ख़तरे में पक्षी

Submitted by RuralWater on Sun, 02/15/2015 - 15:39
Source
योजना, जुलाई 2010

हाथी के पाँव के नीचे सबका पाँव, बाघ की छत्रछाया के नीचे अन्य पशु-पक्षी भी सहज रूप से जी सकेंगे। बाघों का संरक्षण यदि उचित ढंग से होता है तो उसके प्राकृतिक पर्यावरण में अन्य जीवों का संसार भी बचा रहेगा। पक्षियों की चहचहाहट बन्द न हो इसके लिए शिकार और कीटनाशकों के अन्धाधुन्ध उद्योग पर सख़्ती से रोक लगानी होगी और दलदली जमीनों को अतिक्रमण से बचाना होगा। ताल, पोखरों को बनाए रखना होगा। इससे जल संकट में कमी तो आएगी ही, पशु-पक्षियों का अस्तित्व भी ख़तरे में नहींं पड़ेगा।

पाँच जून विश्व पर्यावरण दिवस पर अनायास ही हमारी पर्यावरण चेतना का अहम अंश रहे पक्षियों से रिश्तों की याद आने लगी। बचपन के अपने छोटे से कस्बे बलरामपुर के उस घर की याद हो आई जिसमें सूरज निकलने के पहले से लेकर उसके डूबने तक छोटी-छोटी गौरैया चहकती, फुदकती रहती थीं।

माँ उनमें नर-मादा पक्षियों का भेद करने के लिए उनको चिड़ी और चिड़ा कहा करती थीं। गहरी सिलेटी पंखों वाली चिड़ी और भूरे रंग का चिड़ा। गौरेया ही नहींं उनके साथ खंजन और कबूतर भी हमारे घर-आंगन में चहचहाते रहते थे। गौरेया और उस जैसे अन्य पक्षियों को घर-आंगन में देखना अब दिल्ली जैसे बड़े महानगरों में मयस्सर नहींं। शहरों में कंक्रीट के बढ़ते जंगलों में पुराने वक्त के चमन की रौनक नहींं रही तो पंछी कहाँ से दिखेंगे।

अब आज के बच्चों को गौरैया दिखाने के लिए किताबों में छपे चित्र दिखाने पड़ते हैं। ये पक्षी कभी हमारे जीवन का हिस्सा हुआ करते थे, लेकिन अब वे हमसे दूर होते जा रहे हैं। शहरीकरण, औद्योगीकरण या फिर इन सबका मिला-जुला कारण जलवायु परिवर्तन का प्रभाव हमारे आसपास के वातावरण पर इतना गहरा होता जा रहा है कि अन्य अनेक नैसर्गिक देनों के साथ-साथ अनेक पंछी भी हमसे दूर होते जा रहे हैं।

जिन पक्षियों को हम पहले सहज ही अपने आसपास पाया करते थे और कभी-कभी उनकी चहचहाट से खीझ भी जाया करते थे, लेकिन अब उन्हें देखने-सुनने के लिए चिड़ियाघरों का रुख करना पड़ता है और इसमें भी सब की दिलचस्पी अब देखने को नहींं मिलती। पक्षियों की अनेक प्रजातियों का अस्तित्व अब ख़तरे में दिखाई दे रहा है। कठफोड़वा, बुलबुल, नीलकंठ, बया, टिटहरी, बनमुर्गी, बगुला, तोता और कौड़िल्ला (किंग फिशर) भी अब कम ही दिखाई देते हैं।

अन्तरराष्ट्रीय प्रकृति एवं प्राकृतिक सम्पदा संघ (इंटरनेशनल यूनियन फाॅर नेचर एण्ड नेचुरल रिसोर्सेज-आईयूसीएन) की पिछले दिनों आई एक रिपोर्ट में उन पक्षियों की सूची दी गई है, जिनका अस्तित्व जलवायु परिवर्तन के कारण अब ख़तरे में पड़ गया है। अनियोजित विकास के कारण अनेक पक्षी हमारे घर-आंगन और बगीचों से गायब हो ही रहे थे कि अब जलवायु परिवर्तन के संकट ने उनके लिए अस्तित्व का प्रश्न ही खड़ा कर दिया है।

आईयूसीएन के अनुसार जलवायु परिवर्तन के कारण हर आठ में से एक पक्षी की प्रजाति विलुप्त होती जा रही है। भारत उन 10 देशों में से एक है जिनकी पक्षी प्रजातियों पर ख़तरा काफी गम्भीर है। इनमें चम्मच-सी चोंच वाली टिटहरी और चित्तीदार चील भी शामिल है।

अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर पक्षियों की 1,240 प्रजातियों का अस्तित्व ख़तरे में बताया जाता है, जो विलुप्त हो चुकी विश्व की कुल 10,027 प्रजातियों का 12.4 प्रतिशत है। इन दस देशों में ब्राजील का स्थान सबसे ऊपर है, जहाँ 141 प्रजातियाँ विलुप्त होने के कगार पर हैं। उसके बाद पेरू और चीन का स्थान है। भारत सातवें स्थान पर है, जहाँ 88 पक्षी प्रजातियों का अस्तित्व विलुप्तप्राय है।

