सवाल अविरल गंगा का

Submitted by Hindi on Sun, 05/10/2015 - 12:28
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यथावत, 16-31 मार्च 2015

भारतीय राजनेता अंग्रेजों से भी चालाक निकले। जो काम अंग्रेज नहीं कर पाए, वह किया स्वतन्त्र भारत में गंगापुत्रों ने। जिस गंगा के कारण देश की पहचान है, स्वतन्त्रता मिलने के बाद उसके पुत्रों ने ही गंगा को परतन्त्र कर दिया। अब गंगा अपने वेग से नहीं बह सकती। टिहरी बाँध के फाटक उसकी गति तय करते हैं।

गंगा के प्रदूषित होने के बहुत से कारण होंगे। बदलती प्रकृति, समाज की असंवेदनशीलता, बढ़ती औद्योगिकी इकाईयाँ, सिंचाई के लिए निकली नहर या कुछ और भी। पर बड़ा कारण टिहरी में बना बाँध है। इस बाँध के बन जाने के बाद वहाँ से आगे भागीरथी सिर्फ नाम की है। भागीरथी का जो विशेष जल गंगा सागर तक उसे पवित्र बनाए रखता था, उसे सड़ने नहीं देता था, वह टिहरी बाँध के पीछे दम तोड़ रहा है। एक सुरंग के जरिये उसका स्वतन्त्र प्रवाह मात्र एक छलावा है। देश और समाज से यह छल किया है राजनेताओं ने। राजनीति की गन्दी चालों के चलते ही गंगा अधिक मैली हुई है। इसमें कोई भी दल अछूता नहीं है। गंगा का स्वतन्त्र प्रवाह रोकने में सबके हाथ मैले हैं। एक प्रकार से वे सब गंगा के अपराधी हैं। खासकर वे अधिक हैं जिन्होंने गंगाजल हाथ में लेकर उसकी रक्षा का वचन उठाया था। पर उनकी आँखों के सामने, उनके ही राज में गंगा बँध गई। वे कुछ नहीं कर पाए। जो सन्त-महन्त तब आमरण अनशन की बात कहते थे, वे अपने मठों में आराम फरमा रहे हैं।

ऐसे में बरबस याद आते हैं महामना पं.मदन मोहन मालवीय। मोदी सरकार ने हाल ही में माना कि वे भारत रत्न हैं। वास्तव में वे महामना ही थे जिनके प्रयासों के चलते अंग्रेज भी गंगा को पूरी तरह कभी नहीं बाँध पाए। तब के राजनेताओं और सन्तों-महन्तों ने गंगा को दिया अपना वचन निभाया। प्रबल जन आन्दोलन के चलते ब्रिटिश सरकार को समझौता करना पड़ा कि वह कभी गंगा की धारा को अवरुद्ध नहीं करेगी। इतिहास के पन्ने पलटिये। 1914 तक जाइये। तब अंग्रेज सरकार ने गंगा की प्राकृतिक धारा को पूरी तरह बाँधने का निश्चय कर लिया था। 1909 में हरिद्वार में एक नए स्थाई ‘भीमगोड़ा’ बाँध का प्रस्ताव आया था।

सरकार की स्वीकृति मिलने के बाद 1912 में कार्य प्रारम्भ हुआ। अंग्रेज सरकार ने गंगा के पूरे प्रवाह को रोककर उसे नहर में छोड़ने की योजना बना डाली थी। हिन्दू समाज को जब इस योजना के बारे में पता चला तो वे उबल पड़े। मुजफ्फरनगर में अ.भा.हिन्दू सभा के नेता लाला सुखवीर सिंह ने गंगा को रोके जाने के विरुद्ध आन्दोलन प्रारम्भ कर दिया। 5 जून, 1914 को हरिद्वार में एक सभा के बाद सन्तों- महात्माओं व जनता की ओर से एक मांग-पत्र ब्रिटिश सरकार को सौंपा गया, जिसमें सरकार को चेतावनी दी गई कि वह गंगा के अविरल प्रवाह में अवरोध पैदा न करे। सरकार ने यह माँग अनसुनी कर दी। आन्दोलन बढ़ने पर ब्रिटिश सरकार ने हिन्दू समुदाय के प्रतिनिधियों, अनेक राजे-महाराजाओं को आश्वस्त किया कि गंगा का अविरल प्रवाह जारी रहेगा। लेकिन सरकार बाद में इस आश्वासन का क्रियान्वयन करने से पलट गई।

