सौर ऊर्जा के विकास के प्रयास

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योजना, अप्रैल 2010
देश के गाँवों में अनाज सुखाने और खाद्य संरक्षण के लिए सनातन काल से सूर्य के ताप का इस्तेमाल होता आ रहा है। जरूरत है एक ऐसी तकनीक की जो इस सौर ताप को संग्रहित कर उसको जब चाहे तब उपयोग में लाने लायक बना दे। छोटे पैमाने पर बिजली पैदा करने के लिए सौर ऊर्जा एक आदर्श स्रोत है, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों की ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने में सौर ऊर्जा काफी कारगर साबित हो सकती है। अनेक राज्यों के कई गाँवों में सड़कों पर रात्रिकालीन प्रकाश के लिए सौर ऊर्जा के उपकरणों और लालटेनों का उपयोग धीरे-धीरे जोर पकड़ने लगा है। सरकार ने देश की ऊर्जा की माँग में दिन प्रतिदिन हो रही वृद्धि को पूरा करने के लिए वैकल्पिक ऊर्जा का बड़े पैमाने पर दोहन का संकल्प व्यक्त किया है। वैकल्पिक ऊर्जा के विभिन्न स्रोतों में सौर ऊर्जा के दोहन पर विशेष जोर दिया जा रहा है। इसी आशय से जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रीय सौर मिशन बनाया गया है जो जलवायु परिवर्तन पर भारत की 8 कार्ययोजनाओं में सर्वोपरि स्थान रखता है। इस अति महत्वाकांक्षी कार्यक्रम का शुभारम्भ प्रधानमन्त्री डाॅ. मनमोहन सिंह ने 11 जनवरी, 2010 को नयी दिल्ली में आयोजित एक समारोह में किया।

देश के वर्तमान ऊर्जा परिदृश्य और जलवायु परिवर्तन के बारे में बढ़ रही चिन्ताओं को देखते हुए सौर मिशन की शुरुआत एक महत्वपूर्ण पहल कही जा सकती है। सौर मिशन भारत के हजारों गाँवों में रहने वाले करोड़ों ग्रामवासियों को विद्युत शक्ति का लाभ उठाने का अवसर प्रदान करेगा और मिट्टी का तेल, कोयला और अन्य जीवाश्म ईंधनों पर उनकी निर्भरता को कम करने में सहायक बनेगा।

जून 2008 में प्रधानमन्त्री ने जलवायु परिवर्तन पर जो राष्ट्रीय कार्ययोजना घोषित की थी उसमें कहा गया था कि भारत एक उष्ण कटिबन्धीय देश है, जहाँ सूर्य का प्रकाश प्रतिदिन काफी लम्बे समय तक और काफी तेजी के साथ उपलब्ध रहता है। इसलिए ऊर्जा के प्रबल स्रोत के रूप में सौर ऊर्जा भविष्य की ऊर्जा साबित हो सकती है।

प्रधानमन्त्री ने कहा है कि सौर ऊर्जा का अधिकाधिक उपयोग सरकार की रणनीति जलवायु परिवर्तन का प्रमुख अंग है जिसमें अक्षय ऊर्जा और ऊर्जा के स्वच्छ स्रोतों पर आधारित दीर्घकालिक विकास की अवधारणा को मूर्त रूप देने का संकल्प लिया गया है। सौर मिशन का लक्ष्य सौर ऊर्जा के क्षेत्र में भारत को विश्व का अग्रणी देश बनाना है।

न केवल सौर ऊर्जा उत्पादन के क्षेत्र में, बल्कि सौर ऊर्जा के उत्पादन की प्रौद्योगिकी और उसके उपयोग के उपकरणों के उत्पादन के क्षेत्र में भी। सौर ऊर्जा, सूर्य से प्राप्त ऊष्मा को विद्युत शक्ति में बदलने से प्राप्त होती है। इसके लिए सोलर पैनलों की आवश्यकता होती है।

सोलर पैनल में सोलर सेल होते हैं जो सूर्य की ऊर्जा को इस्तेमाल लायक बनाते हैं। ये कई प्रकार के होते हैं। उदाहरण के लिए पानी गर्म करने वाले सोलर पैनल, बिजली पहुँचाने वाले सोलर पैनलों से अलग होते हैं। इसे दो प्रकार से उपयोग में लाने योग्य बनाया जाता है। पहला- सोलर थर्मल विधि। इसमें सूर्य की ऊर्जा से हवा या तरल पदार्थ को गर्म किया जाता है।

