आत्मज्ञान की ओर ले जाता विज्ञान

Submitted by RuralWater on Mon, 05/04/2015 - 10:48
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सर्वोदय प्रेम सर्विस, मई 2015
सन् 1990 के दशक से विज्ञान की दुनिया अब ‘डी.एन.ए.’ के उस नियतिवाद से दूर हट रही हैै जो उस पर बुरी तरह से छाया हुआ था। ‘जीन’ पर आधारित ‘जेनेटिक्स’ की बजाय अब बात हो रही है ‘एपिजेनेटिक्स‘ की। ग्रीक भाषा से बनाए गए इस शब्द का अर्थ है ‘जेनेटिक्स’ से ऊपर और परेेेे। यह विधा बता रही है कि आनुवंशिकी पर पर्यावरण का नियन्त्रण भी होता है। विज्ञान साबित कर रहा है कि हमारी दस में से नौ बीमारियों का कारण तनाव है। तनाव से ग्रस्त शरीर अपने बढ़ने की सहज प्रक्रिया रोक देता है। उसकी रोगों से लड़ने वाली शक्ति क्षीण हो जाती है। बुद्धि में, चेतना में नियन्त्रण रखने वाली क्रिया पर लगाम लग जाती है। ये सब मिलजुल कर स्वास्थ्य बिगाड़ देते हैं, जिजीविशा मिटा देते हैं। तनाव तब तो और विकराल रूप ले लेता है, जब किसी को लगने लगता है कि वह इन असाध्य कठिनाइयों के सामने लाचार है।

मजबूरी और तनाव का एक बड़ा कारण है यह भाव कि हमारा जीवन आनुवंशिकी के वश में होता है। यानी हमारा शरीर, हमारी चेतना, सब कुछ हमारे माता-पिता से मिले आनुवंशिकी तत्वों पर निर्भर है। यानी जिसे पहले प्रारब्ध कहते थे, वह असल में हमारे ही शरीर में, हमारे ‘जीन’ में लिखा हुआ है। वैज्ञानिक समझ बढ़ने के साथ-साथ यह दृष्टि तेजी से फैली है।

छोटी उमर में विद्यालय से लेकर विश्वविद्यालय तक, अखबार टी.वी. और फिल्मों में, सभी तरफ वंश के असर के उदाहरण दिखते हैं। इन्हें देख-देख कर और नई किस्म की वैज्ञानिक जानकारी को उसमें जोड़कर जन साधारण में जो एक नए तरह का भाग्यवाद बढ़ रहा है वह है आनुवंशिकी का नियतिवाद। इसके अनुसार हमारे जीवन के सबसे महत्वपूर्ण पहलू किसी ‘जीन‘ की चपलता पर टिके हैं। हमारे भाग्य में ऐसा ही लिखा है। हम क्या करें।

हमारे ये आनुवंशिक तत्व जब चाहे चालू हो जाते हैं, जब चाहे रुक जाते हैं। हममें से कोई भी अपने ‘जीन’ चुन नहीं सकता। यह नहीं तय कर सकता कि उसका जन्म किस माता-पिता से होगा। यानी हम अपने ‘जीन’ बदल भी नहीं सकते। अगर हमें अपने पैदाइशी गुण अच्छे नहीं लगते तो इससे यह भाव पनपता है कि हम अपने से बड़ी ताकत के खेल में मामूली से मोहरे हैं,बस। इसका सबसे प्रबल उदाहरण शरीर की बीमारियों में झलकता है।

कैंसर या मधुमेह या हृदयरोग जैसी कई विषम बीमारियाँ एक परिवार के लोगों को होती रहती हैं। मानसिक विषाद और ‘अलज्हाइमरस’ जैसी प्रवृत्तियाँ भी एक पीढ़ी से दूसरी को ‘जीन’ के साथ मिलती हैं। जिन लोेेेगों के परिवार में, अग्रजों में ऐसे रोग पाए गए हैं, वे मानते हैं कि उन्हें भी आगे नहीं तो पीछे ये रोग पकड़ेंगे ही। ऐसे में उनकी जीवनशक्ति ‘डी.एन.ए.’ की बदमिजाजी के आगे मजबूर हो जाती है।

