ग्रामीण भारत में जल की गुणवत्ता (Water quality in rural India)

Submitted by Hindi on Sun, 05/31/2015 - 16:38
Source
कुरुक्षेत्र, मई 2015

वैज्ञानिकों की आरे से दी गई चेतावनी और भविष्य की स्थिति को देखते हुए केन्द्र एवं राज्य सरकारों की ओर से भी पारम्परिक जल स्रोतों को बढ़ावा देने के साथ ही उन्हें शुद्ध बनाने की कोशिश की जा रही हैं। गाँवों में स्थित तालाबों की खुदाई के लिए भरपूर पैसा खर्च किया जा रहा है। पंचायती राज अधिनियम के तहत ग्राम पंचायतों को यह अधिकार दिया गया है कि वे गाँवों मे स्थित तालाब एवं पोखरों की खुदाई कराएँ। साथ ही पुराने कुओं की मरम्मत के लिए भी उन्हें निर्देश दिया गया है। गाँव में कुओं की मरम्मत तो हो जाएगी और तालाब-पोखरे भी खुद जाएँगे, लेकिन उन्हें स्वच्छ रखने की जिम्मेदारी ग्रामीणों की होगी। जब तक ग्रामीण इस दिशा में पहल नहीं करेंगे तब तक ग्रामीण पेयजल एवं स्वच्छता का मिशन अधूरा रहेगा।

बढ़ते पर्यावरण प्रदूषण एवं जलस्रोतों की अनदेखी की वजह से ग्रामीण भारत में पेयजल की गुणवत्ता लगातार प्रभावित हो रही है। सरकार की ओर से पेयजल को बचाने के लिए तमाम योजनाओं का संचालन किया जा रहा है, लेकिन इसके लिए सामूहिक भागीदारी जरूरी है। दुनिया भर में ग्रामीण जनसंख्या के केवल 27 फीसदी घरों में सीधे तौर पर पाइप के जरिए पीने का पानी पहुँचाया जाता है और 24 फीसदी आबादी असंशोधित स्रोतों पर निर्भर करती है। इसमें ग्रामीण इलाके की भागीदारी करीब 84 फीसदी से ज्यादा है। भारत के विभिन्न राज्यों में पानी तो हैं, लेकिन गुणवत्तायुक्त पानी का अभाव है। यानी पीने का पानी या पीने योग्य पानी पर्याप्त मात्रा में नहीं है। जल प्रदूषण सहित विभिन्न कारणों से भूमिगत जल में वास्तविक तत्वों का अभाव है। कहीं आर्सेनिक की अधिकता है तो कहीं लौह तत्व पानी की गुणवत्ता को प्रभावित कर रहे हैं। असंरक्षित पानी पीने से लोग बीमारियों की चपेट में आते हैं। भारत में सामान्य जल आपूर्ति नेटवर्क पीने योग्य पानी नल से उपलब्ध कराते हैं। यह अलग बात है कि इसी पानी का उपयोग पीने के साथ ही कपड़े धोने व अन्य नित्यक्रिया के लिए किया जाता है। जबकि चीन सहित कई देश अपने शहरों में पीने के पानी की वैकल्पिक रूप से एक अलग नल से आपूर्ति करते हैं। ऐसे में पीने योग्य पानी गुणवत्तापरक बना रहता है।

नीति आयोग (पहले योजना आयोग) की एक रिपोर्ट के मुताबिक देश में फिलहाल 1123 अरब घनमीटर जल इस्तेमाल के लिए उपलब्ध है, जबकि माँग 710 अरब घनमीटर है। लेकिन 2025 में जल की माँग बढ़कर 1093 अरब घनमीटर हो जाएगी। पानी की माँग अगर इसी तेजी से बढ़ती रही तो 2030 में आधी माँग पूरी नहीं हो पाएगी। केन्द्रीय भू-जल बोर्ड (सीजीडब्ल्यूबी) के मुताबिक पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और पश्चिम बंगाल में 2002-2012 के दौरान जलस्तर में चार मीटर से अधिक की गिरावट हुई है। देश के 802 ब्लाॅक में भू-जल के अतिदोहन से उन क्षेत्रों में जल संकट मंडरा रहा है। पंजाब के 80 प्रतिशत, हरियाणा के 59 प्रतिशत, राजस्थान के 69 प्रतिशत, दिल्ली के 74 प्रतिशत और उत्तर प्रदेश के 9 प्रतिशत ब्लाॅक में भू-जल का अतिदोहन हुआ है। केन्द्र ने भू-जल का दोहन रोकने के लिए राज्यों को एक माॅडल विधेयक भेजा है। केन्द्र ने शुरू में यह माॅडल विधेयक 1970 में भेजा था। इसके बाद इसे 1992, 1996 और 2005 में राज्यों को भेजा गया। अब तक सिर्फ 11 राज्यों और केन्द्रशासित प्रदेशों ने ही यह कानून बनाया है। बाकी 18 राज्य व केन्द्रशासित प्रदेश इसे कानून का रूप देने की प्रक्रिया में हैं। केन्द्र ने केन्द्रीय भू-जल प्राधिकरण का गठन भी किया है, जिसने 800 से अधिक क्षेत्रों में भू-जल के दोहन पर अंकुश लगाया है।

