ‘मसाज’ कर उसकी रंगत को वापिस लाया जाए।

दुनिया के कई देशों के लोग ताज महल को आश्चर्य मानते हैं। आश्चर्य इसकी बनावट या खूबसूरती के कारण नहीं, बल्कि इतनी लापरवाही से उसकी देखभाल करने के बावजूद इतने लम्बे समय तक इसका अस्तित्व बरकरार रहने के कारण! ताज की खूबसूरती पर खतरे के बादल मँडरा रहे हैं। प्रमाण हैं कि इस बेशकीमती इमारत की मीनारों में झुकाव आ रहे हैं।

ताज की ताजतरीन समस्या उसके पत्थरों व नक्कासी के जगह-जगह से चटकने की है। मुख्य इमारत के बाहरी हिस्से में जहाँ बेहतरीन, नफीस नक्कसी है, वहाँ गहरी दरारें देखी जा सकती हैं। इसके खम्बों पर संगमरमर भी कई जगह चटक गया हैं।

सरकारी अफसर इसे कोई बड़ी समस्या नहीं मानते, लेकिन कई-कई हजार किलोमीटर दूर से इस अजूबे को देखने आने वालों की आँख में तो यह खटकता है। इस वैज्ञानिक तथ्य को लगातार नजरअन्दाज किया जाता रहा है कि ताजमहल की आलीशान इमारत जिस नींव पर टिकी है उसमें नमी बरकरार रखना जरूरी है, वरना यह ढाँचा कभी भी अपना सन्तुलन खो सकता है।

सनद रहे यूनेस्को ने सन् 1983 में ताज को विश्व विरासत घेाषित किया था। ऐसी सभी इमारतों के संरक्षण के लिए यूनेस्को समय-समय पर धन और तकनीकी सहायता उपलब्ध करवाता है। ताज के साथ भी ऐसा हुआ, लेकिन सन् 2000 में जिस तरह सुप्रीम कोर्ट और अन्तरराष्ट्रीय संस्थाओं के कड़े निर्देशों के बावजूद ताजमहल और आगरा के किले के बीच काॅरीडोर बनाने का काम शुरू हुआ था, उससे प्यार के इस नायाब तोहफे को बहुत कुछ नुकसान हुआ।

हालांकि काम रुक गया, उत्तर प्रदेश की सरकार पलट गई, लेकिन यमुना में जो बन्धान का काम हुआ, उससे नदी का बहाव प्रभावित हुआ है। जाहिर है कि इसका असर ताज की संरचना पर पड़ रहा है। यही नहीं इस अधूरे पड़े कॉरीडोर को आगरा नगर निगम ने शहर भर का कचरा डम्प करने की खन्दक बना लिया है। यहाँ यह भी याद रखना होगा कि कचरे के सड़ने से निकलने वाली मीथेन गैस संगमरमर की सेहत के लिए बेहद नुकसानदेय होती हैं।

ताजमहल को सबसे बड़ा खतरा तो यमुना का बहाव बदलने से हैं। सनद रहे कि ताजमहल को बनाते समय उसकी नींव को नदी के जलस्तर तक खोदा गया था। फिर पतली ईंटें और चूने से कुएँ की आकृति की नींव तैयार की गई थी। यहाँ कोई साढ़े तीन सौ कुएँ हैं जिनमें चूना व लकड़ी का बुरादा भरा है।

सन् 1631 में अपनी पत्नी मुमताज महल की याद में ताजमहल बनवाने वाले मुगल बादशाह शाहजहाँ को यह सपने में भी गुमान नहीं होगा कि जिस ताज को वह प्रेम की अमर कृति के रूप में बना रहा है, उस पर मुल्ला-मौलवी, मन्दिर-मस्जिद विवाद का साया मँडराएगा। आजादी से पहले सन् 1942 में सर्वे ऑफ इण्डिया की एक रिपोर्ट को उजागर किया गया था, जिसमें बताया गया था कि ताज यमुना नदी में 1.44 इंच धँस गया है। सरकार भले ही लाख मना करे, लेकिन धँसने की क्रिया आज भी जारी है। सन् 1965 में प्रसिद्ध इतिहासविद् प्रो. रामनाथ ने ताजमहल का एक सर्वेक्षण किया था। उसमें उन्होंने बताया था कि यदि ताज के सौन्दर्य को अक्षुण्ण रखना है तो जरूरी है कि यमुना में पानी का स्तर उतना ही रखा जाए, जितना 17वीं शताब्दी में यहाँ हुआ करता था। दुर्भाग्य है कि प्रो. रामनाथ की सिफारिशों को कहीं सरकारी बस्ते लील गए और बीसवीं सदी आते-आते नदी किनारे का पानी सुखा कर वहाँ बाजार बसाने की योजनाएँ बनने लगीं।

