बिहार में बुरा हाल

Submitted by birendrakrgupta on Tue, 03/24/2015 - 17:21
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योजना, अगस्त 2008
लखीसराय जिले में ग्रामीणों की यह आम शिकायत है कि यहाँ नरेगा का काम मजदूरों के बजाय बड़ी मशीनों से कराया गया। फर्जी बिल बनाए गए और कई लोगों ने इस पैसे से महंगी गाड़ियाँ तक खरीद ली। राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना के आने के बाद बिहार के ग्रामीण गरीबों में आशा का संचार हुआ। वे यह सोचने लगे थे कि अब उन्हें ट्रेनों की छतों पर लदकर काम की तलाश में दिल्ली, पंजाब, असम या मुम्बई नहीं जाना पड़ेगा। अपने गाँव-घर में ही सम्मानजनक रोजगार उन्हें मिल जाएगा। लेकिन प्रशासनिक तन्त्र का गरीब विरोधी और असंवेदनशील रवैया तथा राजनैतिक दलों के कार्यकर्ताओं, नेताओं की अनिच्छा के कारण उनके सपने चकनाचूर हो गए लगते हैं। खुद बिहार सरकार के ग्रामीण विकास विभाग के आँकड़े ही सत्य को उद्घाटित कर रहे हैं। वर्ष 2007-08 में दिसम्बर 2007 तक राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार अधिनियम के प्रावधानों के अनुरूप सौ दिनों का रोजगार 0.98 प्रतिशत (कुल 23,044 परिवारों) को ही दिया जा सका। अरवल जिले में 5.4 प्रतिशत निधि का उपयोग कर के रोजगार हेतु मात्र 1.6 लाख कार्यदिवस सृजित किए गए।

रिपोर्ट में यह दावा किया गया है कि लखीसराय जिले में लगभग 82 प्रतिशत निधि खर्च करके 57 लाख कार्यदिवस सृजन किए गए। इसी प्रकार नवादा जिले में कोष उपयोग दर सबसे अधिक 87.33 रही। पूरे राज्य के स्तर पर कोष उपयोग दर 41.11 प्रतिशत रही। ये आँकड़े बिहार सरकार के ग्रामीण विकास विभाग के हैं, लेकिन बिहार के ग्रामीण अंचलों में जाने पर दूसरी ही हकीकत का पता चलता है। लखीसराय जिले में ग्रामीणों की यह आम शिकायत है कि यहाँ नरेगा का काम मजदूरों के बजाय बड़ी मशीनों से कराया गया। फर्जी बिल बनाए गए और कई लोगों ने इस पैसे से महंगी गाड़ियाँ तक खरीद ली। ये बातें अखबारों के स्थानीय संस्करणों में छप भी चुकी हैं और निष्पक्ष जाँच की माँग भी कई स्तरों पर उठाई जा रही है।

बिहार के अधिकांश पंचायतों में पंचायत भवन बन गए हैं और उन पर पंचायत भवन का बोर्ड लगा दिया है। यहाँ पंचायत का सचिवालय है। लेकिन यहाँ पंचायत सचिव, राजस्व कर्मचारी, नरेगा के प्रभारी कर्मचारी या मुखिया सप्ताह में एक या दो दिन मुश्किल से एक-दो घण्टों के लिए दिखलाई पड़ते जाते हैं। जहाँ ग्रामीण श्रमिकों में जागरुकता और अधिकार बोध ज्यादा दिखाई देता है वहाँ राशि खर्च ही नहीं की जाती। जहाँ जागरुकता का अभाव है वहाँ कागज पर खर्च दिखा दिया जाता है और राशि दलालों, भ्रष्ट अधिकारियों के बीच बँट जाती है। अफसोस की बात है कि इन बातों की चिन्ता न तो बिहार के सत्ता पक्ष को है और न विपक्ष को। चूँकि बिहार के समाज में जागरुकता थोड़ी ज्यादा है, कुछ जन संगठन सक्रिय हैं और स्थानीय मीडिया इन प्रश्नों पर संवेदनशील रहता है इसलिए बातें प्रकाश में आ जाती हैं।

