गरीबी निवारण के लिए रोजगारोन्मुख विकास

Submitted by birendrakrgupta on Tue, 06/09/2015 - 17:05
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योजना, अप्रैल 2005
सेवाओं में विकास के साथ-साथ रोजगार में भी बढ़ोत्तरी हो रही है। उसकी वजह से कृषि पर निर्भर लोग काफी पीछे छूट गए हैं। बेहतर जीवन स्तर के लिए आज जरूरत इस बात की है कि रोजगारोन्मुख विकास हो।विगत दो दशकों के दौरान भारत और चीन के विकास सम्बन्धी अनुभव में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण यह अन्तर है कि चीन ने विकास के क्रम में रोजगार में भी तेजी से वृद्धि की है। यह रोजगार उत्पादन एवं निर्माण क्षेत्र में सर्वाधिक है। चीन की कुल श्रमशक्ति के 22 प्रतिशत को औद्योगिक क्षेत्र में रोजगार प्राप्त है जबकि भारत में यह 16 प्रतिशत (2000) है। चीन में आर्थिक सुधार के पहले दशक के बाद शहरी और ग्रामीण उद्यमों के विस्तार के साथ उसकी निर्धनता में आश्चर्यजनक कमी आई। इसकी वजह यह थी कि इन उद्यमों में ग्रामीण क्षेत्रों के अतिरिक्त श्रम को काम मिल गया। वहाँ 1978 में उत्पादन क्षेत्र में कुल रोजगार का ग्रामीण श्रेत्रों में हिस्सा जहाँ एक तिहाई से थोड़ा कम ही था, वहीं सन् 2000 तक यह बढ़कर आधा हो गया।

भारत की तुलना चीन के किए जाने की जरूरत है। दोनों देशों में तीव्र विकास तथा आय में असमानता में वृद्धि के बावजूद चीन में निर्धनता के दायरे में केवल 3-4 करोड़ लोग बच गए हैं, वहाँ औसत आय बढ़ी है तथा शिक्षा स्तर और जीवन सम्भाव्यता भारत की तुलना में काफी अधिक बढ़ी है। इसलिए, दोनों देशों में आय की बढ़ रही असमानता के बावजूद इन दोनों देशों की सामाजिक स्थिति की तुलना नहीं की जा सकती।

गरीबी निवारण के लिए रोजगारोन्मुख विकासरोजगारोन्मुख विकास से गरीबी में कमी आएगी और असमानता बढ़ेगी नहीं लेकिन 1990 के दशक में उत्पादन क्षेत्र की रोजगारपरक नमनीयता में बेहद कमी आई है। श्रमशक्ति में बढ़ोत्तरी की गति से रोजगार के बढ़ते रहने की एकमात्र वजह सेवा क्षेत्र में बढ़ोत्तरी रही है। लेकिन इसकी वजह से भारत में कृषि पर निर्भर लोग काफी पीछे छूट गए। नब्बे के दशक में खासतौर पर फसल उत्पादन की वृद्धि धीमी पड़ गई है।

आज भी भारत में कृषि क्षेत्र में 59 प्रतिशत लोग रोजगार पा रहे हैं। हालांकि मध्यम अवधि में श्रम को कृषि से बाहर अन्तरित करने की आवश्यकता पड़ेगी, लेकिन सरकार की सीधी कार्यवाही से अगले पाँच वर्षों में भारत की ग्रामीण निर्धनता को नाटकीय रूप के कम किया जा सकता है। निर्धन परिवारों को वार्षिक न्यूनतम रोजगार गारण्टी प्रदान करने के लिए नई सरकार संसद में एक विधेयक लाएगी। मूल प्रस्ताव के अनुसार, प्रत्येक राज्य में प्रत्येक परिवार से एक व्यक्ति को न्यूनत्तम मजदूरी दर से हर वर्ष 100 दिनों के रोजगार का संवैधानिक अधिकार दिया जाना था। लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण रूप से नए प्रारूप से संवैधानिक अधिकार को निकाल दिया गया है तथा इसे पूरे देश में लागू करने की कोई समय-सीमा निर्धारित नहीं की गई है। आरम्भ में यह देश के 150 सबसे गरीब जिलों में लागू होगी।

