सामाजिक लेखापरीक्षण के माध्यम से जवाबदेही

Submitted by birendrakrgupta on Sat, 03/28/2015 - 13:19
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योजना, अगस्त 2008
.राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी योजना कानून ने 2 फरवरी, 2008 को अपने दो साल पूरे किए। ये दो साल की यात्रा इसके लिए बहुत ही उतार-चढ़ाव वाली रही। जबकि कोई इसे पूरी तरह से दरकिनार नहीं कर सकता और यह कह सकता है कि यह पूरी तरह से धन की बर्बादी है या एक असफल कानून है। परन्तु इसके बारे में हम ऐसा भी नहीं कह सकते कि इसके अमल में बाधाएँ नहीं आईं। जैसे सभी बड़ी योजनाओं में दिक्कतें आती हैं उसी तरह इसमें भी ऐसी कई बाधाएँ आईं।

विभिन्न वर्गों के लोग नरेगा पर नजर रखते हैं और विशेष रूप से वे लोग जो भारतीय बाजार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की स्थिति और उससे होने वाले लाभ पर लगातार नजर रखे हुए हैं, वे ही इस कानून को सिरे से नकार रहे हैं।

अधिनियम और दिशा-निर्देश सुरक्षा उपायों को प्रभावी ढंग से लागू करने के स्पष्ट और व्यापक मार्ग-चित्र प्रदान करते हैं। मुख्य समस्या इन सुरक्षा उपायों को सख्ती से लागू करना है। समय का तकाजा है कि पारदर्शिता और जवाबदेही की दिशा में प्रभावी दबाव बनाया जाए।नरेगा के समर्थन का मतलब यह नहीं कि इसकी हर चीज सही है। हालाँकि योजना की अच्छाई या बुराई का यह मतलब नहीं कि योजना ही गलत है। बल्कि उसके चलाने व लागू करने के तन्त्र पर इसकी सफलता निर्भर करती है जबकि कानून के पास इसकी सुरक्षा के पारदर्शी हथियार हैं। साथ ही एक खास अधिकार जिसमें इसके सूचना सम्बन्धी अधिकार के उपयोग का भी प्रावधान है लेकिन सरकार ने इस क्षेत्र में काफी कम काम किया है। दूसरी ओर एक समूह ऐसा है जो इस योजना को अपने राज्य में लाने और सामाजिक लेखापरीक्षण के माध्यम से इसे लागू करने के प्रयास में संघर्षरत है। लेकिन ज्यादातर राज्यों में इन समूहों को छिद्रान्वेशी और नरेगा विरोधी करार दिया गया बजाय उसकी बातों को समझने के।

कुछ अधिकारियों ने तो सामाजिक लेखापरीक्षण के कार्य करने के ढर्रे पर भी उंगली उठानी शुरू कर दी है चाहे वे उस राज्य की सत्ताधारी पार्टी में से ही क्यों न हों। राज्य सरकार के ही एक उच्च पदाधिकारी ने हाल में ही एक टीवी चैनल को यह बयान दिया कि लेखापरीक्षण बस एक दिखावे के लिए है और यह इस योजना सम्बन्धी कानून के लिए और दुश्मन ही पैदा कर रहा है जो इसके लिए रास्ता ढूंढ़ रहे हैं। इस योजना के कानून का सबसे दुखद व संकीर्ण विश्लेषण यह है कि यह बस उन्हीं राज्यों में सफल हो सका जहाँ शिक्षित समाज इस मुद्दे को लोकप्रिय बना रहा है और जहाँ मस्टर रोल्स (हाजिरी पंजी) एक छिपा हुआ दस्तावेज नहीं रह गया। पाँच साल पहले आन्ध्र की सरकार ने और इसके राजनीतिक पदाधिकारी ने इसे अच्छी मॉनिटरिंग के साथ अपनाया है।