पेयजल और स्वास्थ्य मन्त्रालय द्वारा जारी आँकड़ों के अनुसार कीटनाशकों और उर्वरकों द्वारा भी पेयजल के स्रोत दूषित हो रहे हैं। 2011 जनसांख्यिकी के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में केवल 35 फीसदी भारतीयों को अपने घरों के भीतर पीने योग्य पानी उपलब्ध है जबकि 22 फीसदी ग्रामीण परिवारों को पीने योग्य पानी की खोज में आधे से एक किलोमीटर से भी अधिक की यात्रा करनी पड़ती है। रिपोर्ट के मुताबिक मणिपुर के 40.70 प्रतिशत, मेघालय के 37.90, झारखण्ड के 36.40 और मध्य प्रदेश के 36.10 प्रतिशत परिवार अभी भी 500 मीटर से अधिक दूरी से पेयजल लेने जाते हैं।

2011 जनसांख्यिकी के अनुसार भारत में पानी की प्रति व्यक्ति उपलब्धता 1545 क्यूबिक मीटर है, जो 2001 जनसांख्यिकी के अनुसार, 1816 क्यूबिक मीटर की तुलना में कम हो गई है। चालू वर्ष (2014-15) में, एनआरडीडब्ल्यूपी ने 137,043 बस्तियों का लक्ष्य निर्धारित किया है जिसमें से 64 फीसदी यानी 87,722 बस्तियों में 2 मार्च 2015, की स्थिति के अनुसार, पहले से ही पेयजल की व्यवस्था हो चुकी है। इस तरह उत्तर प्रदेश, 76,150 बस्तियों के साथ ऐसा राज्य है जो पेयजल प्रदान करने में सबसे सफल रहा है। इसी तरह ओडिशा में 58,733, मध्य प्रदेश में 56.087, झारखण्ड में 52,883 और कर्नाटक में 47,481 बस्तियों में पेयजल उपलब्ध कराया जा रहा है।

विश्व के कुल उपलब्ध जल में से मात्र 0.08 प्रतिशत ही पीने के लिए उपलब्ध हैं और इसका वितरण भी पूरे विश्व में एक समान नहीं है। इससे भी बड़ी समस्या यह है कि मानवीय गतिविधियाँ इस प्राकृतिक संसाधन को बर्बाद कर रही हैं। विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार एशिया और प्रशांत क्षेत्रों में प्राकृतिक संसाधनों का सबसे अधिक दोहन किया गया है और इस शताब्दी में पूरे विश्व में पानी की कमी होगी। वैज्ञानिकों की ओर से दी गई चेतावनी और भविष्य की स्थिति को देखते हुए भारत में केन्द्र एवं राज्य सरकार की ओर से भी पारम्परिक जल स्रोतों को बढ़ावा देने के साथ ही उन्हें शुद्ध बनाने की कोशिश की जा रही है। गाँवों में स्थित तालाबों की खुदाई के लिए भरपूर पैसा खर्च किया जा रहा है। पंचायती राज अधिनियम के तहत ग्राम पंचायतों को यह अधिकार दिया गया है कि वे गाँवों में स्थित तालाब एवं पोखरों की खुदाई कराएँ। साथ ही पुराने कुओं की मरम्मत के लिए भी उन्हें निर्देश दिया गया है। गाँव में कुओं की मरम्मत तो हो जाएगी और तालाब-पोखरे भी खुद जाएँगे, लेकिन उन्हें स्वच्छ रखने की जिम्मेदारी ग्रामीणों की होगी। ग्रामीणों का जहाँ अधिक से अधिक जोर हैंडपम्पों की ओर है, लेकिन सरकार की कोशिश है कि हैंडपम्प तो लगाए जाएँ पर किसी भी कीमत पर कुओं की उपेक्षा नहीं होनी चाहिए। वैज्ञानिक साफ तौर पर चेताने लगे हैं कि एक से डेढ़ दशक में भूगर्भ से पानी निकालना दुरूह और महँगा हो जाएगा। भू-जल के अति दोहन से ऐसी भी नौबत आ सकती है कि नलकूप व्यर्थ हो जाएँ, क्योंकि उनकी पानी खींचने की क्षमता सीमित है।