निम्न आय वाले देश के गरीब बेरोजगार रहकर नहीं जी सकते। भारत के अधिकतर गरीब कामकाजी गरीब हैं। अधिकांश निर्धन परिवार या तो दिहाड़ी वाला है, अथवा वे स्वरोजगार में लगे हैं।निम्न आय वाले देश के गरीब बेरोजगार रहकर नहीं जी सकते। भारत के अधिकतर गरीब कामकाजी गरीब हैं। अधिकांश निर्धन परिवार या तो दिहाड़ी वाला है, अथवा वे स्वरोजगार में लगे हैं। नियमित रोजगार वाले लोगों के गरीब होने की सम्भावना कम ही होती है। गरीबों को साल में 100 दिनों का नियमित रोजगार देकर रोजगार गारण्टी अधिनियम निर्धनता-आधार को समाप्त करना सुनिश्चित करेगा। 60 रुपए प्रतिदिन के जनसंख्या आधारित औसत न्यूनतम मजदूरी के आधार पर, 100 दिनों के रोजगार से गरीब परिवारों की वार्षिक आय में रु. 6,000 की वृद्धि हो जाएगी। इससे भारत की दो-तिहाई आबादी को गरीबी रेखा से ऊपर ले आया जा सकेगा।इससे राष्ट्रीय कोष पर क्या लागत आएगी? द्रेज (2004) का अनुमान है कि 2004 के मूल्यों के आधार पर इस कार्यक्रम को चरणबद्ध रूप से लागू करने पर पहले वर्ष (2005) में इस पर आने वाली कुल लागत सकल घरेलू उत्पाद का 0.5 प्रतिशत होगी जो आरम्भिक चरण के अन्तिम वर्ष (2008) में बढ़कर 1 प्रतिशत हो जाएगी। इसके बाद यह अनुपात कम होने लगेगा, क्योंकि गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों की संख्या कम होने लगेगी।

यह कार्यक्रम तथा उसकी लागत महाराष्ट्र में 20 सालों तक सफलतापूर्वक क्रियान्वित किए गए ऐसे ही एक कार्यक्रम पर आधारित है। लेकिन बाद के इस आकलन में श्रम-सामग्री का 60:40 के अनुपात की कल्पना की गई है। महाराष्ट्र में यह अनुपात काफी कम है और इकाई लागत अधिक श्रम-सघनता के साथ कम हो सकती है।

सम्भावित लाभ


वस्तुतः श्रम-सघनता वाटरशेड विकास, भूमि संवर्धन, बाढ़ नियन्त्रण तथा कमाण्ड क्षेत्र विकास जैसे कार्यों में अधिक हो सकती है। इससे न केवल पर्यावरण की रक्षा होगी, वरन् भविष्य में भूमि की उर्वरा में वृद्धि तथा ग्रामीण रोजगार में बढ़ोत्तरी भी होगी। ग्रामीण भारत में सिंचाई के विकास के लिए बाँधों का महत्त्व बना रहेगा। इसके साथ ही दसवीं योजना में अनेक कम लागत वाले विकल्पों का उल्लेख भी किया गया है। इसमें कहा गया है कि 'पारम्परिक जलसंग्रहण संरचनाओं के जीर्णोंद्धार, भूजल विकास, लघु सिंचाई प्रणालियों को फिर से बहाल करना, शहरी क्षेत्रों में वर्षा जल संग्रहण तथा वाटरशेड विकास' किया जाएगा। ये विकल्प बाँधों के प्रति हेक्टेयर विकास पर आने वाली लागत की तुलना में कम महंगे हैं तथा बाँधों के समक्ष उपस्थित होने वाली विस्थापित लोगों के पुनर्वास, वनक्षेत्र के जलमग्न हो जाने तथा भूमि अधिग्रहण जैसी अन्य समस्याएँ इनके मार्ग में नहीं आती।

इनके अतिरिक्त वाटरशेड विकास को उन्नत बनाने से बार-बार आने वाली बाढ़ से जीवन और सम्पदा को होने वाले नुकसान को कम किया जा सकता है तथा सरकार द्वारा भविष्य में बाढ़ राहत कार्य पर आने वाले खर्चे से बचा जा सकता है। रोजगार गारण्टी के विरुद्ध तर्क गौण चीजों के लिए चतुर और बड़ी चीजों के लिए मूर्ख बनने जैसा है। लेकिन जैसा कि दसवीं योजना में कहा गया है, इसके लिए 'बाढ़ प्रभावित मैदानी इलाकों का वर्गीकरण कर उनका प्रबन्धन करने तथा बाँधों के रख-रखाव में जनभागीदारी' अपेक्षित है।

