पुरी में प्रदूषणः ऑक्सीजन की बहस

Submitted by Hindi on Fri, 05/29/2015 - 09:39
Printer Friendly, PDF & Email

सवाल अहम है कि एनजीटी के इस आदेश से निकला सन्देश क्या दूर तलक जाएगा? क्या बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड यानी बीओडी और डीओ के बहाने छिड़ी बहस किसी अच्छे नतीजे पर पहुँचेगी? क्या हम जल जीवों के लिए ऑक्सीजन की उपलब्धता बढ़ाकर उनकी ऑक्सीजन की माँग कम कर पाएँगे? या हम होटलों और व्यावसायियों की लॉबी के दबाव में दब कर तमाम मानक बदल देंगे? क्या हरिद्वार और उड़ीसा के प्रदूषण फैलाने वाले होटलों को सबक सिखाने का यह कदम पूरे देश पर असर डालेगा? निश्चित तौर पर पर्यावरण संरक्षण विरोधी इस माहौल में एनजीटी एक नया माहौल बनाएगा और नई चेतना का संचार करेगा?

एक हिन्दी फिल्म में खलनायक एक डायलॉग बोलता है- “हम तुम्हें लिक्विड ऑक्सीजन में डाल देंगे। लिक्विड तुम्हें जीने नहीं देगा और ऑक्सीजन तुम्हें मरने नहीं देगा।” कुछ इसी तरह की रोचक बहस बीओडी यानी बायो ऑक्सीजन डिमांड और डिजाल्व्ड ऑक्सीजन के मानकों के बारे उत्तराखंड से उड़ीसा तक चल रही है। राष्ट्रीय हरित पंचाट यानी नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की जाँच में रंगे हाथों पकड़े जाने के बाद उड़ीसा के जिन 60 होटलों पर बंद होने की तलवार लटक रही है। उनकी दलील है कि 1986 का पर्यावरण संरक्षण अधिनियम बीओडी का स्तर 350 मिलीग्राम प्रति लीटर तक मान्य करता है। इसलिए उड़ीसा राज्य प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड का 75 मिली ग्राम प्रति लीटर का मानक बहुत सख्त है। इसके जवाब में बोर्ड की दलील थी कि केन्द्रीय कानून राज्य बोर्ड को अपने ढँग से मानक तय करने का अधिकार देता है।

इसलिए यह जानना भी जरूरी है कि बीओडी क्या है और इससे पानी की गुणवत्ता पर क्या असर पड़ता है।

बीओडी ऑक्सीजन की वह मात्रा है जो पानी में रहने वाले जीवों को तमाम गैर जरूरी आर्गेनिक पदार्थों को नष्ट करने के लिए चाहिए। यानी बीओडी जितनी ज्यादा होगी पानी का ऑक्सीजन उतनी तेजी से खत्म होगा और बाकी जीवों पर उतना ही खराब असर पड़ेगा। बीओडी के बढ़ते जाने से पानी में रहने वाले जैविक जन्तुओं का दम घुटने लगता है, वे दबाव में आते हैं और धीरे-धीरे दम तोड़ने लगते हैं। शायद जब कृष्ण ने यमुना में कालियादह किया होगा तो वहाँ का बीओडी काफी बढ़ा रहा होगा और डीओ यानी डिजाल्व्ड ऑक्सीजन काफी घटा रहा होगा। बीओडी जिन चीजों के कारण बढ़ता है उनमें पत्ती, लकड़ी, जानवर (मरे हुए), अवशिष्ट, सेप्टिक टैंक का खराब होना और क्लोरीन बढ़ने से भी होता है।

बीओडी का रिश्ता डीओ यानी डिजाल्व्ड ऑक्सीजन से भी होता है। जिस तरह बीओडी बढ़ने से खतरनाक स्थिति बनती है उसी प्रकार डीओ के घटने से खतरनाक स्थिति बनती है। वजह साफ है कि अगर पानी में मिलने वाले प्रदूषण को दूर करने के लिए छोटे जीव जन्तुओं को ज्यादा काम करना पड़ेगा तो उन्हें ज्यादा ऑक्सीजन की जरूरत पड़ेगी और अगर ज्यादा ऑक्सीजन की जरूरत पड़ेगी तो उसकी पानी में घुली हुई मात्रा घटेगी। इस तरह एक खतरनाक स्थिति बनेगी। बीओडी की परिभाषा यह है कि पानी में पड़े आर्गेनिक पदार्थ को डि-कंपोज करने और अकार्बनिक पदार्थ को ऑक्सीडाइज करने की क्रिया में जितनी ऑक्सीजन की जरूरत पड़ती है वही बीओडी है। इसे पाँच दिनों में 20 डिग्री तापमान पर मापा जाता है। धारा के भीतर तापमान, पीएच वैल्यू और दूसरी चीजों से बीओडी पर असर पड़ता है।

