हिमालयी त्रासदी और चीख की सीख

Submitted by birendrakrgupta on Tue, 04/28/2015 - 12:39
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डेली न्यूज एक्टिविस्ट, 28 अप्रैल 2015
.धरती के गुस्से का अहसास पिछले शनिवार-रविवार को भारत और नेपाल के लोगों ने हिमालयी त्रासदी के रूप में किया। हमारे पुरखों ने पृथ्वी और नदियों को माँ बताया है। पानी, पेड़ और प्रकृति को भी किसी न किसी देवी-देवता का नाम देते हुए उसका पर्याय बताया है। इसका आज धार्मिक मतलब निकालते हुए भले ही प्रगतिशीलता का लबादा ओढ़ककर हम खारिज कर दें। पर इन सब पर धर्म का मुअलम्मा चढ़ाने के पीछे उनकी मंशा यह थी कि हम आराध्य की तरह इन्हें न केवल पूजें बल्कि संरक्षित, पोषित और पल्लवित भी करें। पर भाववादी से भौतिकवादी होने की राह पर कदम बढ़ाते हमने इन्हें पण्य (कमोडिटी) मान लिया। नतीजतन, हम इनका उपयोग करने की जगह दोहन करके इन्हें बाजार के हवाले करने लगे। बाजार का भावना, संवेदना और आस्था से दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं है। तो ऐसे में धरती माँ के इस गुस्से के लिए हम अपनी माँ को दोष देने के बजाय अपने इस नजरिए की तरफ देखें तो शायद हमें जवाब मिल जाएगा।

मन की बात से लेकर धन, बल और सम्बल नेपाल के साथ है। पर नेपाल की चीख हमारे लिए एक सीख लेकर आई है। सीख यह कि हमारी संवेदनशीलता सिर्फ संकट तक ही सीमित न रहे। प्राकृतिक आपदा के रूप में जो कुछ हो रहा है, उसके लिए हम अथवा हमारा बाजारवादी नजरिया जिम्मेदार है। हमने एक ओर धरती की पकड़ मजबूत बनाने के लिए धरती माँ की कोख में उगे पेड़-पौधों को नष्ट करना शुरू किया। पेड़ वैसे भी धरती के शृंगार माने जाते हैं। वहीं दूसरी ओर बड़े-बड़े बाँध बनाकर हम नदियों की दशा और दिशा बदलने की साजिश कर रहे हैं। प्रकृति की उन्मुक्तता को बाँधने की कोशिश और उसके अल्हड़ सौन्दर्य को प्रदूषण के हवाले करने के प्रयास यह बयाँ कर रहे हैं कि विकास की बलिवेदी पर हमारी प्रकृति और उसकी नैसर्गिक सुन्दरता चढ़ाई जा रही है। प्रकृति को विजित करने की सायास-अनायास कोशिशें भी प्राकृतिक आपदाओं के लिए जिम्मेदार हैं।

आज जिस हिमालयी क्षेत्र में आई आपदा का शिकार नेपाल और भारत हुआ है, उसका पेट चीरकर ल्हासा से काठमाण्डू तक ट्रेन चलाने की घोषणा चीन कर चुका है। चीन का इरादा माउण्ट एवरेस्ट के नीचे सुरंग बनाकर काठमाण्डू तक रेल लाइन बिछाने का है। चीन के सरकारी अखबार चाइना डेली में छपी खबर से बहुत पहले से इसकी तैयारी चल रही है। बीजिंग से ल्हासा और फिर ल्हासा से सिगात्जे तक रेल लाइन बिछ चुकी है। सिगात्जे, नेपाल सीमा के करीब है। इस रेल लिंक को आगे बढ़ाकर चीन काठमाण्डू तक पहुँच सकता है, लेकिन इसके बीच माउण्ट एवरेस्ट खड़ा है। तिब्बत तक रेल पहुँचाने में चीन ने जिस तरह से सुरंग और पुल को बनाने में महारथ हासिल कर ली है, ऐसे में यह चुनौती बड़ी नहीं।

तिब्बत ऑटोनॉमस रिजन सीपीसी कमेटी के एक्जीक्यूटिव डिप्टी सेक्रेटरी वू यिंग्जी कहते हैं, हमने कई रेल लाइन बिछाई हैं। हम शान्तिपूर्ण सह अस्तित्व में भरोसा करते हैं। जैसे अमेरिका-कनाडा और यूरोप के देश रेल और यातायात के मामले में साथ हो गए हैं, वैसे ही हमें भी होना चाहिए। यह किसी देश पर निर्भर करता है कि वो कब और कहाँ तक रेल विस्तार चाहता है। नेपाल हमारी रेल को अपने देश तक ले जाने के लिए लगातार आग्रह करता रहा है। जब भी इस तरह की बात की जाती है, तब राष्ट्रों की सरहद, देशों के टकराते अहम और देशों की ऊँची नाक ही चिन्ता की जाती है। प्रकृति की नहीं।