इस विधि का उपयोग घरेलू कार्यों में किया जाता है। दूसरी विधि है- प्रकाश विद्युत। इस विधि में सौर ऊर्जा को बिजली में बदलने के लिए फोटोवोल्टेक (बैटरियों) सेलों का उपयोग होता है। ये वैसे तो महंगे होते हैं परन्तु इनका रखरखाव सरल और सस्ता होता है। व्यापक पैमाने पर विद्युत उत्पादन के लिए पैनलों पर भारी निवेश करना पड़ता है।

विश्व के अनेक स्थानों में सूर्य का प्रकाश कम होता है। अतः वहाँ सोलर पैनल कारगर नहीं हो सकते। इसके अलावा, वर्षा ऋतु में भी सोलर पैनल ज्यादा बिजली नहीं बना पाते। आजकल सौर ऊर्जा से पानी गर्म करने वाला उपकरण देश में व्यापक रूप से इस्तेमाल होता है। अनेक संस्थानों, होटलों, भवन निर्माताओं ने सोलर वाटर हीटर का उपयोग करना शुरू कर दिया है और इससे न केवल बिजली की बचत हो रही है बल्कि उपभोक्ताओं के पैसे भी बच रहे हैं। कार्बन उत्सर्जन में जो कमी हो रही है वह तो है ही।

देश के गाँवों में अनाज सुखाने और खाद्य संरक्षण के लिए सनातन काल से सूर्य के ताप का इस्तेमाल होता आ रहा है। जरूरत है एक ऐसी तकनीक की जो इस सौर ताप को संग्रहित कर उसको जब चाहे तब उपयोग में लाने लायक बना दे। छोटे पैमाने पर बिजली पैदा करने के लिए सौर ऊर्जा एक आदर्श स्रोत है, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों की ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने में सौर ऊर्जा काफी कारगर साबित हो सकती है।

अनेक राज्यों के कई गाँवों में सड़कों पर रात्रिकालीन प्रकाश के लिए सौर ऊर्जा के उपकरणों और लालटेनों काउपयोग धीरे-धीरे जोर पकड़ने लगा है। महानगरों में चैराहों पर यातायात संकेतकों के लिए भी सौर ऊर्जा का इस्तेमाल होने लगा है। इन सब कार्यों में मुख्य रूप से फोटोवोल्टेक सेलों का उपयोग होता है। इनकी पूँजी लागत शुरू में तो काफी होती है, पर विद्युत पोषण में ” ह्रास की कोई सम्भावना के न होने और इसके परिचालन में कोई खर्च न होने की वजह से यह कुल मिलाकर सस्ती ही पड़ती है वायुमण्डल की स्वच्छता बनी रहती है, सो अलग से।

सौर ऊर्जा के दोहन में सबसे बड़ी समस्या यही है कि प्रारम्भिक लागत काफी ज्यादा होती है। सौर मिशन के माध्यम से एक ऐसे फार्मूले की तलाश है जो इस लागत में कमी ला सके।

उपयुक्त सरकारी समर्थन के माध्यम से सौर मिशन को इस मिशन को अंजाम देना होगा। इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए मिशन सब्सिडी देने के बारे में विचार कर रहा है। सौर ऊर्जा के नवाचारी अनुप्रयोगों के लिए 30 प्रतिशत तक सब्सिडी देने की योजना विचाराधीन है। मिशन की एक मंशा यह भी है कि ग्रामीण क्षेत्रों के विद्यार्थी कम्प्यूटरों को चलाने के लिए भी सौर ऊर्जा का इस्तेमाल हो। साथ ही प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों के आवश्यक उपकरणों के संधारण में भी सौर ऊर्जा का ही यथासम्भव उपयोग हो।

विद्युत प्रदाय की स्थिति अधिकांश गाँवों में भरोसेमन्द नहीं होती, इसलिए अस्पतालों में, जहाँ लोगों के जीवन-मरण का प्रश्न रहता है, सौर ऊर्जा पर निर्भरता अधिक विश्वसनीय रहेगी। सौर मिशन, ऊर्जा उत्पादन से जुड़े उपकरणों के निर्माण और प्रौद्योगिकी को भी बढ़ावा देगा। भारत की प्रमुख औद्योगिक और व्यावसायिक संस्था- फेडरेशन आॅफ इंडियन चैंबर्स आॅफ काॅमर्स एंड इंडस्ट्रीज (फिक्की) भी अब सौर मिशन से जुड़ गई है।