सन 1916 में जैसे ही काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना के कार्य से महामना मालवीय मुक्त हुए, उन्होंने गंगा आन्दोलन की कमान अपने हाथों में ले ली। इसके पूर्व उनका सम्पर्क आन्दोलनकारियों से बना हुआ था। महामना के प्रयासों से देश के अनेक राजे-महाराजे एक मंच पर आए और उन्होंने जनता के साथ मिलकर अंग्रेज सरकार के रवैये पर तीखा आक्रोश प्रकट किया। 4 सितम्बर, 1916 को हरिद्वार में एक विराट जनसभा हुई, जिसमें महामना ने सरकार को चेतावनी दी कि वह हिन्दू समाज से टकराव न ले। नवम्बर 1916 में इसी सन्दर्भ में दिल्ली में एक सम्मेलन आहूत किया गया जिसमें देश के अनेक राजे-महाराजे भी उपस्थित हुए। अ.भा. हिन्दू सभा की ओर से ले.गवर्नर सर जेम्स मेस्टन को ज्ञापन सौंपा गया।

स्थिति की गम्भीरता का अनुमान करके लेफ्टिनेंट गवर्नर सर जेम्स मेस्टन ने हरिद्वार में 18 एवं 19 दिसम्बर, 1916 को एक सम्मेलन बुलाया, जिसमें अखिल भारतीय हिन्दू सभा, श्री गंगा सभा (हरिद्वार) तथा अन्य हिन्दू प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इस सम्मेलन में महाराजा कासिम बाजार ने कहा-‘गंगा सभी हिन्दुओं की माँ है, हरिद्वार से गंगा-सागर तक इसका जल हिन्दू समाज द्वारा विभिन्न कार्यों में प्रयुक्त होता है। हम गंगा का शुद्ध व स्वतन्त्र प्रवाह गंगा सागर तक चाहते हैं।’ बैठक में उपस्थित सभी राजा-महाराजाओं एवं अन्य महानुभावों ने गंगा पर किसी भी तरह के बाँध पर आपत्ति नहीं जताई।

16 दिसम्बर की बैठक में वार्ता पूरी न हो पाने के कारण 19 दिसम्बर, 1916 को पुन: बैठक आयोजित की गई। इस बैठक में महाराजा दरभंगा ने हिन्दू प्रतिनिधियों की ओर से तैयार किए गए प्रस्ताव को रखा। प्रस्ताव में कहा गया कि, ‘हरिद्वार में निर्माणाधीन बाँध में गंगा का अविरल प्रवाह सुनिश्चित करने के लिए स्वतन्त्र धारा पर कोई नियन्त्रक नहीं बनाया जाना चाहिए। स्वतन्त्र धारा पर्याप्त चौड़ी होनी चाहिए ताकि शास्त्रों के अनुसार, पर्याप्त जल नीचे तक पहुँचता रहे। इसके लिए मासिक बहाव की न्यूनतम मात्रा निर्धारित की जानी चाहिए।’ प्रस्ताव के उपरान्त भारत सरकार के अभियन्ताओं को इस पर विचार करने के लिए कुछ समय दिया गया। पुन: बैठक प्रारम्भ होने पर लेफ्टिनेंट गवर्नर सर मेस्टन की मौजूदगी में संयुक्त प्रान्त के मुख्य अभियन्ता बार्लो ने अंग्रेज सरकार का प्रस्ताव पढ़ा।

जिसमें स्पष्ट कहा गया कि, ‘गंगा की धारा के अनवरत प्रवाह में कोई भी हस्तक्षेप या बाधा नहीं डाली जाएगी। नई आपूर्ति धारा के मुहाने पर दरवाजा (गेट) नहीं लगाया जाएगा। बाँध में एक स्वतन्त्र प्रवाह सतह तक खुला रखा जाएगा।’ लेफ्टिनेंट गवर्नर मेस्टन ने प्रस्ताव में कही गई बातों को दोहराते हुए यह भी कहा था कि भविष्य में इस समझौते के अतिरिक्त कोई भी कदम बिना हिन्दू समुदाय के पूर्व परामर्श के नहीं उठाया जाएगा।

बैठक में उपस्थित सभी हिन्दू प्रतिनिधियों और सरकार की ओर से मुख्य सचिव आर.बर्न ने समझौते पर हस्ताक्षर किए। इसके बाद 26 सितम्बर, 1917 को ब्रिटिश सरकार की ओर से संयुक्त प्रान्त के मुख्य सचिव आर. बर्न ने उपरोक्त समझौते को शासनादेश का रूप देते हुए इसकी एक प्रति अखिल भारतीय हिन्दू सभा के सचिव लाला सुखबीर सिंह को भेज दी। समझौते से जुड़े अन्य प्रतिनिधियों को भी इसकी जानकारी दे दी गई। यह शासनादेश आज भी उ.प्र. सरकार के सिंचाई विभाग की जानकारी में है, सुरक्षित है और प्रभावी भी है।

