नरेगा में भ्रष्टाचार : मिथक और वास्तविकता

Submitted by birendrakrgupta on Sat, 03/21/2015 - 07:07
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योजना, अगस्त 2008
नरेगा से भ्रष्टाचार का उन्मूलन हो सकता है। इसके साथ ही जहाँ कहीं से भी भ्रष्टाचार की शिकायत मिले, वहाँ त्वरित कार्रवाई की जानी चाहिए।राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी कानून (नरेगा) 2 साल पहले 200 जिलों में लागू किया गया था। बीती अवधि में इसे अनेक प्रक्रियाजन्य समस्याओं से जूझना पड़ा, हालाँकि नरेगा के मार्गनिर्देश काफी सटीक थे। इससे यह अपनी मौलिक अनुकूल प्रकृति से अथवा अपनी सफल होने की सम्भावना से विचलित नहीं हो सका। परन्तु, इसने जाँच के दौरान महालेखा परीक्षक को इस बात के लिए पर्याप्त आधार प्रदान कर दिया कि वे इसको सन्देह के घेरे से निकालने के लिए नैदानिक उपाय करने की माँग कर सकें।

मीडिया रिपोर्ट के विपरीत नरेगा के बारे में महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट के मसौदे में धन के व्यापक घोटाले के किसी प्रमाण का कोई उल्लेख नहीं है और न ही यह निष्कर्ष है कि नरेगा ‘विफल’ रहा। रिपोर्ट में मुख्य रूप से प्रक्रिया सम्बन्धी खामियों तथा उनको दूर करने के रचनात्मक उपायों का उल्लेख है। नरेगा के पूरे देश में विस्तार के कुछ ही सप्ताह पहले यह रिपोर्ट आई।

प्रश्न उठता है कि क्या नरेगा का धन वास्तव में गरीबों तक पहुँच पाया है? इस सिलसिले में हम ‘दैनिक मजदूरी भुगतान के सत्यापन’ के ताजा निष्कर्षों की चर्चा करेंगे। सत्यापन का काम जीबी पन्त सोशल साइंस इंस्टीट्यूट, इलाहाबाद के तालमेल के साथ पूरा किया गया था। सर्वेक्षण दल में दिल्ली विश्वविद्यालय तथा दूसरी जगहों के पूरी तरह से प्रशिक्षित छात्रों को शामिल किया गया।

दैनिक मजदूरी सूची जहाँ-तहाँ से नमूने के तौर पर सर्वेक्षण से पहले लिए गए विवरण के आधार पर तैयार की गई थी, ताकि उसमें सुधार करने की नाममात्र भी गुंजाइश न रहे। जाँचकर्ताओं के साक्षात्कार और विशेष रूप से तैयार मजदूरी की सूची में श्रमिकों से पूछताछ कर इस बात की पुष्टि की गई कि काम के दिन और उन्हें दी गई मजदूरी सही है कि नहीं। दैनिक मजदूरी की सूची का सत्यापन राजस्थान में सूचना के अधिकार अभियान की पृष्ठभूमि में विकसित प्रणाली के आधार पर किया गया। यह सीखने की प्रक्रिया और पारदर्शिता विकसित करने का एक सुअवसर भी रहा, ताकि लोक निर्माण योजनाओं (यथा मजदूरों की सूची, जॉब कार्ड की नियमित व्यवस्था तथा सामाजिक लेखापरीक्षण) के लिए रक्षोपाय किए जा सकें। इनमें से अनेक का उल्लेख पहले से ही नरेगा के संचालन सम्बन्धी मार्गनिर्देश तथा कानून में है। राजस्थान से इसके काफी अनौपचारिक साक्ष्य भी प्राप्त हुए जिनसे ये रक्षोपाय काफी हद तक भ्रष्टाचार को रोकने में मददगार साबित होंगे। हम लोगों ने अन्यत्र भी इस जानकारी का उल्लेख किया है। (दि हिन्दू, 13 जुलाई, 2007)

