पहाड़ों की जीवनरेखा ‘स्प्रिंग’ बचाने को जुटे जल-संगठन

Submitted by Hindi on Sun, 05/17/2015 - 13:28
.15 मई 2015, नैनीताल, उत्तराखण्ड। पहाड़ों के सबसे महत्त्वपूर्ण जलस्रोत स्प्रिंग बचाने और संवर्धन के मुद्दे पर पहाड़ी राज्यों के सरकारी, गैर-सरकारी जल-संगठनों और सामाजिक प्रतिनिधियों का बड़ा जमावड़ा भीमताल में हुआ। भारत के हिमालयी पहाड़ों में पाँच लाख से ज्यादा स्प्रिंग हैं जो पहाड़ों की जीवन-रेखा हैं। स्प्रिंग-जल से लगभग देश की 50 लाख से ज्यादा आबादी को पेयजल की उपलब्धता होती है। उत्तराखण्ड में भी बीस हजार से ज्यादा स्प्रिंग हैं। कार्यक्रम में सिक्किम सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहे ग्रामीण विकास विभाग में ‘स्प्रिंगशेड अथॉरिटी’ के स्टेट-कॉआर्डिनेटर ‘पेम नोरबू शेरपा’ ने बताया कि सिक्किम सरकार 1500 से ज्यादा स्प्रिंग के विकास पर काम कर रही है। सूख चुके 52 स्प्रिंग को पुनर्जिवित किया गया है।

मेघालय के ‘मेघालय बेसिन डेवलपमेंट अथॉरिटी’ के निदेशक एबन स्वैर ने बताया कि मेघायल सरकार दस हजार से ज्यादा स्प्रिंग के पुनर्जीवन पर काम कर रही है। स्प्रिंग पुनर्जीवन के लिए 6000 से ज्यादा पैरा-वर्कर तैयार किए जा रहे हैं, जिनके ऊपर मेघालय के 6800 गाँवों के सूखते स्प्रिंग को पुनर्जीवन की जिम्मेवारी होगी। उत्तराखण्ड के जलसंकट को दूर करने में स्प्रिंग यानी स्रोतों के महत्त्वपूर्ण स्थान है, यह कहना था उत्तराखण्ड के जन प्रतिनिधियों का। स्प्रिंग इनिशिएटिव की तरफ से आहूत बैठक में अर्घ्यम (बंगलुरू), अक्वाडैम (पूना), हिमालय सेवा संघ, लोक विज्ञान केन्द्र और चिराग सहित जलस्रोतों और स्प्रिंग के प्रबन्धन में व्यापक अनुभव रखने वाले देशभर के जलसंगठन इकट्ठा हुए।

स्प्रिंग इनीशिएटिव देश भर में स्प्रिंग पर काम करने वाले संगठनों और सरकार का समूह है। तमिलनाडु से सिक्किम तक विभिन्न नजरिए से काम करने वाले समूहों का यह संगठन भू-जल के वैज्ञानिक और टिकाऊ प्रबन्धन का मॉडल है। स्प्रिंग इनीशिएटिव स्प्रिंग की अहमियत को समझाने वाली चेतना को फैलाने और देश भर में स्प्रिंग को संरक्षित करने और उनका प्रबन्धन करने की क्षमता विकसित करने के लिए काम कर रहा है।

बैठक की रूप-रेखा रखते हुए अर्घ्यम के अयन विश्वास ने कहा कि हालाँकि इस बात का कोई विश्वसनीय अनुमान नहीं है कि देश में कितने स्प्रिंग हैं लेकिन विशेषज्ञों का अनुमान है कि भारत में दस लाख से भी ज्यादा स्प्रिंग हैं। पहाड़ के दूर दराज वाले बिखरे इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए यह स्प्रिंग अकसर पानी के इकलौते स्रोत होते हैं। इसके बावजूद स्प्रिंग को न तो ठीक से समझा गया न ही उनका रख-रखाव किया गया।

हिमालय सेवा संघ के संयोजक मनोज पांडे ने कहा कि आजकल जमीन के उपयोग में आए बदलाव, पर्यावरणीय पतन और जलवायु परिवर्तन के कारण स्प्रिंग पर खतरा मंडरा रहा है। हमें अपने जीवनशैली में भी परिवर्तन की जरूरत है। प्रसिद्ध वैज्ञानिक रवि चोपड़ा ने ‘उफरैखाल’ का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि पूरे देश में भू-जल पर बढ़ते संकट के कारण यह जरूरी हो गया है कि स्प्रिंग का उन समुदायों के साथ ज्यादा वैज्ञानिक रूप से प्रबन्धन किया जाए जिनकी स्प्रिंग के आस-पास रहने की और उनका प्रबन्धन करने की लम्बी परम्परा है।

प्रसिद्ध जल-वैज्ञानिक हिमांशु कुलकर्णी ने स्प्रिंग का महत्त्व प्रतिपादित करते हुए कहा कि किसी भी पहाड़ी राज्य के पीने के पानी की 80 प्रतिशत जरूरत स्प्रिंग ही पूरा करते हैं। देश की कोई भी नदी स्प्रिंग से ही बहती है। स्प्रिंग को पुनर्जीवित और उनका प्रबन्धन करने के लिए सबको शामिल होना होगा।

बैठक में उत्तराखण्ड समेत सिक्किम, मेघालय और दूसरे राज्यों के उन अनुभवों को उत्तराखण्ड सरकार के साथ बाँटा गया जिनमें सरकारों ने आगे बढ़कर स्प्रिंग की हिफाजत की है। भीमताल के बाद स्प्रिंग इनीशिएटिव के सहयोगी जून में मेघालय में जमा होंगे जहाँ पर मेघालय सरकार ने स्प्रिंग यानी स्रोतों के विकास का खाका बनाने का, देश का सबसे बड़ा कार्यक्रम हाथ में लिया है।

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