अभिलेखों की कालकोठरी

Submitted by birendrakrgupta on Thu, 03/26/2015 - 15:10
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योजना, अगस्त 2008
नरेगा में अधिनियम और दिशा-निर्देश वस्तुतः पारदर्शी सुरक्षा उपायों को प्रभावी ढंग से लागू करने के स्पष्ट और व्यापक मार्ग-चित्र प्रदान करते हैं और मुख्य समस्या इन सुरक्षा उपायों को सख्ती से लागू करना ही है।

कार्यस्थल पर ही मस्टर रोल्स को रखा जाना सुनिश्चित करने से उसमें हेरा-फेरी करना लोगों के लिए आसान नहीं रह जाएगा।
बड़े पैमाने पर सरकारी राशि के गबन के आरोपों को लेकर ओडिशा में राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी अधिनियम, पिछले कुछ महीनों से लोगों की गहन विवेचना का विषय बना हुआ है। इन आरोपों के चलते एक दुखद प्रश्न यह खड़ा होता है कि नरेगा के सुचारू संचालन के लिए जो व्यापक पारदर्शी सुरक्षा उपाय बनाए गए थे, ओडिशा में उनकी किस प्रकार अवहेलना की गई। पश्चिमी ओडिशा के तीन जिलों, बोलनगीर, बौध और कालाहाण्डी में नरेगा के सर्वेक्षण पर आधारित पूर्व की एक रिपोर्ट में इस मुद्दे पर प्रकाश डाला गया है। यह सर्वेक्षण दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों ने जीबी पन्त समाज विज्ञान संस्थान (इलाहाबाद विश्वविद्यालय) की पहल पर स्थानीय स्वयंसेवकों की मदद से किया था। प्रस्तुत आलेख में ओडिशा में नरेगा के अभिलेखों में जो जोड़-तोड़ किया गया है उसका विवरण देने का प्रयास किया गया है कि किस प्रकार अधिनियम के पारदर्शी और भ्रष्टाचार मुक्त क्रियान्वयन को धता दिया गया है। जॉबकार्ड, मस्टर रोल (हाजिरी रजिस्टर) और निगरानी एवं सूचना प्रणाली का विशेष रूप से उल्लेख किया गया है। पारदर्शिता सुनिश्चित करने में इनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है। उदाहरण के तौर पर, हम बौध जिले की बढ़ीगाम पंचायत में खुल्लम-खुल्ला फर्जीवाड़े के एक मामले से कर रहे हैं। सर्वेक्षण के कुछ दिनों पहले ही यहाँ पर सर्वेक्षण दलों को एक फर्जी हाजिरी रजिस्टर का पता चला था, जिसमें शुरू से लेकर आखिर तक सारे नाम मनगढ़ँत थे।

बढ़ीगाम पंचायत में फर्जी हाजिरी रजिस्टर प्रकरण का विस्तृत अध्ययन


उपर्युक्त सर्वेक्षण के एक अंग के रूप में अतार्किक रूप से चयनित 30 ग्राम पंचायतों में से प्रत्येक में से एक-एक कार्यस्थल के हाजिरी रजिस्टरों का सत्यापन किया गया। बढ़ीगाम ग्राम पंचायत (बौध जिला) में ‘इच्छापुर हगुरीमुण्डा तालाब का सुधार’ इसी तरह के कार्यस्थल का एक नमूना है। जिला प्रशासन ने हमें 28 सितम्बर, 2007 को जो हाजिरी रजिस्टर दिया था, उसके अनुसार इस परियोजना पर तीन ‘पखवाड़ों’ में काम किया गया था। ये तारीखें थीं 12 से 24 मई, 28 मई से 9 जून और 12 से 24 जून। परन्तु सर्वेक्षण दल को ग्राम पंचायत कार्यालय से जो असली हाजिरी रजिस्टर मिले उनसे चौथे हाजिरी रजिस्टर (25-30 जून की अवधि का) की मौजूदगी की भी जानकारी मिली। आगे की पूछताछ से शीघ्र ही पता चल गया कि चौथा हाजिरी रजिस्टर फर्जी था।

बढ़ीगाम में हमने श्रमिकों से पूछा कि उन्हें कितनी बार पैसे का भुगतान किया गया है। श्रमिकों द्वारा भुगतानों की संख्या, चार हाजिरी रजिस्टरों में दी गई जानकारी के मुकाबले, लगातार एक कम ही बताई जाती रही। किसी भी श्रमिक ने यह नहीं बताया कि उसको कई हफ़्तों की मजदूरी का एक साथ भुगतान किया गया है। उदाहरण के लिए उन्होंने बताया कि उन्हें दो बार भुगतान किया गया था (उनका मतलब था कि उन्होंने दो अलग-अलग हफ़्तों में काम किया था।) जबकि हाजिरी रजिस्टरों में उन्हें तीन बार काम करते दिखाया गया था। प्रमाण के तौर पर अनादि को स्पष्ट याद है कि उसे केवल दो बार भुगतान किया गया था- पहली बार 1,000 रुपए और फिर बाद में 1,600 रुपए। जो राशि बताई गई वह पहले तीन हाजिरी रजिस्टरों के आँकड़ों से मिलती-जुलती थी। 1,082 और 1,628 रुपए। उसने तीसरी बार भुगतान (420 रुपए) किए जाने से इंकार किया। यदि चौथा हाजिरी रजिस्टर (जिसमें उसका नाम दर्ज है) अधिकृत और सही होता तो भुगतान का दावा सही माना जा सकता था।