इसके जुड़ने से इस उद्योग में तेजी आएगी ऐसा विश्वास है। प्रधानमन्त्री डाॅ. मनमोहन सिंह ने राष्ट्रीय सौर मिशन का उद्घाटन करते हुए सौर ऊर्जा को ऊर्जा का अक्षय और असीम स्रोत बताने के साथ निःशुल्क स्रोत बताया और कहा कि देश की ऊर्जा सुरक्षा और जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों का सामना करने के लिए इसका भरपूर उपयोग किया जाना चाहिए।

उन्होंने सौर ऊर्जा को ऊर्जा का मुख्य स्रोत बनाने के लिए इसके इस्तेमाल को कम खर्चीला बनाने तथा लम्बे समय तक इसका भण्डारण सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर बल दिया। इस सन्दर्भ में उन्होंने नैनो जैसी आधुनिक प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल करने का भी सुझाव दिया।

प्रधानमन्त्री ने देश में ‘सोलर वैलियाँ’ सौर घटियाँ बनाने की योजना पेश की। उन्होंने आशा व्यक्त की कि सब कुछ ठीक ढंग से चलता रहा तो आने वाले कुछ वर्षों में सूचना प्रौद्योगिकी की ही तरह भारत सौर ऊर्जा के क्षेत्र में भी विश्व का अग्रणी देश बनकर उभरेगा।

सोलर वैली उस औद्योगिक क्षेत्र को कहते हैं जहाँ पारम्परिक विद्युत के बजाय सौर ऊर्जा का इस्तेमाल होता है। चीन, जर्मनी और यूनान में इस प्रकार के कुछ औद्योगिक क्षेत्र विकसित किए गए हैं। चीन के प्रसिद्ध हिमिन उद्योग समूह ने इस दिशा में सबसे पहले शोध एवं विकास केन्द्र खोला। चीन के ही झाऊ सोलर वैली में स्थित उद्योगों में सौर ऊर्जा का उपयोग होने लगा है और यह क्षेत्र ऊर्जा की खपत में लगभग 70 प्रतिशत की बचत कर रहा है।

जर्मनी के फ्रैंकफर्ट शहर के पास भी सौर घाटी विकसित की जा रही है। यूरोप के अन्य देशों में भी सौर घाटियों के विकास की प्रक्रिया विभिन्न चरणों में है। परन्तु यूरोपीय देशों की तुलना में भारत में इस तरह के प्रयोग की सफलता की सम्भावना कहीं अधिक है। सोलर वैली की उपयोगिता को देखते हुए देश में सौर विज्ञान, इंजीनियरी, अनुसन्धान और विकास तथा विनिर्माण की व्यापक सम्भावनाएं हैं।

अतः औद्योगिक घरानों को इस दिशा में आगे आने की आवश्यकता है। इससे देश की अत्यावश्यक माँग तो पूरी होगी ही, शिक्षा और रोजगार के अनेक नए अवसर उपलब्ध होंगे। सौर घाटियाँ जलवायु परिवर्तन की समस्या से निपटने में भी मदद करेंगी।

प्रधानमन्त्री ने सौर ऊर्जा मिशन को ‘सोलर इण्डिया’ का ब्राण्ड नाम देते हुए कहा है कि राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्ययोजना में राष्ट्रीय सौर मिशन की अहम भूमिका रहेगी। इसके अन्तर्गत तेरहवीं पंचवर्षीय योजना तक (यानी 2022 तक) 20 हजार मेगावाट सौर ऊर्जा के उत्पादन का लक्ष्य है। केन्द्रीय नवीन और नवीकरणीय ऊर्जामन्त्री डाॅ. फारुक अब्दुल्ला ने इसे स्पष्ट करते हुए बताया कि 2022 तक 2 करोड़ वर्गमीटर के सौर उष्मा संग्राहक लगाने का लक्ष्य है, जिससे 7,500 मेगावाट विद्युत की बचत होगी।

इसके अलावा इसी अवधि में 2 करोड़ सौर प्रकाश (सोलर लाइट) लगाने का भी लक्ष्य है। इससे प्रतिवर्ष करीब एक अरब लीटर मिट्टी के तेल की बचत होगी। सरकारी आँकड़ों के अनुसार भारत की कुल स्थापित विद्युत उत्पादन क्षमता 155.8 जीडब्ल्यू (गीगावाट) है, जिसमें से नवीकरणीय (अक्षय) ऊर्जा का हिस्सा केवल दस प्रतिशत है। इस स्वच्छ ऊर्जा का अधिकांश भाग पवन ऊर्जा का है। सौर ऊर्जा का अंशदान नगण्य है। सौर मिशन के तहत अगले तीन वर्षों में 1, 300 मेगावाट सौर ऊर्जा के उत्पादन का लक्ष्य है। इसमें से 1,100 मेगावाट ऊर्जा को ग्रिड से जोड़ा जाएगा और करीब 200 मेगावाट ऊर्जा ग्रिड से अलग उपयोग में ली जाएगी।

