मैं नदी आँसू भरी

Submitted by Hindi on Thu, 02/19/2015 - 12:31
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कहार पत्रिका, जुलाई-दिसम्बर 2014
(मंच पर चार कलाकार गीत गाते हुए आते हैं)
गंगा में मिलते कचरा एवं गंदे नालेरहीमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून,
पानी गए न ऊबरे मोती मानस चून।


कोरस: बिना पानी के मचेगा हाहाकार मरेंगे बिना पानी के......3 नदी का मंथर गति से प्रवेश (लहर की भांति) हू...हू....हू....हू....हा...हा...हा....हा....-2 (सभी कलाकार नहाने, हाथ-मुंह धोने का अभिनय करते हैं। कुछ कलाकार पूजा का या सूर्य नमस्कार का अभिनय करते हैं।)

कलाकार-1-2: हर हर गंगे, हर-हर गंगे।

कलाकार 2-3: जय यमुने, जय यमुने।

कोरस: जय सरस्वती माता, मैया जय सरस्वती माता, तुममें नित ही नहावत, तुमको नित दिन ध्यावत जय सरस्वती माता,कलाकार धीरे-धीरे चारों ओर जाकर बाहर की ओर बैठ जाते हैं, तीनकलाकार पेड़ के आकार में खड़े होते हैं।

पेड़: नदी मैया, राम-राम।

नदी: जुग-जुग जियो-2, कैसा है रे मेरे पेड़ राजा।

पेड़: बस सब आपकी कुपा है, आपके लाड-दुलार से देखो कैसा हट्टा-कट्टा हरा-भरा हो गया हूँ।

नदी: जीता रह पेड़ राजा, तेरा वंश बढ़े-फले-फूले और लोगों को छांव दे, फल दे, फूल दे, शुद्ध हवा दे। (एक चिड़िया का वृक्ष के आस-पास फुदकते हुए प्रवेश, नदी से जल पीती है।)

चिड़िया: नदी मैया राम-राम।

नदी: जुग-जुग जी बिटिया (हंसते हुए)। चिड़िया रानी बड़ी सयानी, भर-भर डोना पीती पानी।

चिड़िया: नदी मैया आप में जल, जल से धरती, धरती से पेड़, पेड़ से पवन, पवन से पर्यावरण।

नदी: और तू कहाँ, ये बता।

चिड़िया: (हंसते हुए) मैं पेड़ दादा के कन्धे पर, (गाती है)पेड़ ही पर सो जाना, सुबह से उठके पानी पीना, मीठे-मीठे फल खाना,इधर फुदकना, उधर फुदकना, फुर्र-फुर्र कर उड़ जाना, चूं-चूं-चूं-चूं, चीं-चीं-चीं-चीं, मीठे बोल सुनाना।

नदी: (हंसते हुए) वाह ! अच्छा-अच्छा बातूनी जा, काम पड़े हैं। (नदी का संगीत बजता है, पेड़ झूमता हुआ और चिड़िया फुदकते हुए मंच से बाहर चली जाती है, नदी मंथर गति से लहराती हुई चलती है।)

कोरस: चली, नदी बह चली-2 गाँव-गाँव और शहर-शहर, चली, नदी बह चली-2 चली, नदी बह चली।

नदी: मैं नदी ! मुझे आपने सतलुज कहा, कहा नर्मदा, मैं व्यास कहलाई, मैं सरस्वती, मुझे पुकारा गंगा।

कोरस: (लय में) गंगा....

नदी: मुझे पुकारा यमुना।

कोरस: (लय में) यमुना....