लेकिन अब भौतिक विज्ञान और जीवशास्त्र में कुछ ऐसी खोजें हुई हैं जो विषय पर नया प्रकाश डाल रही हैं। सन् 1990 के दशक से विज्ञान की दुनिया अब ‘डी.एन.ए.’ के उस नियतिवाद से दूर हट रही हैै जो उस पर बुरी तरह से छाया हुआ था। ‘जीन’ पर आधारित ‘जेनेटिक्स’ की बजाय अब बात हो रही है ‘एपिजेनेटिक्स‘ की। ग्रीक भाषा से बनाए गए इस शब्द का अर्थ है ‘जेनेटिक्स’ से ऊपर और परेेेे। यह विधा बता रही है कि आनुवंशिकी पर पर्यावरण का नियन्त्रण भी होता है। यही नहीं, किसी जीव का पर्यावरण का बोध भी ‘डी.एन.ए‘ की अभिव्यक्ति काबू कर सकता है। यानी पर्यावरण के बदलने से हमारे वे वंशानुगत गुण-अवगुण भी बदल जाते हैं, जिनके बारे में अब तक विज्ञान यही बताता रहा है कि इन्हें तो आपको ढोना ही था।

‘एपिजेनेटिक्स’ का यह नया पाठ हमें यह भी बताता है कि हम केवल अपनी आनुवंशिकी के आगे बेबस नहीं हैं। अब हम किसी ‘डी.एन. ए.’ की कठपुतली भर नहीं हैं। चूँकि हम अपने शरीर के पर्यावरण को बदल सकते हैं, उस पर्यावरण के बोध को भी बदल सकते हैं, सो हम अपनी मजबूरी से ऊपर भी उठ सकते हैं। इससे यह विश्वास भी मिलता है कि हम अपने विवेक से पर्यावरण का नुकसान करने से अपने आप को रोक सकते हैं।

इसे समझने के लिये आज से कोई 40 साल पहले की बात करते हैं। उन दिनों मैं अपने छात्रों को आनुवंशिकी का ‘नियतिवाद’ पढ़ाया करता था। उस समय मैं मांसपेशियों की कमजोरियों पर भी कुछ प्रयोग कर रहा था। इन प्रयोगों से ही ‘एपिजेनेटिक्स’ की विधा निकल कर आई थी। मैं मूल कोशिकाओं के प्रतिरूप तैयार करता था। ये मूल कोशिका की एकदम ठीक नकल होते थे। इन प्रतिरूपी कोशिकाओं को मैं एक-एक कर के अलग करता और उन्हें अलग-अगल वातावरण में रखता, अलग-अलग बर्तनों में।

इस संस्कार में रखी कोशिकाओं हर 10-12 घंटे में विभाजित होती हैं, एक से दो हो जाती हैं। फिर अगले 10-12 घंटे में दो चार, और फिर चार से आठ। इसी तरह दो हफ्ते में हजारों कोशिकाएँ तैयार होतीं। फिर मैंने तीन भिन्न वातावरण में कोशिकाओं की तीन भिन्न बस्तियाँ तैयार कीं। इन ‘बस्तियों’ का रासायनिक वातावरण एकदम अलग-अलग था। ठीक कुछ वैसे ही जैसे हर व्यक्ति के शरीर का वातावरण अलग होता है और एक ही शरीर के भीतर भी कई तरह केे वातावरण होते हैं। अलग-अलग वातावरण में भी रखी गई इन कोशिकाओं का ‘डी.एन.ए.’ तो एकदम समान था। उनका पर्यावरण, उनका वातावरण भिन्न था। जल्दी ही इस प्रयोग के नतीजे सामने आने लगे।

