हिमालय के सवाल पर नहीं है गम्भीर सरकार

Submitted by RuralWater on Tue, 04/07/2015 - 15:24

. हिमालय तथा खुद को बचाने की चुनौती दक्षिण एशिया व दुनिया के लिये है। हिमालय के लोगों को अपने जीवनयापन की बुनियादी ज़रूरतों को पूरा करने लिये जल, जंगल, ज़मीन पर स्थानीय समुदायों को अधिकार पाने के संघर्ष करने पड़ रहे हैं। हिमालय सदियों से मैदानों, नदियों तथा सम्पन्न मानव समाजों का निर्माणकर्ता और उनका रक्षक रहा है। भारत के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल के 16.3 प्रतिशत क्षेत्र में फैले हिमालयी क्षेत्र को समृद्ध जल टैंक के रूप में माना जाता है। इसमें 45.2 प्रतिशत भू-भाग में घने जंगल हैं। हिमालय के भारतीय हिस्से में 11 छोटे राज्य हैं। बावजूद इसके हिमालय के सवाल संसद में नहीं गूँजते।

आज जबकि प्राकृतिक संसाधन लोगों के हाथ से खिसक रहे हैं। नदियों की जलराशि पिछले 50 वर्षों में आधी हो गई है। हिमालयी ग्लेशियर प्रतिवर्ष 18-20 मीटर पीछे हट रहे हैं। दूसरी ओर, हिमालय आपदाओं का घर बनता जा रहा है। जल विद्युत परियोजनाओं से लेकर सड़कों को चौड़ा बनाने व तेजी से बढ़ता पर्यटकों का आवागमन। बाढ़-भूस्खलन जैसी आपदाएँ तो आ ही रही हैं, साथ ही भूकम्प के खतरे भी बढ़ रहे हैं।

केन्द्र सरकार गंगा की अविरलता और निर्मलता के लिये काफी उत्साहित है। लेकिन मैदानी क्षेत्रों को मिट्टी, पानी, हवा प्रदान करने वाले हिमालय के बिना गंगा का अस्तित्व सम्भव नहीं है। ग्लेशियरों, पर्वतों, नदियों, जैविक विविधताओं की दृष्टि से सम्पन्न हिमालय पर इनके लिये जो ध्यान दिया जाना चाहिए, वह नहीं है। गंगा बचाओ का नारा हिमालय बचाओ के बिना अधूरा है।

हिमालय की नीति नहीं है। उसे योजनाएँ नहीं, एक समग्र नीति चाहिए। ऐसी नीति, जो हिमालय व उससे जुड़े देश के पर्यावरण के बारे में तो सोचे, साथ ही हिमालय क्षेत्र में रहने वाले लोगों की समृद्धि का रास्ता भी इसी पर्यावरण से जोड़कर निकाले।

हिमालय में खासकर उत्तराखण्ड ने चिपको, रक्षासूत्र और बड़े बाँधों के विरोध के बाद हिमालय विकास के पृथक मॉडल पर बहस चल रही है।

इस सन्दर्भ में गाँधी शान्ति प्रतिष्ठान में सुप्रसिद्ध समाजसेवी राधा भट्ट की अध्यक्षता में हिमालय नीति के सन्दर्भ में एक मन्थन हुआ। मन्थन के बाद सांसदों के नाम खुला पत्र जारी करने, हिमालय लोक नीति का मसौदा प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी को सौंपने तथा सम्बन्धित राज्यों में हिमालय के विषय पर संवाद करने तथा उत्तर पूर्व पश्चिम हिमालय में बैठक करने के अलावा हिमालय नीति के सवाल पर जम्मू कश्मीर से नगालैंड तक यात्रा करने व सक्रिय संगठनों के साथ संवाद करने के फैसले लिये गए।

