कैसे चलेगी नाव, इस ठांव बंधु

Submitted by Hindi on Fri, 05/08/2015 - 16:28
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यथावत, 16-31 मार्च 2015
.बीसवीं सदी से पहले जल परिवहन के लिए आवश्यक बल की प्राप्ति वायु के प्रवाह से प्राप्त की जाती थी। इसकी दिशा को मस्तूल और पाल से नियन्त्रित किया जाता था। अब इसके लिए इंजनों का उपयोग होता है। बिहार में 19वीं सदी में सोन नहर का निर्माण हुआ था। तब इस क्षेत्र के किसान अपने उत्पाद को बाजार तक लाने के लिए इनका उपयोग करते थे। वे रस्सी से खींचकर नौका का संचालन किया करते थे। धीरे-धीरे परिवहन के अन्य माध्यमों के उपलब्ध होते जाने पर ये नहर परिवहन के माध्यम नहीं रह गए।

बेशक जल परिवहन में ऊर्जा की खपत कम होती है। यह पर्यावरण के अनुकूल माध्यम है, लेकिन सुलभ और सस्ता जल परिवहन का माध्यम धीरे-धीरे दम तोड़ चुका है। अब सवाल है कि जल परिवहन के प्रति यह बेरुखी क्यों? क्यों हुआ ऐसा? इसे जिन्दा रखने के नाम पर जो कुछ किया गया, क्या यह पर्याप्त है?

केन्द्र सरकार ने 1986 में ‘अंतर्देशीय जलपथ प्राधिकरण’ का गठन कर जल परिवहन को पुनर्जीवन देने की कोशिश की थी। प्राधिकरण को जलमार्ग के रूप में नदियों और झीलों का विकास करने की जिम्मेदारी दी गई। इसे भारत सरकार के जहाजरानी मन्त्रालय के मातहत रखा गया। नदियों में जलयान चालन के लिए पानी की आवश्यक गहराई को सुनिश्चित करने का खास काम भी प्राधिकरण को सौंपा गया। हल्दिया से नवद्वीप समुद्री मार्ग के साथ ही हल्दिया से इलाहाबाद की 1620 किलोमीटर की दूरी को गंगा नदी का राष्ट्रीय जलमार्ग घोषित किया गया। हल्दिया से नवद्वीप के बीच चार मीटर गहराई वाले जहाज भी आसानी से आवा-जाही कर सकते हैं। वहीं नवद्वीप से फरक्का तक के 560 किलोमीटर मार्ग में भी कोई प्रमुख बाधा नहीं है। इस मार्ग में पानी की उपलब्धता नियन्त्रित है, जिसका मुख्य माध्यम फरक्का बैराज का फीडर नहर तथा भागीरथी का जंगीपुर बैराज है। इस भाग में दो मीटर गहरा पानी पूरे साल उपलब्ध रहता है।

असल समस्या फरक्का के ऊपरी भाग में है। इस हिस्से में गंगा बिखरी हुई है। ज्यादातर जगहों पर नदी दो-तीन भागों में बटी हुई है। इस भाग में नदी का मुख्य प्रवाह भी स्थिर नहीं रहता। इसमें इधर-उधर स्थानान्तरण होता रहता है। इसका फल है कि नदियों में जलयान चालन के लिए पानी की आवश्यक गहराई नहीं मिल पाती। कई बार जलयान बीच रास्ते में ही फंस जाते हैं। आरम्भ में ऐसा प्रतीत हुआ कि यह परिवहन माध्यम जरूर आकार ग्रहण करेगा।

2008-09 में 672 टन माल की ढुलाई हुई। 2009-10 में बढ़कर 3,308 टन हो गई। लेकिन उसके बाद इसकी निरन्तरता कायम नहीं रह पाई। इस रुकावट की तीन वजह सामने आई है। पहली वजह है कि निरन्तरता का न हो पाना। अनिश्चितता की दशा में इस इलाके में नौपरिवहन एक स्थाई माध्यम का रूप नहीं ग्रहण कर सकता। दूसरी वजह है- इस नदी मार्ग के कुछ हिस्सों में मोटरकृत वाहनों के परिचालन पर प्रतिबंध। कहलगाँव से सुल्तानगंज के बीच का 50 किलोमीटर भाग डाल्फिन के लिए और बनारस के पास का सात किलोमीटर का भाग ‘रामगढ़ का अभ्यारण्य’ कछुआ के लिए संरक्षित है। योजना के निर्माण के वक्त इस तथ्य की अनदेखी की गई। इन संरक्षित क्षेत्रों में मोटरकृत वाहनों का परिचालन प्रतिबंधित है। इस प्रतिबंध की अवलेहना हमेशा सम्भव नहीं।