तब हिन्दू समाज, सन्तों-महन्तों और राजनेताओं के दबाव के चलते अंग्रेज वचन निभाने को मजबूर हुए। इस मामले में भारतीय राजनेता अंग्रेजों से भी चालाक निकले। जो काम अंग्रेज नहीं कर पाए, वही किया स्वतन्त्र भारत में गंगापुत्रों ने। जिस गंगा के कारण देश की पहचान है, उसके पुत्रों ने ही स्वतन्त्रता मिलने के बाद गंगा को परतन्त्र कर दिया। अब गंगा अपने वेग से नहीं बह सकती। टिहरी बाँध के फाटक उसकी गति तय करते हैं। अपने जीवन के अन्तिम कालखण्ड में महामना मालवीय को सम्भवत: यह भान हो गया था कि गंगा पर आया संकट पूरी तरह टला नहीं है। आगे पुन: इसे अवरुद्ध करने का प्रयास होगा। तब उन्होंने भारत के पूर्व केन्द्रीय मन्त्री डा. कैलाशनाथ काटजू के सुपुत्र पं.शिवनाथ काटजू को बुलाकर कहा था, ‘हो सकता है मेरे बाद यह समस्या फिर उठ खड़ी हो, सरकार गंगा के अविरल प्रवाह को पुन: रोक दे, तब के लिए मैं तुमसे कहे जाता हूँ, जैसे भी हो, इसे होने मत देना।

गंगा की रक्षा के लिए जब तक मेरी सामर्थ्य थी, मैंने संघर्ष किया, अब यह भार तुम्हारे हवाले करता हूँ।’
पं. शिवनाथ काटजू, जो बाद में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश बने, ने यह बात मालवीय जी के पौत्र और सहयोगी न्यायमूर्ति गिरधर मालवीय को बताई थी। अपने संस्मरणों में उन्होंने इसे लिखा भी। पर मालवीय जी के पौत्र भी बेबसी से देखते रहे। काशी के राजेंद्र घाट पर धरना दिए रहे। पर गंगा बँध गई।

बेबसी तो विश्व हिन्दू परिषद के सबसे बड़े नेता अशोक सिंहल ने भी जताई। उन्होंने माना कि भाजपा की सरकार ने ही उनके साथ, हिन्दू समाज के साथ धोखा किया है। अशोक सिंहल गंगा की रक्षा के लिए निरन्तर सक्रिय रहे। 1991 में जब मन्दिर आन्दोलन उफान पर था तब भी वे निर्माणाधीन बाँध रुकवाने गए थे। उस पर काम की गति मन्द पड़ गयी थी। जब भाजपा के नेतृत्व वाले राजग की सरकार आई तो उन्हें उम्मीद बँधी। पर हुआ उनकी उम्मीद के विपरीत काम। बाँध की ऊँचाई भी बढ़ गयी और उसके काम में भी तेजी आयी। एक बार फिर वे दिसम्बर, 2001 में टिहरी के लिए कूच कर गए, आमरण अनशन की चेतावनी देकर। तब केन्द्र में अटल सरकार थी और राज्य के भाजपाई मुख्यमन्त्री थे भगत सिंह कोश्यारी। तब अशोक सिंहल को टिहरी तक पहुँचने से रोकने के लिए सब कुचक्र रचे गए।

पर वे पहुँच ही गए तो उन्हें मनाने के लिए वही सरकारी चाल चली गई-जाँच समिति का गठन। तबके मानव संसाधन विकास मन्त्री डॉ. मुरली मनोहर जोशी की अध्यक्षता में एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया गया। इसकी एक बैठक में खुद सिंहल भी गए। एक सुझाव पर सहमति बनी कि टिहरी बाँध की झील की लम्बाई, जो लगभग 45 कि.मी. होगी, उससे पहले एक सुरंग बनाकर भागीरथी का जल बाँध के आगे सीधे गंगा में डाला जाए। इस पर अनुमानित खर्च 600 करोड़ रु. आँका गया। गंगा के प्रति जन भावना के सामने यह कीमत कुछ भी नहीं थी। पर बाँध का निर्माण करने वाले जे.पी.समूह, बाँध की तकनीकी समिति, विशेषज्ञ समिति और सरकारी अधिकारियों ने कुछ ऐसा खेल रचा कि समिति ने इस सुझाव पर आगे काम ही नहीं किया।

