गोवा, दिल्ली की भूख और प्यास

Submitted by Hindi on Mon, 03/02/2015 - 16:59
Source
गाँधी मार्ग, मार्च-अप्रैल 2015
पोथी पढ़-पढ़ पंक्ति जिस पण्डित की ओर संकेत करती है, उसे सब जानते ही हैं। जग मुआ पर पण्डित नहीं बन पाए। प्रेम का ढाई आखर बना देता है पण्डित। इस बार ढाई आखर प्रेम का नहीं फ्रेम का है। तेजी से अपण्डित होते जा रहे संसार में वृत्त-चित्र के ढाई फ्रेम भी नए पण्डित बना सकते हैं- इस विश्वास के साथ इस बार पोथी के इस काॅलम में वृत्त-चित्र की चर्चा की जा रही है।

‘रेणुकाजी दिल्ली के नलों में’ तीन बड़े संकटों की तरफ संकेत करती है। एक तो ये कि क्या दिल्ली देश के ऊपर है कि यहाँ बाहर से पानी लाया जाए और जहाँ से पानी लाया जाए वहाँ बड़े स्तर पर पर्यावरण का विनाश हो। दूसरा यह कि पानी और दूसरे संसाधनों पर किसका अधिकार हो? जनता का या सरकार का? यानी रेणुका घाटी के पानी पर किसका अधिकार होना चाहिए।

फिल्मकार, फिल्म अध्येता और प्रखर सामाजिक कार्यकर्ता कुरुष कैंटीनवाला ने तीन डाॅक्यूमेन्ट्री फिल्में बनाई हैं- ‘गोवा गोवा गाॅन’ (2009), ‘रेणुकाजी दिल्ली के नलों में’ (2010) और ‘कोंकणाची मेगा वाट’ (2013)। यहाँ उनकी दो फिल्मों ‘गोवा गोवा गाॅन’ और ‘रेणुकाजी दिल्ली के नलों में’ पर चर्चा होगी।

‘गोवा गोवा गाॅन’ फिल्म गोवा के खनन उद्योग पर है। वैसे तो गोवा का खनन उद्योग उसी समय शुरू हो गया था, जब पुर्तगालियों ने इस राज्य पर कब्जा किया था। लेकिन नई आर्थिक नीति और ‘भूमंडलीकरण’ के दौर में ये खनन उद्योग ज्यादा ही सक्रिय हो गया है। आज यह मुख्य रूप से लौह अयस्क, मैंगनीज और कुछ हद तक बाॅक्साइट खनन पर केन्द्रित है और इसी के साथ प्रारम्भ हुआ है ग्रामीणों और पर्यावरणविदों द्वारा इस खनन उद्योग का विरोध!

गोवा दुनिया की उन बारह जगहों में हैं, जहाँ जैव-विविधताओं की बहुतायत है। लेकिन अब यही गोवा पर्यावरणीय विनाश के मुहाने पर है। कुरुष कैंटीनवाला की इस फिल्म में एक निवासी का कहना है कि यहाँ हरीतिमा की जगह लाल पहाड़ लेते जा रहे हैं। लाल पहाड़ का मतलब लाल मिट्टी के बड़े-बड़े ढेर जो खनन के दौरान निकले हैं और जो अब कई गाँवों की उपजाऊ जमीन की उर्वरता को भी नष्ट कर रहे हैं।

गोवा में इस खनन उद्योग के खिलाफ जब जनचेतना फैली तो मामला अदालतों में गया और सर्वोच्च न्यायालय ने 2012 में खनन पर प्रतिबन्ध भी लगा दिया। हालाँकि सन् 2014 में, कई पक्षों की सुनवाई के बाद इस प्रतिबंध को हटा भी दिया गया है। हाँ कुछ शर्तें भी रख दी गई हैं ताकि खनन सीमित मात्रा में हो और पर्यावरण का अधिक विनाश न हो। अब देखना है कि गोवा सरकार किस तरह इन शर्तों का पालन कराती है।

‘गोवा गोवा गाॅन’ बतौर फिल्म उस विनाश लीला का रेखांकन है, जिसे खनन माफिया ने अंजाम दिया। इस खनन माफिया में सिर्फ व्यापारी नहीं हैं, नेता भी हैं। फिल्म में एक तत्कालीन मन्त्री का भी जिक्र है जो खनन उद्योग के मालिक भी हैं। अठारह महीने के प्रतिबन्धित दौर को छोड़ दें तो खनन उद्योग गोवा का दूसरा सबसे बड़ा उद्योग रहा है। पहला यानी सबसे बड़ा उद्योग पर्यटन है। जब खनन उद्योग अपने चरम पर था तो ये गोवा की आठ फीसदी धरती को अपने में समेटे था। यह खनन उद्योग अन्धाधुन्ध फैलने लगा तो इसके खिलाफ प्रतिरोध शुरू हुआ। कई गाँवों में प्रदर्शन हुए। कई बार ऐसा भी हुआ कि यहाँ की पुलिस तक ने खनन उद्योग का साथ दिया और खनिजों से भरे ट्रकों को इलाके से बाहर निकालने में मदद की है।