यह सौर मिशन की पहली कसौटी होगी। यदि यह लक्ष्य समय पर हासिल हो जाता है तो बाकी का लक्ष्य हासिल करना असम्भव नहीं होगा। जैसाकि पहले कहा जा चुका है, सौर ऊर्जा उत्पादन की, विशेषकर ग्रिड से जोड़े जाने वाली ऊर्जा की प्रारम्भिक लागत बहुत अधिक होती है। पहली प्राथमिकता इसमें यथासम्भव कमी लाने की है।

अनुसन्धान परिषद और उत्कृष्टता केन्द्र, दोनों मिलकर वर्तमान सौर अनुसन्धान सुविधाओं की क्षमता में गुणात्मक सुधार लाने का प्रयास करेंगे। भारत को परमाणु ऊर्जा और अन्तरिक्ष प्रौद्योगिकी में विश्वस्तरीय वैज्ञानिक और तकनीकी क्षमताओं वाला देश बनाने में जवाहरलाल नेहरू की दूरदृष्टि के कारण ही औद्योगिक क्रान्ति का पदार्पण हुआ और भारत ने विश्व के अग्रणी देशों में अपनी जगह बनाई। अब उनके नाम पर रखे गए सौर ऊर्जा मिशन से भी यही आशा है कि इस क्षेत्र में भी ऐसी ही क्रान्ति सम्भव हो सकेगी।सौर मिशन के अनुसार एनटीपीसी विद्युत व्यापार निगम अगले तीन वर्षों में केन्द्रीय विद्युत नियामक आयोग द्वारा निर्धारित दरों पर सौर ऊर्जा खरीदेगा। राज्य सरकारों की विद्युत इकाइयों को सौर ऊर्जा के बराबर ही ताप बिजली दी जाएगी।

इस प्रकार महंगी और सस्ती बिजली की मिश्रित दर उपभोक्ताओं पर लागू होगी, जो बहुत ज्यादा नहीं होगी। एक अनुमान के अनुसार यह पांच रुपये प्रतियूनिट या उससे कम ही होगी। सौर ऊर्जा को बढ़ावा देने वाली नीति के तहत् हाल ही में (12 जनवरी, 2010 को) दिल्ली में विद्युत कम्पनी बीएसईएस ने एक अन्य निजी कम्पनी ऐक्मे के साथ समझौता किया है जिसके तहत बीएसईएस राजधानी और बीएसईएस यमुना को अगले 25 वर्षों तक 50 मेगावाट सौर ऊर्जा मिलेगी।

दिल्ली सरकार के विद्युत सचिव की उपस्थिति में यह समझौता सम्पन्न हुआ। प्राप्त जानकारी के अनुसार गुड़गाँव स्थित ऐक्मे टेलीपाॅवर लिमिटेड कम्पनी राजस्थान के विभिन्न भागों में सौर ऊर्जा के संयन्त्र लगा रही है, जिनसे 150 मेगावाट बिजली का उत्पादन होगा। जैसलमेर, बीकानेर और जोधपुर में लगने वाले सौर ऊर्जा संयन्त्रों से 50-50 मेगावाट सौर विद्युत का उत्पादन किया जाएगा।

आशा है कि अगले वर्ष के मध्य तक इन संयन्त्रों में विद्युत उत्पादन शुरू हो जाएगा। दिल्ली को जो बिजली दी जाएगी, वह जैसलमेर संयन्त्र से प्राप्त होगी। बिजली की कीमत केन्द्रीय विद्युत नियामक आयोग तय करेगा। कुछ अन्य प्रयास इस प्रकार हैं:

सौर ऊर्जा के उपयोग को प्रोत्साहन की दिशा में राष्ट्रपति भवन ने एक आदर्श कदम उठाया है। राष्ट्रपति भवन में विद्युत आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु 50 किलोवाट क्षमता का सौर ऊर्जा संयन्त्रा लगाया गया है। राष्ट्रपति भवन परिसर में सौर ऊर्जा से जलने वाले 100 पथ प्रकाश (स्ट्रीट लाइट) भी लगाए गए हैं। इसका उद्घाटन 25 जुलाई, 2009 को राष्ट्रपति ने किया।

