विनाश के दुष्चक्र को रोकने की लड़ाई का बनारस से आगाज

Submitted by RuralWater on Fri, 04/17/2015 - 11:10
नदियों पर आधारित सभ्यता ने सामाजिक ताने-बाने को बुनने की एक लम्बी प्रक्रिया पूरी की है। इसी प्रक्रिया में सभ्यता के विभिन्न समूहों की गतिशीलता के लिये आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक आधार विकसित हुए हैं। लेकिन अनुभव और तथ्य बताते हैं कि नीति निर्माता नए विकास के ढाँचे के लिये नदियों पर आधारित सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक ढाँचे को नेस्तनाबूद करने में ही महारथी होने पर जोर देते रहे हैं। लेकिन पूरी दुनिया में दो तरह के अनुभव सामने आते हैं। वाराणसी। 12 अप्रैल। विकास के नाम पर विनाश के दुष्चक्र को रोकने की लड़ाई का आगाज वाराणसी से हो गया है। गंगा मुक्ति आन्दोलन, साझा मंच और सर्वसेवा संघ की ओर से आयोजित तीन दिवसीय राष्ट्रीय समागम के रविवार को समापन के मौके पर गंगोत्री से लेकर गंगासागर तक के छह राज्यों के आन्दोलनकारियों ने इस लड़ाई को तेज करने का संकल्प लिया। भैंसासुर घाट पर हजारों नाविकों, मछुआरों और मज़दूरों की मौजूदगी में भावी बनारस घोषणा भी जारी की गई।

जारी घोषणा पत्र में कहा गया है कि औद्योगिक आधारित सभ्यता के इतिहास के शुरू होने से सदियों पहले नदियों पर आधारित आधुनिक सभ्यता का निर्माण हुआ है। सभ्यता के विकास का अर्थ दो भिन्न आधारों पर विकसित समाज के उन्नत अवस्था में पहुँचने में निहित हैं।

नदियों पर आधारित सभ्यता ने सामाजिक ताने-बाने को बुनने की एक लम्बी प्रक्रिया पूरी की है। इसी प्रक्रिया में सभ्यता के विभिन्न समूहों की गतिशीलता के लिये आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक आधार विकसित हुए हैं। लेकिन अनुभव और तथ्य बताते हैं कि नीति निर्माता नए विकास के ढाँचे के लिये नदियों पर आधारित सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक ढाँचे को नेस्तनाबूद करने में ही महारथी होने पर जोर देते रहे हैं। लेकिन पूरी दुनिया में दो तरह के अनुभव सामने आते हैं।

जिस भूभाग ने औद्योगिक विस्तार की अगुवाई की वहाँ के आम जन ने अपने अनुभव से जल्द ही यह सीखा कि नदियाँ केवल नदियाँ नहीं है। यह मानव सभ्यता के ताने-बाने का आधार है और उस समाज ने अपनी नदियों को बचाने के लिये संघर्ष किया और एक हद तक कामयाबी भी हासिल की। लेकिन दूसरा अनुभव यह बताता है कि साम्राज्यवाद के लिये उपनिवेशों की नदियाँ दूसरी चीजों की तरह महज एक आर्थिकी संसाधन रही है। यानी जल, जंगल, ज़मीन को लेकर उनके दृष्टिकोण और संवेदना में कोई मौलिक अन्तर नहीं रहा है।

अपने देश में तमाम तरह के संसाधनों पर सामाजिक नियन्त्रण के खोने की एक लम्बी प्रक्रिया का एहसास हमें होने लगा है। जल, जंगल, ज़मीन पर अपने हक को बचाने के लिये छोटे-बड़े आन्दोलनों के रूप में हम उसे देख सकते हैं। यहाँ तक कि सामाजिक नियन्त्रण वाले संसाधनों पर अपने बुनियादी हक को बचाने के लिये लोगों के मौलिक अधिकारों को भी कुचला जा रहा है। लेकिन हम ऐसा नहीं होने देंगे।

समाज के लिये राज सत्ता के बजाय राज सत्ता के लिये खास तरह के समाज के निर्माण के सिद्धान्त का बुनियादी तौर पर हम विरोध करते हैं और लगातार उसके विरोध के लिये समाज के विभिन्न समूहों को एकताबद्ध होने और आपस में समझदारी विकसित करने की अपील करते हैं।

इन्हीं प्रस्थापनों के साथ हम वाराणसी में 10, 11 और 12 अप्रैल 2015 को जमा हुए और अपनी नदियों को बचाने का संकल्प लेने की घोषणा करते हैं। वाराणसी वरुणा और असि के बीच एवं गंगा के किनारे बसी एक सांस्कृतिक नगरी है लेकिन यह हिमालय से लेकर हिन्द महासागर तक बसे समाज का ही हिस्सा है।

