गंगा मन्त्रालय का कदम ताल

Submitted by Hindi on Tue, 05/05/2015 - 15:19
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य़थावत, 16-31 मार्च 2015
बेशक घोषणाएँ हो रही हैं। योजनाएँ भी बन रही हैं, लेकिन गंगा नदी की सफाई को लेकर अब तक कोई ठोस शुरूआत नहीं हुई है। कहीं ऐसा तो नहीं कि गंगा सफाई अभियान मन्त्रालयों की खींच-तान में फँस गया है। एक रपट

कोर्ट ने यहाँ तक जानना चाहा है कि क्या निर्मल गंगा का लक्ष्य इस कार्यकाल में पूरा किया जाएगा? यह सवाल इसलिए भी उठा है, क्योंकि 2014 के आम चुनाव में निर्मल गंगा एक मुद्दा था। 24 अप्रैल, 2014 को नरेन्द्र मोदी वाराणसी पर्चा भरने गए थे तो कहा था, ‘माँ गंगा ने मुझे बुलाया है।’ इस बात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है कि गंगा के मैदानी क्षेत्र से नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में राजग को लोकसभा की 123 सीटें मिलीं।

‘राष्ट्रीय नदी होने के बावजूद गंगा बद से बदतर स्थिति में है।’ यह बात ‘गंगा रीवर बेसिन मैनेजमेंट प्लान’ नाम की रिपोर्ट में कही गई है। मोदी सरकार की पहल पर सात आईआईटी संस्थानों की एक समिति ने इस रिपोर्ट को तैयार किया है। इसमें गंगा की सफाई और उसकी अविरलता को बनाए रखने के लिए पाँच-पाँच उपाय सुझाए गए हैं। यह सुझाव डूबते को तिनके का सहारा है। क्या मोदी सरकार इन सुझावों को अमल में लाएगी? यह बड़ा सवाल है।

वैसे गंगा सफाई को लेकर मोदी सरकार ने उम्मीद पैदा कर दी है, लेकिन जमीन पर कोई ठोस शुरूआत नहीं हुई है। इससे भ्रम पैदा हुआ है। पहले की सरकारें भी गंगा सफाई को लेकर योजनाएँ बनाती रही हैं, लेकिन लक्ष्य हासिल करने में विफल रही। अब आरोप लगते हैं कि गंगा सफाई को लेकर उनकी नीयत साफ नहीं थी। इसके कई उदाहरण हैं। यहाँ एक की चर्चा काफी है। बात 4 नवम्बर, 2008 की है। इसी तारीख को तत्कालीन प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह ने एक बैठक कर गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित करने का फैसला किया था। उसी वक्त राष्ट्रीय गंगा नदी घाटी प्राधिकरण (एनजीआरबीए) के गठन पर सहमति बनी। यह तय हुआ कि इसके अध्यक्ष प्रधानमन्त्री खुद होंगे। साथ ही इसके सदस्य उन राज्यों के मुख्यमन्त्री होंगे, जिन राज्यों से होकर गंगा गुजरती है। दिलचस्प बात है कि मनमोहन सिंह के कार्यकाल में गंगा नदी घाटी प्राधिकरण की एक भी बैठक नहीं हुई। इससे जनता में संदेश गया कि संप्रग सरकार गंगा को लेकर गम्भीर नहीं है। वह झाँसा दे रही है।

अब मोदी सरकार ने गंगा को आदर्श नदी का रूप देने का बीड़ा उठाया है। सूत्र बताते हैं कि इस सरकार में अब तक राष्ट्रीय गंगा नदी घाटी प्राधिकरण की चार बैठकें हो चुकी हैं। लेकिन इतने से बात बनने वाली नहीं है। यह प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी भी समझ रहे होंगे, इसलिए उन्होंने इसकी जिम्मेदारी उमा भारती को सौंप दी है। गंगा की सफाई के काम में कोई अवरोध पैदा न हो, इस बात को ध्यान में रखते हुए जल-संसाधन मन्त्रालय का पुनर्गठन भी किया गया है। अब इसका नाम ‘जल संसाधन, नदी विकास और गंगा पुनर्जीवन मन्त्रालय’ है। मोदी सरकार का यह मन्त्रालय सबसे अधिक चर्चा में है। यह बात जगजाहिर है कि उमा भारती गंगा पर अडिग आस्था और विश्वास व्यक्त करती रही हैं। इनकी छवि जुनूनी राजनीतिज्ञ की है। इससे भरोसा बना हुआ है।

