हिमालय की नजाकत

Submitted by birendrakrgupta on Thu, 02/19/2015 - 17:08
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योजना, सितम्बर 2013
.मशहूर अंग्रेज कवि जॉन कीट्स ने एक बार कहा था ‘‘धरती की कविता कभी खत्म नहीं होगी।’’ कीट्स एकदम सही थे। धरती अपने रूप बदलती रही है। धरती के विभिन्न रूपों के निशान धरती के ही इतिहास के पन्नों में दफन हैं। हिमालय की ऊँची चट्टानों की सतहों के बीच समुद्री जीवाश्म की प्रचुर मात्रा मौजूद हैं, जो बताते हैं कि उत्तुंग पर्वत श्रृंखला की जगह एक समय वहाँ लहराता समुद्र हुआ करता था।

यदि यह सच है तो सवाल यह भी है कि इतनी गहराई से यहाँ इतनी ऊँचाई कैसे बन गई। कोई भी यही सोचेगा कि हिमालय यहाँ स्थिर और अचल है लेकिन नहीं, हकीकत यह है कि वो भंगुर और लगातार चलायमान है। हिमालय को जानने के लिए हमें पहले यह जानना चाहिए कि वो अस्तित्व में कैसे आया।

हिमालय का जन्म


ये कोई 50 लाख साल पहले की बात है, जब इण्डियन प्लेट टेथिस सागर से खिसक रही थी, नोह के आर्क की तरह, जो जीव-जन्तुओं, वनस्पतियों, प्राचीन नदियों, घाटियों, प्राचीन पहाड़ियों और पठार की खेप की तरह था। इण्डियन प्लेट जब स्थिर भूमि से टकराई तो इतनी जोरदार टक्कर हुई कि टकराहट रेखा पर पहाड़ों की एक श्रृंखला बन गई। हिमालय विश्व का सबसे ऊँचा और युवा पहाड़ बन गया। ये टक्कर इतनी तगड़ी थी कि आज भी इण्डियन प्लेट अन्दर से एशियन प्लेट को औसतन पाँच से.मी. प्रति वर्ष की दर से खिसकाती रहती है। इस तरह से हिमालय के अन्दरूनी हिस्से में लगातार दबाव-तनाव बना रहता है। इसकी वजह से ही हिमालयी क्षेत्र में लगातार भूकम्प आते रहते हैं।

कोई 50 लाख साल पहले की बात है, जब इण्डियन प्लेट टेथिस सागर से खिसक रही थी, नोह के आर्क की तरह, जो जीव-जन्तुओं, वनस्पतियों, प्राचीन नदियों, घाटियों, प्राचीन पहाड़ियों और पठार की खेप की तरह था। इण्डियन प्लेट जब स्थिर भूमि से टकराई तो इतनी जोरदार टक्कर हुई कि टकराहट रेखा पर पहाड़ों की एक श्रृंखला बन गई। हिमालय विश्व का सबसे ऊँचा और युवा पहाड़ बन गया।हिमालय के उदय के साथ धरती के इतिहास का नया अध्याय भी शुरू हुआ। भारतीय उपमहाद्वीप की भौगोलिक कहानी दोबारा लिखी गई। इसमें सिन्धु, गंगा और ब्रह्मपुत्र जैसी महान नदियों की खास भूमिका थी। ये नदियाँ पहाड़ियों के साथ घुमाव लेते हुए घाटियों का निर्माण करते हुए बह निकलीं। उन्होंने घिसे हुए पहाड़ों के साथ लाई गई सामग्रियों से सतह पर सतह बनाते हुए विशाल मैदानी भूभाग तैयार किया। सालाना बाढ़ और जलोढ़ के साथ ताजी सतह के निर्माण के क्रम का चक्र भी तब से लगातार चला जा रहा है।

ऊँचे और विशाल हिमालय ने भारतीय उपमहाद्वीप के भूगोल को ही नहीं बदला बल्कि इस क्षेत्र की जलवायु को भी बदल दिया। इससे मानसून की शुरुआत हुई। मानसून के कारण नदी के किनारों का मैदानी भूभाग अत्यधिक उर्वर धरती में बदल गया। इससे मानव का जीवन आसान हुआ। नदियों के किनारे आबादियों की शुरुआत हुई, सिंधु घाटी सभ्यता फलीफूली। बाद में गंगा घाटी सभ्यता ने इसकी जगह ली।

