जल दिवस का भारतीय संयोग

Submitted by RuralWater on Sun, 03/22/2015 - 13:07

विश्व जल दिवस पर विशेष


. कितना सुखद संयोग है! 20 मार्च को विश्व गौरैया दिवस के बहाने हम सब की अपनी एक नन्हीं घरेलू चिड़िया की चिन्ता; देशी माह के हिसाब से चैत्री अमावस्या यानी गोदान का दिन। 21 मार्च को चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा यानी मौसमी परिवर्तन पर संयमित जीवनशैली का आग्रह करते नवदिन और नवदिनों का प्रारम्भ।

इसी का पीछा करते हुए 22 मार्च को विश्व जल दिवस; भारतीय पंचांग के हिसाब से इस वर्ष की मत्स्य जयन्ती। नवरात्रोपरान्त महावीर जयन्ती से आगे बढ़कर बैसाख का ऐसा महीना, जिसमें जलदान की महिमा भारतीय पुराण बखानते नहीं थकते। इसी बीच 21 अप्रैल को अक्षय तृतीया है और 22 अप्रैल को विश्व पृथ्वी दिवस। अक्षय तृतीया, अबूझ मुहूर्त का दिन है। इस दिन बिना पूछे कोई भी शुभ काम किया जा सकता है। पानी प्रबन्धन की भारतीय परम्परा इस दिन का उपयोग पुरानी जल संरचनाओं को झाड़-पोछकर दुरुस्त करने में करती रही है।

वर्ष-2015 के इस सिलसिले को देखकर ऐसा लगता है कि जैसे जल चिन्ता हेतु अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर मनाए जाने वाले विश्व जल दिवस ने भी भारतीय दिवसों से संयोग करने का मन बना लिया हो। गौर करने की बात है कि नदी, समुद्र, बादल, जलाशय आदि के प्रति अपने दायित्वों को याद करने का भारत का तरीका श्रमनिष्ठ रहा है। हम इन्हें पर्वों का नाम देकर क्रियान्वित करते जरूर रहे हैं, किन्तु उद्देश्य भूलने की मनाही हमेशा रही है।

 

भारतीय जल दिवस-एक


भारतीय पंचांग के मुताबिक पहला जल दिवस है- देव उठनी ग्यारस....देवोत्थान एकादशी! चतुर्मास पूर्ण होने की तारीख। जब देवता जागृत होते हैं। यह तिथि कार्तिक मास में आती है। यह वर्षा के बाद का वह समय होता है, जब मिट्टी नर्म होती है। उसे खोदना आसान होता है। नई जल संरचनाओं के निर्माण के लिये इससे अनुकूल समय और कोई नहीं।

खेत भी खाली होते हैं और खेतिहर भी। तालाब, बावड़ियाँ, नौला, धौरा, पोखर, पाइन, जाबो, कूलम, आपतानी-देश भर में विभिन्न नामकरण वाली जल संचयन की इन तमाम नई संरचनाओं की रचना का काम इसी दिन से शुरू किया जाता था। राजस्थान का पारम्परिक समाज आज भी देवउठनी ग्यारस को ही अपने जोहड़, कुण्ड और झालरे बनाने का श्रीगणेश करता है।

 

भारतीय जल दिवस-दो


भारतीय पंचांग का दूसरा जल दिवस है- आखातीज! यानी बैसाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि। यह तिथि पानी के पुराने ढाँचों की साफ-सफाई तथा गाद निकासी का काम की शुरुआत के लिये एकदम अनुकूल समय पर आती है। बैसाख आते-आते तालाबों में पानी कम हो जाता है। खेती का काम निपट चुका होता है। बारिश से पहले पानी भरने के बर्तनों को झाड़-पोछकर साफ रखना जरूरी होता है।