एक बर्तन में उन्हीं कोशिकाओं ने हड्डी का रूप ले लिया था, एक में मांसपेशी का और तीसरे बर्तन में कोशिकाओं ने वसा या चर्बी का रूप ले लिया। यह प्रयोग इस सवाल का जवाब ढूँढने के लिये किया था कि कोशिकाओं की किस्मत कैसे तय होती है। सारी कोशिकाएँ एक ही मूल से निकली थीं। तो नए सिरे से यह सिद्ध हुआ कि कोशिकाओं की आनुवंशिकी नियति तय नहीं करती है। जवाब था, परिवेश। पर्यावरण। वातावरण। हमने यह भी पाया कि जिन कोशिकाओं को पोषण नहीं मिलता वे अकाल जैसे वातावरण में थोड़ी बीमार-सी पड़ जाती हैं। इन कोशिकाओं की चिकित्सा के लिये हमने उन्हें कोई दवा नहीं दी। हमने केवल उन्हें एक अच्छे वातावरण में रख दिया। सुन्दर वातावरण में लौटते ही ये कोशिकाएं स्वस्थ हो उठीं, फलने-फूलने लगीं।

इस प्रयोग ने यह सिद्ध किया कि कोशिकाएँ अपने परिवेश में ढलने के लिये अपना शरीर और पिंजर तो क्या, अपनी आनुवंशिकी तक बदल देती हैं। हर बर्तन में जो पृथक रासायनिक वातावरण उन कोशिकाओं का भाग्य बना रहा था, वह ‘जीन’ से ऊपर था। इन बर्तनों का पर्यावरण कुछ वैसा ही था जैसा कि हमारे शरीर के भिन्न-भिन्न भागों में होता है। इसीलिये इन बर्तनों में हुए प्रयोग हम सभी के शरीर के लिये उपयुक्त उदाहरण हैं। इसे समझने के लिये हमें अपने शरीर को लेकर चली आ रही कुछ ‘वैज्ञानिक’ भ्रान्तियों को तजना होगा।

हम अपने आप को चाहे एक व्यक्ति मानें, एक शरीर मानें, सच्चाई इससे एकदम परे है। हमारा शरीर कई चीजों को मिलकर बना है। एक औसत आकार के शरीर में लगभग 50 लाख करोड़, कोशिकाएँ होती हैं। 50 की संख्या पर तेरह शून्य लगेंगे-

50,0000000000000! हर कोशिका अपने आप में एक जीव है, एक जीवन्त संस्कार, संसार है। यानि हर मनुष्य का शरीर अनगिनत कोशिकाओं का मिला-जुला, भरा-पूरा समाज है। सामाजिकता और मिलजुल कर रहने का सबक अगर सीखना हो तो अपने शरीर से बहुत दूर देखने की जरूरत नहीं है। भीतर झाँकिए तो।

‘एपिजेनेटिक्स’ का सिद्धान्त यह प्रतिपादित करने का प्रयास है कि मनुष्य अपनी सोच से अपने खून के रसायन में परिवर्तन कर सकता है। मस्तिष्क के दोनों हिस्सों, चेतन व अवचेतना के प्रयोजनों से भी हम अपने ‘जेनेटिक’ को नई दिशा दे सकते हैं। मानव की अपनी दृढ़ता और स्वयंसिद्ध होने को स्थापित करते लेख की दूसरी एवं अन्तिम कड़ी ।

‘एपिजेनेटिक्स’ की विधा इसी सत्य पर बनी है कि हर शरीर के खून का रासायनिक स्वभाव इन कोशिकाओं का वातावरण बनाता है। यह स्वभाव कोशिकाओं के आनुवंशिक गुणों-अवगुणों को बदल भी सकता है। तो सवाल उठता है कि खून का रासायनिक स्वभाव कैसे तय होता है? जवाब है मस्तिष्क। दिमाग ही शरीर का असली रसायनशास्त्री है, शरीर का केमिस्ट है। हमारे भाव और पर्यावरण के बोध के आधार पर मस्तिष्क नसों में रसायन छोड़ता है। ये ही रसायन खून में घुल कर पूरे शरीर में घूमते हैं और कोशिकाओं और अंगों को संचालित करते हैं।