भूकम्प से बड़े पैमाने पर होने वाला विनाश प्रकृति से बढ़ती छेड़छाड़ और खतरे की चेतावनियों की अनदेखी का नतीजा है। भू-विज्ञानी इसे लेकर दशकों से चेतावनी दे रहे हैं। प्रो. रोजर बिलहाम, विनोद के. गौड़ और पीटर मोलनार नामक भू-वैज्ञानिकों ने वर्ष 2001 में ‘जर्नल साइंस’ में ‘हिमालय सेसमिक हाजार्ड’ शीर्षक से प्रकाशित शोधपत्र में कहा था कि इस बात के एकाधिक संकेत मिले हैं कि हिमालय के इस इलाके में एक बड़ा भूकम्प कभी भी आ सकता है। उससे लाखों लोगों का जीवन खतरे में पड़ सकता है। उन्होंने कहा था कि हिमालय के छह क्षेत्रों में रिक्टर स्केल पर आठ या उससे ज्यादा के भूकम्प आने का अन्देशा है। दार्जिलिंग-सिक्किम रेंज भी इनमें शामिल है। विशेषज्ञों का कहना है कि मिट्टी का कटाव ही जमीन धंसने की प्रमुख वजह है। लेकिन इसके अलावा एक और वजह यह है कि हिमालय के इस पूर्वी रेंज के पहाड़ अपेक्षाकृत जवान है। इनकी बनावट में होने वाले बदलावों की वजह से भूगर्भीय ढाँचा लगातार बदलता रहता है और अब तक स्थिर नहीं हो सका है।

विशेषज्ञों के मुताबिक, जमीन के नीचे भारतीय व यूरेशियाई प्लेटों के बीच टकराव की वजह से विशालकाय चट्टानें दक्षिण की ओर बढ़ती हैं। इन चट्टानों को एक-दूसरे से अलग करने वाली प्लेटों के जगह बदलने से ही उनके नीचे दबी उर्जा के बाहर निकलने की वजह से भूकम्प आते हैं।पश्चिम बंगाल में सिलीगुड़ी स्थित हिमालयन नेचर एण्ड एडवेंचर फाउण्डेशन नामक एक गैर-सरकारी संगठन, जो पहाड़ों को बचाने की दिशा में काम कर रहा है, इसके संयोजक अनिमेष बसु कहते हैं- ‘हिमालय का पूर्वी हिस्सा अभी अपनी किशोरावस्था में है। इसलिए इसकी चट्टानें अभी दूसरे हिस्सों की तरह ठोस नहीं है। उसका यह गुणधर्म इसे भूकम्प के प्रति बेहद संवेदनशील बनाती है।’ वे कहते हैं कि पर्वतीय इलाके की तमाम सड़कें ब्रिटिश शासनकाल के दौरान बनी थीं। तब उन पर चलने वाले वाहनों की तादाद बहुत कम थी। अब यह तादाद सौ गुने से ज्यादा बढ़ गई है। नतीजतन, पहाड़ों पर बोझ भी बढ़ा है। इस बोझ को नहीं सह पाने की वजह से भी पहाडियों के पैर उखड़ रहे हैं। उनके मुताबिक, इलाके में तेजी से होने वाले अवैध निर्माण और बड़े-बड़े बाँध हिमालय पर बेहद प्रतिकूल असर डाल रहे हैं।

इलाके की भूगर्भीय परिस्थितियों का ख्याल किए बिना, हम अपनी जरूरतों के मुताबिक मनमाने तरीके से पेड़ और पहाड़ काट रहे हैं। सिक्किम तक रेल की पटरियाँ बिछाने का रेल मन्त्रालय का फैसला और जलढाका, झालंग और नेवड़ावैली जंगलों से होकर राजधानी गंगटोक तक वैकल्पिक सड़क बनाने का सेना का प्रस्ताव सिर पर मण्डरा रहे विनाश की बानगी बन सकता है। विशेषज्ञों के मुताबिक, जमीन के नीचे भारतीय व यूरेशियाई प्लेटों के बीच टकराव की वजह से विशालकाय चट्टानें दक्षिण की ओर बढ़ती हैं। इन चट्टानों को एक-दूसरे से अलग करने वाली प्लेटों के जगह बदलने से ही उनके नीचे दबी उर्जा के बाहर निकलने की वजह से भूकम्प आते हैं।

