लोगों के लिये अभिशाप बना गंडेरी का पानी

Submitted by Hindi on Thu, 06/18/2015 - 15:45
भारत वर्ष में नहरे खुदवाई गयी सिंचाई हेतु। लेकिन इन नहरों से भारतीय किसानों को लाभ के बजाए घाटा ही हुआ है। जब सुखा का समय रहता है, तो नहरों से पानी नापता रहता है। जब भयंकर बारिश होती है, तो नेपाल के तरफ से ज्यादा पानी छोड़ा जाता है जिससे हमारी कोशी तथा गंडक नदियों में उफान आ जाता है, तटबंध टूट जाते है, हजारों हेक्टेयर फसल बर्बाद हो जाते हैं, बहुत सारे गाँव तबाह हो जाते हैं। छोटी गंडकी युगों–युगों से हमारी जीवन संगिनी रही है। गोपालगंज जनपद के ‘हिरापकड़’ ग्राम के आस-पास से निकलने वाली यह नदी सिवान जिले के बहुत से ग्राम पंचायतों को पार कर सारण जिले के सोनपुर रेलवे स्टेशन से पहले ही उत्तर भारत की सबसे महत्त्वपूर्ण नदी गंगा में अपने को समाहित कर देती है। वैसे तो इस श्रिनकाय तारिणी का नाम नही मिलता है, परन्तु कहीं–कहीं ग्रामीण मानचित्र में इसे ‘गंडेरी’ नाम से दिखाया गया है। ‘गंदारी शब्द का अर्थ भी विचित्र है। हमारे इलाके में ‘गन्ना’ के बीज को ‘गेड़ी’ के पौधों की सही– ढँग से पालन– पोषण करने वाली माँ का नाम ‘गंडेरी’ है।

इस ‘गंडेरी’ के किनारे बसने वाले निरीह किसानों का कहना है, पहले यही नदी हमारे लिए वरदान थी, आज अभिशाप बनी हुई है। हमलोग इसके किनारे गन्ना की ‘गोड़ी’ का रोपण करते थे। शानदार गन्ने का फसल होता था। तैयार गन्ना के फसल में एक किनारे से दूसरे किनारे तक जाना कठिन काम था। एक बार गन्ना के बुआई के बाद लगातार पाँच-छह साल तक हम लोग फसल काटते थे। जिससे नगदी आमदनी होती थी। जानवरों के लिए छह–सात माह का हरा चारा मिल जाता था। साल भर के लिए जलावन हो जाती थी।

लेकिन आज? इस गंडेरी के दोनों तरफ मिलों दूर तक गजब की उपजाऊ भूमि थी। उस समय उर्वरक का प्रयोग नही होता था। मात्र गोबर खाद का ही प्रयोग होता था। और गजब की उपज मिलती थी। कृषि के सारे संसाधन अपने थे। हल–बैल, बीज–खाद हमलोगों में किसी को कोई दुःख नही था। साल भर खर्च करने के बाद भी बचत के रूप में कुछ बच जाता था।

इस गंडेरी के आस–पास के इलाके की मिट्टी की बनावट गजब की है। दोमट मिट्टी जो गर्मी के दिन्नों में भी अपनी ‘नमी’ को पूर्णतः नहीं खोती है। जिससे गन्ने की फसल की सिंचाई न के बराबर करनी पार्टी है। यह वह इलाका है, जहाँ सन 1934 के भूकम्प का असर नहीं पड़ा और जब सारा बंगाल आकाल के भार से जूझ रहा था, तब भी हमारे इलाके के लोग खुशहाल थे, अकाल के बेअसर। अंग्रेजों के ज़माने में यहाँ नील की खेती होती थी। इस नदी के किनारे सिवान जिले के जोगपुर कोठी और चौकी हसन में नीलहे साहबों की कोठियाँ थी। जोगापुर कोठी में आज भी अंग्रेजों द्वारा बनाए गए शानदार मकान है।