उदाहरण के लिए अगर हम आँख खोलते ही किसी प्रियजन को देखते हैं तो मस्तिष्क खून में कुछ खास तरह के रस, कुछ हॉर्मोन छोड़ता है। इनके नाम हैं ‘डोपामाइन’ और ‘ऑक्सिटोसिन’। कुछ ऐसे हॉर्मोन भी होते हैं जो शरीर के विकास को बढ़ाते हैं। इन रसायनों से कोशिकाओं का स्वास्थ्य अच्छा होता है। इसीलिए किसी प्रिय व्यक्ति से मिलने पर चेहरा चमकने, दमकने लगता है। हमें लगता है कि उनका आशीर्वाद मिल गया है।

इससे ठीक उलटा होता है जब हम किसी अप्रिय व्यक्ति या वस्तु को देखते हैं तब मस्तिष्क तनाव पैदा करने वाले, शरीर में सूजन पैदा करने वाले रसायन छोड़ने लगता है। यह दिमाग का प्रतिरक्षा तन्त्र है क्योंकि तनाव में शरीर वह सब कर सकता है जो प्रसन्न रूप में नहीं करता। यह आपातकाल से जूझने का एक तरीका है। लेकिन जब कोई व्यक्ति लगातार अप्रिय वातावरण में रहता है तो मस्तिष्क को लगातार आपातकाल का भास होता रहता है, जिसके जवाब में यह लगातार तनाव के रसायन छोड़ता रहता है। इससे व्यक्ति हमेशा तना हुआ रहता है। ऐसा वातावरण बने रहने से कोशिकाओं की स्वस्थ आदतें जाती रहती हैं। कोशिकाएँ मरने लगती हैं। यही कारण है कि ऐसा तनाव मृत्यु का कारण बन जाता है।

इससे पता यह चलता है कि किसी भी जीव के शरीर और मानस के सबसे ऊपर मस्तिष्क है। और इस मस्तिष्क का स्वभाव कैसे तय होता है? बुद्धि में होने वाले विचार से। इसका मतलब यह है कि किसी भी व्यक्ति के वंशानुगत स्वभाव को उसकी बुद्धि, उसका विवेक बदल सकता है। इसका मतलब यह है कि हमारे बर्ताव, हमारे कर्म पर हमारा वश है। चाहे दुनिया भर पर न भी हो, लेकिन हमारे अपने स्वभाव को तो हम बदल सकते हैं, अपनी बुद्धि में बारीक बदलाव लाकर। इसके लिए हमें मस्तिष्क की रूप-रेखा पर एक नजर दौड़ानी होगी।

हमारे मस्तिष्क के दो विभिन्न अंश हैंः चेतन और अवचेतन। दोनों ही अलग-अलग प्रयोजनों के लिए जिम्मेदार हैं और दोनों के सीखने के तरीके भी अलग-अलग हैं। मस्तिष्क का चेतन भाग हमें विशिष्ट बनाता है, वही हमारी विशिष्टता है। इसकी वजह से एक व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति से अलग होता है। हमारा कुछ अलग-सा स्वभाव, हमारी कुछ अनोखी सृजनात्मक शक्ति-ये सब मस्तिष्क के इसी हिस्से से संचालित होती हैं। तय होती है। हर व्यक्ति की चेतन रचनात्मकता ही उसकी मनोकामना, उसकी इच्छा और महत्वाकांक्षा तय करती है।

इसके विपरीत मस्तिष्क का अवचेतन हिस्सा एक ताकतवर प्रतिश्रुति यन्त्र जैसा ही है। यह अब तक के रिकॉर्ड किए हुए अनुभव दोहरता रहता है। इसमें रचनात्मकता नहीं होती । यह उन स्वचलित क्रियाओं और उस सहज स्वभाव को नियन्त्रित करता है, जो दुहरा-दुहरा कर, हमारी आदत का एक हिस्सा बन चुका है। यह जरूरी नहीं है कि अवचेतन दिमाग की आदतें और प्रतिक्रियाएँ हमारी मनोकामनाओं या हमारी पहचान पर आधारित हों। दिमाग का यह हिस्सा अपने सबक जन्म के थोड़े पहले, माँ के पेट में ही सीखना शुरू कर देता है। (जीवन के ‘चक्रव्यूह’ में उतरने से पहले ही ‘अभिमन्यु’ पाठ सीखने लगता है! -अनुवादक) यहाँ से लेकर सात साल की उमर तक वे सारे कर्म और आचरण, जो भावी जीवन के लिए मूल हैं, उन्हें हमारे दिमाग का यह अवचेतन हिस्सा सीख लेता है। फिर से दुहरा लें कि सात साल की उमर आते-आते अवचेेतन दिमाग बहुत कुछ सीख चुका होता है। कैसे? माता-पिता, भाई-बहन, परिवार-कुनबा और आस-पड़ोस के आचरण की नकल करके।