प्रकृति कभी नहीं सोती। प्राकृतिक माध्यम मसलन हवा और पानी लगातार काम करते रहते हैं। कैसे पानी का असर हिमालय पर पड़ा और किस तरह अभी इसका असर जारी है, ये जानना महत्वपूर्ण होगा।

ग्लेशियर प्रकृति के रोड रोलर


अगर हिमालय की नदियाँ ‘वी’ के आकार में घाटियाँ बनाने में व्यस्त थीं तो ग्लेशियर भी ‘यू’ आकार की घाटियाँ सृजित करने में लगे थे। ग्लेशियरों का काम कड़ी मेहनत के बावजूद धीमा था लेकिन उतना ही असरदार। जब एक ग्लेशियर खिसकता है तो बेहद विशाल, ताकतवर और प्राकृतिक रोड रोलर की तरह होता है। इसके नीचे जो भी आता है वो पिस जाता है और चूर-चूर होकर आटे की तरह हो जाता है। ग्लेशियर्स ने घाटियों में फैली चट्टानों को भी बड़ी मात्रा में हटाया। ग्लेशियर का मतलब है बर्फ और बर्फ का मतलब है हिमकारी तापमान। पानी का बहुत बड़ा भू-भाग ग्लेशियर के कब्जे में आकर चट्टानों की दरारों में घुसकर रात में जम जाता है। दिन में जब ये पिघलता है और काफी बड़ी तादाद में फैल जाता है तो तेज गड़गड़ाहट के साथ चट्टानों की बौछार करने लगता है।

इस तरह ग्लेशियर वैली में तमाम आकारों के गोल पत्थर और चट्टानों का चूरा मलबे की तरह फैल जाता है। इसे हिमोढ़ भी कहा जाता है। एक सक्रिय ग्लेशियर के कब्जे वाली घाटी में पानी कई जगहों से पिघलकर सतह पर आता रहता है, इस पिघले पानी का एक हिस्सा सतह के अन्दर जाकर नीचे की ओर बह निकलता है। इसलिए घाटी की जमीन हमेशा दलदली होती है। वही खिसकता हुआ ग्लेशियर्स अपने पीछे बड़ा दबाव छोड़ जाता है। जो ग्लेशियर के पिघले हुए हिस्से से भर जाता है, जिससे झीलें या केटल होल्स तैयार होते हैं। इसलिए ग्लेशियर वास्तव में एक जलीय संसार है, आंशिक तौर पर बर्फ के रूप में जमा और आंशिक तौर पर पिघला पानी।

केदारनाथ एक बर्फीली घाटी


पौराणिक केदारनाथ मन्दिर शानदार ढंग से केदारनाथ गिरी पिण्ड की छाया में आठवीं शताब्दी से खड़ा है। यह मन्दिर मन्दाकिनी नदी घाटी में स्थित है। केदारनाथ में ये घाटी पाँच चोटियों से घिरी है— विज ऊँची चोटी (5,505 मीटर), भारत कुण्टा चोटी (6,567 मीटर), केदारनाथ चोटी (6,940 मीटर), महालय पर्वत चोटी (5,870 मीटर) और हनुमान टॉप चोटी (5,320 मीटर)। ये सभी चोटियाँ बर्फ से ढंकी रहती हैं। यहाँ बर्फ हमेशा इकट्ठी रहती है। इस घाटी की चौड़ाई आगे की ओर छह कि.मी. और दक्षिणी छोर की ओर, जहाँ ये संकरी है, तीन कि.मी. है।

