आज भी सपना है बिहार में शुद्ध पेयजल

Submitted by RuralWater on Fri, 03/27/2015 - 10:14
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विश्व जल दिवस पर विशेष


.तस्वीर में मौजूद इस हैण्डपम्प को देखें। यह हैण्डपम्प बिहार के पूर्णिया जिले के धमदाहा गाँव में हाल ही में राज्य सरकार की ओर से लगवाया गया है। अधिकारियों के कथनानुसार यह आयरन मुक्त जल देने वाला हैण्डपम्प है। मगर इस हैण्डपम्प के नीचे की सिमेंटेड पाट को देखें। वहाँ चन्द महीने में ही जो पीलेपन की परत जम गई है वह सरकारी दावों की पोल खोलती है।

राज्य के कोसी और मिथिलांचल इलाके का बच्चा-बच्चा जानता है कि यह पीलापन पानी में आयरन की अत्यधिक मात्रा की वजह से आता है। इसी वजह से इस इलाके के लोग सफेद और हल्के रंग का कपड़ा कम खरीदते हैं, क्योंकि अगर यहाँ के पानी में उसे साफ किया जाए तो बहुत जल्द कपड़े पर पीलापन छाने लगता है। यह तो रंग की बात है, जिसे एकबारगी लोग सह भी लेते हैं।

मगर इसकी बड़ी पीड़ा यह है कि पेयजल में आयरन की अत्यधिक मात्रा की वजह से इस इलाके के लोगों का पाचनतन्त्र हमेशा बिगड़ा ही रहता है। गैस और कब्जियत इनका पीछा मौत के बाद ही छोड़ता है। राज्य सरकार के आँकड़ों के मुताबिक यहाँ के नौ जिलों के 101 प्रखण्डों की 18,673 बस्तियों के लोग तयशुदा मानकों से अधिक आयरन की मात्रा पेयजल में ले रहे हैं।

हालांकि आयरन ही राज्य के पेयजल में पाया जाने वाला एकमात्र हानिकारक खनिज नहीं है। जहाँ नेपाल के तराई के जिलों के पेयजल में आयरन की अधिकता है वहीं गंगा किनारे बसे मध्य बिहार के जिलों के लोग आर्सेनिक युक्त पेयजल पीने को विवश हैं। बाकी बचे दक्षिण बिहार के लोगों को पेयजल के साथ-साथ फ्लोराइड जैसा खतरनाक रसायन भी पीना पड़ रहा है।

पेयजल में आर्सेनिक और फ्लोराइड की अधिक मात्रा से होने वाले नुकसान जगजाहिर हैं। जिस व्यक्ति के शरीर पर आर्सेनिक का प्रभाव होता है, उसे त्वचा कैंसर हो जाता है। तलवा फटने लगता है। शरीर पर चकते निकलने लगते हैं। इलाज के अभाव में मौत हो जाती है। इसी प्रकार से फ्लोराइड प्रभावित रोगी के शरीर में घुटने में दर्द होने व सूजन होने सहित शरीर में दाँत में पीलापन की शिकायत होती है। अगर फ्लोराइड की मात्रा काफी अधिक हो तो हड्डियाँ कमजोर पड़के लचीली हो जाती हैं और इंसान विकलांगता का शिकार हो जाता है।

हालांकि हाल के सालों में बिहार सरकार ने इस दिशा में कुछ कदम जरूर उठाए हैं। इसी के तहत लोक स्वास्थ्य अभियन्त्रण विभाग ने राज्य के 2,70,318 जल स्रोतों के पानी का परीक्षण कराया है। इस परीक्षण से नतीजे सामने आए हैं कि 38 जिलों वाले बिहार राज्य के आठ जिलों का पानी ही आँखें मूँद कर पीने लायक है, शेष 30 जिलों के इलाके आर्सेनिक, फ्लोराइड और आयरन से प्रभावित हैं। इन्हें बिना स्वच्छ किए नहीं पीया जा सकता।

जिस तरह पेयजल स्रोतों के परीक्षण में सरकार ने ताकत झोंकी है वैसी ताकत लोगों को शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने में नहीं झोंकी है। कहने को हैण्डपम्पों में वाटर प्यूरीफिकेशन यन्त्र लगाने से लेकर बड़े-बड़े वाटर ट्रीटमेंट प्लांट प्रभावित इलाकों में लगाए गए हैं। मगर कहीं तो इन्हें कामचलाऊ ढंग से लगा दिया गया है, कहीं ये रख-रखाव के अभाव में जल्द ही बेकार हो जा रहे हैं। ऐसे में इन इलाकों में लोगों को शुद्ध पेयजल हासिल हो पाना उनकी आर्थिक स्थिति पर निर्भर है, जो लोग फिल्टर खरीद सकते हैं और आरओ लगवा पाते हैं वे शुद्ध पानी पी रहे हैं। इन आँकड़ों के मुताबिक बिहार के उत्तर-पूर्वी भाग के 9 जिले के पानी में आयरन की अधिक मात्रा पाई गई है, जबकि गंगा के दोनों किनारे बसे 13 जिलों में आर्सेनिक की मात्रा और दक्षिणी बिहार के 11 जिलों में फ्लोराइड की अधिकता पाई गई है। सिर्फ पश्चिमोत्तर बिहार के आठ जिले ऐसे हैं जहाँ इनमें से किसी खनिज की अधिकता नहीं है। पानी प्राकृतिक रूप से पीने लायक है।

सरकारी आँकड़ों के मुताबिक आर्सेनिक प्रभावित जिले हैं- बक्सर, भोजपुर, सारण, पटना, वैशाली, समस्तीपुर, बेगुसराय, भागलपुर, लखीसराय, मुंगेर, खगड़िया, दरभंगा और कटिहार। फ्लोराइड प्रभावित जिले हैं, नालंदा, औरंगाबाद, भागलपुर, नवादा, रोहतास, कैमूर, गया, मुंगेर, बांका, जमुई और शेखपुरा और आयरनयुक्त जल पीने को विवश जिले हैं, खगड़िया, पूर्णिया, कटिहार, अररिया, सुपौल, किशनगंज, बेगूसराय, मधेपुरा और सहरसा।

हालांकि जिस तरह पेयजल स्रोतों के परीक्षण में सरकार ने ताकत झोंकी है वैसी ताकत लोगों को शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने में नहीं झोंकी है। कहने को हैण्डपम्पों में वाटर प्यूरीफिकेशन यन्त्र लगाने से लेकर बड़े-बड़े वाटर ट्रीटमेंट प्लांट प्रभावित इलाकों में लगाए गए हैं।

मगर कहीं तो इन्हें कामचलाऊ ढंग से लगा दिया गया है, कहीं ये रख-रखाव के अभाव में जल्द ही बेकार हो जा रहे हैं। ऐसे में इन इलाकों में लोगों को शुद्ध पेयजल हासिल हो पाना उनकी आर्थिक स्थिति पर निर्भर है, जो लोग फिल्टर खरीद सकते हैं और आरओ लगवा पाते हैं वे शुद्ध पानी पी रहे हैं। बाकी उसी दूषित और हानिकारक पानी पीने को विवश हैं।

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