माँ के पेट से लेकर सात साल की उमर तक इतना कुछ सीखने के लिए मस्तिष्क का अवचेतन भाग जिस तरंग, जिस आयाम पर चलता है, वह सम्मोहन का आयाम है। सम्मोहन की वजह से शिशु दूसरों की नकल से कई बातें सीख लेता है। यह अकर्मक शिक्षा है जिसके लिए चेतना की जरूरत नहीं होती है। शिशु सम्मोहन के द्वारा हजारों आचरण के नियम सीख लेता है जो उसके रोजमर्रा के जीवन और उस विशेष समाज में रह सकने के लिए जरूरी होते हैं। हर समाज के नियम अलग होते हैं और इसलिए हर समाज के शिशु उन्हीं से अलग-अलग शिक्षा पाते हैं। मनोवैज्ञानिकों को पता चला है कि सात साल तक अवचेतन अवस्था में सम्मोहन से सीखी हुई बातों में लगभग 70 प्रतिशत नकारात्मक होती हैं। इनमें कई विध्वंसक भी होती हैं और हमारे व्यक्तिगत सामर्थ्य को कमजोर करती हैं।

अगर हमारे जीवन और शरीर पर मस्तिष्क का वश चलता है, तो फिर ऐसा क्यों है कि ज्यादातर लोग अपनी अपेक्षाओं के आधार पर अपना जीवन चलाने में असमर्थ होते हैं? इसका कारण यह भुलावा है कि हम अपने जीवन पर नियन्त्रण अपने दिमाग के चेतन भाग से रखते हैं। यह सच्चाई के ठीक विपरीत है। मनोविज्ञान और तंत्रिका-विज्ञान यह सिद्ध कर चुके हैं कि हमारे संज्ञान की केवल 1-5 प्रतिशत क्रियाएँ हमारे चेतन दिमाग से होती हैं। हमारे आचरण और कर्म में 95-99 प्रतिशत क्रियाएँ हमारे अवचेतन दिमाग से चलती हैं। उस हिस्से से जो सम्मोहन से बना है।

ऐसा क्यों है? जवाब चेतन मस्तिष्क के स्वभाव में मिलता है। यह हिस्सा सोच सकता है, विचार कर सकता है। जब चेतन हिस्सा विचार में मगन होता है तब उसे तात्कालिक परिस्थितियों का बोध नहीं रहता। जब चेतना किसी बात पर मनन कर रही है, तब शरीर और जीवन चलाने की कमान अवचेतन मस्तिष्क के पास चली जाती है। यह हमारे दिमाग का वह हिस्सा है जो दूसरों की नकल करने से बना है। सम्मोहन से बना है। चेतन अवस्था में विचार करने वाले दिमाग को उन आदतों का बोध नहीं होता जो दूसरों की नकल से बना है।

