दो बूंद पानी को तरसते लोग

Submitted by Hindi on Tue, 05/26/2015 - 16:41
Source
चरखा, 26 मई 2015

विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में 60 प्रतिशत बीमारियों का कारण अशुध्द जल है। भारत में बच्चों की मौत की एक बड़ी वजह जलजनित बीमारियाँ हैं। अशुध्द पानी पीने से हर साल डायरिया के चार अरब मामलों में से 22 लाख मौतें होती हैं। पृथ्वी पर कुल 71 प्रतिशत जल उपलब्ध है इसमें से 97.3 प्रतिशत पानी खारा होने की वजह से पीने के योग्य नहीं है। सारी दुनिया पानी की समस्या से जूझ रही है।

भगवान ने प्रकृति को कई अनमोल तोहफों से नवाज़ा है इनमें से पानी भी एक है। कहने को तो जल ही जीवन है लेकिन जहाँ पर जल ही नहीं, वहाँ जीवन कैसा होगा, इसका अनुमान आप स्वयं लगा सकते हैं। जम्मू कश्मीर के सीमावर्ती ज़िले पुँछ में पानी की समस्या एक विकराल रूप लिए हुए है। यहाँ कई स्थानों पर पहाड़ों के चश्मों से बहकर प्रकृति का अनमोल तोहफा यूँ ही बर्बाद हो रहा है तो कहीं पर लोगों को कई किलोमीटर दूरी से पानी लाना पड़ता है। पुँछ ज़िले की तहसील हवेली का नाबना गाँव भी पानी की समस्या से दो चार है। पाँच हज़ार की आबादी वाले इस गाँव में दो पंचायतें हैं नाबना और मदाना। पानी की समस्या के बारे में नाबना पंचायत के स्थानीय निवासी मोहम्मद जुबैर ने बताया कि- ‘‘हमारे गाँव में सबसे बड़ी परेशानी पानी की है।”

पानी की समस्या को लेकर हम लोग कई बार अधिकारियों के पास गए हैं लेकिन वह भी हमें पानी देने में असफल साबित हुए हैं। आखिरी कोशिश के रूप हम लोगों ने सोचा कि क्यों न हम अपनी परेशानी को मीडिया के माध्यम से उजागर करें? शायद हमारी समस्या का कोई हल निकल जाए। भगवान की कृपा है कि आप लोग खुद ही हमारी समस्याएँ जानने के लिए यहाँ आ गए। पानी की समस्या के बारे में गाँव के सरपंच मोहम्मद अमीन ने बताया कि- ‘‘क्षेत्र में पानी की समस्या के बारे में हमने कई बार पीएचई विभाग के अधिकारियों व कर्मचारियों अवगत कराया है मगर किसी के कान जूँ तक नहीं रेंगती। आज और कल का बहाना बनाकर हमें टाल दिया जाता है।’’

इसके बाद लोग हमें अपने घरों में ले गए और सभी ने पानी से सम्बन्धित समस्याओं के बारे में खुलकर बताया। स्थानीय लोगों के अनुसार- ‘‘नाबाना का वार्ड नम्बर सात और आठ अधिकारियों और कर्मचारियों की सबसे ज़्यादा अनदेखी का शिकार है।’’

इस क्षेत्र में पीएचई विभाग का कोई भी अधिकारी, कर्मचारी और लाइनमैन कभी भी यह जानने नहीं आता कि जनता को पानी मिल भी रहा है या नहीं। हाँ एक सुपरवाईज़र हैं जिनकी शक्ल कभी-कभी देखने को मिल जाती है। जनता ने उनसे जब पानी की समस्या को लेकर सवाल किया तो जबाब में उन्होंने कहा कि- ‘‘पानी की लाइन बिछाने के लिए स्टोर में पाइपें मौजूद नहीं हैं। इसके अलावा कोई कर्मचारी भी नहीं है जिसको पानी की सप्लाई के लिए भेजा जा सके।’’

यहाँ की जनता का साफतौर पर कहना है कि विभाग के अधिकारी सिर्फ आॅफिसों में बैठकर अपना ड्यूटी का समय पूरा करके चले जाते हैं। यहाँ की ज़्यादातर वाटर सप्लाई योजनाओं का काम पीएचई विभाग ने अधूरा छोड़ रखा है। पानी की समस्या के बारे में उप सरपंच का कहना है कि- ‘‘आप अपनी आंखों से देख सकते हैं कि यहाँ पानी की कितनी बड़ी समस्या है। उन्होंने बताया कि यहाँ के लोग तीन किलोमीटर दूर चश्मे से पानी लेकर आते हैं। पानी लाने में आधा दिन बर्बाद हो जाता है क्योंकि पानी लेने के लम्बी लाइन होती है।’’

यहाँ के लोगों ने बताया कि- ‘‘हम लोग बारिश होने का बेसब्री से इन्तज़ार करते हैं कि कब बारिश हो और कब हमारे जानवर जी भर के पानी पी सकें।’’

पिछले साल एक दैनिक अखबार में छपी राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल कार्यक्रम की एक रिपोर्ट के अनुसार जम्मू कश्मीर की केवल 34.7 प्रतिशत आबादी को नलों के जरिए पीने का साफ पानी उपलब्ध है, जबकि बाकी की 65.3 प्रतिशत आबादी को हैंडपम्प, नदियाँ, नहरों तालाबों और धाराओं का असुरक्षित और अनौपचारिक पानी मिलता है। ऐसे में भारत सरकार के ग्रामीण विकास मन्त्रालय के पेयजल एवं स्वच्छता विभाग के 2011-2022 की रणनीतिक योजना के अनुसार वर्ष 2017 तक, 55 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों को पाइपों के जरिए पानी उपलब्ध करवा देने का दावा दिवास्वप्न सा ही लगता है। राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल योजना ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल की समस्या को दूर करने के मकसद से शुरू की गई थी लेकिन नाबना जैसे दूरदराज़ इलाकों में इस स्कीम की हकीकत खुल जाती है।

विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में 60 प्रतिशत बीमारियों का कारण अशुध्द जल है। भारत में बच्चों की मौत की एक बड़ी वजह जलजनित बीमारियाँ हैं। अशुध्द पानी पीने से हर साल डायरिया के चार अरब मामलों में से 22 लाख मौतें होती हैं। पृथ्वी पर कुल 71 प्रतिशत जल उपलब्ध है इसमें से 97.3 प्रतिशत पानी खारा होने की वजह से पीने के योग्य नहीं है। सारी दुनिया पानी की समस्या से जूझ रही है।

पानी की कमी के चलते पानी का निजीकरण होता जा रहा है। शहर में ज़्यादातर लोग बंद बोतल पानी खरीदकर पीते हैं। घर-घर वाटर प्यूरीफायर यन्त्र लगे हुए हैं। किसी न किसी रूप में लोग मिनरल वाटर का प्रयोग कर रहे हैं। वहीं दूसरी ओर सीमावर्ती और दूरदराज़ क्षेत्रों में रह रहे लोगों के पास पेयजल की सुविधा उपलब्ध नहीं है। केन्द्र एवं राज्य सरकार की शुद्ध पेयजल और जल संरक्षण योजनाएँ केवल बजट एवं घोषणाओं में ही अधिक दिखती है। इन योजनाओं को ज़मीन पर उतारने की ज़रूरत है ताकि देश केदूरदराज़ क्षेत्रों के लोगों को कम से कम पीने का साफ पानी तो उपलब्ध हो जाए।

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