लेकिन, सुप्रीम कोर्ट ने समय-समय पर जो सवाल उठाए हैं, उससे शंका पैदा होती है। कोर्ट ने यहाँ तक जानना चाहा है कि क्या निर्मल गंगा का लक्ष्य इस कार्यकाल में पूरा किया जाएगा? यह सवाल इसलिए भी उठा है, क्योंकि 2014 के आम चुनाव में निर्मल गंगा एक मुद्दा था। 24 अप्रैल, 2014 को नरेन्द्र मोदी वाराणसी पर्चा भरने गए थे तो कहा था, ‘माँ गंगा ने मुझे बुलाया है।’ इस बात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है कि गंगा के मैदानी क्षेत्र से नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में राजग को लोकसभा की 123 सीटें मिलीं। मोदी सरकार पर इसका भी नैतिक दबाव है। तभी गंगा संरक्षण कार्य के संदर्भ में मन्त्रालय ने 1 अगस्त, 2015 को ही राजपत्र अधिसूचना जारी की थी, जिसमें ‘अविरल धारा और निर्मल धारा’ का संकल्प लिया गया था।

अविरल धारा को लेकर सात आईआईटी संस्थानों की विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट महत्त्वपूर्ण है। इसे किसी भी कीमत पर दरकिनार नहीं किया जा सकता है। इसमें कहा गया है कि स्थानीय वातावरण के अनुकूल नदी तट पर जलाशयों का निर्माण होना चाहिए। नदी क्षेत्र के किसी भी निर्माण कार्य में स्थानीय लोगों की भागीदारी सुनिश्चित होनी चाहिए। इस बात का भी ख्याल रखा जाना चाहिए कि स्थानीय जैव प्राकृतिक सन्तुलन किसी भी कीमत पर न बिगड़े। यह देखने में आ रहा है कि गंगा नदी पर बड़ी-बड़ी परियोजनाएँ बन रही हैं, जिसका नदी के बहाव और प्राकृतिक सन्तुलन पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है। क्या सरकार इन योजनाओं के बाबत पुनर्विचार के लिए तैयार है? यदि हाँ तो अविरल धारा की उम्मीद की जा सकती है। पानी की बर्बादी को रोकने के लिए इसकी माँग कम करने का सुझाव दिया गया है। बेशक सरकार के लिए इस बाबत निर्णय करना मुश्किल कदम होगा, लेकिन ऐसे कठोर फैसले ही सरकार को लक्ष्य के नजदीक पहुँचाएंगे।

निर्मल गंगा के लिए सरकार ने एक महत्वाकांक्षी योजना का प्रस्ताव रखा है। इसके लिए नदी तट पर बसे सभी ग्राम पंचायतों को खुले में शौच करने से मुक्त करने के लिए शौचालय उपलब्ध कराने की योजना है। 27 नवम्बर, 2014 को जल संसाधन, नदी विकास और गंगा पुनर्जीवन राज्य मन्त्री प्रोफेसर सांवर लाल जाट ने एक प्रश्न के लिखित उत्तर में लोकसभा को यह जानकारी दी थी। आँकड़े बताते हैं कि गंगा तट पर 1,649 ग्राम पंचायतें हैं। गंगा तट पर खुले में शौच करने वालों से 2022 तक पूरी तरह मुक्त कराने का लक्ष्य रखा गया है। तब अपने जवाब में उन्होंने यह भी कहा था कि गंगा नदी के किनारे स्थित 118 शहरों की सीवेज प्रणाली को ठीक करने के लिए शहरी विकास मन्त्रालय के साथ मिलकर उचित रास्ते निकालने के प्रयास हो रहे हैं। मन्त्रालय की इन कोशिशों से मालूम होता है कि वह अपने लक्ष्य के प्रति गम्भीर है। विशेषज्ञ समिति ने जो रिपोर्ट दी है, उसमें गंगा की सफाई के लिए पाँच सुझाव दिए गए हैं। इनमें एक यह है कि नदी से साफ पानी लेने पर पानी की सफाई में आने वाले खर्च का डेढ़ गुणा मूल्य सम्बन्धित औद्योगिक इकाई को चुकाना होगा। क्या सरकार ऐसे फैसले करेगी? क्योंकि इससे उद्योग जगत के नाराज होने का डर रहेगा।

वहीं उमा भारती लगातार विभिन्न राज्यों का दौरा कर रही हैं। पिछले दिनों झारखंड की राजधानी में उन्होंने महत्त्वपूर्ण बैठक की। कुछेक महीने पहले कानपुर में गंगा तट का दौरा किया था। सूत्र बताते हैं कि वे जल्द ही पूरे गंगा तट का दौरा करने वाली हैं। सरकार का दावा है कि जून, 2014 से ही गंगा संरक्षण की चुनौती के मद्देनजर गंगा मन्त्रालय के साथ सम्बन्धित मन्त्रालय कार्य योजनाओं का मसौदा तैयार करने में जुटे हैं। इनमें पर्यावरण मन्त्रालय के साथ-साथ जहाजरानी, पर्यटन, शहरी विकास और पेयजल आपूर्ति जैसे मन्त्रालय शामिल हैं। इसी सन्दर्भ में सम्बन्धित मन्त्रालयों के सचिवों के एक समूह ने गंगा सफाई अभियान को लेकर 21 जुलाई, 2014 को अपनी पहली रिपोर्ट दी थी, जबकि अन्तिम रिपोर्ट 28 अगस्त, 2014 को पेश की गई। फिर भी सुप्रीम कोर्ट सन्तुष्ट नहीं है। वह कह चुका है कि सरकार जिस तरीके से काम कर रही है, उससे लगता है कि गंगा अगले 200 वर्ष में भी साफ नहीं होने वाली है। इस नाराजगी की वजह यही है कि जमीन पर कोई ठोस काम दिखाई नहीं दे रहा है। गंगा मन्त्रालय एक ही जगह कदम-ताल कर रहा है। ऐसा मालूम होता है कि वह उन्मुक्त नहीं है, मन्त्रालयों के आन्तरिक खींच-तान में फंसा है।