नरेगा के अभिलेखों में ‘सामंजस्य’ बिठाने के अनेक सुरक्षित भूल-भुलैया हैं। इसमें हाजिरी रजिस्टर की विशेष भूमिका है। इन अभिलेखों का सत्यापन करना कठिन होता है और इससे व्यापक गबन का रास्ता खुल जाता है।चौथे हाजिरी रजिस्टर के फर्जी होने के बारे में और भी अनेक संकेत मिले हैं। इसमें कुछ ऐसे श्रमिकों के नाम भी दर्ज हैं, जिन्हें दो दिन काम पर दिखाया गया है लेकिन जब उन श्रमिकों से पूछा गया तो उन्होंने इससे साफ इंकार किया। उदाहरणार्थ मगुनी कन्हार को फर्जी हाजिरी रजिस्टर में दो दिनों की अल्पावधि के लिए काम करते दिखाया गया था। परन्तु मगुनी ने इससे साफ इंकार किया। फर्जी हाजिरी रजिस्टर में दर्ज एक और नाम है- नेपू प्रधान, जो अपने हस्ताक्षर का नमूना देने के लिए जूझती रही और अन्ततः उसे पूरा नहीं कर सकी। उसने सफाई दी कि वह अभी लिखना-पढ़ना सीख रही है। परन्तु हाजिरी रजिस्टर में उसके नाम के आगे साफ-सुथरे हस्ताक्षर किए हुए हैं, जो कि नमूने के हस्ताक्षर से पूर्णतया भिन्न हैं।

इस कार्यस्थल के पूर्ण होने के ऑनलाइन अभिलेखों में सिर्फ तीन हाजिरी रजिस्टर ही दिखाए गए हैं जो हाथ से तैयार उन हाजिरी रजिस्टरों से मेल खाते हैं जिनकी फोटो कॉपी सर्वेक्षण दल ने शुरू में ही कराई थी। चौथा हाजिरी रजिस्टर निगरानी एवं सूचना प्रणाली (एमआईएस) में दिखाई नहीं देता और न ही इस हाजिरी रजिस्टर का कोई अता-पता जॉबकार्डों में मिलता है जबकि बढ़ीगाम के जॉबकार्ड बहुत सलीके से सन्धारित हैं और आमतौर पर पहले तीन हाजिरी रजिस्टरों से मेल खाते हैं।

जिस दिन (11 अक्तूबर, 2007) हमने यह सब पूछताछ की, जिलाध्यक्ष (सुश्री शालिनी पण्डित) ने मामले की आगे की जाँच के लिए गाँव का दौरा किया। पंचायत अधिशासी अधिकारी (पीईओ), कनिष्ठ अभियन्ता (जेई), ग्राम श्रमनेता (वीएलएल) और पंचायत सचिव (पीएस) के सामने श्रमिकों से किए गए सवाल-जवाब से इस बात की पुष्टि हो गई कि चौथा हाजिरी रजिस्टर सही नहीं था।

जिलाध्यक्ष ने जब ग्राम पंचायत की बैंक पासबुक देखी तो उन्हें पता चला कि कार्य जून 2007 के अन्त में पूर्ण होना दिखाया गया था और फर्जी एमआर 25-30 जून की अवधि का था तथा 10,480 रुपए (वह राशि जो फर्जी एमआर के अनुसार, कुल भुगतान की गई राशि के समानार्थी थी) बैंक से 26 सितम्बर, 2007 को निकाली गई थी जो कि तथाकथित भुगतान के तीन महीने बाद की तारीख है। इससे और भी पक्का हो गया कि चौथा एमआर फर्जी है।

प्रकटतः दोषी कर्मचारियों ने 26 सितम्बर को यह मानकर पैसा निकाला था कि स्वीकृत राशि से बचाई गई राशि को हजम करना ज्यादा सुरक्षित था। 28 सितम्बर को जब हमने अभिलेख माँगे तो वे घबरा गए और अपनी कारगुजारी को छिपाने के लिए फर्जी हाजिरी रजिस्टर तैयार कर डाला।

जिलाध्यक्ष ने गबन की गई राशि को तुरन्त वापस करने को कहा। पीईओ ने एक घण्टे के भीतर ही नकद पैसे वापस कर दिए। भ्रष्टाचार की शिकायत के खि़लाफ त्वरित कार्रवाई का यह दुर्लभ और स्वागत योग्य प्रकरण था। बाद में पीईओ को निलम्बित कर दिया गया और उसके विरुद्ध वित्तीय अनियमितता की कार्यवाही शुरू कर दी गई।

ओडिशा में नरेगा की पारदर्शिता सम्बन्धी सुरक्षा उपायों का खुल्लम-खुल्ला धोखाधड़ी पर आधारित अपवंचना का यह चरम उदाहरण है। इस तरह के अपवंचन को सम्भव बनाने वाली कुछ मामूली तरकीबों का विवरण नीचे दिया गया है। इन सबसे जो बात उभर कर सामने आती है वह यह कि नरेगा के अभिलेखों में ‘सामंजस्य’ बिठाने (अर्थात हेरा-फेरी) के अनेक सुरक्षित भूल-भुलैया हैं। इसमें हाजिरी रजिस्टर की विशेष भूमिका है। इन अभिलेखों का सत्यापन करना कठिन होता है और इससे व्यापक गबन का रास्ता खुल जाता है।