ग्रामीण घरों में बनाए जाने वाले शौचालयों के कार्यक्रम में महिलाओं को भी शामिल कर लिया जाए तो इससे गरीब ग्रामीण महिलाएँ दोगुना स्वाधीन होंगी- एक तो उनके हाथों में कमाई होगी, दूसरे वे बाहर मलत्याग के लिए जाने में शामिल अपमान, असुरक्षा, गोपनीयता के अभाव और स्वास्थ्य सम्बन्धी जोखिम से बच पाएँगी।विकासोन्मुख गतिविधि के लिए सिंचाई सम्भावनाओं का निर्माण तथा उनके उपयोग के बीच की चौड़ी खाई को पाटना आवश्यक है। दूसरे सिंचाई आयोग ने सत्तर के दशक के आरम्भिक वर्षों में ही इस खाई को रेखांकित किया था जिसके परिणामस्वरूप कमाण्ड क्षेत्र विकास कार्यक्रम की शुरुआत की गई थी। सिंचाई के पानी के कुशल उपयोग को स्रोत के ऊपर की नहर प्रणाली के बेहतर रख-रखाव एवं स्रोत के नीचे के मैदानी संजाल तथा नालों का विकास कर बड़े पैमाने पर बढ़ाया जा सकता है। कमाण्ड क्षेत्र विकास कार्यक्रम ने इस दिशा में कुछ प्रगति की है लेकिन उनका मूल्यांकन करने पर उनमें कई कमियाँ पाई गई हैं। आश्चर्य नहीं होना चाहिए जब दसवीं योजना कहती है कि 'कमाण्ड क्षेत्र विकास कार्यक्रम की सफलता के लिए इस प्रणाली को जल उपयोगकर्ता संघों को रख-रखाव के लिए सौंप दिया जाना चाहिए। इस प्रकार, कमाण्ड क्षेत्र विकास कार्यक्रम में सहभागिता को पूर्ण सिंचाई प्रबन्धन की संकल्पना से जोड़ा जाना चाहिए।'

ऐसी योजनाओं को यदि रोजगार गारण्टी से जुड़े कार्यों के साथ समन्वित कर लिया जाए तो घरेलू आय पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा क्योंकि, इससे कृषि कार्यों में मजदूरी तथा मानवपूँजी में निवेश बढ़ जाएगा। निर्धन माता-पिता के बच्चों के स्कूल छोड़ देने की एक प्रमुख वजह यह है कि वे शिक्षा पर होने वाले प्रत्यक्ष तथा परोक्ष व्यय को वहन नहीं कर पाते। परिवार की आय बढ़ने से पढ़ाई छोड़ने वालों की संख्या में कमी आएगी, साथ ही भूमि की उत्पादकता में वृद्धि होगी। ये आपस में मिलकर आर्थिक विकास का प्रभाव बढ़ा सकेंगे।

इसके अलाला, भारत को कर पर सकल घरेलू उत्पाद का अनुपात बढ़ाना चाहिए। 1990-2001 के वर्षों के दौरान निम्न आय वालो देशों में केन्द्रीय कर राजस्व सकल घरेलू उत्पाद का 14.1 प्रतिशत था जबकि भारत में केन्द्रीय स्तर पर सकल घरेलू उत्पाद पर कर संग्रह वर्ष 2001-02 के दौरान मात्र 8.2 प्रतिशत तथा 2003-04 के दौरान 9.3 प्रतिशत था। इसकी तुलना चीन से करें, जहाँ 2003 में यह 22 प्रतिशत था। आय में वृद्धि के साथ सकल घरेलू उत्पाद पर कर राजस्व के अनुपात में वृद्धि हो जाती है। मध्यम आय वाले देशों में यह अनुपात 18.5 प्रतिशत तथा उच्च मध्यम आय वाले देशों में 23.1 प्रतिशत है। भारत में आय में वृद्धि के बावजूद सकल घरेलू उत्पाद पर केन्द्रीय कर अनुपात कम ही है, यह 1987-88 के 10.6 प्रतिशत से कम होकर 2003 में 9.3 प्रतिशत ही रह गया है (भारत सरकार)। सकल घरेलू उत्पाद की तुलना में केन्द्र सरकार के कर को अस्सी के दशक के अन्तिम वर्षों के स्तर पर ले आने मात्र से रोजगार गारण्टी अधिनियम पर होने वाले व्यय के भुगतान से अधिक राजस्व इकट्ठा किया सकेगा।