आन्ध्र प्रदेश की सरकार ने इस सामाजिक लेखापरीक्षण को पूरे राज्य में कैसे लागू कर लिया, यह सोचकर किसी को भी हैरानी हो सकती है। इस राज्य ने नरेगा की केवल नींव ही नहीं रखी बल्कि सामाजिक लेखापरीक्षण रिपोर्ट के लिए एक अच्छी वेबसाइट भी तैयार की और इससे सम्बन्धित कुछ नियम भी बनाए जो जल्दी ही पेश होने वाले हैं। यही एकमात्र राज्य है जिसने नरेगा से सम्बन्धित प्रक्रिया को संस्थागत रूप दे दिया है। जबकि दूसरे राज्यों के लिए आन्ध्र प्रदेश का उदाहरण कुछ मायने नहीं रखता है और राजनीतिक इच्छाशक्ति, जगह, आर्थिक मदद, सामाजिक ढाँचा, प्रशासनिक व्यवस्था आदि इस गतिविधि में महत्त्वपूर्ण कारक हैं। आन्ध्र में इस गतिविधि के सफल होने के पीछे केवल एक ही सच्चाई है कि वहाँ की राज्य सरकार ने इसमें सबसे बड़ा योगदान किया है। और इसी प्रशासनिक संकल्प की वजह से उस राज्य में इतना बदलाव आया है। आन्ध्र प्रदेश की सरकार ने यह साबित कर दिया कि यदि सरकार चाहे तो कुछ भी असम्भव नहीं है।

नलगोण्डा जिले में काम के लिए अनाज राष्ट्रीय योजना (एनएफएफडब्ल्यूपी) के अन्तर्गत नौ वैधानिक कार्यक्रमों का सामाजिक लेखापरीक्षण शुरू हुआ। यह लेखापरीक्षण गतिविधि को समझने और प्रशिक्षुओं को प्रशिक्षण देने के लिए हुआ था। इस कार्यक्रम में प्रशिक्षण का इन्तजाम ग्रामीण विकास विभाग/जीओएपी तथा मजदूर किसान शक्ति संगठन नामक स्वयंसेवी संस्था के सहयोग से किया गया। इसके साथ ही एक समीक्षा सत्र भी शुरू हुआ जिसमें एमकेएसएस के प्रशिक्षु सदस्य और कार्यपालक सदस्यों ने ग्रामीण विकास विभाग के साथ अपने विचार बाँटे और यह निष्कर्ष निकाला कि आन्ध्र के नरेगा के लिए भी इस तरह के काम बने थे। नरेगा के सामाजिक लेखापरीक्षण के लिए आयोजित आमसभा में ग्रामीण विकास विभाग के मुख्य सचिव और विभाग के कमिश्नर भी शामिल हुए और बहुत सारे ऐसे मुद्दे उठाए गए जिन्हें सूचना प्रबन्धन व्यवस्था (एमआइएस) भी नहीं उठा सकी थी। शासन व्यवस्था के साथ मिलकर इन स्वतन्त्र समूहों ने वर्तमान स्थिति का लेखापरीक्षण किया और इसका परिणाम यह हुआ कि अगले 6 महीनों के अन्दर प्रारम्भ में जिन तीन जिलों में यह कार्यक्रम शुरू हुआ था वो पहले चरण में 13 जिलों मंा फैल गया और दूसरे चरण के जिलों में इस फरवरी से शुरू करने का लक्ष्य रखा गया। दूसरे चरण में 22 जिलों को रखा गया है।

जो भी रास्ते अपनाए गए वे आसान नहीं हैं, पर सीखने को इनमें बहुत कुछ है। एक महिला ने कहा कि उसे ऐसा महसूस होता है कि कोई था जो समय पर उसके दुखों को सुनता था और उसे दूर करने की कोशिश भी करता था। फिर उसे अपनी रोज की कमाई लेने शाखा डाक प्रबन्धक के पास रात को जाना पड़ता था। क्योंकि वह एक ऑटो चालक है और वह दिन में गाँव में नहीं होता था इसलिए वह मजदूरों को, खासकर ज्यादातर औरतों को या क्षेत्र सहायक को, जो अपनी साइकिल में पानी के कनस्तर बाँध कर पौधों में पानी डालने का काम करते हैं, जबकि यह उनका काम नहीं था, उन्हें भी वह रात में पैसे लेने बुलाता था। ये सारे मुद्दे सामाजिक लेखापरीक्षण के दौरान सामने आए। इस बैठक के दौरान उन सभी मुद्दों पर प्रकाश डाला गया जो इस योजना के सफल व असफल होने के मुख्य कारण थे और फिर उन चीजों पर भी गौर किया गया जिनमें बदलाव की जरूरत थी।