नदी: मुझे बुलाया कृष्णा।

कोरस: कृष्णा हो कृष्णा।

नदी: मुझे तुम सबने अलग-अलग नाम दिये, मुझे कभी देते थे सम्मान, आज जय कहकर करते हो अपमान। आज मैं नदी आँसू भरी। मैं कहती अपनी कथा, सुनो ये मेरी व्यथा। मैं थी पावन, तुमने किया अपावन। मैं नदी आँसू भरी। मैंने तुम्हें स्वच्छ जल दिया, तुमने मुझे दूषित किया। कैसी-कैसी विपदाओं से मेरा पाला पड़ता, मेरे भीतर नगर गाँव का कूड़ा पड़ता। मैं नदी आँसू भरी।

कोरस: (गाते हुए) आया नगर नदी जाए किधर कचरे के ढेर पर बैठा शहर (नाले का प्रवेश) नाला बिगड़े हुए सांड की तरह नदी पर झपटता है, नदी अपना बचाव करती है।)

नाला: मैं हूँ मोती नाला, मैं हूँ आफत का परकाला, मैं हूँ कमेटी का साला, भैंसे जैसा काला, मैं हूँ काले दिलवाला, अरे भई सुनियो लाला और तू भी सुन ले बाला, मैं आया मोती नाला, मैं हूँ मोती नाला, भरा हुआ है मुझमें मलबा, वाह वा-वा-वा-वाह, गाँव शहर में मेरा जलवा, हा हा हा हा हा, गंदगी लिए नदी में जाऊं, नदियों को मैं तिल-तिल खाऊं, मच्छर-मक्खी, कूड़ा-करकट कभी रुकूं, कभी दौड़ूं सरपट, तुम सबने ही मुझको पाला, मैं हूँ मोती नाला-2 (गीत के बीच नदी को परेशान करता है, और अन्त में नदी में कचरा फेंककर चला जाता है।)

नदी: ऐसे लाखों-करोड़ों नालों ने मेरा जीना हराम कर रखा है, नालियां भी कम नहीं हैं, ये नहीं कि कहीं और जाएं, मुझमें नां समायें, ओह ! डायन का नाम लिया और इधर ही दौड़ी आई। (नाली का हाथ में छडि़यां लिए प्रवेश)

नाली: मैं हूँ काल-कलूटी नाली, मैं हूँ नाले की घरवाली, सभी ने खूब गंदगी डाली, नदी देती मुझको गाली, मैं हूँ काल-कलूटी नाली।(नाली नदी को तंग करती है और उसमें गंदगी डालकर प्रस्थान। एककलाकार पानी पीने के लिए छटपटाता है, लोग उसे उठाकर ले जाते हैं।) (नदी छटपटाती हुई आगे बढ़ती है। एक कलाकार आकर भैंसे नहलाता है, एक व्यक्ति नाक साफ करता है, एक व्यक्ति कुछ कपड़े धोता है, एक व्यक्ति ट्रक धोता है, एक मुंडन करवाकर बाल नदी में फेंकता है।)

नदी: ऐ लोगों मेरी रक्षा करो, पेड़ कट गए जल सूख रहा है, बारिश कम हो रही है, आबादी बढ़ती जा रही है और घास ने मुझे घेर रखा है, (कोरस को) आप सब लोग तो मेरी पूजा करते हो, हर-हर गंगे कहते हो।

कोरस: कहते हैं मैया।

नदी: फिर मुझे दूषित क्यों करते हो।

एक: मैंने तो केवल अपनी भैंस नहलाई है।
दो: मैंने तो इतना-सा कचरा डाला था।
तीन: मैंने तो सिर्फ इतना सा ही ट्रक धोया था।
चार: मैंने दातुन को, थोड़ा खंगारा और पच्च से थूक दिया।
पांच: मैंने तो बस ऊपर के हाथ धोये थे।
छह: मैंने तो बस ये थोड़े से कपड़े ही धोये थे।
सात: मैंने तो सिर्फ मुण्डन कराया, कुछ बाल बहाए, इतने से बाल, फिर क्यों से बवाल।

नदी: आप सभी लोग तो पढ़े-लिखे हैं?