पौराणिक केदारनाथ मन्दिर शानदार ढंग से केदारनाथ गिरी पिण्ड की छाया में आठवीं शताब्दी से खड़ा है। यह मन्दिर मन्दाकिनी नदी घाटी में स्थित है। केदारनाथ में ये घाटी पाँच चोटियों से घिरी है— विज ऊँची चोटी, भारत कुण्टा चोटी, केदारनाथ चोटी, महालय पर्वत चोटी और हनुमान टॉप चोटी। ये सभी चोटियाँ बर्फ से ढंकी रहती हैं।मन्दाकिनी नदी अपने आप में अद्वितीय है क्योंकि ये दो ग्लेशियरों विज, चौराबारी और अलग कर दिए सहयोगी ग्लेशियरों से सिंचित होती रहती है, इस तरह इस पूरी घाटी पर इसी का वर्चस्व है। जोखिम के लिहाज से केदारनाथ की ये खास भौगोलिक स्थिति है। हिमोढ़ के अध्ययन के बाद जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इण्डिया (जीएसआई) के जाने-माने भूगोलवेत्ता दीपक श्रीवास्तव इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि कभी ये दो ग्लेशियर, जिनका पहले उल्लेख किया जा चुका है, एक साथ थे और ये घाटी के ऊपरी छोर की पूरी एक कि.मी. की चौड़ाई को आच्छादित करते थे। केदारनाथ के हिमोढ़ अच्छी तरह स्थापित हैं और यहाँ से तीन कि.मी. दूर उनका प्रभाव ऐसे स्थान पर है जो वनस्पतियों से युक्त है। हिमोढ़ के चलते ये भी अन्दाज लगाया गया कि इतिहास पूर्व काल में यहाँ कम से कम चार बड़े ग्लेशियर रहे होंगे, जो घटकर अब वर्तमान में काफी नीचे तक आ गए हैं। शोधकर्ता डी.पी. डोभाल और उनके सह-शोधकर्ताओं का कहना है कि मन्दाकिनी नदी घाटी का जलीय क्षेत्र करीब 67 वर्ग कि.मी. (रामबाड़ा तक) है, जिसमें 23 फीसदी हिस्सा ग्लेशियर के आच्छादित हैं। ये बात उन्होंने करण्ट साइंस के 25 जुलाई, 2013 के अंक में कैलाश हादसे पर अपने एक पेपर में कही है।

केदारनाथ हादसा


केदारनाथ कस्बा चौराबारी के बाहरी मैदानों और जोड़ीदार ग्लेशियरों के साथ स्थित है। मन्दाकिनी और सरस्वती नदियों के रास्ते केदारनाथ कस्बे को घेरते हुए जाते हैं। उनकी धाराएँ हर साल अपने किनारों को काटती रहती हैं। यहाँ सतह पर भी पानी की उपधाराएँ भी हैं जो ग्लेशियर के पानी से लगी जमीन पर स्थित हैं। केदारनाथ मन्दिर के इर्द-गिर्द हुए निर्माण से सतह पर पानी के बहाव को बाधा पहुँची और सतह पर बहने वाली दूसरी धाराओं को भी। इसलिए ये केवल बादल का फटना नहीं था बल्कि 15 और 16 जून को वहाँ हुआ 325 मि.मी. रेकॉर्ड बारिश (जैसा कि चौराबारी स्थित वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के मौसम सम्बन्धी केन्द्र ने रिकॉर्ड किया) हुई, जो गाँधी सरोवर बाँध को नुकसान पहुँचाने के लिए काफी था। ये बाँध बारिश और बारिश के चलते बर्फ के पिघलने से लबालब हो चुका था। जिससे जल ने जबरदस्त ताण्डव किया, न केवल कई बिल्डिंग्स बह गईं बल्कि मानवों और पशुओं की जाने भी गईं।

सौभाग्य से मन्दिर को कोई आँच नहीं आई और वो बचा रहा। ये भी एक तथ्य है कि ये मन्दिर 14वीं से 17वीं शताब्दी के बीच अल्प हिमयुग के दौरान बर्फ की मोटी परतों के बीच दब गया लेकिन इसके बाद भी बचा रहा। बर्फ के नीचे दबने का असर मन्दिर की दीवारों पर अब भी देखा जा सकता है। केदारनाथ की अतिसंवेदनशीलता पर जीएसआई ने 1994-95 में ग्लाशियोलॉजिकल अध्ययन पर विस्तृत रिपोर्ट जारी की थी। इस रिपोर्ट के अनुसार दीपक श्रीवास्तव ने केदारनाथ घाटी में 28 ऐसे क्षेत्रों को चिह्नित किया था, जहाँ बर्फ का ढेर लगातार गिरता रहता है और उन्होंने अबाध तौर पर निर्माण कार्यों को जारी रखने पर आपदा की भी चेतावनी दी थी। जैसा कि होता है इस ओर किसी ने ध्यान नहीं दिया और तबाही हो गई।