अब चूँकि हमारा आचरण ज्यादातर अवचेतन दिमाग से निर्धारित होता है और अवचेतन दिमाग का ज्यादातर व्यवहार नकारात्मक और दुर्बल बनाने वाला माना गया है, तो हम बेसुधी में अपना नुकसान करते हैं। ऐसा काम करते हैं जो खुद हमें बर्बाद करता है। अपने अवचेतन दिमाग के उत्पात से बेखबर हम अपने आपको परिस्थितियों के आगे मजबूर महसूस करते हैं। अपनी सारी कमियों या खोट का ठीकरा दूसरों के माथे फोड़ते हैं। कम उमर में विकसित अवचेतन दिमाग का हमारे जीवन पर असर बिलकुल हाल में समझ आया हो, ऐसा नहीं है। कोई 500 साल से ईसाईयों के जेसुइट पंथ में यह कहा जाता रहा है कि किसी भी बालक को हमें छह-सात साल की उमर तक के लिए दे दीजिए। फिर वह बड़ा होने के बाद जीवन भर चर्च का ही बना रहेगा। जेसुइट पादरियों के खोले स्कूल दुनिया भर में खूब चले हैं, भारत में भी। उन्हें पता था कि पहले सात साल में सिखाया गया ढर्रा किसी व्यक्ति की जीवन-राह तय कर सकता है। उस व्यक्ति की कामनाएँ और इच्छाएँ चाहे कुछ और भी हों तो भी वह इस दौर को भूल नहीं पाता। दुनिया पर प्रभाव रखने वाली कई ताकतों को इसका पता था, किसी न किसी रूप में।

क्या यह मान लें कि नकारात्मक बातों से भरे हमारे इस अवचेतन दिमाग से हमें आजादी मिल ही नहीं सकती? ऐसा नहीं है। इस तरह की आजादी की अनुभूति हर किसी को कभी न कभी जरूर होती है। इसका उदाहरण है प्रेम की मानसिक अवस्था। प्रेम में, स्नेह में अभिभूत व्यक्ति का स्वास्थ्य कुछ अलग चमकता हुआ दिखता है, उसमें ऊर्जा दिखती है। वैज्ञानिकों को हाल ही में पता चला है कि जो लोग रचनात्मक ढंग से सोचने की अवस्था में होते हैं, आनंद में रहते हैं, उनका चेतन दिमाग 90 प्रतिशत समय सजग रहता है। चेतन अवस्था में लिए निर्णय और हुए अनुभव किसी भी व्यक्ति की मनोकामनाओं और महत्वाकांक्षाओं के अनुरूप होते हैं। तब दिमाग अपने अवचेतन के प्रतिबंधक ढर्रों पर बार-बार वापिस नहीं लौटता है। लेकिन यह रचनात्मक अवस्था सदा नहीं रहती। जल्दी ही अवचेतन कमान पर लौट आता है।

दिमाग का अवचेतन भाग अगर नए भाव से, सकारात्मक आदतें चेतन हिस्से से सीख सके तो इस समस्या का समाधान निकल आए। ऐसा सम्भव है। इसके चार सिद्ध तरीके हैंः एक, सम्मोहन के द्वारा, जैसे कि सात साल की उमर के पहले अवचेतन दिमाग सबक सीखता है। दो, नई आदतें बार-बार दोहराने से, जो सात साल की उमर के बाद अवचेतन दिमाग को सीखने का एकमात्र सहज तरीका है। तीन, जब कोई व्यक्ति किसी घनघोर संकट से गुजरता है या कोई सदमा लगता है, तब अवचेतन नए सिरे से सबक सीखने लगता है, जैसे किसी दुर्घटना या किसी गम्भीर बीमारी का होना या किसी प्रियजन की मृत्यु हो जाना। चार, आजकल कुछ ऐसी चिकित्सा पद्धतियाँ आई हैं जो अवचेतन पर ही काम करती हैं। इनमें से कुछ भारत और चीन जैसे देशों की पुरानी, परम्परागत चिकित्सा पद्धतियों के सहारे खड़ी हुई हैं। इनमें से एक का नाम है ‘एनर्जी साएकॉलॉजी’

‘एपिजेनेटिक्स’ अब उपचार के ऐसे तरीकों पर बल देती है जो नियति को कोसने के बजाए समस्याओं के समाधान अपने आचरण, अपने मस्तिष्क में ढूँढ़ते हैं। यह आत्म-साक्षात्कार आत्मज्ञान के रास्ते की ओर इशारा करता है।

अमेरिकी वैज्ञानिक श्री ब्रूस लिप्टन के इस लेख का हिन्दी अनुवाद श्री सोपान जोशी ने किया है।

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