सत्यापन की यह नयी श्रृंखला मई-जून, 2007 में झारखण्ड तथा छत्तीसगढ़ में शुरू हुई थी, जहाँ हमलोगों को दो साल पहले ‘काम के बदले अनाज’ कार्यक्रम में व्यापक भ्रष्टाचार के प्रमाण मिले थे। उदाहरण के लिए छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में उस समय काम के बदले अनाज कार्यक्रम के लिए आवण्टित धन के गबन पर कोई नियन्त्रण नहीं था। हालत इतनी खराब थी कि हममें से एक व्यक्ति को यह टिप्पणी करने पर मजबूर होना पड़ा कि यह लूट फॉर वर्क प्रोग्राम है। (टाइम्स ऑफ इण्डिया, 2 जुलाई, 2005)

उसी जिले में इस साल अनेक स्रोतों से हमलोगों को यह बात सुनने को मिली कि नरेगा के लागू होने से भ्रष्टाचार की वारदात में भारी कमी आई है। यह दैनिक मजदूरों की सूची के सत्यापन कार्य का परिणाम है। हमने ग्राम पंचायतों द्वारा कराए गए निर्माण कार्यों के जहाँ-तहाँ से 9 नमूने लिए। उनकी जाँच से पता चला कि मजदूरों की सूची के अनुसार, 95 प्रतिशत मजदूरी का भुगतान किया गया। भुगतान वास्तव में सम्बन्धित मजदूरों को ही मिला है। पड़ोस के कोरिया जिले में भी इसी तरह का सत्यापन किया गया। वहाँ नरेगा कार्यक्रम के भुगतान में सिर्फ 5 प्रतिशत की गड़बड़ी पाई गई।

झारखण्ड में अचानक चयनित पाँच जिलों में दैनिक मजदूरों की सूची का सत्यापन किया गया। वहाँ नरेगा के निर्माण कार्यों में 33 प्रतिशत गड़बड़ी पाई गई। स्पष्टतः यह गड़बड़ी पूरी तरह से अमान्य है, परन्तु यह उच्च आँकड़ा भी इस दावे को उचित नहीं ठहराता कि नरेगा कोष का बड़ा हिस्सा गरीबों तक नहीं पहुँचा। झारखण्ड में पूर्व के वर्षों की तुलना में भ्रष्टाचार में धीरे-धीरे कमी आई है। पहले आमतौर पर यही तथ्य उजागर हुआ था कि दैनिक मजदूरों की सूची ऊपरी स्तर से निचले स्तर तक नकली होती थी।

आन्ध्र प्रदेश सरकार ने नरेगा की सारी मजदूरी का भुगतान डाकघर के माध्यम से करने के साहसिक उपाय किए हैं। यह अमल वाली एजेंसी से भुगतान वाली एजेंसी को पृथक रखने का एक उदाहरण है। नरेगा के मार्गनिर्देश में भी ऐसी ही सिफारिश है।इसके बाद हम लोग जुलाई-अगस्त 2007 में तमिलनाडु के विल्लूपुरम जिले में नरेगा के सामाजिक लेखापरीक्षण के सिलसिले में गए। वहाँ हमें नरेगा में भ्रष्टाचार को फैलने से रोकने के गम्भीर प्रयासों के अनेक उदाहरण मिले। उदाहरण के लिए तमिलनाडु सरकार ने दैनिक मजदूरों की सूची तैयार करने का विशेष तरीका निकाला है। मजदूरों को हर दिन अपनी हाजिरी के तौर पर दैनिक मजदूरी की सूची में दस्तखत करना पड़ता है अथवा अंगूठे का निशान लगाना पड़ता है। इससे यह सुनिश्चित हुआ है कि कार्यस्थल पर न सिर्फ नरेगा के मार्गनिर्देश के अनुरूप आम लोगों की जाँच के लिए मजदूरों की सूची उपलब्ध रहती है, बल्कि वास्तव में हर दिन इसे बड़ी संख्या में लोग देखते भी हैं। इस तथा अन्य तरीकों से त्रुटिहीन प्रणाली कायम करने की दिशा में काफी प्रगति हुई है। दुर्भाग्यवश, धन के दुरुपयोग की मात्रा तय करना सम्भव नहीं हो पाया है, क्योंकि विल्लूपुरम सामाजिक लेखापरीक्षण में सुनियोजित दैनिक मजदूरी सूची का सत्यापन शामिल नहीं है।