ग्रामीण रोजगार गारण्टी योजना को लागू करने के लिए जिम्मेदार प्रशासनिक अधिकारी और कर्मचारी बार-बार यह आँकड़ा दिखलाते हैं कि जॉबकार्ड माँगने वाले बहुत कम लोग आते हैं और जिनका जॉबकार्ड बन भी जाता है उनमें से अधिकांश काम माँगने ही नहीं आते। जबकि हकीकत यह है कि ग्रामीण श्रमिकों का जॉबकार्ड बनवाने और उसके बाद काम पाने के लिए सिफारिश और बेगारी करनी पड़ती है। अधिकांश जगहों पर नरेगा से सम्बन्धित कर्मचारी या मुखिया को घूस देकर जॉबकार्ड या काम पाया जाता है। जो मुखिया ईमानदारी दिखलाने की कोशिश करते हैं उनके यहाँ नरेगा के लिए फण्ड भेजने में कोताही की जाती है और नियम-कायदों का हवाला देकर वहाँ का फण्ड रोकने और तरह-तरह से परेशान करने की कोशिश होती है। मुजफ्फरपुर जिले के मुरौल पंचायत में युवा आदर्शवादी मुखिया मोहन मुकुल उदाहरण इसके हैं जिन्हें काम की तत्परता और कर्मठता के लिए बार-बार परेशानी झेलनी पड़ती है।

ग्रामीण श्रमिकों का जॉबकार्ड बनवाने और उसके बाद काम पाने के लिए सिफारिश और बेगारी करनी पड़ती है। अधिकांश जगहों पर नरेगा से सम्बन्धित कर्मचारी या मुखिया को घूस देकर जॉबकार्ड या काम पाया जाता है। जो मुखिया ईमानदारी दिखलाने की कोशिश करते हैं उनके यहाँ नरेगा के लिए फण्ड भेजने में कोताही की जाती हैइसी जिले के रजवाड़ा पंचायत के जनपक्षी सरपंच भूषण ठाकुर को भी इसलिए झूठे मुकदमें में फँसाया गया, क्योंकि उन्होंने ‘जनता की पंचायत’ लगाकर जन सुनवाई करवाई और गरीबों को नरेगा, इन्दिरा आवास योजना तथा ग्रामीण विकास की अन्य योजनाओं में व्याप्त भ्रष्टाचार को उजागर करने का अवसर प्रदान किया। वहाँ जन दबाव में घूस के पैसे लौटाए जाने लगे थे। मुशहरी प्रखण्ड के प्रखण्ड विकास अधिकारी उनसे इतने खफा हो गए कि उन्होंने उसके बारे में जिला पंचायत अधिकारी को मिथ्या रिपोर्ट भेज दी। जिला पंचायत अधिकारी ने बिना जाँच-पड़ताल के आनन-फानन में सरपंच भूषण ठाकुर को कारण बताओ नोटिस भी भेज दिया कि क्यों नहीं उन्हें सरपंच पद से हटाने के लिए आयुक्त को अनुशंसा भेजी जाए। लेकिन जब सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ भूषण ठाकुर तिरहुत प्रमण्डल के आयुक्त जयलाल राम मीणा से मिले और मामले की जाँच की माँग की तो आयुक्त ने तत्परता से कार्रवाई की और जिला पंचायत अधिकारी को न केवल नोटिस वापस लेनी पड़ी बल्कि उन्होंने भूषण ठाकुर से माफी भी माँगी। बदनाम प्रखण्ड विकास अधिकारी का भी तबादला कर दिया गया। लेकिन ऐसा हर जगह नहीं होता। न तो हर जगह डॉ. हेम नारायण विश्वकर्मा, वासुदेव साह, सुनौना सहनी और चन्दन जैसे सजग तत्पर और ईमानदार सामाजिक राजनैतिक कार्यकर्ता मिलते हैं और न तत्परता से निष्पक्ष कार्रवाई करने वाले उच्चाधिकारी।