ग़ौरतलब है कि मीनारों के झुकने का खतरा आजादी से पहले अंग्रेज सरकार ने भाँप लिया था। तभी सन् 1942 में मीनारों पर पर्यटकों के जाने पर रोक लगा दी गई थी, जो आज भी जारी है। वैसे जब ताज का मूल डिज़ाइन बनाया गया था, तब यमुना नदी में साफ और शुद्ध जल निरन्तर बारहों महीने बना रहता था। जब तक यमुना में पावन जल रहेगा, तभी तक ताजमहल का अस्तित्व है।

विडम्बना है कि इस तथ्य को जानते परखते हुए भी आगरा में यमुना नदी को रासायनिक अपशिष्ट और शहरी गन्दगी का नाला बना दिया गया है। शहर के सभी नाले बगैर किसी उपचार के यमुना में गिर रहे हैं। ताज से सटा श्मशान घाट सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी यथावत हैं। धोबी घाट भी नहीं हटा है। केन्द्रीय प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड के मुताबिक ताजमहल के आसपास नाईट्रोजन ऑक्साइड, सल्फरडाई ऑक्साइड और एसपीएम की मात्रा निर्धारित मात्रा से चार गुणा अधिक हैं।

सन् 1993 रुड़की विश्वविद्यालय के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के तीन विशेषज्ञों के दल ने एक जाँच में चेताया था कि ताजमहल स्वयं के वजन के कारण जमीन में 80 मिलीमीटर धँस गया है।

आगरा से सटे मथुरा, फिरोजाबाद, हाथरस, भरतपुर और अलीगढ़ के कई कारखाने हर रोज सैंकड़ों टन सल्फर डाइ ऑक्साइड गैस छोड़ रहे हैं। इससे ईरानी संगमरमर के काले होने का खतरा है। एक जनहित याचिका पर सन् 1993 में सुप्रीम कोर्ट नेेेे लगभग साढ़े पाँच सौ उद्योगों को ताजमहल की खातिर बन्द करवा दिया था। बाद में इनमें से अधिकांश कारखानों ने प्रदूषणरोधी संयन्त्र लगवाने की सूचना दी। बाद में अदालत ने फीरोजाबाद क्षेत्र के 65 उद्योगों को छोड़कर शेष सभी को चलाने की अनुमति दे दी थी।

यह चर्चा आम है कि न तो कारखानों से निकलने वाला धुआँ कम हुआ है और न ही ताजमहल को होने वाला नुकसान, लेकिन सरकारी कागजों पर तो सब कुछ ठीक बताया जा रहा है। ताजमहल को स्थानीय उद्योगों से होने वाले नुकसान की जाँच के लिए केन्द्र सरकार की वरदराजन कमेटी व उत्तर प्रदेश शासन की त्रिपाठी समिति की रिपोर्ट देखें तो पता चलेगा कि इलाके के कारखानों से ताजमहल को कोई नुकसान है ही नहीं।

सन् 1631 में अपनी पत्नी मुमताज महल की याद में ताजमहल बनवाने वाले मुगल बादशाह शाहजहाँ को यह सपने में भी गुमान नहीं होगा कि जिस ताज को वह प्रेम की अमर कृति के रूप में बना रहा है, उस पर मुल्ला-मौलवी, मन्दिर-मस्जिद विवाद का साया मँडराएगा। आजादी से पहले सन् 1942 में सर्वे ऑफ इण्डिया की एक रिपोर्ट को उजागर किया गया था, जिसमें बताया गया था कि ताज यमुना नदी में 1.44 इंच धँस गया है। सरकार भले ही लाख मना करे, लेकिन धँसने की क्रिया आज भी जारी है।