कोरस: हाँ हम पढ़े-लिखे हैं।

नदी: पढ़े-लिखे होकर भी मेरे साथ अनाचार कर रहे हो। मेरा क्या है, जब तक मुझ में जल है बहूँगी। पर कहे देती हूँ, जब मैं मर जाऊंगी, तुम भी मरोगे। न नहाने का पानी होगा, न धोने का, न पीने का, एक दिन प्यासे रहकर देखो, क्या हाल होता है ? मैं सूख रही हूँ, मैं नदी आँसू भरी, ऐ माँ, देखो सभी, देखो वो आया जल्लाद, कारखाने से निकला जहरीले रसायनों से भरा मैला। (मैला राम घोड़े की तरह भागता, काले कपड़े को लहराता हुआ आता है।)

मैलाराम: मैं कारखाने की गन्दगी और रसायन लिए बेलगाम भागता, मैलाराम और ये मेरी दुश्मन नदी रानी। ओ नदीरानी, अब मर जाएगी तेरी नानी। कारखाने ने मुझे भेजा है लेकर गन्दाऔर जहरीला पानी, मैंने गाँव के गाँव दिये उजाड़, मेरे मालिक कारखानों ने खूब अधिक मात्रा में जहर नदियों में बहा दिया जिससेदो करोड़ से ज्यादा लोग बीमार हो गए। हमने चर्म रोग फैलाया, हमजहर घोल रहे हैं जल में। मेरा मालिक किसी की नहीं सुनता। उसकेरास्ते के कांटे साफ कर दिये जाते हैं।

नदी: (भयभीत होकर) देखो, मैं तुम्हारी मददगार हूँ, कपड़े के मिल, चमड़ा उद्योग, दवा की फैक्ट्री जैसे बड़े-बड़े कारखाने मेरे सहयोग से चल रहे हैं, मुझे दूषित न करो, मुझे चुपचाप यहाँ से बहने दो।

मैलाराम: नदी रानी तुम बहोगी, मैं भी तुम्हारे संग बहूँगा। मैं तुम में समाहित होकर मनुष्य जाति को रौंद दूँगा। (मैलाराम अपना कपड़ा नदी पर डालकर प्रस्थान करता है। लोग नदी का पानी पीते हैं, महामारी फैल जाती है, एक कलाकार उल्टी करता है, कुछ लोग अर्थी लेकर वहाँ से निकलते हैं, एक व्यक्ति दर्द के मारे तड़प-तड़प कर मर जाता है।)

नदी: लोगों बचाओ, रक्षा करो, पूरी मनुष्य जाति का विनाश हो रहा है, रक्षा करो।

एक: कलजुग है कलजुग, अब तो अपनी ही रक्षा कर लो यही बहुत है।
दो: हम तो इस बेचारी की कोई मदद नहीं कर सकते। हम तो कभी नहाते ही नहीं।
तीन: (आश्चर्य से) कभी नहीं नहाते।
दो: नहीं, नदी में, नदी में नहाते ही नहीं। हम तो महल वाले हैं, नदी से हमारा क्या वास्ता।
चार: हमने तो हैण्ड पम्प लगवा लिया। हमारे पड़ोसी ने सौ फुट गहरा खुदवाया, तो हमने सोचा कि ये तो मूर्ख हैं, हमने हैण्डपम्प वाले से कहकर दो सौ फुट खुदवाया, हैण्डपम्प वाला भी खुश हो गया कि हमने कितना अच्छा सोचा। अब एकदम ठण्डा पानी धरतीसे डायरेक्ट आता है। नदी का काम ही नहीं। (नदी का प्रवेश)

नदी: अरे मेरे पुत्रों, गहराई से सोचो, जल कम हो रहा है, नदी का हो या धरती का, पर्याप्त वर्षा नहीं हो रही, जंगल कटते जा रहे हैं, 60 से 70 प्रतिशत बीमारियाँ सिर्फ प्रदूषित गन्दे पानी से हो रही हैं, अब भी हाथ पर हाथ धरे बैठे रहोगे ?

