रोजगार गारण्टी कानून एवं पर्यावरण सुरक्षा

Submitted by birendrakrgupta on Sat, 03/21/2015 - 07:13
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योजना, अगस्त 2008
राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी योजना की मूल भावना में कोई कमी नहीं है। लेकिन कार्य सम्पादन के स्तर पर इसमें कमी है। इसे अति शीघ्र ठीक किए जाने की आवश्यकता है। पर्यावरण पुनर्चक्रीकरण के देवता भी यही चाहते हैं कि विस्ततृ कार्य योजना बने।अस्सी के दशक के मध्य में पर्यावरणविद अनिल अग्रवाल जब महाराष्ट्र की रोजगार गारण्टी योजना के सूत्रधार की खोज में निकले तो मैं भी उनके साथ हो ली। इस खोज में हमने स्वयं को सचिवालय में फाइलों से अटे धूलभरे दफ्तर में पाया। वहाँ हमारी मुलाकात श्री वीएस पागे से हुई। वे छोटी कद-काठी के बहुत ही मृदुभाषी इंसान थे। उन्होंने हमें बताया कि सन् 1972 में जब राज्य में भीषण सूखा पड़ा था और लोग पलायन पर मजबूर थे, तब यहाँ एक ऐसी कार्य योजना तैयार की गई जिसकी मूल भावना थी ग्रामीण इलाकों में रोजगार पैदाकर भुगतान के लिए बड़े शहरों के व्यवसायियों पर दायित्व डालना। ये रोजगार कानूनन गारण्टी से युक्त थे। यह पहल गरीबी हटाने के ध्येय को लेकर निर्मित रोजगार अधिकार सम्पन्नता की ओर पहला कदम था, चूँकि काम स्थानीय स्तर पर ही उपलब्ध था अतः लोगों को रोजगार की तलाश में शहरों की ओर नहीं भागना पड़ा।

संकट के ऐसे दौर में रोजगार सृजन की इस पहल से अनिल न केवल उत्साहित थे बल्कि एक और बड़ा पर्यावरण पुनर्निर्माण का लाभ वे इसमें देख पा रहे थे। इसी दौरान हम अण्णा हजारे से मिलने राले गाँव सिद्धि गए थे। वहाँ उनके निर्देशन में पहाड़ियों की परिधि में पानी रोकने और जमीनी जल पुनर्भरण के उद्देश्य से छोटी खाइयाँ निर्मित की जा रही थीं। वहाँ हमें प्याज की भरपूर पैदावार देखने को मिली। इसकी वजह थी सिंचाई की बढ़ी हुई मात्रा। पागे साहब भी अनिल के इसमें निहित पर्यावरण लाभ के विचार से सहमत तो थे किन्तु उन्होंने बताया कि चूँकि योजना संकट के दौर का सामना करने के लिए बनाई गई थी, अतः जिला अमल में रोजगार गारण्टी कार्यक्रम प्रशासन ने ज्यादातर मामलों में पत्थर तोड़ने, सड़कें बनाने और सार्वजनिक निर्माण के कार्य करवाकर अपना कर्तव्य पूरा कर लिया।

अगले कुछ वर्षों में इस श्रमधन का उपयोग प्राकृतिक आस्तियों के निर्माण के लिए किए जाने के विचार ने महाराष्ट्र में जोर पकड़ा। अब मिट्टी और पानी को बचाने की ओर ध्यान केन्द्रित हुआ। इस दिशा में चेक डैम निर्माण, खेतों में मिट्टी उपचार, पहाड़ियों में खाई रचना और पौधरोपण के कार्य होने लगे। महाराष्ट्र रोजगार योजना की तर्ज पर बनाए गए केन्द्रीय रोजगार कार्यक्रम ने भी अनुसरण करते हुए कुछ मामलों में पर्यावरण पुनर्निर्माण की गरज से एक न्यूनतम प्रतिशत पौधरोपण पर ही खर्च करने की व्यवस्था अनिवार्य कर दी।

इसी दौर में देश ने जीवित रहने वाले सार्थक पौधरोपण या ऐसे तालाब निर्मित करने का कौशल भी सीखा जो हर बारिश में गाद से न भर जाएँ। प्रशासक एनसी सक्सेना ने आकलन किया कि रोपा गया हर पौधा अगर जीवित रह पाए तो हर गाँव में इतने पेड़ होंगे कि प्रत्येक गाँव के नजदीक एक अच्छा-खासा जंगल होगा जो अब तक वास्तव में सिर्फ कागजों तक ही सीमित था। अनिल ने बाद में लिखा भी था कि ये सब किस तरह अनुत्पादक रोजगार निर्माण से सिद्धहस्त हो चुके हैं, जिसके अन्तर्गत हर वर्ष सिर्फ पौधरोपण जो कि प्रतिवर्ष रोपों के पशुओं द्वारा खा लिए जाने या मर जाने के कारण उन्हीं गड्ढों को बार-बार खुदवाए जाने से शाश्वत होता जा रहा था।

