खास होती, नदियों की आस

Submitted by RuralWater on Wed, 03/18/2015 - 12:38

विश्व जल दिवस पर विशेष


.बधाई! यह विश्व जल दिवस के आने से पहले की कई तारीखें भारत की नदियों के लिए कुछ खास आस लेकर आई हैं। अच्छी खबरें कई हैं, लेकिन इससे अच्छी और अतुलनीय.. कोई नहीं।

 

प्रदूषण करने वाले को पार्टी से निकाला


कुछ वर्ष पूर्व खनन में संलग्न होने पर जल बिरादरी के एक प्रदेश संयोजक की पदमुक्ति के निर्णय का बखान करते मैंने कई को सुना। किन्तु एक मार्च, 2015 से पहले मैंने यह कभी नहीं सुना कि नदी प्रदूषित करने के दोषी पदाधिकारी को किसी राजनैतिक दल ने पार्टी से ही निकाल दिया हो।

महाराष्ट्र नव निर्माण सेना ने ऐसा किया। अपनी फैक्टरी के जहरीले रसायन पदार्थ से औरंगाबाद की खाम नदी को प्रदूषित करने के लिए पाँच लोगों को चिन्हित किया गया। जिसमें तीन अन्य के अलावा, स्थानीय भाजपा पार्षद और महाराष्ट्र नव निर्माण सेना (मनसे) की औरंगाबाद इकाई के प्रमुख सुमित खाम्बेकर भी दोषी पाए गए। दोष की पुष्टि की गई। पुष्टि होते ही मनसे प्रमुख ने सुमित को न सिर्फ सभी पदों से बर्खास्त किया, बल्कि पार्टी से ही निकाल बाहर किया।

मनसे प्रमुख राज ठाकरे ने नदी में जहर मिलाने के इस कृत्य को पूरी तरह अमानवीय और भयंकर बताते हुए संकल्प जताया कि कोई कैसे लोगों की जिन्दगीसे खिलवाड़ कर सकता है?

हर विश्व जल दिवस पर संयुक्त राष्ट्र संघ कम-से-कम इतनी उम्मीद तो करता ही होगा कि लोग जागें। हम भारतीय, अपनी संस्कृति का सिर्फ गुणगान न करें, बल्कि भारतीय संस्कृति के अनुरूप पानी और प्रकृति के साथ अनुशासन के साथ जीने के सिद्धान्तों को अपनी आदत भी बनाएँ। गौर करने की बात है कि ‘खाम्बेकर’ नाम की उत्पति ही खाम नदी से हुई।

इस नाम का खाम नदी से गहरा रिश्ता है। किन्तु सुदीप खाम्बेकर इस रिश्ते को ही भूल गए। न सुमित खाम्बेकर ने इस रिश्ते की लाज नहीं रखी; न भाजपा पार्षद ने जन-प्रतिनिधि के दायित्व की और न ही अन्य तीन उद्योगपतियों ने औद्योगिक कानूनों की। सिर्फ मनसे प्रमुख ने संकल्प दिखाया। बयान और व्यवहार की खाई पाटी। एक नजीर पेश की। ऐसी नजीर कोई और हो, तो बताइए।

 

नजीर को सराहें भी, अपनाएँ भी


इस विश्व जल दिवस का विषय है: पानी और टिकाऊ विकास। यदि हमें सतत् विकास चाहिए कि ऐसी नजीरों को आगे रखकर सरकारों और विकास के पैरोंकारों को याद दिलाते होगा कि न तो नदी, विकास की दुश्मन है और न ही नदी की सेहत की वकालत करने वाले। शुक्र है किसी-किसी सरकार ने कुछ-कुछ समझना शुरू कर दिया है।

 

हरमू के दिन लौटेंगे, तालाबों के भी


हरमू नदीसंसद से सड़क तक भूमि बचाने की कवायद : एक दिन नदी की ज़मीन भी बचाएगी। यह आस भी है और नदी की दृष्टि से खास भी। आप खुश हो सकते हैं कि इस बाबत झारखण्ड से आई खबर अच्छी है। झारखण्ड मुख्यमन्त्री रघुवरदास ने ऐलान कर दिया है कि नदी और तालाबों की ज़मीन बेचने वाले बख्शे नहीं जाएँगे। अगले छह महीनों के भीतर ज़मीनों के रिकाॅर्ड आॅनलाइन होंगे।