जॉबकार्ड


इस कथा की पहली कड़ी जॉबकार्ड है। जॉबकार्ड का मुख्य उद्देश्य नरेगा के अन्तर्गत श्रमिकों के कार्य-दिवसों की संख्या और अर्जित पारिश्रमिक के विवरण का लिखित अभिलेख यानी ‘एक रोजगार पासबुक’ के तौर पर काम करना है। यह पासबुक श्रमिकों के पास ही रहती है। कालाहाण्डी की मधुरपुर पंचायत के नरेगा श्रमिक सुरेन्द्र नाइक इसका एक अच्छा उदाहरण हैं। उनके पास अपना जॉबकार्ड नहीं था। इसलिए जब उनसे उनके जॉबकार्ड में फर्जी प्रविष्टियाँ किए जाने की सम्भावनाओं के बारे में पूछा गया तो वे चिन्तित हो गए। उन्होंने दृढ़ता से कहा कि ऐसा सम्भव नहीं है क्योंकि वह अपने कार्ड में की जाने वाली प्रविष्टियों पर कड़ी नजर रखते हैं।

परन्तु लगता है कि इस पहले कदम पर ही ओडिशा के कदम डगमगा गए हैं। कम से कम तीन तरह से जॉबकार्डों की अभिकल्पना दोषपूर्ण है, इसका वितरण अपूर्ण है और जॉबकार्डों की देखभाल ठीक से नहीं की जाती।

वितरण


पहली समस्या जॉबकार्डों के वितरण की है। कार्यान्वयन के दिशा-निर्देशों में स्पष्ट है कि पंजीकरण सभी ग्रामीण परिवारों के लिए खुला है। ओडिशा में जॉबकार्डों का वितरण अपूर्ण रहा है। इसका एक आंशिक कारण यह है कि पंजीकरण के पात्र कौन लोग होंगे, इस बारे में स्पष्टीकरण का अभाव है। यह दुविधा न केवल श्रमिकों के बीच है बल्कि सरकारी कर्मचारियों में भी इसे लेकर भ्रम की स्थिति है। जब हमने सरकारी कर्मचारियों/अधिकारियों से नरेगा कार्यों में पंजीकरण के मानदण्ड के बारे में प्रश्न किए तो विभिन्न कर्मचारियों ने अलग-अलग जवाब दिए।

जॉबकार्ड वितरण में भ्रम की स्थिति के लिए कुछ हद तक एमआईएस के उपयोग की भी भूमिका हो सकती है। ओडिशा में नरेगा से सम्बन्धित सूचना को ऑनलाइन उपलब्ध कराने में इसी (एमआईएस) का उपयोग होता है। एमआईएस का इस बात पर जोर रहता है कि जॉबकार्डों की गिनती करने के लिए उसी कोडिंग प्रणाली का उपयोग होना चाहिए जो 2002 में बीपीएल (गरीबी रेखा से नीचे) की जनगणना के लिए की गई थी। बीपीएल जनगणना भारत सरकार ने राशन कार्ड वितरण करने के लिए कराई थी। जॉबकार्डों की गिनती के लिए अपनाए जाने वाले इस नियम से सम्बन्धित निर्देश को लगता है ओडिशा के कुछ भागों में गलत समझ लिया गया। लोगों ने समझा कि केवल बीपीएल कार्डधारक ही जॉबकार्ड के हकदार हैं। कुछ स्थानों में यह समझा गया कि जिनके पास किसी भी तरह का राशन कार्ड (बीपीएल, एपीएल या अन्य) है, वे नरेगा के अन्तर्गत पंजीकृत हो सकते हैं। कभी-कभी इस निर्देश का यह मन्तव्य भी निकाला गया की यदि एक संयुक्त परिवार का एक ही राशन कार्ड है तो उस परिवार को एक ही जॉबकार्ड मिलना चाहिए। जबकि कार्यान्वयन दिशा-निर्देशों में स्पष्ट कहा गया है कि प्रत्येक एकक परिवार को अलग-अलग जॉबकार्ड दिया जाना चाहिए।

राज्य सरकार का जॉबकार्ड वितरण के प्रति ढुलमुल रवैया इसी तथ्य से स्पष्ट हो जाता है कि इस बारे में स्पष्टीकरण नरेगा के प्रभावी होने (फरवरी 2006) के करीब डेढ़ वर्ष बाद जून 2007 में जारी किया गया। इस उदासीनता की कीमत बेचारे श्रमिकों को चुकानी पड़ती है जब कि नरेगा उनके लिए जीवन रेखा बन सकती है। उदाहरणार्थ लॉजीगढ़ विकास खण्ड (जिला कालाहाण्डी) के सीतापुर गाँव की फूलमती बेहरा का मामला लें। सात बच्चों की माँ, इस भूमिहीन विधवा के पास अन्त्योदय वाला राशन कार्ड है। उसने कम से कम एक वर्ष पूर्व जॉबकार्ड के लिए आवेदन किया था, परन्तु अभी तक उसे यह कार्ड जारी नहीं हो सका है। उसी में रहने वाली सावित्री डोरा को जॉबकार्ड इसलिए जारी नहीं किया गया क्योंकि उसके पास राशन कार्ड नहीं था। बानगी के तौर पर चुने गए ग्राम पंचायतों से अलग हटकर अन्य गाँवों के अपने एक भ्रमण के दौरान हमें करीब 50 कच्चे घरों वाला एक अति निर्धन गाँव पुरवा मिला, जिसमें मुश्किल से पाँच लोगों को जॉबकार्ड दिए गए थे।