देश का पहला मेगावाट स्तर का ग्रिड से जुड़ने योग्य सोलर फोटोवोल्टेक पावर प्लांट पश्चिम बंगाल के आसनसोल में स्थापित किया गया है। इसकी स्थापना वेस्ट बंगाल ग्रीन एनर्जी डेवलपमेंट कार्पोरेशन ने की है। भारत की सबसे बड़ी सौर ऊर्जा से चलने वाली खाना पकाने की प्रणाली शिरडी के प्रसिद्ध साईं बाबा के मंदिर परिसर में लगाई गई है, जिसमें प्रतिदिन करीब 17 हजार लोगों के लिए खाना पकता है। इस परियोजना का उद्घाटन डाॅ. फारुक अब्दुल्ला ने 30 जुलाई, 2009 को किया था।

सौर ऊर्जा का एक रोचक परन्तु प्रभावी उपयोग महाराष्ट्र के किसानों ने करना शुरू किया है। राज्य के अहमदनगर और कुछ अन्य जिलों के किसानों और फलोत्पादकों ने जानवरों से अपने खेतों की रक्षा के लिए सौर ऊर्जा संवाहित बाड़ लगाकर एक अभिनव प्रयास किया है। विद्युत (सौर ऊर्जा) प्रवाहित इस तार को छूने पर जोरदार झटका लाता है। बड़े-से-बड़ा पशु भी झटका खाने के बाद दोबारा इस बाड़ के पास आने का प्रयास नहीं करता।

बाड़ की यह तरकीब स्थानीय किसानों में काफी लोकप्रिय हो रही है। सिद्धान्त रूप से देश के 30 शहरों को ‘सौर नगरों’ के रूप में विकसित करने की स्वीकृति दी जा चुकी है। इनमें से 12 नगरों का मास्टर प्लान बनाया जा रहा है। सौर नगर का लक्ष्य पारम्परिक ऊर्जा की माँग में कम-से-कम 10 प्रतिशत की कमी लाना है। इसके लिए वैकल्पिक ऊर्जा के उपयोग के साथ-साथ ऊर्जा खपत में किफायत बरतना भी शामिल है। सौर ऊर्जा का उपयोग बढ़ाना इसी कार्यक्रम का अंग है।

अरुणाचल प्रदेश के दूरदराज के सीमावर्ती 512 गाँवों में सोलर फोटोवोल्टेक प्रणाली से बिजली पहुँचाई गई है। इसके अलावा जम्मू-कश्मीर की गुरेज़ तहसील के 27 गाँवों के 3,900 घरों में सौर ऊर्जा से प्रकाश की व्यवस्था की गई है और वे आधुनिक प्रकाश प्रणाली का पूरा आनन्द उठा रहे हैं।

कोलकाता के राजभवन में भी प्रकाश, पथ प्रकाश और पानी गर्म करने के लिए 50 किलोवाट का सौर ऊर्जा संयन्त्र लगाया गया है। इस संयन्त्र का उद्घाटन राष्ट्रपति ने 7 दिसम्बर, 2009 को किया। विशेष क्षेत्र प्रदर्शन परियोजना (एसएडीपी) के तहत स्थापित इस परियोजना के अतिरिक्त, इसी प्रकार की एक और योजना छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के राजभवन के लिए भी स्वीकृत की गई है। वहाँ 45 किलोवाट का सौर ऊर्जा संयन्त्रा लगाया जाएगा।

सोलर फोटोवोल्टेक प्रणालियों, यथा- सौर प्रकाश, सौर लालटेन, सौर पम्प आदि के लिए ऋण देने के लिए बैंकों को प्रोत्साहित करने की योजना है। सौर मिशन के माध्यम से इस प्रकार की व्यवस्था करने का प्रस्ताव है कि बैंक अपनी वर्तमान दरों पर ही इनके लिए ऋण प्रदान करें।

सौर ऊर्जा मिशन का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य देश में सौर ऊर्जा का उत्पादन करने वाले संयन्त्रों के निर्माण को प्रोत्साहित करना है। भारत में अभी 700 मेगावाट की फोटोवोल्टेक इकाइयों के निर्माण की क्षमता है। प्रयास है कि पाॅली सिलिकाॅन सामग्री के निर्माण की क्षमता इस प्रकार बढ़ाई जाए कि प्रतिवर्ष सोलर सेलों की क्षमता में 2 गीगावाट की वृद्धि हो सके।

