बूँदों पर टिकी बुनियाद की मज़बूती जरूरी

Submitted by RuralWater on Sun, 03/29/2015 - 15:18
.‘पानी और सतत् विकास’ - विश्व जल दिवस-2015 के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ का सूत्र बिन्दु यही है। भारत में पानी और नदियों के बढ़ते संकट तथा विकास का आसमान छू लेने की ललक को देखते हुए यह एक चुनौती ही है।

स्वच्छ और भरपूर पानी के बगैर, न 100 स्मार्ट सिटी का सपना साकार हो सकता है और न औद्योगिक निवेश व विकास का। चाहे नमामि गंगे का संकल्प सिद्ध करना हो या स्वच्छ भारत का, स्वच्छ...निर्मल-अविरल जल के बगैर वह भी सम्भव नहीं। फिल्टर, आरओ और बोतलबन्द पानी के भरोसे विकास का पहिया चल नहीं सकता। विकास की चिन्ता करनी है, तो पानी की चिन्ता तो करनी ही होगी। आइए, भारतीय पानी प्रबन्धन की चुनौतियों पर चिन्तन करें; ताकि विकास भी सतत् रहे और पानी भी।

भारतीय पानी प्रबन्धन की हकीक़त


यह अक्सर कहा जाता है कि भारत में पानी की कमी नहीं, पानी के प्रबन्धन में कमी है। किन्तु क्या पानी का प्रबन्धन सरकारों को कोसने से ठीक हो सकता है? दरअसल, यह न सरकारों को कोसने से ठीक हो सकता है, न रोने से और न किसी के चीखने-चिल्लाने से।

हम इस मुगालते में भी न रहें कि नोट या वोट हमें पानी पिला सकते हैं। वोट पानी पिला सकता, तो देश में सबसे ज्यादा वोट वाले उत्तर प्रदेश के बाँदा-महोबा-हमीरपुर में पानी की कमी के कारण आत्महत्याएँ न होतीं। सिर्फ नोट से ही यदि पानी का सुप्रबन्धन सम्भव होता, तो सबसे अधिक बाँध और हमारी पंचवर्षीय योजनाओं में पानी का सबसे अधिक बजट खाने वाले महाराष्ट्र, इस वर्ष गर्मी आने से पहले ही सिंचाई और पेयजल का संकट से बेजार नहीं होता।

यदि कोई कहे कि कोई कच्छ, चेन्नई और कलपक्कम की तरह करोड़ो फेंककर खारे समुद्री पानी को मीठा बनाने की महंगी तकनीक के बूते सभी को पानी पिला देगा, तो यह भी हकीक़त से मुँह फेर लेना है।

हकीक़त यह है कि हमें हमारी जरूरत का कुल पानी न समुद्र पिला सकता है, न ग्लेशियर, न नदियाँ, न झीलें और न हवा व मिट्टी में मौजूद नमी। पृथ्वी में मौजूद कुल पानी में सीधे इनसे प्राप्त मीठे पानी की हिस्सेदारी मात्र 0.325 प्रतिशत ही है। आज भी पीने योग्य सबसे ज्यादा पानी (1.68 प्रतिशत) धरती के नीचे भूजल के रूप में ही मौजूद है।

हमारी धरती के भूजल की तिजोरी इतनी बड़ी है कि इसमें 213 अरब घन लीटर पानी समा जाए और हमारी जरूरत है मात्र 160 अरब घन लीटर। अब ऐसे में भी यदि निकासी ज्यादा हो जाए और संचयन कम, तो कोई भी पानी खातेदार कंगाल होगा ही होगा।

चुनौतियाँ कई


भारत के पानी प्रबन्धन की चुनौती यह है कि अभी तक देश में जलसंरचनाओं के चिन्हीकरण और सीमांकन का काम ठीक से शुरू भी नहीं किया जा सका है। भारत के पास कहने को राष्ट्रीय व प्रादेशिक स्तर पर अलग-अलग जलनीति जरूर है, लेकिन हमारे पानी प्रबन्धन की चुनौतियों को जिस नदी नीति, बाँध नीति, पानी प्रबन्धन की जवाबदेही तथा उपयोग व मालिकाना सुनिश्चित करने वाली नीति, जल स्रोत से जितना लेना, उसे उतना और वैसा पानी वापस लौटाने की नीति की दरकार है, वह आज भी देश के पास नहीं है। भूजल प्रबन्धन ही पानी प्रबन्धन की सबसे पहली और जरूरी बुनियाद है। यह जानते हुए भी हमने इस बुनियाद को कमज़ोर होने दिया है।

