ई-एग्रीकल्चर और व्यावसायिक कृषि क्यों नहीं!

Submitted by birendrakrgupta on Sun, 05/03/2015 - 16:34
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डेली न्यूज एक्टिविस्ट, 29 अप्रैल 2015
.कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था की हमेशा से ही रीढ़ रही है, पर सबसे अधिक दुश्वारियाँ इसी ने झेली हैं। भारत में अधिकांशत: जीविका और गुजारे की फसल का ही उत्पादन हो रहा है, ऊपर से दैवीय आपदा, ओलावृष्टि और बेमौसम बारिश से खेती झुरमुट हो गई और खेती करने वाला इसका शिकार होता जा रहा है। 65 बरस की कृषि नीति और इतने ही प्रतिशत के आसपास कृषि के कारोबारी तबाही के मंजर से न उबर रहे हैं और न ही कृषक होने का गौरव हासिल कर रहे हैं। सवाल है कि सभी स्थानों पर अब ‘ई’ की सुविधा होती जा रही है तो ऐसे में ई-एग्रीकल्चर क्यों नहीं?

यदि कृषि का व्यावसायीकरण और किसानों को अच्छा जीवन देना है तो खेती की तकनीकी विधा को कहीं अधिक प्रभावशाली करना होगा और जो चुनौतियाँ कृषि के लिए आएदिन अवरोध के रूप में खड़ी हो जाती हैं, उन्हें आर्थिक अनुदानों और अतिरिक्त सहायता के माध्यम से समाप्त करने की भी कवायद होनी चाहिए।सूचना और संचार माध्यमों के जरिए कृषि और ग्रामीण विकास पर ई-एग्रीकल्चर वाली विचारधारा एकदम नई है। यह एक ऐसा उभरता हुआ क्षेत्र माना जा सकता है, जो वर्तमान मोदी सरकार के डिजिटल इण्डिया के सपने को भी पंख दे सकता है। ऐसी मान्यता है कि बदले वक्त के साथ इस क्षेत्र को अब बहुत देर तक इन पद्धतियों से अलग नहीं रखा जा सकता। यदि इसका रास्ता समुचित नहीं बन पाया तो सरकार को भी समझ लेना होगा कि कृषि में बदलाव और किसानों के जीवन निर्वहन में आशातीत परिवर्तन दूर की कौड़ी ही बनी रहेगी।

आज से करीब एक दशक के आसपास वर्ष 2006 में संयुक्त राष्ट्र के ‘फूड एवं एग्रीकल्चर ऑर्गेनाइजेशन’ ने ग्लोबल सर्वे में ई-एग्रीकल्चर की वैश्विक स्थिति उभरी थी। कृषि क्षेत्र में सूचनाओं का महत्त्व अब इतना बढ़ा देना चाहिए कि किसी भी प्रकार की जानकारी और उपयोगिता से किसान वंचित न रहे। बदलते वक्त के साथ दुनिया में कृषि के स्वरूप में भी परिवर्तन हुआ है। भारत की यह विडम्बना रही है कि परम्परागत खेती के चलते किसानों को कुर्बान होना पड़ा। जलवायु परिवर्तन की चर्चा यहाँ इसलिए लाजिमी है, क्योंकि कृषि का वास्ता इससे रोजाना पड़ता है।

ताजा स्थिति यह है कि बीते फरवरी-मार्च में दस ऐसे अवसर आए, जब उत्तर भारत बेमौसम बारिश का शिकार हुआ, जिससे तबाही का प्रभाव तत्काल में भी जारी है। भारतीय किसानों की बड़ी चुनौती यह भी है कि खेतों तक नालियाँ नहीं पहुँची हैं, पानी नहीं पहुँचा है, गाँव में अभी भी अँधेरा है, बिजली की कटौती जारी है। किसानों की खेती-बाड़ी की वस्तुएँ वास्तविक न होकर काफी हद तक परम्परागत हैं। इन सभी का प्रभाव यह है कि खेती निहायत अपाहिज हो गई है और रही सही कसर जलवायु का मिजाज पूरी कर देता है।

गौरतलब है कि ई-एग्रीकल्चर की मुहिम लाकर खेती की दशा को बदला जा सकता है। तकनीक के प्रभाव से श्रम की न केवल बचत होगी बल्कि ई-मण्डी जैसी चीजें लाकर आढ़तियों के पास अनाज जाने के बजाय सरकार के न्यूनतम समर्थन मूल्य के तहत चुकाई गई कीमत के साथ एफसीआई में पहुँचेंगे। इससे किसानों को दाम मिलेगा और खरीददारी की पूरी गारण्टी भी मिलेगी और किसानों के शोषण की सम्भावना भी कम रहेगी।

ई-एग्रीकल्चर को जानकार किसानों का हमसफर भी कहते हैं। अक्सर यह सवाल उठता है कि खेती और किसानों पर आधारित कृषि दर्शन और दूरदर्शन पुराने कार्यक्रम हैं, परन्तु कारगर नहीं है। नवाचारों के बगैर ये कार्यक्रम खानापूरी बन कर रह गए हैं। किसानों की समृद्धि के लिए कृषि के व्यावसायीकरण को अब प्राथमिकता में होना ही चाहिए। स्वामीनाथन समिति ने यह मशविरा दिया था कि किसानों को खेती की लागत से 50 फीसदी अधिक कीमत दी जानी चाहिए। हालांकि ऐसी अच्छी सिफारिशें हमेशा खटाई में रहती हैं। इस रिपोर्ट के बाबत यह कहा जा सकता है कि 65 सालों के इतिहास में कृषि से जुड़ी कई क्राँतियाँ हुई हैं, बावजूद इसके कि किसानों की हालत सुधरे ये न होकर, उनकी आँतें सूखती रहीं। मौजूदा कृषि उर्वरक के भरोसे पैदावार देने में ही सक्षम है।