सुश्री राधा भट्ट ने कहा कि हिमालय के सवाल महत्वपूर्ण हैं। गंगा के सन्दर्भ में सबकी चिन्ता है, लेकिन हिमालय के बारे में चिन्ता नहीं है। हर साल ग्लेशियर 19 से 20 मीटर पीछे हट रहा है, यह चेतावनी है, इसे नीति निर्धारकों को गहराई से समझाना होगा। मैदानी भाग के विकास में हिमालय का अहम योगदान है। मौजूदा भूमि अधिग्रहण बिल के सन्दर्भ में उन्होंने कहा कि यदि यह वहाँ चला तो क्या देश बचेगा? हिमालय का मुद्दा हिमाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर, उत्तराखण्ड सहित अन्य राज्यों के साथ-साथ राष्ट्रीय मुद्दा है। इस सवाल पर पूरे उत्तर भारत के लोगों को एकजूट होना होगा।

हिमालय के सवाल पर गंगोत्री से गंगासागर तक की यात्रा के अनुभवों को साझा करते हुए यात्रा के संयोजक एवं पर्यावरणविद सुरेश भाई ने कहा कि यात्रा के दौरान 45 से अधिक स्थानों पर बैठक तथा संगोष्ठियों के माध्यम से जनसंवाद किया गया। इस दौरान 2000 से अधिक लोगों ने प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी को हिमालय नीति अभियान के समर्थन में पत्र भेजे। उन्होंने कहा कि सरकारें गंगा और हिमालय के सवाल पर अपनी संवेदना तो दिखा रही हैं, लेकिन गंगा के तट पर रहने वाले लोगों के साथ संवाद स्थापित नहीं किया गया है। हिमालय का सवाल पूरे देश के लिये महत्वपूर्ण है।

Himalaya Niti Abhiyan, 27 March 2015पत्रकार भारत डोगरा ने सरकार की विकास नीति पर सवाल उठाते हुए कहा कि विकास योजनाओं से फायदा कम और नुकसान ज्यादा हो रहा है। गाँव की योजना गाँव में बने। वैकल्पिक उर्जा का विकास हो। यह सुनिश्चित किया जाए कि पर्यावरण और खेती को नुकसान नहीं पहुँचे। उन्होंने कहा कि पहाड़ों से जो नुकसान हो रहा है, उसका प्रतिकूल असर पहाड़ी क्षेत्रों के साथ-साथ मैदानी क्षेत्रों पर भी पड़ रहा है।

विकास का सही मतलब टिकाऊ विकास के साथ-साथ सुरक्षा की बुनियाद भी होनी चाहिए। वरिष्ठ पत्रकार प्रसून लतांत ने कहा कि अब एक मंच से विस्थापन, गंगा, हिमालय और प्राकृतिक संसाधनों को छीने जाने के विरोध में लड़ाई लड़नी होगी। बड़ी ताकत से ही सरकार को झुकाया जा सकता है। इण्डिया वाटर पोर्टल के केसर सिंह ने कहा कि नई सरकार की विकास नीति स्पष्ट हो रही है। यह महत्त्वपूर्ण सवाल है कि यह विकास नीति किसके लिये है।

सर्व सेवा संघ, राजघाट, वाराणसी से आए अशोक भारत ने हिमालय को लेकर की यात्रा के बरेली और वाराणसी के अनुभवों को साझा किया। उन्होंने अभियान को तेज करने के साथ-साथ पूरे मामले को नीति आयोग के समक्ष रखने की आवश्यकता बताई। झारखण्ड से आए अरविन्द अंजुम ने कहा कि पहाड़ यदि स्वस्थ है तो वह मैदानी हिस्से की सम्पत्ति है।

प्रमोद चावला ने कहा कि अभियान में संचार के नए टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। देहरादून से आए प्रेम पंचोली ने अभियान की मज़बूती के लिये अन्य संगठनों से बात करने की आवश्यकता बताई। आॅक्सफेम इण्डिया के श्रीयश त्रिपाठी ने हिमालय नीति के जन मसौदे को लागू करने के लिये राजनीतिक अभियान भी सांसदों को जोड़कर चलाने का सुझाव दिया।