हम भूल गए कि पानी का काम कभी अकेले नहीं हो सकता। पानी एक साझा उपक्रम है। अतः इसका प्रबन्धन भी साझे से ही सम्भव है। वैदिक काल से मुगल शासन तक शामिलात संसाधनों का साझा प्रबन्धन विशः, नरिष्ठा, सभा, समिति, खाप, पंचायत आदि के नाम वाले संगठित ग्राम सामुदायिक ग्राम्य संस्थान किया करते थे। अंग्रेजी हुक़ूमत ने भूमि-जमींदारी व्यवस्था के बहाने नए-नए कानून बनाकर ग्राम पंचायतों के अधिकारों में खुला हस्तक्षेप प्रारम्भ किया। इस बहाने पंचों को दण्डित किया जाने लगा। परिणामस्वरूप साझे कार्यों के प्रति पंचायतें धीरे-धीरे निष्क्रिय होती गईं। नतीजा यह हुआ कि सदियों की बनी-बनाई साझा प्रबन्धन और संगठन व्यवस्था टूट गई।

चुनौती यह भी है कि जलसंसाधनों के सरकारी होते ही लोगों ने इन्हेें पराया मान लिया। हालांकि ‘जिसकी भूमि, उसका भूजल’ का निजी अधिकार पहले भी भूमालिकों के हाथ था और आज भी। लेकिन भूजल का अदृश्य भण्डार हमें दिखाई नहीं देता। हमारा समाज आज भी यही मानता है कि जल-जंगल के सतही स्रोत सरकार के हैं। अतः पानी पिलाना, सिंचाई व जंगल का इन्तज़ाम उसी के काम हैं; वही करे।

आज, जब केन्द्र के साथ-साथ राज्य सरकारों ने भी अनेक योजनाओं के क्रियान्वयन के अधिकार पंचायतों को सौंप दिए हैं; बावजूद इसके सरकारी को पराया मानने की नजीर और नजरिया आज पहले से बदतर हुआ है। इसी सोच व नासमझी ने पूरे भारत के जल प्रबन्धन का चक्र उलट दिया है। पूरी जवाबदेही अब सरकार के सिर आ गई है। समाज हकदारी खो चुका है।

यूँ देखें, तो जहाँ-जहाँ समाज ने मान लिया है कि ये स्रोत भले ही सरकार के हों, लेकिन इनका उपयोग तो हम ही करेंगे, वहाँ-वहाँ चित्र बदल गया है तथा वहाँ समाज पानी के संकट से उबर गया है। लेकिन हर जगह का समाज व प्रशासन ऐसे ही हों, जरूरी नहीं है। अतः हकदारी और जवाबदारी की जुगलबन्दी जरूरी है।

सरकारी के प्रति पराएपन के भाव से समाज को उबारने का यही तरीका है। वरना तीन सवाल भारतीय पानी प्रबन्धन के समक्ष नई चुनौती बनकर खड़े ही हैं: प्राकृतिक संसाधनों का मालिक कौन? शासन-प्रशासन प्राकृतिक संसाधनों की ठीक से देखभाल न करें, तो जनता क्या करे? जलापूर्ति पर निर्णय का अधिकार किसका? पानी के व्यावसायीकरण ने यह चुनौती और बढ़ा दी है। भूमि अधिग्रहण के सवाल, भारत के पानी प्रबन्धन को नए सिरे से चुनौती देते दिखाई दे ही रहे हैं।

इन्हीं सवालों के कारण पानी के स्थानीय, अन्तरराज्यीय व अन्तरराष्ट्रीय विवाद हैं। इसी के कारण लोग पानी प्रबन्धन के लिये एक-दूसरे की ओर ताक रहे हैं। इसी के कारण सूखती-प्रदूषित होती नदियों का दुष्प्रभाव झेलने के बावजूद समाज नदियों के पुनर्जीवन के लिए व्यापक स्तर पर आगे आता दिखाई नहीं दे रहा। बाजार भी इसी का लाभ उठा रहा है। परिणामस्वरूप आज भारत के पानी प्रबन्धन को बाढ़-सुखाड़ से इतर तीन नए संकट से जूझना पड़ रहा है।

तीन संकट


शोषण, अतिक्रमण और प्रदूषण :


जिस तरह कैंसर का निदान उसके स्रोत से किया जाता है, उसी तरह प्रदूषण का निपटारा भी उसके स्रोत पर ही किया जाना चाहिए। मल हो या कचरा.. दोनो को ढोकर ले जाना सिर्फ सामाजिक व नैतिक ही नहीं, बल्कि वैज्ञानिक पाप भी है। भूजल शोषण नियन्त्रण का उपाय भूजल स्रोतों का नियमन, लाइसेंसीकरण या रोक नहीं हो सकता। हाँ! अकाल आदि आपदाकाल छोड़कर सामान्य दिनों में जलनिकासी की अधिकतम गहराई सीमित कर भूजल-शोषण कुछ हद तक नियन्त्रित अवश्य किया जा सकता है। 21वीं सदी के इस दूसरे दशक में भारत के पानी समक्ष पेश नए संकट ये तीन ही हैं। जो उद्योग या किसान जेट अथवा समर्सिबल पम्प लगाकर धकाधक भूजल खींच रहा है, उस पर कोई पाबन्दी नहीं कि जितना लिया, उतना पानी वापस धरती को लौटाए। हालांकि अभी हाल ही में राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण ने एक मामले में उद्योगों को ऐसे आदेश जारी किए हैं; लेकिन जब तक ‘रेलनीर’ या हमारे दूसरे सरकारी संयन्त्र खुद यह सुनिश्चित नहीं करते कि उन्होंने जिन इलाकों का पानी खींचा है, उन्हें वैसा और उतना पानी वे कैसे लौटाएँगे, तब तक सरकार गैर-सरकारी को कैसे बाध्य कर सकती है? यही हाल अतिक्रमण का है।