पानी की गुणवत्ता के मानदण्ड


.पीने के पानी की गुणवत्ता के मानदण्ड आमतौर पर दो श्रेणियों के तहत आते हैं। एक रासायनिक/ भौतिक और दूसरा सूक्ष्म जीवविज्ञानी। पहले मानदण्ड में भारी धातु, कार्बनिक यौगिकों का पता लगाना और पूर्ण रूप से मिले हुए ठोस पदार्थ (टीएसएस) और टर्बिडिटी (गंदलापन) शामिल हैं। जबकि दूसरे मानदण्ड के तहत कैलिफाॅर्म बैक्टीरिया, ई. कोलाई और जीवाणु की विशिष्ट रोगजनक प्रजातियाँ, वायरस और प्रोटोजोन परजीवी हैं। पानी का भौतिक परीक्षण गंध, स्वाद तथा रंग से किया जा सकता है, लेकिन रासायनिक परीक्षण सम्भव नहीं है। क्योंकि जल की कठोरता, अम्लीयता, लौह तथा मैगनीज आदि तत्व की पानी में कमी एवं अधिकता दोनों स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं। कठोर जल अथवा लवणयुक्त जल पीने से पथरी तथा अन्य रोग होते हैं तो नाइट्रोजन युक्त पदार्थ, ग्रहित आक्सीजन, क्लोराइड्स तथा अन्य कार्बनिक पदार्थ अप्रत्यक्ष रूप से जल की गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं तथा स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव डालते हैं। पानी की प्रकृति पर गौर करें तो चार से कम पी.एच के पेयजल का स्वाद खट्टा एवं कड़वा होता है। जबकि 8.5 से अधिक पी.एच का जल क्षारीय स्वाद का होता है। भारतीय मानक संस्थान के मानकों के अनुसार पेयजल का पी.एच 6.5 से 8.5 के मध्य होना चाहिए। इस सीमा से बाहर पी.एच आमाशय की लेष्म झिल्ली तथा जल वितरण तंत्र को प्रभावित करता है। पेयजल में उच्च पी.एच. क्लोरीन के जीवाणुनाशक प्रभाव को भी कम कर देता है, तथा एक हानिकारक पदार्थ ट्राईहेलोमिथेन्स का निर्माण करता है। इसी तरह जल में अवक्षेपित क्लोरीन 0.05-0.10 मिलीग्राम प्रति लीटर होना चाहिए। क्लोरीन के कारण उत्पन्न गंध को उबालकर दूर किया जा सकता है।

फ्लोराइडयुक्त पानी पीने का असर


भारत के करीब-करीब हर राज्य में कहीं न कहीं फ्लोराइड युक्त पानी की अधिकता है। गुजरात हो या पश्चिम बंगाल, उत्तराखण्ड हो अथवा ओडिशा हर जगह पानी में कहीं न कहीं फ्लोराइड पाया जाता है। यह फ्लोराइडयुक्त पानी हड्डियों तथा दाँतों के बाहरी आवरण को एपेटाइड लवण के साथ मिलकर सख्त बना देता है। बाल झड़ने से लेकर उसके पीले होने तक का खतरा रहता है। बच्चे एवं बड़े कम उम्र में ही बुजुर्ग दिखने लगते हैं। पेयजल में 1.0 मिलीग्राम प्रति लीटर से अधिक फ्लोराइड की मात्रा दाँतों, हड्डियों के जोड़ों को प्रभावित करती है। ऐसे में दाँतों में फ्लोरोसिस हो सकता है। इसी तरह फ्लोराइडयुक्त पानी भी कई रोगों को बढ़ावा देता है।