राज्य सरकार का जॉबकार्ड वितरण के प्रति ढुलमुल रवैया के कारण उदासीनता की कीमत बेचारे श्रमिकों को चुकानी पड़ती है जब कि नरेगा उनके लिए जीवन रेखा बन सकती है। नरेगा से अनुचित तौर पर वंचित परिवारों के अलावा जॉबकार्डों का अपूर्ण वितरण उन प्रमुख खामियों में से एक है जो भ्रष्ट गतिविधियों के लिए प्रयुक्त की जा रही है। नरेगा में जब रोजगार दिया जाता है, काम माँगने आए जॉबकार्ड विहीन श्रमिकों को काम देने से इंकार नहीं किया जा सकता। परन्तु स्थानीय अधिकारियों को मालूम है कि जॉबकार्ड से वंचित श्रमिकों के नाम (यथा-अपंजीकृत श्रमिक) आँकड़ों की प्रविष्टि के चरण पर एमआईएस स्वीकार नहीं करेगा। इससे निपटने के लिए वे हाजिरी रजिस्टर पर इस तरह के अपंजीकृत श्रमिकों के नाम ही दर्ज नहीं करते। उसके स्थान पर इन श्रमिकों को हाजिरी रजिस्टर में जॉबकार्ड वाले श्रमिकों के नाम के विरुद्ध समायोजित कर दिया जाता है। इस प्रकार हाजिरी रजिस्टर के अनुसार लक्ष्मी चरण बाग (गुड़वोलिपदार पंचायत, बौध जिला) ने 54 दिन कार्य किया और 4,860 रुपए कमाए। वस्तुतः उसकी बहन ने इस कार्यस्थल पर काम किया था (वह भी कुल 15 दिन जिसके लिए उसे केवल 1,200 रुपए का भुगतान किया गया था)।

ऐसे अनेक प्रकरण थे, जिनमें हाजिरी रजिस्टर में दर्ज व्यक्तियों ने नरेगा के कार्यस्थलों पर काम नहीं किया था और यह दावा किया गया कि उनके परिवार (या गाँव) के किसी अन्य व्यक्ति ने काम किया था। अनेक प्रकरणों में यह स्पष्ट नहीं हो सका कि किसने किसके बदले काम किया था, और किसका समायोजन अपंजीकृत नाम के विरुद्ध किया गया था। इससे यह पता करना बड़ा कठिन हो गया कि हाजिरी रजिस्टर की गड़बड़ियाँ सरकारी कोष के दुरुपयोग से जुड़ी हैं कि नहीं। या फिर यह समायोजन वास्तव में केवल व्यावहारिक कारणों के लिए किया गया था। स्पष्ट है कि भले ही गबन न किया गया हो, इस तरह का समायोजन एक प्रकार से अभिलेखों में हेरा-फेरी ही माना जाएगा और इसे स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए।

अभिकल्पना


एक अच्छे जॉबकार्ड की बुनियादी जरूरत है कि इसे आसानी से पढ़ा जा सके। एक अच्छे तरीके से बने जॉबकार्ड के महत्त्व का पता हमें उस समय चला जब हमारी भेंट कुन्ती यादव (गिगिना पंचायत, कालाहाण्डी) से हुई। वह अपना जॉबकार्ड लेकर यह पूछने आई थी कि 100 दिनों की वार्षिक पात्रता में से कितने दिनों का रोजगार उसे मिल चुका है। मैं उलझन में पड़ गई क्योंकि मैं इस सीधे सरल प्रश्न का उत्तर उड़िया दुभाषिये की सहायता के बावजूद भी नहीं दे सकी। (जॉबकार्ड की कुछ प्रविष्टियाँ उड़िया भाषा में की गई थीं।) पहले तो, हमें काफी समय यह पता लगाने में लगा कि दर्शाई गई प्रविष्टियाँ किस वित्त वर्ष से सम्बन्धित हैं, क्योंकि प्रत्येक पृष्ठ पर सम्बन्धित वित्त वर्ष दर्शाने के लिए दिया गया स्थान खाली पड़ा था। अगली बाधा वे तारीखें समझने में सामने आईं जिनसे जॉबकार्ड की प्रविष्टियाँ सम्बन्धित थीं। इस प्रकार 111 की प्रविष्टि (चार वर्णों में से तीन में दर्शाई गई) का अर्थ 1 नवम्बर भी हो सकता था और 11 जनवरी भी। जॉबकार्ड सन्धारण के बारे में अपर्याप्त प्रशिक्षण के कारण हर अधिकारी/कर्मचारी ने प्रविष्टियाँ करने का अपना अलग ही तरीका अपना रखा था।