सन् 1993 में रुड़की विश्वविद्यालय के इंजीनियरों के एक दल ने ताज का अध्ययन किया था, जिसमें मीनारों के लगातार झुकने की बता कही थी। इसका मुख्य कारण यमुना में पानी की कमी ही है। समिति ने यह भी चेताया था कि ताज को औद्योगिक प्रदूषण से बचाने के लिए तो बड़े-बड़े कदम उठाए जा रहे हैं, लेकिन भवन के निर्माण दोष या उसकी पारिस्थितिकी पर कतई गौर नहीं किया जा रहा है।

आज ताज को बचाने के नाम पर कई कारखानों का विस्थापन हो चुका हैं। शहर में चलने वाले डीजल के टेम्पो को हरे रंग से पोत कर शहर को हरा-भरा बताने का मजाक हो रहा है। ताज के करीबी कालोनियों में गैस के सिलेण्डर बाँटने में हुई बन्दर-बाँट की तो काई चर्चा भी करता है। ताज को बचाने के फेर में लाखों लोगों की रोजी-रोटी के साधन नहीं बच पाए, लेकिन हालत जस-के-तस हैं।

यह अब आम धारणा बनती जा रही है कि ताज को खतरा प्रदूषण से कम और बाजारवाद से ज्यादा है। तभी तो धुआँ, धूल और धूप से इसके संगमरमर पर पड़ रहे विषम प्रभावों पर तो लगातार बयान, आदेश और कार्यवाहियाँ हो रही हैं। जाहिर है कि इसकी चपेट में अधिकांश गरीब पुश्तैनी कारीगर व छोटे उद्योग आ रहे हैं।

ताजमहलजबकि इमारत की वास्तु, बनावट और आधार पर जल व जमीन के साथ हो रही छेड़छाड़ के कारण पड़ रहे भयंकर परिणामों पर कोई चर्चा करने को भी तैयार नहीं है। यहाँ तक कि जब कोई तकनीकी विशेषज्ञ इस पर टिप्पणी करता है, सरकारी बयान उसे झूठा साबित करने में जुट जाते हैं।

जब ताजमहल इतने प्रदूषण से जूझ रहा है, तब पुरातत्व विभाग इस पर मुल्तानी मिट्टी का लेप कर इसकी चमक वापसी का दावा कर रहा हैं। हालांकि पिछले अनुभव सामने हैं कि इस तरह के लेप से कुछ महीनों तक तो ताज चमकता है, लेकिन बाद में इसकी हालत पहले जैसी ही हो जाती हैं। वास्तव में मुल्तानी मिट्टी ‘फुलर्ज अर्थ’ है, जिसका मूल रसायन एल्यूमिनियम सिलिकेट हेाता हैं।

इस रसायन का इस्तेमाल भेड़ों की ऊन साफ करने में एक रंजक या ब्लीच के तौर पर होता है। इस मिट्टी के पेस्ट को ताजमहल की बाहरी दीवारों पर लगाया जाता है। दो दिनों में यह पेस्ट अपने आप गिर जाता है। इसके बाद संगमरमर की सतह को डिस्टिल वाटर से साफ किया जाता है। इससे पहले सन् 1994, 2001 और 2008 में भी ऐसे लेप लगाए गए थे।

यहाँ विचारणीय है कि जो ताज तीन सौ साल से अपनी नैसर्गिक चमक से दमकता रहा है, यदि उसे बार-बार बाहरी रसायनों का आदी बन दिया गया तो कहीं ऐसे लेप की जरूरत हर साल ना पड़े। क्या हम अपनी राष्ट्रीय धरोहरों को इस तरह के प्रयोग कर जोखिम में नहीं डाल रहे हैं?

हो सकता है कि कुछ दिनों के लिए ताजमहल फिर चमक जाए, लेकिन यदि यमुना की गति और प्रदूषण की रफ्तार ऐसी ही रही तो यह गर्व के गुम्बद अर्रा कर दरक भी सकते हैं।

Disqus Comment

More From Author

Related Articles (Topic wise)

Related Articles (District wise)

About the author

पंकज चतुर्वेदीपंकज चतुर्वेदीपंकज चतुर्वेदी
सहायक संपादक
नेशनल बुक ट्रस्ट,
5 नेहरू भवन, वसंतकुंज इंस्टीट्यूशनल एरिया,
नई दिल्ली, 110070 भारत

नया ताजा