फिकल कोलीफार्म युक्त पानी का असर


मनुष्यों एवं अन्य समतापी जन्तुओं के पाचन-तंत्र में कुछ जीवणु पाए जाते हैं जो पाचन क्रिया में सहायक होते हैं। ये जीवाणु मल के साथ बाहर निकलते हैं तथा पानी में मिलने पर उसे दूषित कर देते हैं। यह जीवाणु कोलीफाॅर्म जीवाणु के नाम से जाने जाते हैं। कोलीफॉर्म जीवाणुओं की उपस्थिति दूषित जल की पहचान है क्योंकि ये जीवाणु केवल मल में ही पाए जाते हैं तथा आसानी से सरल परीक्षण द्वारा ज्ञात किए जा सकते हैं। संक्रामक बीमारियाँ मुख्य रूप से मनुष्य एवं जानवरों के दूषित अवशिष्ट द्वारा फैलती हैं। इस प्रकार खुले स्थानों में मल त्याग से तथा गन्दे नालों के कारण जल जनित बीमारियों के फैलने की प्रबल सम्भावना होती है। इस प्रकार के दूषित जल को पीने से उसको खाना बनाने के प्रयोग में लाने से, अथवा उस पानी में नहाने से जलजनित बीमारियाँ फैल सकती हैं। जो बीमारियाँ फिकल कोलीफार्म द्वारा संक्रमित होती हैं उनके उक्त माध्यमों द्वारा फैलने की प्रबल सम्भावनाएँ होती हैं। टायफायड, हैजा, पेचिश, तथा पाचन-तंत्र की सामान्य बीमारियाँ सामान्यतः दूषित जल के उपयोग से ही होती हैं। इसलिए फिकल कोलीफार्म सूचक जीवाणुओं का परीक्षण, पेयजल की गुणवत्ता मापने के लिए एक आवश्यक परीक्षण है। जहाँ क्लोरीनयुक्त सम्भव न हो, वहाँ जल को उबालकर पीना एक सुविधापूर्ण उपाय है। इन स्थानों पर फिकल कोलीफार्म परीक्षण के अतिरिक्त स्वास्थ्य सम्बन्धी सभी कारणों पर ध्यान देना अति आवश्यक हो जाता है। जहाँ तक सम्भव हो सके जल को दूषित होने से बचाना चाहिए।

पारम्परिक जल स्रोतों का शुद्धीकरण


वैज्ञानिकों की ओर से दी गई चेतावनी और भविष्य की स्थिति को देखते हुए केन्द्र एवं राज्य सरकार की ओर से भी पारम्परिक जल स्रोतों को बढ़ावा देने के साथ ही उन्हें शुद्ध बनाने की कोशिश की जा रही है। गाँवों में स्थित तालाबों की खुदाई के लिए भरपूर पैसा खर्च किया जा रहा है। पंचायती राज अधिनियम के तहत ग्राम पंचायतों को यह अधिकार दिया गया है कि वे गाँवों में स्थित तालाब एवं पोखरों की खुदाई कराएँ। साथ ही पुराने कुओं की मरम्मत के लिए भी उन्हें निर्देश दिया गया है। जब तक ग्रामीण इस दिशा में पहल नहीं करेंगे तब तक ग्रामीण पेयजल एवं स्वच्छता का मिशन अधूरा रहेगा।

ग्रामीणों का जहाँ अधिक से अधिक जोर हैंडपम्पों की ओर हैं, लेकिन सरकार की कोशिश है कि हैंडपम्प तो लगाए जाएँ पर किसी भी कीमत पर कुओं की उपेक्षा नहीं होनी चाहिए। इसलिए कुओं की मरम्मत पर भी ध्यान देने के निर्देश दिए गए हैं। कुछ दिन पहले उत्तर प्रदेश में हुई राज्य-स्तरीय समीक्षा बैठक में उन अफसरों की तारीफ की गई जिनके इलाके में कुओं एवं तालाबों पर विशेष काम हुए हैं। सभी जिला पंचायती राज अधिकारियों को निर्देश दिया गया है कि अपने कार्य क्षेत्र वाले जिलों में परम्परागत जल स्रोतों को बढ़ाने की कोशिश करें।

केन्द्र सरकार की ओर से चलाई जा रही मनरेगा योजना के तहत भी सबसे ज्यादा ध्यान तालाब खुदाई पर ही दिया जा रहा है। क्योंकि उत्तर प्रदेश के विभिन्न इलाकों में भू-जल स्तर में गिरावट का सिलसिला कायम है। एक अनुमान के तहत कुछ क्षेत्रों में प्रतिवर्ष एक मीटर तक की गिरावट दर्ज की जा रही है। स्पष्ट है कि यदि इस समय भी जागरूकता नहीं दिखाई गई तो भविष्य में स्थिति और गम्भीर हो सकती है। वैज्ञानिक साफ-तौर पर चेताने लगे हैं कि एक से डेढ़ दशक में भूगर्भ से पानी निकालना दुरूह और महँगा हो जाएगा। भू-जल के अति दोहन से ऐसी भी नौबत आ सकती है कि नलकूप व्यर्थ हो जाएँ, क्योंकि उनकी पानी खींचने की क्षमता सीमित है।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार है।)

ईमेल : indreshc22@gmail.comTags

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