जाहिर सी बात है कि वकील सुभाष दत्ता ने भारत सरकार को पक्षकार बनाकर जो याचिका दायर की थी उसमें यही बिन्दु थे कि स्वर्गद्वार नाम का शमशान स्थल, होटलों का अशोधित कचरा, समुद्र के जल को प्रदूषित कर रहा है। इसके अलावा उनके जो बिन्दु थे उनमें तटीय नियमन क्षेत्र (सीआरजेड) के 500 मीटर के दायरे में हुए अवैध निर्माणों को भी हटाए जाने का अनुरोध था।

दरअसल धार्मिक और पर्यटक नगरी होने के कारण पुरी पर आबादी और प्रदूषण का भारी दबाव है। लेकिन अगर इस दबाव को एनजीटी जैसी संस्थाएँ दूर नहीं करेंगी तो एक सुन्दर नगर और जलवायु के नष्ट होने का खतरा मंडरा रहा है। सम्भव है कि होटल व्यवसाय के लोग पर्यावरण के मानकों को व्यवसाय विरोधी घोषित करें और व्यवसाय हितैषी मौजूदा केन्द्र सरकार और उड़ीसा की राज्य सरकार के मदद माँगने की कोशिश भी करें।

लेकिन एनजीटी की सक्रियता से कानून के पालन और जन जागरूकता की जो स्थिति बनी है उसे कायम रखे जाने की जरूरत है। एनजीटी ने उड़ीसा के होटलों के सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट और अशोधित अवशिष्ट के बारे में जाँच करने के लिए पिछले साल ही आइआइटी खड्गपुर के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के इंचार्ज प्रोफेसर माधव गंगरेकर से अनुरोध किया था। पंचाट ने उनसे सीआरजेड जोन के उल्लंघन की पहचान करने को भी कहा था। उनकी जाँच में यह बात निकल कर आई कि पुरी से एक करोड़ लीटर अशोधित पानी रोजाना समुद्र में जाता है। इसके अलावा बहुत सारे होटलों ने संचालन के लिए सहमति पत्र (सीटीओ) नहीं ले रखा है। पुरी के बकी मोहान में यह होटल बड़ी मात्रा में अशोधित पानी डाल रहे थे।

जाहिर सी बात है कि जब एनजीटी ने मामले में कदम आगे बढ़ाए तो कुछ होटल वाले हाई कोर्ट चले गए और उन्हें स्टे मिल गया। लेकिन बाकी होटलों पर बंदी की गाज गिरने की तैयारी हो गई है। लेकिन मामला इन होटलों तक ही सीमित नहीं है। पुरी के नगर निकायों और राज्य के प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड के समक्ष बड़ी चुनौती रथयात्रा के दौरान शहर को साफ रखने की है। रथयात्रा और नबाकालेबरा के दौरान एक जुलाई के करीब यहाँ पचास लाख लोगों की भीड़ आने वाली है। उसको ध्यान में रखकर उड़ीसा के शहरी मन्त्रालय ने सफाई और स्वास्थ्य अनुकूल स्वच्छता पर 22 पेज की योजना तैयार की है। इस योजना के तहत सफाई कर्मचारियों की संख्या बढ़ाना ठोस कचरे के निस्तारण का इन्तजाम करना, मशीनों की संख्या बढ़ाना और सीवेज ट्रीटमेंट को ज्यादा सक्रिय करने के कार्यक्रम हैं।

सवाल अहम है कि एनजीटी के इस आदेश से निकला सन्देश क्या दूर तलक जाएगा? क्या बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड यानी बीओडी और डीओ के बहाने छिड़ी बहस किसी अच्छे नतीजे पर पहुँचेगी? क्या हम जल जीवों के लिए ऑक्सीजन की उपलब्धता बढ़ाकर उनकी ऑक्सीजन की माँग कम कर पाएँगे? या हम होटलों और व्यावसायियों की लॉबी के दबाव में दब कर तमाम मानक बदल देंगे? क्या हरिद्वार और उड़ीसा के प्रदूषण फैलाने वाले होटलों को सबक सिखाने का यह कदम पूरे देश पर असर डालेगा? निश्चित तौर पर पर्यावरण संरक्षण विरोधी इस माहौल में एनजीटी एक नया माहौल बनाएगा और नई चेतना का संचार करेगा?

More From Author

Related Articles (Topic wise)

Related Articles (District wise)

About the author

नया ताजा