बाद में आन्ध्र प्रदेश के संक्षिप्त दौरे से नरेगा में भ्रष्टाचार रोकने की विभिन्न पहलों को देखने तथा उन पहलों को सराहने का सुअवसर मिला। उदाहरण के लिए आन्ध्र प्रदेश सरकार ने नरेगा की सारी मजदूरी का भुगतान डाकघर के माध्यम से करने के साहसिक उपाय किए हैं। यह अमल वाली एजेंसी से भुगतान वाली एजेंसी को पृथक रखने का एक उदाहरण है। नरेगा के मार्गनिर्देश में भी ऐसी ही सिफारिश है। इस प्रणाली से अमल वाली एजेंसी को दैनिक मजदूरी की सूची में गड़बड़ी के लिए किसी भी प्रकार के प्रोत्साहन की गुंजाइश खत्म हो गई है, क्योंकि भुगतान उनकी पहुँच से बाहर है। इसके अलावा आन्ध्र प्रदेश ने सामाजिक लेखापरीक्षण का एक संस्थागत ढाँचा भी खड़ा कर दिया है, जिसमें भागीदारी वाली प्रक्रिया के आधार पर नरेगा के रिकॉर्डों के नियमित सत्यापन की व्यवस्था है। अपने संक्षिप्त दौरे तथा सामाजिक लेखापरीक्षण के आधार पर हमारा निष्कर्ष है कि ये रक्षोपाय काफी प्रभावकारी हैं। जबकि छोट-मोटे भ्रष्टाचार (जैसे पोस्ट मास्टरों द्वारा घूस लेना) सामाजिक लेखापरीक्षण के कारण पनपे हैं। व्यापक घोटाले का कोई प्रमाण नहीं मिला जब कि कुछ साल पहले तक आन्ध्र प्रदेश में लोक निर्माण कार्यों में धोखाधड़ी व्यापक स्तर पर कायम थी।

भारी मानसिक आघात


इन अपेक्षाकृत उत्साहजनक जानकारियों के बाद ओडिशा में हमलोगों को तब भारी मानसिक आघात लगा जब अक्टूबर 2007 में अकस्मात 30 चुनिन्दा कार्यस्थलों पर, जो तीन जिलों (बोलांगीर, बाउध और कालाहाण्डी) में फैले हुए थे, दैनिक मजदूरों के रजिस्टर का सत्यापन किया गया। इस जाँच-निष्कर्ष की खबर अन्यत्र भी छपी थी। (दि हिन्दू, 20 नवम्बर, 2007)। संक्षिप्त जाँच के दौरान हमलोगों ने पाया कि ओडिशा में सार्वजनिक निर्माण कार्यों में (जिनमें निजी ठेकेदार लगे होते हैं) व्यापक स्तर पर दैनिक मजदूरों से काम लिया जाता है और रिश्वतखोरी संस्थागत रूप ले चुकी है, यही भ्रष्टाचार की ‘परम्परागत प्रणाली’ की जगह पारदर्शी एवं जवाबदेह प्रणाली में बदलाव शायद ही शुरू हो पाया है।