एक अन्य गम्भीर समस्या और है कि ओडिशा के जॉबकार्डों में (जैसा कि पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश जैसे कुछ अन्य राज्यों में भी है) श्रमिकों को भुगतान की जाने वाली राशि दर्ज करने के लिए कोई कॉलम ही नहीं है। इस भूल से जॉबकार्ड का मूल उद्देश्य ही नष्ट हो जाता है। श्रमिक अपनी मजदूरी के भुगतान पर नजर रख सकें, जॉबकार्ड का उद्देश्य तो यही था।

हाजिरी रजिस्टरों से सम्बन्धित आँकड़ों के सत्यापन के दौरान जॉबकार्ड की कुछ और त्रुटियाँ उभर कर सामने आईं। उदाहरणार्थ, किसी श्रमिक ने कितने दिन काम किया, इसका सत्यापन करना कठिन है, क्योंकि जॉबकार्ड में दिए गए रोजगार दिखाने वाले पृष्ठ में श्रमिकों के नाम के स्थान पर केवल श्रमिकों और कार्यस्थल का कोड दर्ज किया जाता है। श्रमिक का कोड का अर्थ पता करने के लिए जॉबकार्ड के पहले पृष्ठ को देखना होता है जिसमें कोड के आगे पंजीकृत नामों की सूची दी गई होती है और जैसे कि यही खामियाँ काफी नहीं हो, कभी-कभी जॉबकार्ड के प्रथम पृष्ठ पर की गईं प्रविष्टियाँ कम्प्यूटर प्रिंट आउट से लेकर अंग्रेजी में होती है। एक ग्रामीण श्रमिक, जो केवल उड़िया में ही पढ़ सकता है (यदि वह पढ़ा हुआ हो तो), के लिए अपने रोजगार और भुगतान के बारे में जानकारी रखना असम्भव-सा हो जाता है।

सन्धारण


जॉबकार्ड का सन्धारण अगला अवरोधक है। इसमें पहचान के प्रारम्भिक विवरणों (जैसे- जॉबकार्ड संख्या, पंजीकृत वयस्कों के नाम) के साथ-साथ रोजगार से सम्बन्धित क्रमिक प्रविष्टियाँ भी शामिल हैं। गलत पहचान का एक ज्वलन्त प्रकरण पूर्णचन्द्र माझी (पोखरी बँधा पंचायत, लांजीगढ़) का है। जॉबकार्ड के साथ ही नमूना हाजिरी रजिस्टर के अनुसार, पूर्णचन्द्र 18 वर्ष की एक महिला है। सत्यापन की कार्रवाई के दौरान जाँचकर्ताओं को पता चला कि पूरन पाँच वर्ष के लड़के का नाम है। अनेक जॉबकार्डों में जॉबकार्ड संख्याएँ और पंजीकृत परिवारों के सदस्यों के नामों में कई गड़बड़ियाँ हैं। उदाहरणार्थ, दो परिवारों को एक ही संख्या वाले जॉबकार्ड जारी किए गए हैं।

नरेगा के कार्यान्वयन दिशा-निर्देशों के अनुसार, यह जरूरी है कि मजदूरी का भुगतान करने वाली प्रत्येक एजेंसी को बिना किसी गलती के जॉबकार्ड पर भुगतान की गई राशि और कितने दिनों की मजदूरी दी गई है, इसका उल्लेख करना आवश्यक है। परन्तु अनेक जॉबकार्डों में या तो कोई प्रविष्टि ही नहीं की गई थी और यदि की भी गई थी तो निहायत ही लापरवाही से।

जॉबकार्ड की प्रविष्टियाँ कभी भी मजदूरी का भुगतान करते समय श्रमिकों के सामने नहीं की गईं, जैसा कि कार्यान्वयन दिशा-निर्देशों के अनुसार अपेक्षित है। इसके अलावा जॉबकार्ड की प्रविष्टियाँ कभी भी मजदूरी का भुगतान करते समय श्रमिकों के सामने नहीं की गईं, जैसा कि कार्यान्वयन दिशा-निर्देशों के अनुसार अपेक्षित है। सर्वेक्षण दलों को यह पता चला कि जॉबकार्ड में प्रविष्टियाँ करने के लिए पंचायत कर्मचारी से ले गए थे, परन्तु महीनों तक उसे वापस नहीं किया। बानगी के तौर पर चुने गए 30 ग्राम पंचायतों में से 12 में जॉबकार्ड मजदूरों को सर्वेक्षण दल के दौरे से ऐन पहले वापस किए गए थे और वह भी जल्दबाजी में की गई प्रविष्टियों के साथ। और जो जॉबकार्ड श्रमिकों के पास ही थे, उनका सन्धारण ठीक से नहीं किया गया था। अनेक बिल्कुल कोरे और खाली थे, जबकि कई में फर्जी प्रविष्टियों के प्रमाण दिखाई दे रहे थे।