श्रम की खपत


इस विधेयक के क्रियान्वयन से श्रम को कृषि से अन्तरित करने की आवश्यकता समाप्त नहीं हो जाएगी। क्योंकि कृषि क्षेत्र में केवल कुछ लोगों को ही नियमित रोजगार उपलब्ध हो पाता है। इस क्षेत्र में अधिकतर लोग या तो स्वरोजगार में लगे होते हैं अथवा दिहाड़ी श्रमिक होते हैं। यह भी जरूरी है कि नए नियमित काम का बहुलांश अल्प कुशल श्रमिकों के लिए हो, क्योंकि दिहाड़ी मजदूरों को केवल 1.8 वर्ष तथा स्वरोजगार में लगे लोगों को 3.7 वर्ष की शिक्षा प्राप्त होती है। इसके मुकाबले नियमित रोजगार वाले कर्मचारियों की औसत शिक्षण अवधि 7.8 वर्षों (घोष, 2004) की होती है। इसका अभिप्राय यह हुआ कि विकास की ऐसी रणनीति अपनाई जाए जिसमें निर्यात योग्य वस्तुओं के साथ-साथ विशाल तथा निरन्तर बढ़ रहे घरेलू बाजार के लिए ऐसी वस्तुओं का उत्पादन भी किया जाए जिसमें अधिक कौशल की आवश्यकता न हो।

लेकिन गरीबों की तादाद को दोखते हुए उन्हें कृषि से बाहर रोजगार में लगाने से भी सभी काम करने वाले निर्धनों की गरीबी दूर नहीं की जा सकती। इसलिए रोजगार गारण्टी अधिनियम के जरिये प्रत्यक्ष रोजगार-सृजन इस नीति का एक अनिवार्य अंग है।

इसके अतिरिक्त कुल रोजगार में बाद में औद्योगीकरण हुए देशों के उद्योग का अधिकतम हिस्सा उत्पादन के उत्कर्ष पर औद्योगिक देशों के हिस्से से कम है। इंग्लैण्ड में यह 55 प्रतिशत (1901), जापान में 37 प्रतिशत (1973) तथा कोरिया में 33 प्रतिशत (1994) रहा है जबकि चीन में यह 22 प्रतिशत (2000) और भारत में 16 प्रतिशत है। बाद में औद्योगीकरण करने वाले देश पहले के औद्योगिक देशों से प्रौद्योगिकी उधार लेते हैं और समय के साथ-साथ प्रौद्योगिकी की श्रमोन्मुखता कम होती जाती है। इसलिए, कुल रोजगार में नियमित मजदूरी वाले रोजगार की उल्लेखनीय वृद्धि नहीं होगी और भारत सहित अधिकांश विकासशील देशों में स्वरोजगार का हिस्सा महत्त्वपूर्ण बना रहेगा। इससे भी दिहाड़ी श्रमिकों की संख्या कम करने और रोजगार गारण्टी पर विचार करने की जरूरत रेखांकित होती है। निर्धनों को समयबद्ध रोजगार की संवैधानिक गारण्टी देकर यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि ग्रामीण भारत में रहने वाले दो-तिहाई निर्धन परिवार हर साल 6000 रुपए की अतिरिक्त आय की मदद से गरीबी रेखा से ऊपर उठ सकें।

पारदर्शिता सुनिश्चित करना


आलोचकों का तर्क है कि इस अधिनियम से नौकरशाही द्वारा भ्रष्टाचार के अवसरों का विस्तार होगा। लेकिन देश भर में देखा गया है कि सरकार व्यय की प्रभावी सामुदायिक निगरानी न केवल सम्भव है, यह कारगर भी है। इस तरह की कारगर निगरानी के लिए सूचना के अधिकार तथा सामाजिक लेखा परीक्षा की जरूरत होती है। दिल्ली, राजस्थान, तमिलनाडु, कर्नाटक, महाराष्ट्र तथा गोवा जैसे अनेक राज्यों ने सूचना का अधिकार सम्बन्धी कानून लागू किया है। मध्य प्रदेश तथा उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों ने लोगों को सूचना उपलब्ध कराने के लिए कार्यपालक आदेश जारी कर रखा है। जनवरी 2003 में भारत सरकार द्वारा लागू किया गया सूचना की आजादी अधिनियम (एनसीपीआरआई, 2004) भी इस दिशा में एक उल्लेखनीय उपलब्धि है। एमकेएसएस जैसे सामाजिक संगठनों ने दिल्ली और राजस्थान में यह दिखा दिया है कि सूचना के अधिकार के द्वारा किस तरह नौकरशाही में भ्रष्टाचार को समाप्त किया जा सकता है। इसलिए इसके आलोचकों को विषयान्तरण का दोषी माना जा सकता है।