ये दुर्भाग्यपूर्ण है कि उत्तराँचल ने इस बार प्रकृति के प्रकोप का सामना किया। केवल केदारनाथ में ही नहीं बल्कि कई दूसरे इलाकों में भी तबाही हुई, इसमें गोविन्द घाट, उत्तर काशी, पिथौरागढ़ और मुनासिरी जैसी जगहें शामिल हैं। इन सभी जगहों पर 15 और 16 जून को भारी बारिश के बाद जमकर भू-स्खलन हुआ।

भू-स्खलन का कारण


इस मौके पर ये समझना उचित होगा कि भू-स्खलन का कारण क्या है। आमतौर पर पहाड़ों के ढलाव के साथ की सामग्री अपनी जगह पर स्थिर बनी रहती है लेकिन पानी, भूकम्प और उफनती हुई नदियों के कारण पहाड़ों की तलहटी के कटने और पहाड़ों को काटकर सड़कें बनाने और दूसरी निर्माण गतिविधियों के कारण पहाड़ों के ढलाव की मिट्टी और चट्टानें ढीली पड़ गईं और भू-स्खलन होना शुरू हो गया। एक और बात यह भी है कि इन युवा पहाड़ों पर पड़ने वाला पानी इनके अन्दर चला गया और वहाँ से बाहर निकलने के उसने कई रास्ते बना लिए। जब इन रास्तों को रोक दिया गया तो यह भी भू-स्खलन का एक कारण बन गया।

इसीलिए पहाड़ों पर किसी भी निर्माणाधीन परियोजना में पानी की समुचित निकासी पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। सौ साल से भी ज्यादा पुराना होने के बाद कालका-शिमला रेल लिंक परियोजना जल निकासी का मुकम्मल उदाहरण है। इतने साल होने के बाद भी इस रेल लाइन में कभी भी भू-स्खलन से बाधा नहीं पड़ी।

आमतौर पर पहाड़ों के ढलाव के साथ की सामग्री अपनी जगह पर स्थिर बनी रहती है लेकिन पानी, भूकम्प और उफनती हुई नदियों के कारण पहाड़ों की तलहटी के कटने और पहाड़ों को काटकर सड़कें बनाने और दूसरी निर्माण गतिविधियों के कारण पहाड़ों के ढलाव की मिट्टी और चट्टानें ढीली पड़ गईं और भू-स्खलन होना शुरू हो गया।उत्तराखण्ड में जिन क्षेत्रों में प्रकृति की मार पड़ी है, वहाँ अब बनाए जाने वाले मकानों, होटलों और धार्मिक रुचि के स्थानों में इन कॉमन फीचर को जोड़ा जाना चाहिए, ख़ासकर उन निर्माणाधीन में तो ये जरूरी कर दिया जाना चाहिए जो नदी के करीब हों और नदी के चबूतरे पर ऊँची इमारतों के निर्माण को अनुमति नहीं दी जानी चाहिए क्योंकि नदी के चबूतरे कभी स्थिर और टिकाऊ नहीं होते और कभी बाढ़ की प्रचण्डता को बर्दाश्त नहीं कर पाते। अलकनन्दा और भागीरथी नदी के प्रकोप में उनके किनारे बने चबूतरे न केवल ढह गए बल्कि नदियाँ अपने साथ इन पर बनी इमारतों को भी बहा ले गईं।

नदियाँ पहाड़ों पर शायद ही कभी सीधी रेखा में बहती हैं। घुमावदार नदी अपने साथ उभरी हुई चीजों को घिसती और काटती हुई चलती है और उस पर लगी हुई सामग्री धीरे-धीरे कमजोर पड़ती चली जाती है। इस बात को आजकल के बिल्डर आमतौर पर अनदेखा कर देते हैं। उन्हें लगता है कि सीमेण्ट-कंक्रीट की बदौलत वो बारिश और प्रकृति की ताकतों का मुकाबला कर पाएँगे, लेकिन उनकी यही गलती उत्तराखण्ड में न जाने कितने लोगों की जान लेकर अपूरणीय क्षति कर गई।