रुकावट का तीसरा बड़ा कारण है, जहाजरानी मन्त्रालय, राज्य व केन्द्र सरकार के जल संसाधन विभागों के बीच समन्वय का अभाव। अन्तर्देशीय जलपथ प्राधिकरण जहाजरानी मन्त्रालय के अधीन है। वहीं नदियों का प्रबन्धन राज्य एवं केन्द्र सरकार के जल संसाधन विभागों के अधीन है। इन विभागों के बीच समन्वय का अभाव है। वे एक-दूसरे के कार्यों की जानकारी भी नहीं रखते। फरक्का के ऊपरी हिस्से में अन्तर्देशीय जलपथ प्राधिकरण के लिए गहरे जल मार्ग की खोज तो की जाती है, मगर इस भाग में नदी की धारा में बदलाव के चलते दोनों तटों पर कटाव की भयावह समस्या है। जल संसाधन विभाग कटावरोधी कार्य कर नदी किनारों पर गादीकरण का प्रयास करता है। वहीं अन्तर्देशीय जलपथ प्राधिकरण जल परिवहन के लिए उपयुक्त गहराई के निमित्त उसी भाग में ड्रेजिंग करना चाहता है। दोनों प्रभागों के बीच भीषण संवादहीनता है।

2009-10 में भागलपुर के विक्रमशिला सेतु के नीचे नवगछिया के इस्माइलपुर बिंदटोली को बचाने के लिए करोड़ों रुपए की लागत से बनाए गए ‘स्पर अंतर्देशीय जलपथ प्राधिकरण’ के ड्रेजर और जहाज के गुजरने के बाद ध्वस्त हो गए। एक ही जगह एक विभाग गादीकरण करना चाहता है, तो दूसरा गाद ड्रेजिंग कर उसे हटाना चाहता है। इस विचित्र रस्साकसी ने जल परिवहण को बाधित किया।

दिल्ली में नई सरकार के आने के बाद 2014 में एक नया विचार आगे आया है। इसमें गंगा नदी पर सौ-दो-सौ किलोमीटर पर बांध बना दिए जाने का प्रस्ताव है। समझ है कि इससे जल परिवहन हेतु जहाजों के आने-जाने लायक जल की आवश्यक गहराई उपलब्ध होगी। इसपर अभी विचार-विमर्श चल ही रहा है। अब तक इस योजना की कोई रूप-रेखा सामने नहीं आई है। यह योजना चाहे जैसी बने, उसके सामने अनेक यक्ष प्रश्न मौजूद हैं। इनका उत्तर ढूँढ़े बगैर इस दिशा में आगे बढ़ना उपयुक्त नहीं होगा। वे सवाल हैं- कहलगाँव और रामगढ़ के बीच के सुरक्षित क्षेत्रों का क्या होगा? इन बांधों के अप स्ट्रीम एवं डाउन स्ट्रीम में होने वाले कटाव के अवश्य सम्भावी खतरे से कैसे बचा जाएगा? इन बांधों के बनाने से पैदा होने वाले एफलक्स का तथा उससे उत्पन्न होने वाले बाढ़ के खतरे से कैसे निपटा जाएगा?

नदी, व्यवहार के अध्ययन बिना कोई कदम उठाना उचित नहीं है। कुछ भी करने के पहले कटाव, गादीकरण के परिणामस्वरूप नदी तल में उठान तथा गंगा की जैव विविधता और पारिस्थितिकी तन्त्र पर इसके प्रभाव-जैसी समस्याओं पर विचार जरूरी है। यह देखा गया है कि नदियों के प्राकृतिक प्रवाह में कोई भी बाधा आने पर उस बिन्दु के आगे-पीछे भारी कटाव होता है। नदी धारा बदलकर उस बाधा के बगल से निकलना चाहती है। फरक्का में बांध बनाए जाने के बाद से इसके दोनों ओर भारी कटाव का सामना करना पड़ा है। अब तक इस समस्या का स्थायी निदान नहीं ढूँढ़ा जा सका है। अस्थाई निदान के सहारे कब तक काम चलाया जाएगा। यह सोचने की बात है। विक्रमशिला, पटना गाँधी सेतु और बक्सर के गंगा सेतु के दोनों ओर यही स्थिति है। इन स्थानों में हर साल अस्थायी निदान पर करोड़ों रुपए का खर्च आता है। ऐसी कोई भी योजना बनाने के पहले इन खतरों पर विचार जरूरी है।