देश में सिलिकाॅन सामग्री के निर्माण की क्षमता अभी बहुत सीमित है। परन्तु शीघ्र ही सार्वजनिक और निजी क्षेत्र में भी कुछ संयन्त्रों की स्थापना होने की सम्भावना है। सौर तापीय ऊर्जा संयन्त्रों की माँग को पूरा करने के लिए संग्राहकों, रिसीवरों और अन्य उपकरणों की बड़े पैमाने पर उत्पादन की जरूरत है। सौर मिशन इस काम में उत्प्रेरक की भूमिका निभाने का काम करेगा।

इसके लिए विशेष प्रोत्साहन पैकेज की नीति तैयार की गई है। सूचना प्रौद्योगिकी विभाग की इस योजना के तहत् फोटोवोल्टेक सेलों के निर्माण से सम्बन्धित 15 प्रस्ताव सरकार के पास विचाराधीन हैं। इनमें क्रिस्टलीय और बारीक फिल्म वाले, दोनों प्रकार के सेलों के निर्माण का प्रस्ताव शामिल है। इन सभी 15 कम्पनियों की सम्मिलित क्षमता से 2022 तक 8-10 गीगावाट सौर ऊर्जा का उत्पादन किया जा सकेगा, जो मिशन के लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए पर्याप्त होगा।

सौर ऊर्जा के उत्पादन को प्रोत्साहित करने के लिए अनुसन्धान एवं विकास की गतिविधियों के उन्नयन की योजना बनाई गई है। इसका उद्देश्य विद्यमान अनुप्रयोगों की कार्यकुशलता में सुधार, संयन्त्रों और उपकरणों की लागत में कटौती, सुविधाजनक और किफायती भण्डारण क्षमता में विस्तार करना है। जहाँ तक अनुसन्धान का प्रश्न है, निम्नलिखित विषयों पर विशेष शोर दिया जा रहा है:

1. अभिनव प्रक्रियाओं और सामग्रियों तथा अनुप्रयोगों के विकास की दीर्घकालिक दृष्टि से बुनियादी अनुसन्धान,
2. मौजूदा प्रक्रियाओं, सामग्रियों और प्रौद्योगिकी में सुधार के लिए व्यावहारिक अनुसन्धान ताकि वर्तमान संयन्त्रों, उपस्करों के कामकाज को बेहतर बनाया जा सके।
3. पारम्परिक ऊर्जा प्रणालियों के साथ मिलकर काम करने वाली (हाइग्रिड) प्रणाली के विकास की प्रौद्योगिकी की स्वीकार्यता।
4. सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्र की सहभागिता से अनुसन्धान और विकास सम्बन्धी अधोसंरचना का विकास।

सौर मिशन के अन्तर्गत उपर्युक्त लक्ष्यों को मूर्त रूप देने के लिए एक अनुसन्धान परिषद की स्थापना पर शोर दिया गया है, जिसमें जाने-माने वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों के साथ उद्योग जगत और सरकार के प्रतिनिधि शामिल होंगे। इसके साथ ही एक राष्ट्रीय उत्कृष्टता केन्द्र स्थापित करने की बात भी कही गई है, जो अनुसन्धान परिषद द्वारा तैयार योजना पर अमल करने के लिए अनुसन्धान एवं विकास केन्द्रों के अनुसन्धान के निष्कर्षों के परीक्षण, प्रमाणन और उनको विधि मान्यता प्रदान करने के अलावा सौर ऊर्जा उद्योग के मानक भी निर्धारित करेगा।

अनुसन्धान परिषद और उत्कृष्टता केन्द्र, दोनों मिलकर वर्तमान सौर अनुसन्धान सुविधाओं की क्षमता में गुणात्मक सुधार लाने का प्रयास करेंगे। भारत को परमाणु ऊर्जा और अन्तरिक्ष प्रौद्योगिकी में विश्वस्तरीय वैज्ञानिक और तकनीकी क्षमताओं वाला देश बनाने में जवाहरलाल नेहरू की दूरदृष्टि के कारण ही औद्योगिक क्रान्ति का पदार्पण हुआ और भारत ने विश्व के अग्रणी देशों में अपनी जगह बनाई। अब उनके नाम पर रखे गए सौर ऊर्जा मिशन से भी यही आशा है कि इस क्षेत्र में भी ऐसी ही क्रान्ति सम्भव हो सकेगी।

लेखक स्वतन्त्र पत्रकार हैं

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