रक्षोपाय में पारदर्शिता को निहित स्वार्थी तथ्यों ने विफल बना दिया है तथा जो प्रणाली कायम भी है उसमें सत्यापन का काम वस्तुतः मुश्किल है। बोलांगीर और कालाहाण्डी में बदनाम ‘पीसी सिस्टम’ लागू है (इसमें विभिन्न पदाधिकारी इन योजनाओं के लिए आवण्टित राशि में एक निर्धारित प्रतिशत की माँग करते हैं) और इसमें नरेगा के लिए आवण्टित राशि का करीब 22 प्रतिशत खर्च हो जाता है। उम्मीद की किरण यह है कि इस भ्रष्टाचार से ग्रस्त क्षेत्र में भी अनुकूल बदलाव के कई संकेत मिले। जब कभी वहाँ जाँच एवं नियन्त्रण की व्यवस्था लागू की जाती है तो निहित स्वार्थी तत्वों के लिए भुगतान एवं काम में गड़बड़ी करना कठिन हो जाता है और भ्रष्टाचार कम हो जाता है। हाल ही में भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान तेज किया गया था। यह कदम नरेगा में व्यापक भ्रष्टाचार की शिकायत के बाद उठाया गया था।

नरेगा के लिए आवण्टित राशि की और व्यापक छानबीन की जरूरत है, परन्तु छोटे स्तर की जाँच का भी अच्छा परिणाम निकलता है। दैनिक मजदूरों की हाजिरी रजिस्टर तथा सत्यापन फॉर्म आग्रह पर उपलब्ध कराए जाते हैं।इसके बाद दिसम्बर 2007 में हमलोगों ने हिमाचल प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्रों की राह पकड़ी। वहाँ दो जिलों- कांगड़ा एवं सिरमौर की स्थिति में भारी विरोधाभास था। हमने नरेगा सहित सार्वजनिक कार्यों में भारी पारदर्शिता पाई। दैनिक मजदूरी रजिस्टर तथा नरेगा से सम्बन्धित अन्य रिकॉर्ड आम लोगों के देखने के लिए ग्राम पंचायत कार्यालय में उपलब्ध थे- कई जगह कम्प्यूटरीकृत रूप में। एक अपवाद मिण्टा ग्राम पंचायत के अलावा हर जगह दैनिक मजदूरों की सूची तथा श्रमिकों से पूछताछ की बातों में प्रायः समानता थी।

सिरमौर में दैनिक मजदूरों की सूची में गड़बड़ी पाई गई। कुछ मामलों में योजना के उपादानों में अवैध रूप से बढ़ोत्तरी दर्शाई गई थी जिसका उसके लिए निर्धारित राशि से कोई तालमेल नहीं था। राशि के घोटाले के भी कई मामले सामने आए।

नरेगा के लिए आवण्टित राशि की और व्यापक छानबीन की जरूरत है, परन्तु छोटे स्तर की जाँच का भी अच्छा परिणाम निकलता है। दैनिक मजदूरों की हाजिरी रजिस्टर तथा सत्यापन फॉर्म आग्रह पर उपलब्ध कराए जाते हैं। ये रिकॉर्ड उन लोगों के पढ़ने के लिए उपयोगी साबित होंगे जो यह सोचते हैं कि नरेगा का धन व्यवस्थित ढंग से बर्बाद किया जा रहा है। इसी तरह लोगों का कथन भी इसके पक्ष में है। कोई भी संवेदनशील व्यक्ति इन बातों से द्रवित हुए बिना नहीं रह सकता कि किस तरह नरेगा के नियोजन से उनको इज्जत के साथ जीविकोपार्जन, बच्चों के पालन-पोषण तथा उन्हें स्कूल भेजने में मदद मिली है।

इन निष्कर्षों की विविधता से एक सबक भी मिला है। नरेगा से भ्रष्टाचार का उन्मूलन हो सकता है। इस उपाय पर अमल का तरीका स्वतः इसके कानून तथा मार्गनिर्देशों में निहित है जिससे पारदर्शिता सम्बन्धी रक्षोपाय सम्भव है। इसके साथ ही जहाँ कहीं से भी भ्रष्टाचार की शिकायत मिले, वहाँ त्वरित कार्रवाई की जानी चाहिए। समय का तकाजा है कि हम धैर्य न खोएँ।

(लेखकगण जीबी पन्त सोशल साइंसेज इंस्टीट्यूट, इलाहाबाद विश्वविद्यालय से सम्बद्ध हैं)
ई-मेल : jaandaraz@gmail.com एवं reetika.khera@gmail.com