अशोक सिंहल ने तब कहा था, ‘हम लोगों ने बार-बार कहा कि गंगा की अविरल धारा की व्यवस्था करिए। टिहरी बाँध उस समय निर्माणाधीन था, ऊँचाई भी कम थी। हमने यह भी कहा कि इसे 260.5 मीटर तक मत ले जाइए, जहाँ है, वहीं छोड़िए। करोड़ों रुपया लगा तो लगा, गंगा का बलिदान मत कीजिए। हमने अनेक प्रस्ताव रखे, उनमें एक प्रस्ताव यह भी था कि अविरल धारा के लिए एक अलग सुरंग का निर्माण किया जाए। लेकिन समिति के अन्तिम निष्कर्ष से पहले ही जलाशय भरा जाने लगा। राजग सरकार ने मुझे इस मुद्दे पर धोखा दिया, सन्तों को धोखा दिया। हमारे साथ ऐसा व्यवहार किया गया, मानो हम शत्रु हों।’

सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, शत्रु तो सब गंगा के थे। समय-समय पर पर्यावरण और गंगा की रक्षा का दंभ भरने वालों का सुर भी बदलता रहा है। गंगा एक्शन प्लान बनाने वाली कांग्रेस ने ही गंगा को बाँधने की योजना बनाई थी। 1980 में उस कांग्रेस ने भूम्बला समिति की रिपोर्ट के बाद परियोजना रद्द भी कर दी। फिर राजीव के राज में काम चल निकला। उस समय भाजपा निर्मल गंगा-अविरल गंगा का राग अलाप रही थी। टिहरी बाँध को देश और गंगा के लिए खतरा बता रही थी। लेकिन जब उत्तराखंड में उसकी सरकार बनी तो कहने लगे कि भावना बड़ी बात है, पर इसके लिए देश का विकास बाधित नहीं किया जा सकता। तरह-तरह के तर्क दिए गए।

जब टिहरी बाँध की अन्तिम टनल क्रमांक 2 को बंद किया गया तब केन्द्र में भी कांग्रेस सरकार थी और राज्य में भी। तब भाजपा नेताओं द्वारा ही कहा गया कि यह कहना भी ठीक नहीं है कि भागीरथी का प्रवाह पूरी तरह रोक दिया गया है। जल प्रवाह बह रहा है, परन्तु कुछ दिन कम रहेगा और झील भरने के बाद पुन: भागीरथी का प्रवाह शुरू हो जाएगा। यह भी तर्क दिया गया कि हमारे शास्त्रों में लिखा गया है कि गंगोत्री, प्रयाग, इलाहाबाद और गंगा सागर में भी गंगा का जल परम पवित्र है, परन्तु तब तक गंगा में देश भर की अनेक नदियों का जल भी मिल जाता है। यह भावना की बात है कि गंगाजल की तो एक बून्द भी समस्त पापों का शमन करने वाली होती है। साफ था कि जो लोग भागीरथी की स्वतन्त्र मोटी धारा की बात करते थे वे एक बून्द तक सिमट गए।

सच भी यही है कि अब टिहरी बाँध से आगे भागीरथी नदी की एक भी स्वतन्त्र बून्द है या नहीं, दावे के साथ नहीं कहा जा सकता। अब तो बाँध से जो भी जल आ रहा है वह एक विशाल झील का बँधा-ठहरा हुआ जल है। वस्तुत: गोमुख या गंगोत्री से जो प्रवाह चला है, वही प्रवाह गंगा का है। यह कहना कि अलकनंदा, मंदाकिनी का प्रवाह मिलने के बाद गंगा अस्तित्व में आती हैं, सरासर धोखा है। टिहरी बाँध बनाकर गंगा के मूल प्रवाह को पूरी तरह रोक दिया गया है। 800 मीटर गहरी और 45 कि.मी. लम्बी झील में निचला 500 मीटर जल तो मृत ही माना जाता है। मृत लोगों को मुक्ति देने वाली गंगा जल को ही मृत कर देने वाली ऐसी परियोजना की आधारशिला कांग्रेस सरकार ने रखी थी। भाजपा सरकार ने वह पूरी करवाई। अब गंगा सफाई की बात तो हो रही है पर अविरल गंगा-निर्मल गंगा की बात कोई नहीं करता।

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