गंगा की बात करते हुए हम यह मानते हैं कि यह नदियों की पर्यायवाची है। गंगा ढेर सारी नदियों के संगम का नाम है जिसके किनारे विभिन्न तरह की पेशे से जुड़े लोग, समुदायों, जातियों व धर्मों को मानने वाले लोग रहते हैं। गंगा महज किसी धर्म विशेष की श्रद्धा नहीं है बल्कि एक सामाजिक संवेदना का स्रोत है और सभी धर्मों को मानने वालों की जीवन गतिविधियों का केन्द्र है।

लिहाजा गंगा हिन्दुओं के साथ मुस्लिम, सिख, ईसाई और दूसरी आस्थाओं के लिये महान है। इस पर लोगों के सांस्कृतिक जीवन, उनकी सामाजिकता और आर्थिक गतिविधियाँ निर्भर हैं। इन्हीं गतिविधियों से उनके जीवन की गति और जीविका संचालित होती है।

नदियों के नाश करने के मूल में उसे बाँधने की योजनाओं को लगातार जबरन लादे जाने की कोशिशें हैं। नदियों का जीवन इनकी अविरलता में है। उसकी स्वच्छता की पहली शर्त उसकी अबाध गति को सुनिश्चित करना है। हिमालय से लेकर हिन्द महासागर तक नीति निर्माताओं की आक्रामकता ने मनुष्य और प्रकृति के सह सम्बन्धों को तहस-नहस करने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी है।

वनों को काटने से लेकर औद्योगिक कचरे से नदियों को भरने की उसकी कवायद ने जनजीवन पर गहरा असर डाला है। जैव विविधता खतरे में है। अपने चरित्र में प्रकृति विरोधी होने के कारण विकास की ये कथित नीतियाँ आखिरकार समाज के अपेक्षाकृत कमजोर लोगों के विरोध में भी खड़ी दिखती है।

प्राकृतिक आपदाओं के विभिन्न रूप जो हमें देखने को मिल रहे हैं, वे इसी कथित विकास की नीतियों की देन है। पहाड़ों से नदियों के रिश्तों को भंग करने में यह विकास की नीति अपनी सफलता मानती है। हिमालय पर बड़े-बड़े बाँधों का बनना पूरी गंगा घाटी के लिये महाविनाश का आमन्त्रण है।

हम ये भी मानते हैं कि प्रकृति का कोई राष्ट्रवाद नहीं होता है। उसका राष्ट्रवाद मनुष्य और उसके सह-जीवों का समांजस्यपूर्ण और समानतामूलक जीवन है। हम समानता की नीतियों में ही यकीन करते हुए अपने देश और उसकी सीमाओं से परे नदियों और उस पर आधारित सम्पूर्ण जीवन व सामाजिक प्रणाली के विकास के हिमायती हैं। नदियों को बाँधने और दूसरी तरफ सफाई की योजना के सुपुर्द करने के अन्तर्विरोध का अध्ययन हमें इस रूप में समृद्ध करता है कि गंगा के लिये नेपाल, भूटान, बांग्लादेश को भी हम अपनी चिन्ताओं में शामिल मानते हैं।

गंगा मुक्ति आन्दोलन के अनिल प्रकाश ने कहा कि ''यह घोषणा पत्र नहीं संकल्प पत्र है जिसे लागू कराने के लिये सड़क से लेकर संसद के चौखट तक अन्तिम क्षण तक लड़ाई लड़ेंगे।” इस समागम में ​हिमालय लोक नीति का मसौदा भी पारित किया गया। यह स्पष्ट किया गया कि हिमालय बचेगा तो गंगा बचेगी।

समापन सत्र की अध्यक्षता प्रसिद्ध गाँधीवादी अमरनाथ भाई ने की। वरिष्ठ पत्रकार अनिल चमड़िया, डॉ नीता चौबे, उत्तराखण्ड से आए सुरेश भाई, इण्डिया वाटर पोर्टल के केसर सिंह, अम्बरीश राय, गोपाल पांडेय, डॉ राजेश श्रीवास्तव, जागृति राही, अशोक भारत, कुमार कृष्णन, डॉ. आनन्द प्रकाश तिवारी, रामचन्द्र साहनी, अमरनाथ, रामचन्द्र रमानी, वंशीधर, किशोर जायसवाल, श्वेता, अशोक झा, रामपूजन, रामबहादुर, वि​शम्भर पटेेल, मंजू, हुमायूँ, डॉ. दयानन्द, अम्बरीश चौधरी, लौटन राम निषाद, कमलेश यादव, किरण गुप्ता, रणजीव, अमरनाथ, विकास, गोपाल, वल्लभाचार्य स​हित अनेक लोगों ने अपने अनुभवों को साझा किया।

गंगा की अविरलता और निर्मलता पर केन्द्रित नाटक 'गंगा और गागी' का मंचन किया गया। वहीं दूसरी ओर पश्चिम बंगाल से आई ​कविता कर ने मूक अभिनय से माध्यम से गंगा पर विकास के नाम ​पर किए जा रहे अत्याचार के खतरों से आगाह किया।

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