वैज्ञानिकों का कहना है कि सिक्किम में तिस्ता नदी पर बनने वाली पनबिजली परियोजनाओं के तहत बनाए जा रहे बाँध भी विनाश को न्योता दे रहे हैं। पहाड़ों का सीना चीर कर बनने वाले ये बाँध ऊर्जा के विभिन्न रूपों में किसी छोटे से इलाके में केन्द्रित कर रहे हैं। तिस्ता को दुनिया में सबसे ज्यादा तलछट वाली नदी माना जाता है। बाँधों के लिए बने जलाशयों में भारी मात्रा में तलछट जमा होगी। यह ऊर्जा बाहर निकली तो इलाके का मटियामेट होना तय है। इसके अलावा देश के दूसरे पर्वतीय इलाकों की तरह यहाँ होने वाली पेड़ों की अन्धाधुन्ध कटाई भी मिट्टी खिसकने की एक प्रमुख वजह है। पेड़ों की कटाई के चलते मिट्टी नरम हो जाती है।

इण्डियन प्लेट्स के खिसकने के कारण हिमालय की ऊँचाई लगातार बढ़ रही है। इसलिए भूकम्प आते रहते हैं। इण्डियन प्लेट यूरेसिया प्लेट की ओर खिसकी है। इसे एडजस्ट होने में कुछ समय लगेगा, लिहाजा भूकम्प के कई और झटके झेलने पड़ सकते हैं।कौंसिल फॉर साइण्टिफिक एण्ड इण्डस्ट्रियल रिसर्च (सीएसआईआर) के सेण्टर फॉर मैथेमेटिकल एण्ड कम्प्यूटर सिमलेशन की एक टीम ने बीते कुछ वर्षों के अध्ययन के बाद अपनी रिपोर्ट में कहा था कि इन पहाड़ियों के नीचे धीरे-धीरे दबाव बन रहा है। जमीन के नीचे दबी ऊर्जा जब बाहर निकलेगी, तब भूकम्प से जिस पैमाने पर विनाश होगा, उसका अनुमान लगाना भी मुश्किल है। लेकिन उनकी यह चेतावनी और अध्ययन रिपोर्ट फाइलों में पड़ी धूल फांक रही है। हिमालय क्षेत्र में हरेक साल दो हजार से ज्यादा भूकम्प आते हैं, लेकिन उनका मैग्नीट्यूड कम होता है। शनिवार के भूकम्प की तीव्रता काफी ज्यादा थी। इण्डियन प्लेट्स के खिसकने के कारण हिमालय की ऊँचाई लगातार बढ़ रही है। इसलिए भूकम्प आते रहते हैं। इण्डियन प्लेट यूरेसिया प्लेट की ओर खिसकी है। इसे एडजस्ट होने में कुछ समय लगेगा, लिहाजा भूकम्प के कई और झटके झेलने पड़ सकते हैं।

नेपाल, बिहार और उत्तर प्रदेश के अलावा दिल्ली और दूसरे प्रदेश सेस्मॉसिक जोन चार और पाँच में आते हैं। यहाँ बने मकानों में उच्च तीव्रता वाले भूकम्प झेलने की क्षमता नहीं है। इसलिए नेपाल में नुकसान ज्यादा हुआ। हिमालय की गोद में समाया पूरा नेपाल भूकम्प के फॉल्ट जोन में है। नेपाल के बीच में से महेन्द्र हाईवे फॉल्ट लाइन गुजरती है। यह तराई इलाकों और पहाड़ी इलाकों को क्रॉस करती है। लोकल फॉल्ट से आने वाले भूकम्प की तीव्रता 4-5 तक हो सकती है, लेकिन हिमालयन रीजन में आने वाले भूकम्प बेहद खतरनाक हो सकते हैं।

आईआईटी कानपुर के नेशनल इनफॉर्मेशन सेण्टर ऑन अर्थक्वेक इंजीनियर (एनआईसीईई) के कोऑर्डिनेटर दुर्गेश राय इस बात को लेकर नाराज हैं कि इस क्षेत्र में भाषण के सिवा कुछ नहीं होता। हिमालय में भूकम्प आने पर तबाही का दायरा दिल्ली समेत पूरे यूपी में होगा। कानपुर, लखनऊ, मेरठ समेत यूपी में बिल्डर जो भी हाईराइज बिल्डिंग्स बना रहे हैं, वे सुरक्षित नहीं हैं। कहीं भी बिल्डिंग कोड का पालन नहीं किया जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम ने भी अतिसंवदेनशीलता बरतने के लिए कहा है, लेकिन सिर्फ भाषणबाजी ही हो रही है। खासकर लखनऊ और तराई के इलाकों में पिछले दस सालों में ढेरों मल्टीस्टोरी बिल्डिंग्स बनी हैं, लेकिन ज्यादातर जगहों पर ये भूकम्परोधी नहीं हैं। संकट में सियासत नहीं होती। मन की बात से लेकर धन, बल और सम्बल नेपाल के साथ है। पर नेपाल की चीख हमारे लिए एक सीख लेकर आई है। सीख यह कि हमारी संवेदनशीलता सिर्फ संकट तक ही सीमित न रहे।

(लेखन न्यूज एक्सप्रेस न्यूज चैनल के उत्तर प्रदेश-उत्तराखण्ड के स्टेट हेड हैं)

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