इस प्रशासकीय खेल ने ग्रामवासियों को नयी चेतना दी और उन्होंने नाजुक प्रकृति की सुरक्षा का जिम्मा खुद उठाने का प्रण लिया। स्थानीय लोगों की राय ली जाने लगी। इसके फलस्वरूप उन्हें इसके सीधे फायदे भी मिलने लगे। चरनोई पेड़-पौधे, जल-स्रोत आदि पुनर्जीवित हुए। प्रशासकीय अमला- वन विभाग, कृषि विभाग, सिंचाई विभाग गाँवों के लिए जो योजनाएँ बनाता था वे उतनी उपयोगी नहीं होती थीं। यह वह दौर या जब विकास के लिए प्रयोगधर्मिता की शुरुआत हुई, मध्य प्रदेश के गाँवों में वाटर शेड्स बनाने के लिए मात्र एक एजेंसी को माध्यम बनाने का प्रयोग हुआ। इस दौर के ही अध्ययनों से खुलासा हुआ कि भूमि और जल-स्रोतों के बेहतर उपयोग के द्वारा गाँवों में आर्थिक उन्नति के द्वार खुल सकते हैं।

राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी भी इसी भवना से तैयार की गई है और इसमें पिछली योजनाओं को अपेक्षा बेहतर प्रावधान किए गए हैं जैसे प्राकृतिक आस्तियों के निर्माण (मिट्टी और जल के बचाव) पर खर्च के महत्त्व को प्रतिपादित किया जाना और इस हेतु ग्रामीण स्तर पर योजना बनाने को अनिवार्य किया जाना एवं चुनी हुई पंचायतों को लोक निर्माण कार्यों के लिए शासकीय विभागों से वरीयता देते हुए उत्तरदायी बनाना। लेकिन योजना प्रारम्भ होने के दो वर्ष बाद भी एक सवाल मुँह बाए खड़ा है। क्या इससे स्थितियों में वास्तव में कोई परिवर्तन हुआ है?

तपती गर्मी के मौसम में राजस्थान प्रवास के दौरान मैंने महिलाओं के एक झुण्ड को ग्रामीण सौ दिनी योजना (स्थानीय लोग इसे यही कहते हैं) के अन्तर्गत कार्य पर लगे पाया। वे तपते सूरज के नीचे तालाब की खुदाई कर रही थीं। देख-रेख कर रहे इंजीनियर ने बताया कि पंचायत की सलाह पर तालाब में जमा मिट्टी को हटाकर दीवारों का निर्माण किया जाना है। हर महिला एक चौकोर गड्ढा खोद रही थी। कारण पूछने पर सुपरवाइजर ने बताया कि इसी तरह से खुदाई के निर्देश मिले हैं। इसके पीछे कारण है एक वैज्ञानिक अध्ययन, जिसके मुताबिक एक व्यक्ति एक दिन में कितने क्यूबिक मीटर खोदता है इसका अन्दाज हो जाता है। उन महिलाओं को चौकोर गड्ढे का लक्ष्य दे दिया जाता है और काम तथा मजदूरी का हिसाब उसी के द्वारा लगाया जाता है। मौके पर मौजूद मजदूर महिलाओं का कहना था कि इस कवायद का मकसद सिर्फ यह है कि हमें सप्ताह या पन्द्रह दिनों की अपनी मजदूरी का अन्दाज न लग पाए क्योंकि कार्य का आकलन व्यक्ति के रूप में किया जाएगा।

मैंने महससू किया कि दिल्ली में निपटने के चक्कर में हम व्यावहारिकता को भूल जाते हैं। किसी के पास इस सवाल का जवाब नहीं था कि इन चौकोर गड्ढों से क्या तालाब बन पाएगा? किसी को इस बात की फिक्र नहीं थी कि तालाब तक पानी लाने वाली नहरों की गाद निकाली भी गई है या नहीं, या इस सौ दिनी योजना में काम पूरा हो भी पाएगा या नहीं?

इसी दौरान मैंने सुन्दरवन शेर अभ्यारण्य के नजदीक स्थित एक गाँव में देखा कि राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी योजना के अन्तर्गत खोदी जा रही एक नहर ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को किस तरह प्रभावित किया है। स्थानीय मछुआरों को अब मछली पकड़ने के लिए अवैध तरीकों पर निर्भर नहीं रहना पड़ रहा था इसकी वजह से अब कृषक भी एक अतिरिक्त फसल ले पा रहे थे। योजना की इस उपादेयत से उत्साहित होकर मैंने पूछा कि क्या इसकी रूपरेखा पंचायत ने बनाई है? जवाब नकारात्मक था। स्थानीय निवासियों का कहना था कि अगर पंचायत के द्वारा काम हो रहा होता तो हमें भुगतान मिलने में कठिनाई होती क्योंकि पंचायतों के लिए भुगतान को जिला अधिकारियों द्वारा स्वीकृत करवाया जाना आवश्यक है जिसके लिए अधिकारी कार्य पूर्ण होने का विस्तृत सबूत चाहते हैं। यह कार्यवाही इतनी जटिल है कि या तो भुगतान प्राप्त ही नहीं होता या होता भी है तो बहुत कम। इस कार्य को वन विभाग के माध्यम से सम्पन्न करवाया जा रहा है जिसके पास योजना बनाने और उसे सम्पन्न कराने के अधिकार हैं।

राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी योजना की मूल भावना में कोई कमी नहीं है। लेकिन कार्य सम्पादन के स्तर पर इसमें कमी है। इसे अति शीघ्र ठीक किए जाने की आवश्यकता है। पर्यावरण पुनर्चक्रीकरण के देवता भी यही चाहते हैं कि विस्ततृ कार्य योजना बने।

(लेखिका सुपरिचित पर्यावरणविद हैं)

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