एक व्यक्ति: ये तो हमारी सरकार को समझना चाहिए। चौंसठ साल बीत गए।
दो: हम तो ये जानते हैं कि भगवान ने नदी बनाई भगवान ने बहाई, अब भगवान ही करे सफाई, हम क्या करें भाई (लय में)।
तीन: सफाई हो सकती है बशर्ते कि प्रशासन इसमें रूचि ले।
चार: हमने तो सोची है कि हर घर में हैण्डपम्प खुद जाएं तो नदी-वदी, पानी-वानी का झंझट ही दूर हो जाए। क्यों कैसी सोची ?
एक: अरे लल्लू, नलों में पानी नदी से ही आता है, स्वर्ग से नहीं।

नदी: यही तो गड़बड़ है, आदमी इस बारे में सोचता ही नहीं। जो सोचता है तो करता नहीं, सभी काम सरकार के भरोसे नहीं हो सकते। दो तिहाई पीने का पानी दूषित है हिन्दुस्तान में।

एक: पर सरकार को उसकी जिम्मेदारी से बरी भी तो नहीं किया जा सकता।
तीन: वैसे नदी मैया की बात गम्भीर है, हमें कुछ करना चाहिए, वरना हमें और हमारी अगली पीढि़यों को नुकसान हो सकता है।

एक: देखो भाई एक अकेले से कुछ नहीं होगा। मिल-जुलकर ही कुछ हो सकता है।
दो: आपने कुछ सोची ?
चार: हमने सोची है कि हैण्डपम्प तो लग ही गया है, अब नदी की सफाई के बारे में कुछ सोचूं।
तीन: अब सोचना क्या है अब तो करना है। (तभी मैलाराम अपना काला कपड़ा लहराते हुए आता है और लोगों के ऊपर डालता है, लोग चीखते- चिल्लाते हैं, भागते हैं, मैलाराम अपना कपड़ा नदी के ऊपर डालता है, नदी छटपटाती है, कुछ लोग अर्थी लेकर आते हैं और मुर्दे को नदी में फेंक जाते हैं, नाला-नाली भी उसमें गन्दगी डालते हैं। मैलाराम नाला काले कपड़े में नदी को पूरी तरह लपेट देते हैं। नदी छटपटाती हुई गिर जाती है, धीरे-धीरे लोग प्यास के मारे छटपटाते हुए मंच पर आते हैं, और तड़पते हुए गिर जाते हैं।)

कोरस: लोग तट पर छोड़कर अपने वसन, घुस गए कंवारी नदी में निरवसन, फिर नदी की देह पर हमले हुए, फिर नदी रोने लगी मैदान में, फिर नदी घायल हुई अभियान में। (तभी चिड़ियाँ आती है, नदी को काले कपड़े से छुड़ाने की कोशिश करती है।) (कलाकार एक धीरे-धीरे उठकर बोलता है।)

एक: महेन्द्रगढ़ मेवात सौ फफट तक पानी नहीं।
दो: गन्दा पानी पीने से दिल्ली में दो सौ बच्चों की मौत।
तीन: यदि नदी को दूषित करने का सिलसिला यूं ही चलता रहा तो 21वीं सदी तक सारा पानी दूषित, जहरीला हो जाएगा।
चार: हमें नदी की रक्षा करनी चाहिए, क्योंकि वह हमारी रक्षा करती है। (नदी को उठाते हैं और कपड़ा हटाते हैं।)

कोरस: आज से हम संकल्प लेते हैं कि पानी को गन्दा नहीं होने देंगे।

यह नाटक ‘जतन नाटक मंच’ और ‘हरियाणा विज्ञान मंच’ के नाटक कर्मियों एवं कार्यकर्ताओं के द्वारा ‘हरियाणा ज्ञान विज्ञान’ आन्दोलन के दौरान तैयार किया गया।

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