फिल्म में ये भी दिखाया गया है कि महिलाएँ भी खनन माफिया के विरोध में संघर्ष में उतरीं। 82 साल की महिला डोरा डीसूजा और उनकी बेटी चेरिल डीसूजा नाम की दो महिलाओं ने अपने विरोध को प्रकट करने के लिए कुछ लोगों के साथ अपने को एक जन्जीर से बांध लिया था। ये एक प्रतीकात्मक विरोध था। फिर भी पुलिस ने इसका दमन किया। कुछ लोगों को गिरफ्तार भी किया। कुरुष की फिल्म में सेबास्टिन राॅडग्रिक्स नाम के पत्रकार का भी साक्षात्कार शामिल है। वे एक ब्लाॅग भी चलाते हैं और खनन उद्योग के विरोध में चलने वाले अभियान में भी शामिल रहे। सेबास्टिन डाॅडग्रिक्स पर एक खनन कम्पनी ने पाँच सौ करोड़ रुपए की मानहानि का मुकदमा भी दायर किया है। यह सब विपक्ष में उठती आवाजों को दबाने के मकसद से था।

‘गोवा गोवा गाॅन’ में दोनों तरह के दृश्य हैं। एक तरफ राज्य की हरियाली है और दूसरे तरफ वहाँ खनन के काम में लगे क्रेन, ट्रैक्टर और खनिज को ढ़ोते ट्रक और मालगाड़ियाँ दिखती हैं। प्रकृति को दिखानेवाली सुन्दरता और उसे बिगाड़ने वाली कुरूपता। हालाँकि जमीन के भीतर होने वाली खुदाई के दृश्य नहीं हैं। ये सम्भव भी नहीं थे। लेकिन कई ग्रामीणों से लेकर सामाजिक कार्यकर्ताओं और पर्यावरणवादियों के साक्षात्कार इसमें शामिल हैं।

यह फिल्म कई तरह के मुद्दे उठाती है जिनका सम्बन्ध सिर्फ गोवा से नहीं बल्कि पूरे देश में चल रही कानूनी प्रक्रिया और पर्यावरणीय चेतना से है। एक सामाजिक कार्यकर्ता ने उचित ही प्रश्न उठाया है कि क्या वजह है जिन उद्योगों से पर्यावरण की हानि होती है, उनको बिना देरी के पर्यावरण मन्त्रालय से मंजूरी मिल जाती है? फिर राज्य सरकारें अपने यहाँ के पर्यावरण को लेकर सचेत क्यों नहीं रहती? गोवा में बयालीस छोटी-बड़ी नदियाँ हैं। अगर बेरोकटोक खनन जारी रहा तो ये नदियाँ नष्ट हो जाएँगी। कुछ लोगों ने ये अन्देशा जताया है कि अगरगोवा में इसी तरह अन्धाधुन्ध खनन जारी रहा तो यहाँ अगले पाँच साल में पीने लायक शुद्ध पानी नहीं बचेगा।

फिल्म में कुछ आंकड़े भी हैं। सन् 2003-2004 में गोवा से 4645 करोड़ रुपए के अयस्क का निर्यात हुआ। 2004-2005 में ये राशि बढ़कर 6117 करोड़ की हो गई और 2005-2006 में 17719 करोड़! आजकल खनन का ज्यादातर माल चीन जाता है।

‘गोवा गोवा गाॅन’ को कई डाॅक्यूमेन्ट्री फिल्म समारोहों में दिखाया जा चुका है और इसने सिर्फ गोवा में ही नहीं बल्कि देश में भी पर्यावरण संरक्षण के लिए जागरूकता फैलाने में एक विशेष भूमिका निभाई है।

कुरुष कैंटीनवाला की दूसरी फिल्म ‘रेणुकाजी दिल्ली के नलों में’ दिल्ली शहर की पानी की प्यास पर है। दिल्ली में पानी की आपूर्ति के लिए हिमाचल प्रदेश की रेणुका घाटी में रेणुका नदी पर एक जलाशय प्रस्तावित है जिसकी तत्कालीन लागत साढ़े तीन हजार करोड़ से भी अधिक थी। अब ये बढ़ गई होगी। चूँकि ये मामला अभी पर्यावरण मन्त्रालय में मंजूरी के लिए लटका हुआ है, इसलिए अभी इस पर काम शुरू नहीं हुआ है। इस प्रस्तावित बांध या जलाशय से किस बड़े पैमाने पर रेणुका घाटी में विनाश होने की आशंका है, यही इस फिल्म में बताया गया है।