बानगी के तौर पर 30 ग्राम पंचायतों में से 18 ऐसे थे जहाँ जॉबकार्ड बिल्कुल कोरे थे। 20 में फर्जी जॉबकार्ड प्रविष्टियाँ पाई गईं और 12 में जॉबकार्ड की प्रविष्टियों में काट-छाँट की गई थी। सर्वेक्षण दलों को अभिलेखों में आन्तरिक विसंगतियाँ भी दिखाई दीं। उदाहरणार्थ, जॉबकार्ड में दर्ज कार्य दिवसों की संख्या कुछ और थी जब कि सम्बन्धित हाजिरी रजिस्टरों में कुछ और। जॉबकार्ड के भीतर इस्तेमाल व्यक्तिगत कोड भी मुखपृष्ठ पर वर्णित कोड से मेल नहीं खाते थे। सार यह है कि अपूर्ण वितरण के साथ ही ओडिशा में जॉबकार्डों की त्रुटिपूर्ण डिजाइन और सन्धारण ने इन दस्तावेजों को श्रमिकों के दृष्टिकोण से पूर्णतः निरर्थक साबित कर दिया है। इस घालमेल ने नरेगा के कोष में गबन को आसान बना दिया है।

हाजिरी रजिस्टर


मस्टर रोल्स हाजिरी दर्ज करने वाले कागज के उन पन्नों की तरह होते हैं जिनमें सप्ताह विशेष के दौरान किसी कार्यस्थल पर काम में लगे श्रमिकों के नाम और उनको भुगतान की गई मजदूरी का विवरण दर्ज होता है। मस्टर रोल के आँकड़ों के आधार पर ही ग्राम पंचायत के नरेगा खाते से मजदूरी के भुगतान के लिए राशि निकाली जाती है। इस प्रकार, नरेगा के श्रम घटक में भ्रष्टाचार रोकने के लिए मस्टर रोल का पारदर्शी होना अनिवार्य है। नरेगा के समग्र कोष का लगभग 60 प्रतिशत घटक श्रम का ही होता है। नरेगा और भारत सरकार के कार्यान्वयन दिशा-निर्देशों के अनुसार मस्टर रोल्स कार्यस्थल पर उपलब्ध होने चाहिए और ग्राम पंचायत कार्यालय के बाहर उनको प्रदर्शित किया जाना चाहिए। मजदूरी के भुगतान के समय इनको सार्वजनिक रूप से पढ़ा भी जाना होता है।

मस्टर रोल्स की डिजाइन और उनके सन्धारण के सम्बन्ध में स्थिति कोई विशेष उत्साहवर्धक नहीं है। विशेष पहचान वाली संख्या वाला एक समान प्रारूप प्रभावी मस्टर रोल की डिजाइन की एक अनिवार्य विशेषता है। परन्तु सर्वेक्षण दलों को बानगी वाले ग्राम पंचायतों में कम से कम तीन अलग-अलग प्रारूप देखने को मिले। इसमें एक पुराना पड़ चुका मस्टर रोल भी था जो काम के बदले अनाज के राष्ट्रीय कार्यक्रम में इस्तेमाल हुआ करता था और जिसमें जिसके रूप में भुगतान का प्रावधान भी था। यद्यपि एक मानकीकृत मस्टर रोल का प्रारूप अब तैयार कर लिया गया है, तथापि सर्वेक्षण के समय सभी जिलों में इसका इस्तेमाल नहीं किया जा रहा था।

मस्टर रोल्स के सन्धारण पर निगाह डालने से हमें पता चला कि उसमें हेरा-फेरी करने का पारम्परिक तरीका अभी भी ओडिशा में हर जगह प्रचलित है। विशिष्ट रूप से दो तरह के समान्तर अभिलेख (कभी-कभी इन्हें कच्चा और पक्का भी कहा जाता है) रखे जा रहे हैं। कच्चा बही खाता अभिलेख साधारण नोटबुक में रखा जाता है और इसका उपयोग श्रमिकों के भुगतान का हिसाब रखने के लिए किया जाता है। पक्का अभिलेख (बही खाता), सरकारी प्रारूप में तैयार किया जाता है और यह एक रूपान्तरित संस्करण होता है (कुछ घालमेल वाली प्रविष्टियों के साथ) तथा इसका उपयोग नरेगा कोष से पैसा निकालने में होता है। दोहरे अभिलेख (हिसाब-किताब) रखने वाली यह आदत, उनके संधारकों को अन्तर की रकम हड़पने में मदद करती है।

मस्टर रोल में घालमेल करने के जो अन्य पारम्परिक तरीके अभी भी अपनाए जा रहे हैं, उनमें अस्तित्वविहीन व्यक्तियों के नाम, रोजगार के दिनों और वेतन के भुगतान की राशियों को बढ़ा-चढ़ा कर लिखा जाना शामिल है। बढ़ीगाम पंचायत में इस बात के स्पष्ट संकेत थे कि कम से कम कुछ हाजिरी रजिस्टरों के मामले में कोरे हाजिरी रजिस्टरों पर हस्ताक्षर और अंगूठे के निशान लिए गए हैं (उपस्थिति और भुगतान का विवरण भरने से पूर्व ही)। उदाहरण के तौर पर, काम पर न आने की वजह से कुछ श्रमिकों का नाम रद्द कर दिया गया था, परन्तु मस्टर रोल में उसी लाइन के अन्त में हस्ताक्षर अथवा अंगूठे का निशान दिया हुआ था। इसी प्रकार कुछ पंक्तियाँ रिक्त थी, सिवाय इसके कि शुरू में श्रमिक का नाम और अन्त में उसका हस्ताक्षर या अंगूठे का निशान दिया हुआ था। कुछ हाजिरी रजिस्टरों में रिक्त पंक्तियों के सामने अंगूठे के निशान बने हुए थे। इसके अलावा उन व्यक्तियों के हस्ताक्षर के खानों में अंगूठे के निशान दिए हुए थे, जो अपने दस्तखत कर सकते थे। इससे धोखाधड़ी होने के संकेत दिखाई देते हैं और अन्त में हमने एक ही श्रमिक का नाम उसी सप्ताह के मस्टर रोल में दो बार लिखा पाया।