गोविन्द घाट पर प्रकृति का गुस्सा


गोविन्दघाट को सिखों के पवित्र स्थल हेमकुण्ट साहिब का दरवाजा माना जाता है, ये अलकनन्दा के दाहिने किनारे पर स्थित है। जीएसआई टीम, जिसने तहस-नहस हुए इस इलाके का दौरा करने के बाद गोविन्दघाट से रिपोर्ट दी कि यद्यपि वहाँ जान का कोई नुकसान तो नहीं हुआ लेकिन करीब 250 वाहन नदी में तेज बहाव में बह गए। गुरुद्वारा और उसकी बहुमंजिली इमारतें 17 जून को बाढ़ के पानी से बुरी तरह प्रभावित हुई। ये सारी इमारतें अलकनन्दा नदी के चबूतरे पर बनाई गई थी। इसके उल्टे किनारे पर एक भू-स्खलन ने नदी के बहाव को कुछ समय के लिए रोक दिया था, इससे प्रकोप और बढ़ गया। इसके चलते नदी के दूसरे किनारे को जोड़ने के लिए बनाया गया फुटओवर ब्रिज भी बह गया। बाढ़ का पानी गुरुद्वारा परिसर में घुस गया, पेड़ गिर गए और परिसर में नदी के साथ आई सामग्री और बालू भर गई। जीएसआई टीम का कहना है कि आगे से इस इलाके में अलकनन्दा के टैरेस पर किसी भी निर्माण की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए, क्योंकि भौगौलिक तौर पर ये इलाका बाढ़ के लिहाज से खास संवेदनशील है। उन्होंने यहाँ पर मजबूत बचाव दीवारें बनाए जाने की संस्तुति भी की, जिससे गुरुद्वारा की इमारत और दूसरे साथ लगे भवन सुरक्षित रह पाएँ। ये दीवारें नदी में आई बाढ़ के उच्चतम स्तर के निशान से ऊँची होनी चाहिए। नदी के दाहिने किनारे की ओर से गुरुद्वारे के नीचे की ओर बहने वाली धाराओं गोविन्दघाट की ओर जा रही रोड के साथ दीवार बनाकर स्थिर किया जा सकता है।

उत्तरकाशी में जल प्रलय


जिला मुख्यालय उत्तरकाशी में अक्सर भूकम्प, भू-स्खलन आने के साथ भागीरथी नदी में बाढ़ आती रहती है। पिछले एक दशक में, इस इलाके में सबसे जबरदस्त भू-स्खलन वर्ष 2003 में हुआ। अगस्त 2003 में जीएसआई के भू-गर्भवेत्ताओं का एक दल यहाँ वरुणाव्रत चोटी का दौरा करने पहुँची। उन्होंने एक और भू-स्खलन की शुरुआत पर गौर किया और तुरन्त जिलाधिकारी को सावधान कर दिया। तुरन्त लोगों को हटाकर वह जगह खाली कराए जाने से एक बड़ा हादसा बच गया। 24 सितम्बर, 2003 पहाड़ों से पत्थर तेजी से नीचे आने लगे और 50 करोड़ की सम्पत्ति तबाह हो गई जब कि तीन हजार लोग प्रभावित हुए। दरअसल वरुणाव्रत पर्वत की भौगोलिक आकृति ऐसी है कि वो भुरभुरे और नरम पदार्थों से भरी है। यहाँ जब पानी गिरता है तो वो तुरन्त ढलाव से नीचे आ जाता है। 1,800 मीटर ऊँचे पर्वत के निचले हिस्से में 1,100 मीटर की ऊँचाई पर मुख्य कस्बा बसा हुआ है। ऊपर के टॉप को छोड़कर वरुणाव्रत पर्वत की ढाल खासी तीव्र है इसलिए अगर यहाँ एक बार भू-स्खलन शुरू हुआ तो रुकता नहीं।