बंगलौर से आए इ.पी मेनन ने रचनात्मक विरोध के लिये युवाओं को प्रशिक्षित करने की बात कही। सर्वोदय समाज सम्मेलन के संयोजक आदित्य पटनायक ने कहा कि हिमालय बचेगा तो देश बचेगा, इससे लोगों को वाक़िफ़ कराना होगा। वि​श्वजीत गोरई ने उत्तराखण्ड के तराई क्षेत्र में हो रहे उत्खनन के खतरों से वाक़िफ़ कराया। ग्रीनपीस से आई विपासा ने आन्दोलन को सामाजिक आन्दोलन बनाकर सरकार पर दबाव बनाने की बात कही।

प्रवीण भट्ट ने हिमालय नीति, हिमालय पर मँडराते खतरे से वाक़िफ़ कराया और इस सन्दर्भ में अपनी बात को साहित्य के माध्यम से उर्दू, बंगला, नेपाली और अन्य भाषाओं में अनुवाद कर लोगों के बीच संवाद स्थापित करने की बात कही। हिमला बहन ने कहा कि हिमालय नीति के क्रियान्वयन के लिये पहाड़ी तथा मैदानी राज्यों में एक समूह बनाने की बात कही। हिमालय की आवाज़ प्रधानमन्त्री तक कैसे पहुँचे, इस पर एक समन्वित रणनीति तय होनी चाहिए।

सर्वसेवा संघ के मनोज पांडेय ने पूरे देश में एक साथ अभियान चलाने की आवश्यकता बताई। इस मुद्दे पर हो रहे सार्थक बहस में हिस्सा लेते हुए चंदन पाल ने हिमालय के सवाल को महत्त्वपूर्ण बताया। जर्मनी से आई करीना होमेल ने बताया कि जनजातीय समुदाय की स्थिति के सन्दर्भ में बताया। बहस में जलपुरूष राजेन्द्र सिंह, मेरठ से आए मेजर डॉ. हिमांशु, पंकज कुमार, त्रिभुवन नारायण सिंह, पश्चिम बंगाल से सौमित्री देवी, अमुलिका पॉल, काकाली जान्हे, हिमांशु डंगवाल, राज रावत, गाँधी शान्ति प्रतिष्ठान के सचिव सुरेन्द्र कुमार, के.एल बंगोत्रा, संदीप ने हिस्सा लिया।

हिमालय के सवाल को राष्ट्रीय पटल पर लाने के मकसद ने पर्यावरणविद् सुरेशभाई के संयोजन में उत्तराखण्ड के गंगोत्री से गंगासागर तक हिमालय नीति अभियान चलाया गया। दो चरणों में चली इस अभियान के दौरान हरिद्वार, मेरठ, हरदोई, लखनउ, इलाहाबाद, बरेली, वाराणसी, छपरा, सोनपुर, पटना, भागलपुर, कोलकाता आदि स्थानों से 1600 से अधिक पोस्टकार्ड भेजे गए और गंगा की अविरलता और निर्मलता के लिये एक हिमालय नीति बनाने की माँग की गई।

गंगा में मिलने वाली अधिकांश सहायक नदियाँ हिमालय से ही आती हैं। इसमें निरन्तर पानी की कमी, प्रदूषण और गंगा घाटों पर अतिक्रमण, खनन व गंगा घाटों पर बैराज आदि ने हिमालय के उद्गम से लेकर गंगासागर तक संकट खड़ा कर रखा है हिमालयी सूनामी लम्बे समय से मैदानी क्षेत्रों में तबाही का कारण बन रही है और मैदानों में गंगा मैला ढोने वाली मालवाहक बन गई है। इन स्थितियों के बावजूद गंगा की अविरलता और निर्मलता के लिये कोई संवाद नहीं शुरू किया गया है।
 

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