सवा पाँच रुपए से आजीविका

Submitted by birendrakrgupta on Tue, 03/24/2015 - 17:17
Source
योजना, अगस्त 2008
जमीनी स्तर पर प्रदेश में जन संगठनों और स्वैच्छिक रूप से कार्य कर रहे लोगों के जो दो वर्ष के अनुभव सामने आए हैं उन अनुभवों को आधार मानकर कहा जा सकता है कि रोजगार गारण्टी अधिनियम और क्रियान्वयन की व्यवस्था में सामंजस्य नहीं बैठ रहा है।राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी अधिनियम में ऐसे कई पहलू दिखाई देते हैं जिनके आधार पर इस कानून को ‘हक का कानून’ कहने में कोई मतभेद नहीं है। गारण्टी अधिनियम की रूपरेखा तैयार करते वक़्त देश में विभिन्न मुद्दों पर कार्य कर रहे स्वैच्छिक संगठनों एवं संस्थाओं की राय ली गई जिसके तहत इस कानून में शासन और समुदाय दोनों के बीच पारदर्शिता और सामंजस्य बनाए रखने हेतु सामाजिक लेखापरीक्षण की प्रक्रिया को भी स्थान दिया गया ताकि शासन और समाज में वैचारिक मतभेद समाप्त होकर सार्वजनिक रिश्तों का आयाम बना रहे और समुदाय इसे अपना बुनियादी अधिकार मानकर इस कानून के क्रियान्वयन में 100 प्रतिशत अपनी जिम्मेदारी को समझ सकें।

मध्य प्रदेश के सन्दर्भ में यदि कहा जाए तो राज्य ने इस कानून के क्रियान्वयन हेतु बड़ी शिद्दत और प्रतिबद्धता के साथ इसे लागू किया। यह कहा जाना कदाचित अनुचित नहीं है कि राज्य सरकार ने व्यवस्थागत पहलुओं पर जमकर मेहनत की। इसी के साथ सरकारी वक्तव्यों से भी यह ज्ञात हुआ कि शासन की मंशा हर हाथ को काम और काम का पूरा दाम देने की भरसक कोशिश रही। अतः सरकारी प्रयास को नजरअन्दाज करना कदाचित उचित नहीं है। किन्तु, जमीनी स्तर पर प्रदेश में जन संगठनों और स्वैच्छिक रूप से कार्य कर रहे लोगों के जो दो वर्ष के अनुभव सामने आए हैं उन अनुभवों को आधार मानकर कहा जा सकता है कि रोजगार गारण्टी अधिनियम और क्रियान्वयन की व्यवस्था में सामंजस्य नहीं बैठ रहा है। जहाँ करोड़ों रुपए व्यय होने के बावजूद लोगों के रोजगार की माँग को सुनिश्चित नहीं किया जा सका है, वहीं ग्राम सभाओं में होने वाले सामाजिक लेखापरीक्षण को भी नजरअन्दाज किया जा रहा है।

परिणाम यह है कि प्रदेश का एक हिस्सा आज भी भूखा और दाने-दाने को मोहताज है। अगर ग्राम सभाओं और समुदाय की बात को सामने रखा जाए तो जमीन पर मजदूरों के यही सवाल सामने आते हैं कि भारत में सदैव से संयुक्त परिवार प्रथा चली आई है और संयुक्त परिवार में चार से चालीस सदस्य होते हैं जिनका खाना एक ही चूल्हे पर बनता है। तो एक जॉबकार्ड से चालीस सदस्यों की खाद्य सुरक्षा को कैसे सुनिश्चित किया जा सकता है। रोजगार गारण्टी कानून के प्रावधान इस सन्दर्भ में स्पष्ट बयान करते हैं कि माता-पिता और दो बच्चों को प्रत्येक इकाई को एक परिवार माना जाएगा और उन्हें एक जॉबकार्ड निर्गत किया जाएगा। स्पष्टतः इस बारे में जानकारी का अभाव है और विभ्रम को दूर करने का प्रयास कोई नहीं कर रहा।

ग्राम सभाओं का अनुभव कहता है कि इस कानून में प्रत्येक एकक परिवार को 100 दिन का नहीं, 365 दिन की मजदूरी दी जाए तो आजीविका को सुनिश्चित की जा सकती है। जबकि रोजगार गारण्टी कानून 100 दिन की मजदूरी की गारण्टी देता है। श्योपुर जिले के ब्लॉक विजयपुर के विस्थापित सहरिया गाँव की ही बात करें तो यहाँ प्रति हितग्राही बमुश्किल 10 दिन की भी मजदूरी प्राप्त नहीं हुई है। ऐसे में परिवार का गुजारा कैसे सुनिश्चित किया जा सकेगा? इन मजदूरों का यह भी कहना है कि अगर हम कानून के क्रियान्वयन पर सवाल न उठाकर यह मान लें कि हमारी सरकार ने हमें 100 दिन की मजदूरी दे भी दी है तो मध्य प्रदेश में न्यूनतम मजदूरी दर किसी भी स्थान पर 79 रुपए से ज्यादा नहीं है। प्रशासन की इस बात को हकीकत मानें तो प्रति परिवार को यदि 100 दिन का रोजगार मिल भी जाता है तो 100 दिन की न्यूनतम राशि 7,900 प्रति चार सदस्यीय परिवार को एक वर्ष में मिलती है, तो चार सदस्यीय परिवार के प्रत्येक सदस्य के हिस्से में मात्र 5.25 रुपए की राशि आती है। इससे एक व्यक्ति की खाद्य सुरक्षा को कैसे सुनिश्चित किया जा सकता है?

श्योपुर जिले की रोहणी नामक ग्राम की ग्राम सभा में जो अनुभव सामने आए वे यह थे कि मजदूरों ने 40 दिन से भी अधिक कार्य किया। इसके आज 14 माह व्यतीत हो जाने के बाद भी लोगों को उनका मेहनताना प्राप्त नहीं हुआ है। इस ग्राम के सामाजिक अंकेक्षण में समुदाय का सुझाव आया कि मजदूर की मजदूरी किसी एजेंसी या किसी व्यक्ति विशेष के द्वारा भुगतान न कराकर मजदूरों के बैंक में खाते खुलवाकर खातों में ही जमा कराई जाए जिससे मजदूर को पूरा मेहनताना मिल सकें। इससे देश के एक बड़े हिस्से को भूखा सोने से बचाया जा सकता है और ऐसे क्रियान्वयन से समाज के ढाँचे में विकास के नये पहलुओं और नये आयामों से जोड़ा जा सकता है। प्रदेश सरकार को चाहिए कि इस कानून की भावना और क्रियान्वयन की व्यवस्था में तालमेल बैठाने के लिए अभी सुधारात्मक रवैये के पहलू पर ध्यान दे।

(लेखिका राइट टू फूड कंपेन नामक स्वयंसेवी संगठन से सम्बद्ध हैं)

Disqus Comment

Related Articles (Topic wise)

Related Articles (District wise)

About the author

नया ताजा