हिमालय की नजाकत 2
जीएसआई टीम ने रिपोर्ट दी है कि नेशनल हाई-वे 108 के साथ बने घरों को सबसे ज्यादा नुकसान पहुँचा। ऐसा पहली बार नहीं हुआ कि उत्तरकाशी भू-स्खलन से प्रभावित हुआ। अतीत में कस्बे का यह हिस्सा प्रकृति के कहर का सामना करता रहा है। लेकिन इसके बाद भी यहाँ घर बनते रहें। भविष्य में इस तरह के नुकसान को कम करने के लिए जीएसआई टीम ने कुछ जियोटेक्निकल उपाय करने की संस्तुति की थी ताकि भू्-स्खलन का सामना बेहतर ढंग से किया जा सके। इन उपायों को राज्य सरकार ने माना और इसी का नतीजा है कि अब नुकसान कम हो रहे हैं। लेकिन वरुणाव्रत ढलाव की अतिसंवेदनशीलता बरकरार है और भागीरथी नदी को भू-स्खलन की छाया तले ही बहना होगा।

उत्तरकाशी को गंगोत्री और इस इलाके में आने वाले हजारों श्रद्धालुओं के लिए द्वार माना जाता है। इसके चलते यहाँ बड़े पैमाने पर होटल और लॉज बनी हुई हैं। दुर्भाग्य से न तो नगर निगम के अधिकारी और न ही बिल्डर्स को महसूस हुआ कि जो इमारतें वो यहाँ बना रहे हैं वो बाढ़ के लिहाज से बेहद संवेदनशील हैं। भागीरथी नदी में पहले भी अचानक बाढ़ आ चुकी है। हाल का हादसा अगर जबरदस्त बारिश के कारण हुआ तो उसके तुरन्त बाद भू-स्खलन के कारण भी, नदी के लिए बाढ़ के इतने पानी को सम्भाल पाना मुश्किल हो गया और नतीजे में नदी के दाहिने किनारे पर प्रचण्डकारी बाढ़ ने रौद्र रूप दिखाया।

इस त्रासदी ने उत्तराखण्ड को गम्भीर झटका दिया है। दूसरे स्थानों मसलन मुनसियारी और पिथौरागढ़ में नुकसान ऊपर बताए गए अन्य स्थानों की तुलना में कम हुआ। क्योंकि इन स्थानों में जनसंख्या का दबाव कम है। पर्यटकों और श्रद्धालुओं के अलावा स्थानीय लोगों को भी जान-माल की जबरदस्त क्षति जरूर पहुँची। लोगों की जानें गईं, सम्पत्ति के अलावा आजीविका को नुकसान पहुँचा।

प्रकृति की इस विभीषिका को नजरन्दाज नहीं करना चाहिए तथा राज्य और केन्द्र सरकार को पूरे परिदृश्य की विवेचना करके बेहतरीन विशेषज्ञों की सेवाएँ लेकर उत्तराखण्ड के इन स्थानों को फिर से बसाना चाहिए। संयोगवश उत्तराखण्ड में एक गाँव है कोठीबनाल। वहाँ कुछ मकान 1,000 साल तक पुराने हैं। ये मकान इतिहास के गवाह रहे हैं और कई भयंकर भूकम्प भी झेल चुके हैं वो आज भी बिना किसी आँच के खड़े हैं। इन मकानों का आर्किटेक्चर इतना खास है कि इन्हें अब कोठीबनाल आर्किटेक्चर भी कहा जाने लगा है। ये भूकम्प प्रतिरोधी हैं। इनका आर्किटेक्चर हमारे पूर्वजों ने भूकम्प, बाढ़ और भू-स्खलन की वैज्ञानिक जानकारी के बगैर तैयार किया था। दरअसल, उन्होंने कॉमनसेंस का इस्तेमाल किया था। तो भला हम क्यों नहीं जोखिमग्रस्त राज्य में अपने मकानों को बनाने के लिए ऐसे कॉमनसेंस का इस्तेमाल कर सकते।

उत्तराखण्ड के पर्यावरण एक्टिविस्ट सुन्दरलाल बहुगुणा कहते हैं कि यह मुद्दा केवल विकास बनाम पर्यावरण का नहीं है बल्कि विनाश बनाम जीवित रहने का है।

(लेखक भारतीय भूगर्भ सर्वेक्षण, उत्तरी क्षेत्र के निदेशक रह चुके हैं। सेवानिवृत्त के बाद से वह भूगर्भ सम्बन्धी विषयों पर लगातार लेखन कर रहे हैं।)
ई-मेल : joshi.vijaykumar@gmail.com

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