जल परिवहन में ऊर्जा की खपत कम होती है। यह पर्यावरण के अनुकूल माध्यम है, लेकिन सुलभ और सस्ता जल परिवहन का माध्यम धीरे-धीरे दम तोड़ चुका है। अब सवाल है कि जल परिवहन के प्रति यह बेरुखी क्यों? क्यों हुआ ऐसा? इसे जिन्दा रखने के नाम पर जो कुछ किया गया, क्या यह पर्याप्त है?कोई भी योजना बनाने के पहले नदी के दोनों तटों पर होने वाले सम्भावित कटाव को रोकने की जिम्मेवारी तय की जानी चाहिए। साथ ही इस पर आने वाले खर्च को इसी योजना का हिस्सा माना जाना चाहिए। पर्यावरण तथा वन मन्त्रालय के संरक्षित क्षेत्रों को बनाए रखने की समस्या को भी इसी योजना का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। योजना के कार्यान्वयन के पहले अन्तरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप पर्यावरणीय प्रभाव का मूल्यांकन भी इसी योजना के तहत किया जाना चाहिए। बांध बनाने से होने वाले गादीकरण और इसके प्रभाव में नदी के तल में उठान का अध्ययन किया जाना आवश्यक है।

ये अनुत्तरित प्रश्न इस योजना के सामने चुनौतियों के रूप में खड़े हैं। इन जटिलताओं को देखते हुए इस पर भी विचार किया जाना चाहिए कि विकास केवल महती योजनाओं से ही नहीं होता। छोटी-छोटी योजनाओं से भी जल परिवहन के लक्ष्य को पाया जा सकता है। निष्क्रिय पड़ चुके नहर भी जल परिवहन के ध्येय को पुनर्जीवित कर सकते हैं। सुंदरता केवल बड़े आकार में नहीं होती। छोटे-छोटे प्रयास भी कुरूप नहीं होते।

विद्यापति की गंगा (सत्येन्द्र कुमार झा)
महाकवि विद्यापति की गंगा के प्रति आस्था उनके साहित्य से जाहिर होती है। वे गंगा स्नान को सभी जप-तप, साधना और ध्यान से अधिक महत्त्व देते थे। वे मानते थे कि गंगा के प्रवाह में लगाई गई एक डुबकी कृतार्थ कर जाती है। विद्यापति ने ‘गंगा वाक्यावली’ नामक ग्रन्थ की रचना संस्कृत में की थी। इसमें गंगा के महात्म्य, इसकी अर्चना पद्धति और गंगा के प्रति उनका अनुरागात्मक लगाव सहजता से परिलक्षित होता है।

दरअसल, मैथिली साहित्य और संस्कृति, दोनों के लिए ही गंगा का विशेष महत्त्व रहा है। गंगा मिथिला की दक्षिणी सीमा को परिभाषित करती है। गंगाजल का अनवरत पान, गंगा स्नान और गंगा तट पर देहावसान की लिप्सा सदियों से मिथिला के जनमानस को आकर्षित करती रही है। ऐसा लगता है कि विद्यापति का गंगा प्रेम, इसी परम्परा का प्रबल पोषक था। विद्यापति का गंगा प्रेम उनके इस पद में अभिव्यक्त होता है।-

बड़ सुख सार पाओल तुअ तीरे।
छोड़इत निकट नयन बह नीरे।।
कर जोड़ि विनवउं बिमल तरंगे।
पुनि दरसन होए पुनमति गंगे ।।
एक अपराध छेमब मोर जानी।
परसल माए पाए तुअ पानी ।।
कि करब जप-तप जोग धेआने।
जनम कृतारथ एकहि स्राने ।।
मनईं विद्यापति समदओं तोही।
अन्तकाल जनु बिसारह मोही ।।


विद्यापति के पदों की शैलीगत सहजता, भावपरक प्रांजलता और प्रवाह गंगा की धारा जैसी ही है। जीवन के अन्तिम दिनों में उन्होंने निर्णय लिया कि वे अपना देह-त्याग गंगा के तट पर करेंगे। ऐसा कहा जाता है कि समस्तीपुर जिला के विद्यापति नगर के निकट गंगा तट पर अपना शरीर गंगा में समाविष्ट कर दिया।

लेखक बिहार सरकार के बाढ़ नियन्त्रण विभाग के निदेशक रह चुके हैं।

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