खबर यह भी है कि राँची शहर के बीच से गुजरने वाली नदी हरमू के दिन लौटेंगे। 17.04 किलोमीटर नदी साफ होगी। नदी तट सुधरेगा; सुन्दर होगा। सीवेज हेतु 55 किलोमीटर लम्बी भूमिगत व्यवस्था की जाएगी।

 

कलियासोत की ज़मीन बचाएँगे हम


भोपाल (मध्य प्रदेश) की कलियासोत नदी की ज़मीन पर बने बिल्डरों द्वारा निर्मित मकानों को हालांकि माननीय मुख्यमन्त्री जी का आश्वासन है, लेकिन नदी के चहेते जाग गए हैं। कलेक्टर महोदय ने सुनवाई के लिए 27 मार्च की तारीख तय कर दी है।

 

गंगा-यमुना पर संजीदा होते योजनाकार


व्यवहार क्या होगा? अभी कहना मुश्किल है; किन्तु संकेत है कि गंगा में औद्योगिक प्रदूषण को लेकर केन्द्र सरकार संजीदा होने को तैयार है। मन्त्रालय ने संकेत दिए हैं कि गंगा किनारे की फैक्टरियाँ सुधरें अथवा ताला मारकर घर बैठ जाएँ। आईआईटी कन्सोर्टियम ने भी गंगा नदी बेसिन प्रबन्धन योजना- 2015 को लेकर अपनी रिपोर्ट पेश कर दी है।

मैली यमुना को निर्मल बनाने हेतु एकीकृत योजना तैयार कर ली गई है। सिंचाई, उद्योग और घरेलु जलोपयोग को अनुशासित और सक्षम बनाने हेतु राष्ट्रीय जल ब्यूरो के गठन का प्रस्ताव भी आ ही गया है।

कालियासोत नदी

 

अब गोदावरी कुम्भ भी होगा हरित


गोदावरी में प्रदूषण को लेकर नदी कार्यकर्ता, राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण और महाराष्ट्र हाईकोर्ट की नाराजगी रंग लाई है। “गोदावरी का पानी पीने योग्य नहीं है।’’ -नासिक नगर पालिका द्वारा गोदावरी किनारे लगाए गए ऐसे बोर्ड तो अब पुराने पड़ चुके हैं।

नया समाचार यह है कि इलाहाबाद में हुए ‘ग्रीनकुम्भ’ की तर्ज पर नासिक नगर निगम ने भी कुम्भार्थियों द्वारा लाए कचरेसे नदी को बचाने के लिए तय प्रावधानों के साथ ‘हरित कुम्भ’ मनाने की तैयारी शुरू कर दी है। सुखद है कि जिला प्रशासन ने भी कम-से-कम कुम्भ के दौरान गोदावरी साफ दिखे; ऐसा निर्णय ले लिया है।

 

मिलने लगी है चुप्पी को चुनौती


सांगली जिले के कलेक्टर ने जलयुक्त गाँव अभियान के तहत् जल संरक्षण-संवर्धन गतिविधियों के सामाजिक अध्ययन का काम शुरू करने का निर्णय लिया है। कर्नाटक के मांड्या में चैतन्य कदमों की आहट शुरू हो गई है। बुन्देलखण्ड, हिमाचल, पंजाब, दिल्ली समेत श के कई हिस्सों में जल संकट से उबरने के विचार को व्यवहार में उतारने की भिन्न स्तरीय योजनाएँ बनने लगी हैं।

अच्छा है और अच्छा हो यदि मेरे जैसे पानी के कलमकार, पानी की बचत के नुस्खे सिर्फ लिखें नहीं, खुद अपनी आदत में पूरी तरह उतारें भी। बकौल कुमार विश्वास, रायचन्द, ज्ञानचन्द, हुकूमचन्द बनने की बजाय, कर्मचन्द बनें।

 

 

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अरुण तिवारीअरुण तिवारी

शिक्षा:


स्नातक, पत्रकारिता एवं जनसंपर्क में स्नातकोत्तर डिप्लोमा

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