असली समस्या यह है कि अधिनियम के वर्तमान स्वरूप में महत्त्वपूर्ण तत्वों का अभाव है। इसमें इस आशय का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं किया गया है कि रोजगार गारण्टी कार्यक्रमों का नियन्त्रण, नियोजन एवं निगरानी पंचायती राज संस्थाओं द्वारा किया जाना चाहिए। इसके अन्तर्गत यह उल्लेख होना चाहिए कि निगरानी एजेंसियाँ सभी स्तरों पर चुने गए निकायों के प्रति उत्तरदायी और जवाबदेह होंगी तथा ग्राम सभाओं के द्वारा नियमित रूप से सामाजिक लेखा परीक्षा की जानी चाहिए। यह वास्तविक जनतान्त्रिक विकेन्द्रीकरण का सार होगा।

गायब तत्व


विधेयक के संशोधित प्रारूप में कई तत्व गायब हैं। पहला, पूरे देश में इस अधिनियम का समयबद्ध रूप से विस्तार करने का कोई प्रावधान नहीं है। दूसरा, निगरानी और सामाजिक लेखा परीक्षा का अधिकार पंचायती राज संस्थाओं के पास नहीं है। उम्मीद की जाती है कि जिस संसदीय समिति के पास विधेयक के प्रारूप को विचार करने के लिए भेजा गया है, वह इन मुद्दों पर गम्भीरतापूर्वक विचार करेगी।

इनके अलावा, इसमें विधेयक को कमजोर बनाने वाली अन्य धाराएँ भी हैं। पहला, वर्तमान प्रारूप में कहा गया है, 'न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, 1948 में शामिल प्रावधानों के बावजूद केन्द्र सरकार इस कार्यक्रम के तहत रोजगार प्राप्त श्रमिकों के भुगतान के लिए मजदूरी की दर तय कर सकती है।' इस तरह की धारा का इस्तेमाल कार्यक्रम का महत्त्व कम करने तथा मजदूरी की दर बहुत कम निर्धारित करने के लिए किया जा सकता है।

दूसरे, प्रारूप में केवल 'निर्धन' परिवारों को रोजगार भत्ता देने की बात कही गई है। लेकिन ऐसे परिवारों की पहचान के लिए आमतौर पर प्रयोग की जाने वाली गरीबी रेखा से नीचे के लोगों की सूची को प्रायः अविश्वसनीय माना जाता है। गरीबी रेखा से ऊपर के लोगों को रोजगार न दे पाने की स्थिति में विधेयक में कोई प्रावधान न कर उन्हें इसके दायरे से बाहर छोड़ दिया गया है। यह पारम्परिक रूप से इसके सफल तत्व के रूप में सुज्ञात 'आत्मचयन' के सिद्धान्त की अवहेलना करता है।

तीसरे, भूमि कानून पहले से ही महिलाओं को लेकर पूर्वाग्रहग्रस्त हैं। इसके आलोक में यह विधेयक सभी ग्रामीण क्षेत्रों में व्याप्त लिंग आधारित भेदभाव को इस आशय की एक धारा शामिल कर थोड़ा दुरुस्त कर सकता था कि किसी प्रखण्ड में रोजगार प्राप्त करने वाले श्रमिकों की कम-से-कम एक-तिहाई महिलाएँ होंगी। उदाहरण के लिए, यदि ग्रामीण घरों में बनाए जाने वाले शौचालयों के कार्यक्रम में महिलाओं को भी शामिल कर लिया जाए तो इससे गरीब ग्रामीण महिलाएँ दोगुना स्वाधीन होंगी- एक तो उनके हाथों में कमाई होगी, दूसरे वे बाहर मलत्याग के लिए जाने में शामिल अपमान, असुरक्षा, गोपनीयता के अभाव और स्वास्थ्य सम्बन्धी जोखिम से बच पाएँगी।

(लेखक संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम में पूर्व एवं दक्षिण एशिया क्षेत्र के लिए क्षेत्रीय आर्थिक सलाहकार-निर्धनता एवं प्रशासन हैं)

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