दरअसल, कृषि व्यावसायीकरण का मतलब है कृषि उत्पादन की ब्रिक्री, अधिकतम लाभ, उपभोक्ताओं की रुचि के अनुसार उत्पादन किया जाना और किसानों की उद्यमशीलता की ओर ध्यान आकर्षित करना।सिंचाई के अभाव में अभागे किसान औद्योगिक मजदूर बनकर व्यापक पैमाने पर खेती छोड़ चुके हैं। चौंकाने वाला तथ्य यह है कि देश के 85 प्रतिशत किसान लघु और सीमान्त की श्रेणी में आते हैं, जिनकी उम्र 35 वर्ष से कम है। कहा जाए तो भारत युवाओं का इतना बड़ा देश है कि देश को हर क्षेत्र में आगे होना चाहिए, पर वास्तव में ऐसा नहीं है। ई-एग्रीकल्चर एक उभरती हुई कृषि व्यवस्था है, जिसके पूरे सदुपयोग से किसान फलक पर आ सकता है, पर कृषि के व्यावसायीकरण की पर्याप्तता भी होनी चाहिए। दरअसल, कृषि व्यावसायीकरण का मतलब है कृषि उत्पादन की ब्रिक्री, अधिकतम लाभ, उपभोक्ताओं की रुचि के अनुसार उत्पादन किया जाना और किसानों की उद्यमशीलता की ओर ध्यान आकर्षित करना।

वर्ष 1991 से 2015 तक के इन 25 सालों में कृषि और सम्बन्धित क्षेत्र की औसत वृद्धि दर 3.2 फीसदी रही है। योजनाओं के उतार-चढ़ाव में देखें तो आठवीं पंचवर्षीय योजना में यही वृद्धि दर 4.8 थी, तब दौर समावेशी विकास का शुरू हुआ था। बाद की योजनाओं में वृद्धि दर गिरावट में चली गई, हालांकि 2012 में समाप्त ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना चार प्रतिशत की दर लिए हुए थी। असल में कृषि में जो निवेश वाली कमी है, वह योजना दर योजना कामोबेश अन्तर होने के कारण वृद्धि दर में भी अन्तर आता रहा। यदि कृषि का व्यावसायीकरण और किसानों को अच्छा जीवन देना है तो खेती की तकनीकी विधा को कहीं अधिक प्रभावशाली करना होगा और जो चुनौतियाँ कृषि के लिए आएदिन अवरोध के रूप में खड़ी हो जाती हैं, उन्हें आर्थिक अनुदानों और अतिरिक्त सहायता के माध्यम से समाप्त करने की भी कवायद होनी चाहिए।

यदि विकसित देशों से तुलना की जाए तो भारत में कृषि अनुदान करीब 18 डॉलर प्रति हेक्टेयर है, जबकि कनाडा में 167 डॉलर, अमेरिका में 184, न्यूजीलैण्ड में 117 और यूरोपियन यूनियन में एक हजार डॉलर से ज्यादा अनुदान दिए जाते हैं। इन सबके बावजूद जापान में यही अनुदान सात हजार डॉलर प्रति हेक्टेयर के आसपास है। इन आंकड़ों से भारत की कृषि विषमता देखी जा सकती है। कृषि का पिछड़ापन समझा जा सकता है और बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि से जान गंवाने के मामले में किसानों की मजबूरी देखी जा सकती है।

सवाल है कि कृषि में समावेशी विकास क्यों नहीं? भारत में कृषि क्षेत्र को समृद्ध बनाने में सरकारों की योजनाएँ पूरी तरह इसलिए कारगर नहीं रही हैं, क्योंकि उसके लागू करने में वित्तीय अभाव रहे हैं। यदि किसानों ने व्यावसायिक खेती चुनी भी तो भी फायदे का सौदा साबित नहीं हुआ। महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र के किसान जो कपास की खेती करते थे, पूरे भारत के कुल किसानों के खुदकुशी वाले आँकड़ों में 70 फीसदी थे। इससे यह अन्दाजा लगाया जा सकता है कि किसी भी पथ पर किसान सुकून में नहीं है।

अब देश के किसानों को दो चीजें चाहिए, पहला कृषि को व्यवसाय का दर्जा दिया जाना चाहिए, दूसरा अनुदान को तुलनात्मक सुरक्षा कवच बना देना चाहिए। इन दोनों को यदि बहुत देर तक टाला गया तो स्थिति बद से बद्तर हो जाएगी। देश में बहुत सारी कृषि नीतियाँ बनीं, लेकिन अड़चन सिर्फ यह रही कि गवर्नेंस के मामले में कृषि कभी प्राथमिकता नहीं ले पाई। कर्ज और दुख से भरी कृषि को अब उबारने के लिए ई-एग्रीकल्चर को एक बार पूरे मन से विकसित भाव में बढ़ा देना चाहिए।

लेखक का ई-मेल : sushilksingh589@gmail.com

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