अन्तराराष्ट्रीय प्रकृति एवं प्राकृतिक सम्पदा संघ (आईसीयूएन) विश्व का प्रमुख पर्यावरण नेटवर्क है और उसे संयुक्त राष्ट्र साधारण सभा में पर्यवेक्षक की हैसियत मिली हुई है। आईयूसीएन जिन वनस्पतियों और वन्य जीवों के अस्तित्व के बारे में ख़तरे की सूची जारी करता है, उसे अधिकृत माना जाता है और दुनिया के सभी देश उसे मानते हैं।

आईयूसीएन के अनुसार पक्षियों के अस्तित्व के बारे में जो श्रेणियाँ निर्धारित की गई हैं, उनमें तेजी से चिन्ताजनकबदलाव हो रहा है। यानी जो पक्षी पहले उस श्रेणी में आते थे, जिनके विलुप्त होने का हल्का-सा जोख़िम था, वे अब विलुप्तप्राय श्रेणी में तो और कुछ उससे भी आगे गम्भीर रूप से विलुप्तप्राय श्रेणी में खिसक गए हैं।

अधिकांश परिवर्तन गम्भीर ख़तरे में आई प्रजातियों की श्रेणी में हुआ है। बाम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी (बीएनएचएस) के एक अध्ययन में बताया गया है कि भारत में 465 प्रमुख पक्षी क्षेत्र (आईबीए) हैं और इनमें से 198 संरक्षित क्षेत्रों के बाहर हैं। मई 2010 में जारी ख़तरे की सूची के अनुसार पक्षियों की 1,240 प्रजातियों के अस्तित्व को ख़तरा है। इनमें से 8 प्रजातियों को पक्षियों की उस श्रेणी में रखा गया है जिसके अस्तित्व के प्रति हाल के दिनों में ख़तरा औरगम्भीर हो गया है। यूरेशियन कर्ल्यू (जल पक्षी गुलिन्दा-न्यूमेनियस अरकार्टा), छोटी चिड़िया डार्टफोर्ड वार्बलर और लाल मुनिया (सिल्विया उन्डाटा) जैसी प्रजातियाँ पहले उस श्रेणी में गिनी जाती थीं जिनके अस्तित्व को ख़तरा नहींं के बराबर था। परन्तु अब उनकी गिनती उस श्रेणी में होती है जो प्रायः विलुप्त होने को है।

इनमें गिद्धों की चार प्रजातियों के अलावा हिमालय क्षेत्र में पाई जाने वाली बटेर, गुलाबी सिर वाली बत्तख और चम्मच जैसी चोंच वाली टिटहरी भी शामिल है। बुरी ख़बर यहीं खत्म नहींं होतीं। जाड़ों में सुदूर रूस के बर्फीले इलाकों से आने वाली साईबेरियाई सारस (साइबेरियन क्रेन) भी अब प्रायः गायब हो चुके हैं।

अन्तिम बार शायद उन्हें वर्ष 2003 में देखा गया था। ताल-पोखरों और दलदली भूमि की उपेक्षा अपनी कीमत इस प्रकार वसूल रही है। हाँ, जो जलीय निकाय पक्षी अभयारण्यों और राष्ट्रीय पार्कों में स्थित हैं, वे अवश्य संरक्षित हैं और वहाँ अनेक पक्षी देखे जा सकते हैं। जहाँ तक गिद्धों का प्रश्न है, विशेषज्ञों का मानना है कि अगले दशक में वे बिल्कुलगायब हो सकते हैं।

बाम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी जैसे संगठनों का कहना है कि पशुओं के इलाज में दर्द निवारक दवा डाइक्लोफेनेक काइस्तेमाल बढ़ने से गिद्धों की संख्या में कमी आ रही है। सोसायटी एक लम्बे अरसे से इस दवा के इस्तेमाल के विरुद्ध आवाज उठा रही है, परन्तु अभी तक कोई प्रभाव दिखाई नहींं दिया है।

आईयूसीएन ने भारत में लुप्तप्राय जिन पक्षी और पशु प्रजातियों की सूची तैयार की है, उनमें स्तनपायी पशुओं और पक्षियों की संख्या सबसे ज्यादा है। इसके बारे में वन एवं पर्यावरण मन्त्रालय ने कुछ समय पूर्व लोकसभा को भी जानकारी दी थी। परन्तु जब इस ख़तरे के पीछे के कारणों को ठीक करने के कड़े कदम नहींं उठाए जाते, भारत में वन्य जीवों और पक्षियों के अस्तित्व का संकट समाप्त नहींं होने वाला।

बाघ पर जो ध्यान केन्द्रित किया जा रहा है, वह उचित ही है, क्योंकि जैसीकि कहावत है- हाथी के पाँव के नीचे सबका पाँव, बाघ की छत्रछाया के नीचे अन्य पशु-पक्षी भी सहज रूप से जी सकेंगे। बाघों का संरक्षण यदि उचित ढंग से होता है तो उसके प्राकृतिक पर्यावरण में अन्य जीवों का संसार भी बचा रहेगा। पक्षियों की चहचहाहट बन्द न हो इसके लिए शिकार और कीटनाशकों के अन्धाधुन्ध उद्योग पर सख़्ती से रोक लगानी होगी और दलदली जमीनों को अतिक्रमण से बचाना होगा।

ताल, पोखरों को बनाए रखना होगा। इससे जल संकट में कमी तो आएगी ही, पशु-पक्षियों का अस्तित्व भी ख़तरे में नहींं पड़ेगा।

लेखक स्वतन्त्र पत्रकार हैं

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