इससे सत्रह पंचायतों के निवासी विस्थापित होंगे और इसके अलावा जो ख़ानाबदोश होते हैं, जो यहाँ की अर्थव्यवस्था पर निर्भर हैं, वे भी यहाँ कभी आसरा नहीं ढ़ूँढ़ पाएंगे। रेणुका घाटी भगवान परशुराम की माँ के नाम से है। यहाँ खाद्यान और सब्जियों की अच्छी खेती होती है और वही यहाँ के निवासियों की जीविका का आधार भी है। पर अगर दिल्ली शहर को पानी देने के लिए ये प्रस्तावित बांध या जलाशय बना तो क्या यहाँ के निवासियों को कहीं और बसाया जाएगा? अगर हाँ तो कहाँ? क्या उनको उचित मुआवजा मिल जाएगा?

फिल्म में साक्षात्कार के दौरान पर्यावरणविद अनुपम मिश्र ने यह पूछा है कि अगर किसी सरकारी कर्मचारी की एक जगह से दूसरी जगह पर बदली होती है तो उसे पूरी सुविधाएँ मिलती हैं, मकान से लेकर बच्चों की पढ़ाई तक की। लेकिन क्या रेणुका घाटी के किसानों के साथ ऐसा हो पाएगा? अनुपम मिश्र अपनी बातचीत में दिल्ली के पुराने नक्शे का हवाला देते हुए ये भी बताते हैं कि किस तरह दिल्ली के भीतर सात सौ के करीब तालाब थे, वे कहाँ गए? हमारी नई व्यवस्था ने खुद दिल्ली के भीतर पानी की जो व्यवस्था थी, उसे चौपट कर दिया। अनुपम जी ये भी कहते हैं- ”पहले दिल्ली ने यमुना को खत्म किया, फिर यहाँ की प्यास को बुझाने के लिए गंगा का पानी लाया गया और अब रेणुका नदी की बारी है। उसके बाद किसकी बारी है? यही तो उलटी गंगा है।“

फिल्म में हिमाचल प्रदेश की रेणुका घाटी के दृश्य अधिक हैं लेकिन दिल्ली का प्रसंग भी बार-बार आता है। यह फिल्म दिल्ली और रेणुका घाटी- दोनों जगहों पर आवाजाही करती है। शुरु में ही यह दिखाया गया है कि दिल्ली शहर में पानी की खपत लगातार बढ़ती जा रही है। इसी से जुड़ा तथ्य यह भी है कि देश के महानगरों का अगर तुलनात्मक अध्ययन किया जाए तो तस्वीर ये उभरती है कि दिल्ली शहर में औसत दूसरे महानगरों की अपेक्षा ज्यादा पानी की व्यवस्था है। लेकिन इस शहर के भीतर अलग-अलग इलाकों में पानी का असमान वितरण है। नई दिल्ली के इलाकों में राजनैतिक तबका और आला सरकारी अधिकारी रहते हैं। यहाँ की तुलना में सामान्य रिहायशी इलाकों में पानी की आपूर्ति में आसमान जमीन का फर्क है। यही नहीं दिल्ली में सरकार नागरिक आपूर्ति के लिए जितने पानी का इन्तजाम करती है, उसका 40 फीसदी तो चोरी हो जाता है।

‘रेणुकाजी दिल्ली के नलों में’ तीन बड़े संकटों की तरफ संकेत करती है। एक तो ये कि क्या दिल्ली देश के ऊपर है कि यहाँ बाहर से पानी लाया जाए और जहाँ से पानी लाया जाए वहाँ बड़े स्तर पर पर्यावरण का विनाश हो। दूसरा यह कि पानी और दूसरे संसाधनों पर किसका अधिकार हो? जनता का या सरकार का? यानी रेणुका घाटी के पानी पर किसका अधिकार होना चाहिए। और तीसरा यह कि आखिर दिल्ली शहर के भीतर अलग-अलग इलाकों में पानी को इस असमान तरीके से क्यों वितरित किया जाता है? क्या यही लोकतंत्र है कि पानी देने में भी ये ख्याल रखा जाए कि कहाँ भद्र जन रहते हैं और कहाँ सामान्य जन?

कुरुष कैंटीनवाला की दोनों फिल्में प्रकृति और मनुष्य के रिश्ते पर सोचने के लिए प्रेरित करती हैं।

श्री रवीन्द्र त्रिपाठी साहित्य और समाज से जुड़े विविध विषयों पर लिखते हैं। कुरुष कैंटीनवाला की ये दोनों फिल्में यू टयूब पर देखी जा सकती हैं।

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