बिहार में रोजगार गारण्टी योजना के तहत महिलाओं के लिए रोजगार की कोई व्यवस्था नहीं है। शायद यह बात यहाँ के प्रशासनिक तन्त्र के सोच में ही नहीं है। पति-भाई दिल्ली, पंजाब, मुम्बई या असम में हाड़-तोड़ मेहनत करके दो-चार पैसे का जुगाड़ करते हैं। इसके लिए बार-बार प्रताड़ना और अपमान झेलते हैं और गाँव में उनकी जवान पत्नी या बहन के बिहार अमल में रोजगार गारण्टी कार्यक्रम पास बकरी चराने, घास छिलकर बेचने या सूअर चराने के सिवा कोई काम नहीं। नरेगा में जॉबकार्ड बनाने या उनके लिए रोजगार की उपयुक्त व्यवस्था की कोई योजना कहीं दिखाई नहीं देती।

इसी प्रकार विकलांगों के लिए भी नरेगा के तहत आमतौर पर कोई उपयुक्त काम सृजित नहीं किया जाता। बिहार में नरेगा के तहत मुख्यतया तालाबों की उड़ाही का काम होता है, लेकिन अभी यहाँ हजारों तालाब ऐसे हैं जो बाढ़ में आई गाद के कारण मिट्टी से भर गए, लेकिन उनकी खुदाई नहीं की गई है। जबकि नरेगा के मद के काफी पैसे हर साल बिना उपयोग के लौट जाते हैं। तालाबों में जल का संचय होने से भूजल-स्तर नीचे नहीं जाता। बिजली डीजल के पम्पों से सिंचाई के लिए पानी अत्यधिक दोहन के कारण बाढ़ग्रस्त इलाकों में बरसात के बाद के महीनों में भूजल-स्तर काफी नीचे चला जाता है। इस लेखक ने खगड़िया जिले में खुद अपनी आँखों यह देखा समझा है।

उत्तर बिहार में तालाबों की एक श्रृंखला है। उन तालाबों के किनारे-किनारे कभी मिट्टी के जल-निकास नाले बने थे। लेकिन ये नाले अब भर गए हैं तो कहीं सड़क, नहर आदि के अवरोध के कारण बन्द हो गए हैं। इनके पुनरुद्धार का काम बहुत जरूरी है। लेकिन अब तक इस पर किसी ने ध्यान नहीं दिया है।

बिहार सरकार ने नदियों की उड़ाही की योजना बनाई है, लेकिन इसके अमल की गति काफी धीमी है। अगर नदियों की उड़ाही का काम श्रम-शक्ति से ईमानदारी से कराया जाए तो हर साल बाढ़ की विभीषिका भी घटेगी और दसियों लाख लोगों के लिए रोजगार का भी सृजन होगा। नरेगा के मद के पैसे को भी यदि इस काम में लगाया जाए तो पैसे बिना खर्च किए लौटाने की नौबत नहीं आएगी।उत्तर बिहार की नदियाँ हिमालय से निकलती हैं और बाढ़ के समय यहाँ के खेतों में उपजाऊ मिट्टी बिछा देती हैं। लेकिन नदियों पर बने तटबन्धों के कारण नदी में सारी गाद जमा हो जाती है और नदियों का तल बहुत ऊँचा हो गया है। तटबन्ध बेकार हो गए हैं। हर साल बाढ़ के समय सैकड़ों स्थानों पर तटबन्ध टूटते हैं, विनाश लीला दिखाते हैं। सामाजिक कार्यकर्ताओं की माँग पर बिहार सरकार ने नदियों की उड़ाही की योजना बनाई है, लेकिन इसके अमल की गति काफी धीमी है। अगर नदियों की उड़ाही का काम श्रम-शक्ति से ईमानदारी से कराया जाए तो हर साल बाढ़ की विभीषिका भी घटेगी और दसियों लाख लोगों के लिए रोजगार का भी सृजन होगा। नरेगा के मद के पैसे को भी यदि इस काम में लगाया जाए तो पैसे बिना खर्च किए लौटाने की नौबत नहीं आएगी। नरेगा एक उपयोगी और जनपक्षी योजना है। इसे ईमानदारी से और सम्पूर्णता से लागू करने की जरूरत है।

(लेखक मुजफ्फरपुर स्थित पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता हैं)

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