मस्टर रोल में घालमेल करने के जो अन्य पारम्परिक तरीके अभी भी अपनाए जा रहे हैं, उनमें अस्तित्वविहीन व्यक्तियों के नाम, रोजगार के दिनों और वेतन के भुगतान की राशियों को बढ़ा-चढ़ा कर लिखा जाना शामिल है। उदाहरण के तौर पर हमने पाया कि 30 बानगी वाले ग्राम पंचायतों में कुल कार्य-दिवसों की जो संख्या मस्टर रोल में दर्ज की गई थी, उसके मुकाबले, श्रमिकों ने जो बताया उसके अनुसार कुल 60 प्रतिशत दिवसों का उन्होंने कार्य किया था। यह संख्या उन 592 श्रमिकों के प्रमाणपत्र पर आधारित है, जिनके बयान लिए जा सके। बानगी वाले 30 ग्राम पंचायतों में से प्रत्येक में एक-एक कार्यस्थल के मस्टर रोल का सत्यापन किया गया था।

इन पुराने हथकण्डों के अलावा कुछ नये हथकण्डे भी अपनाए जा रहे हैं। सबसे गम्भीर और सबसे ज्यादा प्रचलित वह आजादी है जिसके कारण कार्य सम्बन्धी विवरणों की प्रविष्टियों में समायोजन (जोड़-तोड़) बिठाया जाता है। कई मामलो में इसे धोखाधड़ी के आवरण के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। मस्टर रोल पर समायोजन का सबसे आम तरीका नग दर के आधार पर साथ काम करने वाले श्रमिकों के समूह के कार्य-दिवसों और मजदूरी को एक साथ मिलाकर दिखाना होता है। इस तरह के मामलों में प्रायः केवल एक व्यक्ति का ही नाम (यथा- दल के नेता का) मस्टर रोल पर मिलता है और समूचे समूह द्वारा अर्जित मजदूरी को एक ही श्रमिक के नाम के आगे दर्ज किया जाता है।

एक और आम समायोजन का उल्लेख पहले किया जा चुका है। इसमें बिना जॉबकार्ड वाले श्रमिक को मौका दिया जाता है और उसके भुगतान आदि के विवरण को मस्टर रोल पर किसी अन्य व्यक्ति के नाम दिखाया जाता है। ये और अन्य प्रकार के समायोजन मस्टर रोल की पारदर्शिता में पलीता लगा देते हैं और उनका सत्यापन करना असम्भव-सा हो जाता है। जब भी किसी श्रमिक की गवाही मस्टर रोल के सत्यापन के दौरान उससे मेल नहीं खाती, यह बताना लगभग असम्भव हो जाता है कि यह सरकारी कोष में हेरा-फेरी के इरादे से किया गया है या महज एक समायोजन भर है। कुछ मामलों में मस्टर रोल पर दिखाए गए नामों और मजदूरी का वास्तविक भुगतानों के साथ बहुत कम समरूपता होती है।

कहने का तात्पर्य यह है कि पैसा क्या वास्तव में श्रमिकों को दिया गया और दिया गया तो कितना उन तक पहुँचा, इसके बारे में पक्के तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता, सिर्फ अन्दाज भर लगाया जा सकता है। मस्टर रोल जिसे श्रमिकों के नाम और उपस्थिति का अभिलेख माना जाता है, कम से कम कुछ मामलों में तो जोड़-तोड़ कर बनाया हुआ एक दस्तावेज भर होता है जिसका एक मात्र उद्देश्य ग्राम पंचायत के खाते से पैसा निकालना सुनिश्चित करना और विकास खण्ड स्तर पर आँकड़ों को दर्ज कराना होता है।

