धरती के रंग बचाने हैं

Submitted by Hindi on Wed, 03/04/2015 - 15:01
Source
दैनिक भास्कर (मधुरिमा), 04 मार्च 2015
वंदना शिवावंदना शिवामैंने प्रकृति के प्रति अपने लगाव के चलते भौतिक विज्ञान की पढ़ाई की थी। शुरुआत में ही मुझे सिखाया गया था कि भौतिकी, प्रकृति को समझने का एक जरिया है। इसलिए भौतिकी में मेरा सफर पारिस्थितिकी में सफर की तरह ही है। इनमें कोई खास अन्तर नहीं है, सिवाय इसके कि पर्यावरणीय तबाही के पहलू में हम देखते हैं कि जीवन के लिए जरूरी तन्त्रों का विनाश हो रहा है। इस बात ने मुझे बाध्य किया कि महज अनुसंधान से कुछ अधिक करूँ और हस्तक्षेप करूँ तथा कारगर कदम उठाऊँ।

यह है न्याय की लड़ाई…
हमारे देश में अधिकांश लोग जैवविविधता, जमीन, जंगल, पानी जैसे प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर हैं। ऐसे में पर्यावरण की तबाही एक तरह का अन्याय ही है। आर्थिक गतिविधियों के कारण जब जंगल नष्ट होते हैं, नदी अवरुद्ध होती है, जैवविविधता की लूट मचती है, खेत जलमग्न हो जाते हैं, तो इन लोगों के सामने जीवन-मरण का प्रश्न खड़ा हो जाता है। इसलिए पर्यावरण की लड़ाई, न्याय की लड़ाई है।

महिलाएं विशेषज्ञ होती हैं..
शुरुआत में मुझे इस विरोधाभास ने उद्वेलित किया कि विज्ञान के मामले में बेहद विकसित हो रहा हमारा देश दूसरी तरफ भीषण गरीबी से भी जूझ रहा था। विज्ञान और तकनीक के सामाजिक सम्बन्धों को समझना मेरे लिए आवश्यक हो गया था। दूसरा मुद्दा था हिमालयीन वनों का लुप्त होते जाना, जहाँ मैं बड़ी हुई थी। इसलिए मैं चिपको आन्दोलन से जुड़ी और ग्रामीण महिलाओं के साथ काम किया। इस दौरान मैंने जाना कि जलाऊ लकड़ी, चारा औषधि आदि के सन्दर्भ में उनके लिए वनों के क्या मायने हैं। मेरे सामने यह भी साफ हुआ कि ये स्थानीय ग्रामीण महिलाएं अपने क्षेत्र की वनस्पति, जीव-जन्तुओं के मामले में किसी प्रशिक्षित फॉरेस्टर से ज्यादा जानती हैं।

हमारी जड़ों में है विविधता…
भारत भूमि सांस्कृतिक और जैविक, दोनों तरह की विविधताओं में समृद्ध है। जैसे जंगल बहुरंगी हैं, वैसे ही भारतीय सभ्यता भी इसी विविधरंगी रूप में विकसित हुई है। हमारा आधार-भूत सिद्धान्त है, वसुधैव कुटुम्बकम। सारी पृथ्वी एक परिवार है, जिसमें न केवल सभी प्रजाति, संस्कृति, धर्म और लिंग के मानव शामिल हैं, बल्कि संसार के सारे जीव-जन्तु, पादप प्रजातियों की विविधता भी समाहित है। और जैवविविधता की तरह हमारी सांस्कृतिक विविधता भी मिट्टी से उपजी है।

ये हैं वंदना
वैज्ञानिक, पर्यावरणविद। जंगल बचाने, महिलाओं को संगठित करने और जैवविविधता को संरक्षित करने में जुटी हैं। उनके रिसर्च फाउन्डेशन फॉर साइंस टेक्नोलॉजी एण्ड इकोलॉजी और नवधान्य पारम्परिक बीजों के संरक्षण और जैविक खेती के विस्तार के लिए कार्यरत हैं। प्रकृति से वंदना का गहरा नाता है। प्रकृति में हरे रंग की बहुलता है, जो जीवन का प्रतीक है। वंदना शिवा भी इसी हरियाली को बचाने में जुटी है।

(वंदना शिवा के इंटरव्यू और लेख के चुनिंदा अंश, उनकी वेबसाइट vandanashiva.com से साभार)

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