गंगा उत्तर भारत की जीवन पद्धति है। लेकिन, अत्याधुनिक विकास का जो ढाँचा खड़ा किया जा रहा है, उसके बीच निर्मल और अविरल गंगा की अवधारणा बेमानी मालूम पड़ती है। ऐसे में जाहिर है कि मोदी सरकार को कई कोण से सोचना होगा। गंगा मन्त्रालय की ओर से हो रही पहल तो उसका एक पक्ष हो सकता है।

गंगा संरक्षण की सरकारी पहल


1. राष्ट्रीय गंगा नदी घाटी प्राधिकरण (एनजीआरबीपी) का विस्तार किया गया है। जल संसाधन, नदी विकास और गंगा पुनर्जीवन मन्त्री इसके उपाध्यक्ष होंगे। साथ ही इस कार्य से सम्बन्धित अन्य मन्त्रियों को भी इसमें शामिल किया गया है।
2. केन्द्रीय बजट 2014-15 में गंगा कन्जर्वेशन मिशन के तरह ‘नमामि गंगे’ की कल्पना की गई।
3. लक्ष्य को प्राप्त करने के उद्देश्य से 7 जुलाई, 2014 को ‘गंगा मंथन’ आयोजित किया गया। यह एक राष्ट्रीय वार्ता थी, जिसमें सभी मान्यताओं के 500 से अधिक प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। इसके साथ ही ‘राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन’ ने 12 सितम्बर, 2014 को एक वेबसाइट शुरू की है। इसका उद्देश्य लोगों के विचार और सुझावों को प्राप्त करना है।
4. एक नए कार्यक्रम को शुरू करने के मद्देनजर विचार-विमर्श के लिए 20 नवम्बर, 2014 को तीन दिवसीय ‘जल मंथन’ सम्मेलन आयोजित किया गया था। सम्मेलन के अन्तिम दिन केन्द्रीय जल संसाधन मन्त्री उमा भारती ने कहा कि केन्द्र सरकार 2015 में ‘जल ग्राम योजना’ शुरू करेगी।
5. खनन पर मौजूदा दिशा-निर्देशों को संशोधित करने के उद्देश्य से पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मन्त्रालय ने एक समिति गठित की है।
6. वनस्पति के संरक्षण के लिए फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट से एक योजना तैयार करने को कहा गया है।
7. राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड के सहयोग से गंगा के ऊपरी भागों में मौजूद औषधीय पौधों के संरक्षण के लिए एक रणनीति को अन्तिम रूप देने की तैयारी हो रही है।
8. गंगा नदी में प्रदूषण कम करने के लिए उपयुक्त प्रौद्योगिकियों की सिफारिश करने के लिए तीन सदस्यीय एक तकनीकी समिति का गठन किया गया है, जिनमें राष्ट्रीय पर्यावरण इंजीनियरिंग रिसर्च संस्थान (एनईईआरआई) के निदेशक, केन्द्रीय प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के सचिव और आईआईटी कानपुर के प्रोफेसर विनोद तारे शामिल हैं।
9. राष्ट्रीय पर्यावरण इंजीनियरिंग अनुसंधान संस्थान के माध्यम से गंगा जल की गुणवत्ता की निगरानी और तलछट के विशेष गुण की पहचान के लिए एक परियोजना शुरू की गई है।
10. गंगा नदी को प्रदूषण से बचाने के लिए गंगा वाहिनी रक्षकों की तैनाती की जाएँगी। यह रेडक्रॉस की तर्ज पर काम करेगी। गंगा वाहिनी रक्षकों को प्रशिक्षित करने के लिए सेना की सेवाएं तीन साल के लिए लेने पर विचार-विमर्श चल रहा है।
11. गंगा तट पर पौध-रोपण कार्यक्रम चलाने की भी योजना है।
12. इलाहाबाद-हल्दिया जलमार्ग विकसित करने और उसमें जलयान चलाने की योजना है। इन दोनों शहरों के बीच 1,620 किलोमीटर लम्बे जल मार्ग पर राष्ट्रीय जल मार्ग-1 नाम से गंगा परियोजना शुरू की जाएगी।
13. सरकार ने यह जानकारी दी है कि गंगा एक्सन प्लान एक, दो और एनजीआरबीए में जून 2014 तक कुल 1871.61 करोड़ रुपए खर्च हुए हैं।

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