निगरानी और सूचना प्रणाली


निगरानी और सूचना प्रणाली (एमआईएस) पारदर्शी अभिलेखन का जो प्रयोजन है उसकी अन्तिम कड़ी है, जिसके द्वारा सभी अभिलेखों को कम्प्यूटर में डालकर उसे स्वयं ही इण्टरनेट पर प्रदर्शित किया जाता है। इस उद्देश्य के लिए ओडिशा में राष्ट्रीय सूचना केन्द्र (एनआईसी) द्वारा नरेगा के लिए खासतौर पर तैयार किए गए एमआईएस का उपयोग होता है। इस एमआईएस में आँकड़ों पर अनेक प्रतिबन्ध लगे हुए हैं। उदाहरण के लिए यह जॉबकार्ड रहित श्रमिकों के नाम स्वीकार नहीं करता, गलत जॉबकार्ड संख्याओं और दोहरी प्रविष्टियों को अस्वीकार कर देता है। एक व्यक्ति का नाम एक ही मस्टर रोल पर दो बार नहीं आ सकता। इसके अलावा एक जॉबकार्ड पर प्रतिवर्ष 100 दिन से अधिक के रोजगार को दर्ज नहीं कर सकता। इस प्रकार एमआईएस दिशा-निर्देशों की अवहेलना करने के इरादे से भरे गए आँकड़ों को अस्वीकार कर देता है और सम्भवतः उससे यह अपेक्षा उचित ही की जाती है कि वह आन्तरिक विसंगतियों को स्वीकार नहीं करेगा। इस प्रकार यह दिशा-निर्देशों के अनुसार ही नियमानुसार अभिलेखन को सुनिश्चित करने का काम करता है। परन्तु इस कठोर नियम की कीमत भी चुकानी होती है।

निश्चय ही एमआईएस के कठोर नियमों के कारण अनेक ऐसे समायोजनों का बहाना मिल जाता है, जिनका निवारण पहले किया जा चुका है। उदाहरण के लिए, जॉबकार्ड रहित श्रमिकों को काम का मौका देने को उचित ठहराने के लिए इनका आमतौर पर सहारा लिया जाता है। इन श्रमिकों को अन्य व्यक्तियों के नाम पर रखा जाता है। और जब कागजों पर खानापूरी के बाद कम्प्यूटर पर आँकड़ों को दर्ज कराने (डेटा एंट्री) के समय समस्याएँ या विसंगतियाँ सामने आती हैं तो कम्प्यूटर ऑपरेटर मस्टर सेल की कागजी प्रति पर अन्तिम समय में कुछ परिवर्तन कर एक बार और खानापूरी करने की कोशिश करता है।

यथा- हमें कुछ ऐसे परिवार मिले जिन्होंने कम से कम कागजों पर अधिकतम 100 दिन के कार्य-दिवसों की हकदारी से भी अधिक काम किया था। चूँकि इन परिवारों के सदस्यों के नामों को एमआईएस स्वीकार नहीं कर सकता था, ऐसे मामलों में लोगों के कार्य-दिवसों को कम्प्यूटर पर आँकड़ों की प्रविष्टि के समय किसी अन्य व्यक्ति के नाम के आगे चढ़ा दिया जाता है। बौध जिले में जहाँ कार्य-दिवसों की संख्या 100 से अधिक हो गई थी, परिवारों का पुनर्निर्धारण कर परिवार के कुछ सदस्यों को नये जॉबकार्ड देने को कहा गया और इस तरह समायोजन के उपर्युक्त तरीके से बचने के निर्देश दिए गए। हालाँकि यह दृष्टिकोण समस्या का केवल सतही समाधान है, फिर भी यह कवायद भी कम समस्या मूलक नहीं हैं, क्योंकि 100 दिनों के कार्य-दिवसों की सीमा तय करने का जो प्रयोजन है उसकी यह अवहेलना करता है।

निष्कर्ष


यद्यपि ओडिशा में आज नरेगा की छवि थोड़ी धुँधली दिखाई पड़ रही है, तथापि इस आलेख में वर्णित अनेक समस्याओं का ईमानदार उपायों से काफी हद तक निराकरण किया जा सकता है। मिसाल के तौर पर वर्तमान जॉबकार्डों के स्थान पर सोच-विचार कर बनाए गए जॉबकार्ड इस्तेमाल किए जा सकते हैं। अगले वित्त वर्ष से पहले इन्हें वितरित किया जा सकता है। इससे जॉबकार्ड वितरण का अपूर्ण कार्य पूरा करने का भी अवसर मिलेगा और इस प्रकार वर्तमान में समायोजन के जो बहाने बनाए जाते हैं उनका भी एक प्रमुख कारण समाप्त किया जा सकेगा। प्रत्येक ग्राम पंचायत में ग्राम रोजगार सेवक की नियुक्ति कर उसे जॉबकार्ड के नियमित सन्धारण के लिए उत्तरदायी बनाकर भी इस दिशा में कुछ किया जा सकता है। यह एक छोटा-सा कदम होगा लेकिन इसका दूरगामी प्रभाव पड़ेगा। इसी प्रकार कार्यस्थल पर ही मस्टर रोल्स को रखा जाना सुनिश्चित करने से उसमें हेरा-फेरी करना लोगों के लिए इतना आसान नहीं रह जाएगा।

अधिनियम और दिशा-निर्देश वस्तुतः पारदर्शी सुरक्षा उपायों को प्रभावी ढंग से लागू करने के स्पष्ट और व्यापक मार्ग-चित्र प्रदान करते हैं और मुख्य समस्या इन सुरक्षा उपायों को सख्ती से लागू करना ही है। ऐसा करने में ओडिशा सरकार की असफलता उन लोगों की शक्ति और प्रभाव को दर्शाता है जो (ठेकेदार, भ्रष्ट कर्मचारी और अन्य) मौजूदा स्थिति का लाभ उठा रहे हैं। अतएव समय का तकाजा है कि पारदर्शिता और जवाबदेही की दिशा में प्रभावी दबाव बनाया जाए।

ई-मेल : reetika.khera@gmail.com

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