हर वर्ष तालों से गाद निकालना और टूटी-फूटी पालों को दुरुस्त करना। इसके जरिए ही हम जल संचयन ढाँचों की पूरी जल ग्रहण क्षमता को बनाए रख सकते हैं। ताल की मिट्टी निकालकर पाल पर डाल देने का यह पारम्परिक काम अब नहीं हो रहा। नतीजा? इसी अभाव में हमारी जल संरचनाओं का सीमांकन भी कहीं खो गया है... और इसी के साथ हमारे तालाब भी।

बैसाख-जेठ में प्याऊ-पौशाला लगाना पानी का पुण्य हैं। खासकर,बैसाख में प्याऊ लगाने से अच्छा पुण्य कार्य कोई नहीं माना गया। इसे शुरू करने की शुभतिथि भी आखातीज ही है। लेकिन अब तो पानी का शुभ भी व्यापार के लाभ से अलग हो गया है। भारत में पानी अब पुण्य कमाने का देवतत्व नहीं, बल्कि पैसा कमाने की वस्तु बन गया है।

50-60 फीसदी प्रतिवर्ष की तेजी से बढ़ता कई हजार करोड़ का बोतलबन्द पानी व्यापार! शुद्धता के नाम पर महज एक छलावा मात्र! यदि बारिश के आने से पहले तालाब-झीलों को साफ कर लें। खेतों की मेड़बन्दियाँ मजबूत कर लें; ताकि जब बारिश आए तो इन कटोरे में पानी भर सके। वर्षाजल का संचयन हो सके। धरती भूखी न रहे।

 

बिना संकल्प, जल दिवस अधूरा


जहाँ तक संकल्पों का सवाल है। हर वह दिवस, हमारा जल दिवस हो सकता है, जब हम संकल्प लें- “बाजार का बोतलबन्द पानी नहीं पिऊँगा। कार्यक्रमों में मंच पर बोतलबन्द पानी सजाने का विरोध करुँगा। अपने लिये पानी के न्यूनतम व अनुशासित उपयोग का संयमसिद्ध करुँगा। दूसरों के लिये प्याऊ लगाऊँगा।... मैं किसी भी नदी में अपना मल-मूत्र-कचरा नहीं डालूँगा। नदियों के शोषण-प्रदूषण-अतिक्रमण के खिलाफ कहीं भी आवाज उठेगी या रचना होगी, तो उसके समर्थन में उठा एक हाथ मेरा भी होगा।’’

हम संकल्प कर सकते हैं कि मैं पाॅलीथिन की रंगीन पन्नियों में सामान लाकर घर में कचरा नहीं बढ़ाऊँगा। मैं हर वर्ष एक पौधा लगाऊँगा और उसका संरक्षण भी करुँगा। उत्तराखण्ड में “मैती प्रथा’’ है। मैती यानी मायका। लड़की जब विवाहोपरान्त ससुराल जाती है, तो मायके से एक पौधा ले जाकर ससुराल में रोप देती है। वह उसे ससुराल में भी मायके की याद दिलाता है। वह दिन होता है उत्तराखण्ड का पर्यावरण दिवस।

दुनिया को बताना जरूरी है कि हम अन्तरराष्ट्रीय जल दिवस मनाएँगे जरूर, लेकिन भारत के प्राकृतिक संसाधन अन्तरराष्ट्रीय हाथों में देने के लिये नहीं, बल्कि उसकी हकदारी और जवाबदारी.. दोनों अपने हाथों में लेने के लिये। भारत की दृष्टि से विश्व जल दिवस का महत्व यह भी है कि इस बहाने हम आने वाले भारतीय जल दिवस को भूलें नहीं। उसकी तैयारी में जुट जाएँ। इस नवरात्र में एक नया संकल्प करें। याद रहे कि संकल्प का कोई विकल्प नहीं होता और प्रकृति के प्रति पवित्र संकल्पों के बगैर किसी जल दिवस को मनाने का कोई औचित्य नहीं।

 

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अरुण तिवारीअरुण तिवारी

शिक्षा:


स्नातक, पत्रकारिता एवं जनसंपर्क में स्नातकोत्तर डिप्लोमा

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