देश में जल-संरचनाओं की जमीनों पर सरकारी-गैर-सरकारी कब्जे के उदाहरण एक नहीं, लाखों हैं। तहसील अदालतों से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक कई ऐतिहासिक आदेशों के बावजूद स्थिति बहुत बदली नहीं है। जहाँ तक प्रदूषण का सवाल है, हमने उद्योगों को नदी किनारे बसाने के लिए दिल्ली-मुम्बई औद्योगिक गलियारा, लोकनायक गंगापथ और गंगा-यमुना एक्सप्रेस वे आदि परियोजनाएँ तो बना ली, लेकिन इनके किनारे बसने वाले उद्योंगों द्वारा उत्सर्जित प्रदूषण केे स्रोत पर प्रदूषण निपटारे की कोई ठोस व्यवस्था योजना हम आज तक सुनिश्चित नहीं कर पाए हैं; जबकि प्रदूषण प्रबन्धन का सिद्धान्त यही है।

तीन समाधान


जिस तरह कैंसर का निदान उसके स्रोत से किया जाता है, उसी तरह प्रदूषण का निपटारा भी उसके स्रोत पर ही किया जाना चाहिए। मल हो या कचरा.. दोनो को ढोकर ले जाना सिर्फ सामाजिक व नैतिक ही नहीं, बल्कि वैज्ञानिक पाप भी है। भूजल शोषण नियन्त्रण का उपाय भूजल स्रोतों का नियमन, लाइसेंसीकरण या रोक नहीं हो सकता।

हाँ! अकाल आदि आपदाकाल छोड़कर सामान्य दिनों में जलनिकासी की अधिकतम गहराई सीमित कर भूजल-शोषण कुछ हद तक नियन्त्रित अवश्य किया जा सकता है। ऐसा करने से स्थानीय उपभोक्ताओं को जलसंचयन के लिये भी कुछ हद तक बाध्य किया जा सकेगा।

किन्तु सभी प्रकार के शोषण रोकने का यदि कोई सबसे पहला और बुनियादी सिद्धान्त है, तो वह यह कि हम जिससे जितना लें, उसे उतना और वैसा वापस लौटाएँ। यह सिद्धान्त पानी पर भी पूरी तरह लागू होता है। अतिक्रमण रोकने के लिए जलसंरचनाओं का चिन्हीकरण और सीमांकन कर अधिसूचित करना एक सफल उपाय साबित हो सकता है।

जवाबदारी से आती है, हकदारी


ऊपरी तौर पर देखें, तो इन सिद्धान्तों को व्यवहार में लाना सुनिश्चित कर हम उक्त तीन संकट से निजात पा सकते हैं, लेकिन बाजार के लालच और प्राकृतिक उपक्रमों के प्रबन्धन को लेकर सरकार की ताकने की सामाजिक आदत से निजात पाने का रास्ता एक ही है: प्राकृतिक संसाधनों के प्रबन्धन की जवाबदारी तथा मालिकाने व उपयोग की हकदारी सुनिश्चित करना। गौर करने की बात है कि वन प्रबन्धन में वनवासियों की सहभागिता और लाभ में भागीदारी प्रावधान के परिणाम बेहतर आए हैं। क्यों? क्योंकि अतिक्रमण, शोषण और प्रदूषण हमारे प्राकृतिक संसाधनों के नष्ट होने के कारण नहीं हैं। ये परिणाम है, प्राकृतिक संसाधनों के प्रति पराएपन की हमारी सोच के।

अभी आम धारणा यह है कि सार्वजनिक ज़रूरतों की पूर्ति करना शासन-प्रशासन का काम है। उनके काम में दखल देना... कानून अपने हाथ में लेना है। जबकि असल जरूरत, यह याद करने की है कि जवाबदारी निभाने से हकदारी खुद-ब-खुद आ जाती है? याद रखने की जरूरत यह भी है कि कुदरत की सारी नियामतें सिर्फ इंसान के लिये नहीं हैं, दूसरे जीव व वनस्पतियों का भी उन पर बराबर का हक है। अतः उपयोग की प्राथमिकता पर हम इंसान ही नहीं, कुदरत के दूसरे जीव व वनस्पतियों की प्यास को भी सबसे आगे रखें। यही रास्ता है, यही समाधान।

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अरुण तिवारीअरुण तिवारी

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स्नातक, पत्रकारिता एवं जनसंपर्क में स्नातकोत्तर डिप्लोमा

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