देश में गरीबों ने अपनी पहचान बनाने के लिए लम्बी लड़ाई लड़ी और काफी मुश्किलों के बाद वे 100 दिनों के रोजगार के हकदार बने।अन्तिम 6 महीनों में अपने-अपने विधानसभा क्षेत्रों में होने वाले सामाजिक लेखापरीक्षण में 30 से ज्यादा विधायकों ने भाग लिया। जुक्कल विधानसभा क्षेत्र के विधायक सौदागर गंगाराम ने एक सामाजिक लेखापरीक्षण की बैठक के दौरान कहा- 'हम चुनाव के समय जनता से वोट माँगने हर हालत में पहुँचते हैं चाहे हम बीमार हों, बरसात का मौसम हो या फिर कोई और कठिन परिस्थिति। इसलिए मुझे लगता है कि विधायक/संसद सदस्यों को अपने सरपंचों और स्थानीय स्तर के प्रतिनिधियों की इस बैठक में सम्मिलित होना चाहिए। गरीबों की आर्थिक मदद के लिए यह काम हो रहा है, इसलिए हमें उन तक जाना ही चाहिए।'

13 जिलों के अन्तर्गत 500 मण्डलों में 30,000 ग्रामीण सामाजिक लेखापरीक्षकों को इस सामाजिक लेखापरीक्षण के कार्यक्रम के अन्तर्गत प्रशिक्षित किया गया। इसके फलस्वरूप गड़बड़ी वाली एक करोड़ रुपए से ज्यादा की वसूली की गई और 100 से ज्यादा कार्यकारी समितियों के खिलाफ कार्रवाई की गई। कई बार इन समितियों को तब हटाने की बात भी हुई जब यह पता चला कि वे भी इस पैसे के हेरफेर में शामिल थीं। सामाजिक लेखापरीक्षण की गतिविधियों को बरकरार रखने के लिए प्रत्येक लेखापरीक्षण के 15 दिन बाद एक मूल्यांकन बैठक होती है जिसमें यह देखा जाता है कि आमसभा में उठाए गए मुद्दों पर अमल हो रहा है या नहीं। इन गतिविधियों में से प्रत्येक पर अच्छे से विचार किया जाता है। इस पर शासन और समाज में से चुने गए लोग एकजुट होकर काम करते हैं जिनका उद्देश्य सिर्फ यही होता है कि इस योजना को सफलतापूर्वक लागू किया जाए और इसकी प्रगति में बाधक बनने वाली अड़चनों को हटा दिया जाए।

इस योजना के अमल में अवरोधक बनने वाले काफी लोग हैं जिनमें कुछ अर्थशास्त्री, पत्रकार, शिक्षा क्षेत्र से जुड़े लोग और शोधकर्ता भी शामिल हैं। इस कार्यक्रम पर प्रतिक्रिया उन शिक्षित ग्रामीण युवाओं की तरफ से आएगी जो ग्रीष्म ऋतु में इन निर्माण स्थलों पर काम करना चाहते हैं ताकि वे अपने कॉलेजों की पढ़ाई का कुछ खर्च निकाल सकें या फिर उन औरतों की तरफ से आएगी जो नरेगा से कमाए गए पैसों की बचत कर रही हैं जिससे अपनी बेटियों को शिक्षा उपलब्ध करा सकें और प्रसव के दौरान उचित अस्पताल की सुविधा भी पा सकें। ये लोग उन हजार लोगों में शामिल हैं जो सामाजिक लेखापरीक्षण के दौरान कानूनन अपनी पहचान बनाएँगे।

देश में गरीबों ने अपनी पहचान बनाने के लिए लम्बी लड़ाई लड़ी और काफी मुश्किलों के बाद वे 100 दिनों के रोजगार के हकदार बने। अगर अब इस नियम में कोई अवरोधक बनेगा या इसे बन्द करने की कोशिश करेगा तो वह एक प्रकार का अपराध होगा। न्यूनतम मजदूरी जो 73 रुपए या 80 रुपए है, कमाने के लिए कड़कती गर्मी में मजदूरों को काम करना होता है। इनकी कमाई के बीच में ठेकेदारों, बिचौलियों, मशीनरी की कोई जगह नहीं होनी चाहिए, जो इस योजना को असफल बनाने में जुटे रहते हैं और ग्रामीण गरीबी को कायम रखना चाहते हैं। यह हमारी सामूहिक जिम्मेवारी बनती है कि हम इस योजना को लागू और संचालित करने के उद्देश्य से काम करें। यदि किसी कारण से यह योजना विफल होती है तो इसका एक कारण प्रशासन की अनिच्छा को ही माना जाएगा।

(लेखिका ग्रामीण विकास विभाग, आन्ध्र प्रदेश सरकार से सम्बद्ध हैं)
ई-मेल : sowmyakrishkidambi@gmail.com

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