यह मैदानी नदी जिसका उद्दगम स्थान कोई बर्फीला पर्वत नहीं है। इसका सदियों से एक ही कार्य रहा है– बरसाती जल को, जो किसानी कार्य से अधिक होते हैं, ढोकर इस क्षेत्र से बहार निकाल देना ताकि गन्ना और धान की फ़सल डूब न जाए। बड़ी नदियों के सहायक नदियों के समान ही, इसकी भी सहायक नाले हैं जो सुदूर देहाती इलाकों के बरसाती गन्दला जल को इस नदी तक पहुँचाते हैं। इस इलाके में एक गाँव है हरिहरपुर लालगढ़ जो नाला और नदी के बीच में बसा हुआ है। यह इस गाँव से जल निकासी का काम करता है, तथा पुनः उलीनगर चैनपुर गाँव के समीप इस नदी में विलीन हो जाता है।

महत्त्वपूर्ण लेकिन हमारी बर्बादी का कारण प्राकृतिक न होकर कृत्रिम है। आजादी के बाद भारत सरकार ने नेपाल से समझौता किया पनबिजली बँटवारे पर। भारत सरकार ने पनबिजली नेपाल को दिया तथा सिंचाई हेतु जल अपने को लिया। यहीं से बर्बादी की कहानी शुरू होती है।

भारत वर्ष में नहरे खुदवाई गयी सिंचाई हेतु। लेकिन इन नहरों से भारतीय किसानों को लाभ के बजाए घाटा ही हुआ है। जब सुखा का समय रहता है, तो नहरों से पानी नापता रहता है। जब भयंकर बारिश होती है, तो नेपाल के तरफ से ज्यादा पानी छोड़ा जाता है जिससे हमारी कोशी तथा गंडक नदियों में उफान आ जाता है, तटबंध टूट जाते है, हजारों हेक्टेयर फसल बर्बाद हो जाते हैं, बहुत सारे गाँव तबाह हो जाते हैं।

इस इलाके के दुःख का कारण नहर योजना ही है। गोपालगंज से माँझा होकर आने वाली नहर तरवारा के पास चंचोपाली गाँव के किनारे अपनी पानी गिरती है, जिससे बहुत सारा नहर का गाद यानि रेत वह गिरता है। वह पानी और रेत चंचोपाली होकर गुजरने वाली ‘गंडेरी’ नदी में पहुँच गया है उसपर राडी घास का एक छत जंगल हो गया है। जहाँ से ‘गंडेरी’ नदी का पानी निकलने का रास्ता पूर्णतः बँद हो गया है। इसका भयंकर परिणाम नदी के उत्तरी–पूर्वी विस्तृत इलाके के लोग भाग रहे हैं।

गंडेरी नदी के पानी का निकास बंद हो जाने के कारण निम्नलिखित गाँव मुसीबत में है।

 

 

 

गाँव

पंचायत

प्रखंड

चाचोपाली

कनिपुरा

गोरयाकोठी

कताकपुर सत्कार

गोरयाकोठी

 

कलादुमरा

महमदपुर

गोरयाकोठी

नवलपुर

   

महमदपुर

   

मिर्जापुर

   

पत्राह्था

हरिहरपुर

लालगढ़

बर्हरिया

अलीनगर

चैनपुर

पत्राहथा

मठिया

 

वसिलपुर

हरिहरपुर लालगढ़

 

सिकन्दरपुर

सिकन्दरपुर

बरहारिया

चारी

   

मेधवार

मझवलिया

गोरयाकोठी

चांदपुर

   

सुस्तान्पुर्खुर्द

   

लाद्धि

लाद्धि – सरारी

 

माधोपुर

माधोपुर

महाराजगंज

 


तत्काल इतनी गम्भीर समस्या खरी है, की उसका बयाँ करना ही कठिन लगता है। गंडेरी का पानी इसी इलाके में जमा हो जाता है। धान की फसल डूबकर पूरी तरह बर्बाद हो जाती है, भयंकर जल जमाव के कारण गन्ना का विकास नहीं हो पाता है, तथा गन्ना के फसल खेतों में सड़ जाते है। रबी फसल के समय तक खेत का जल जमाव ख़त्म नहीं होता, जिससे रबी फसल की बुआई समय पर नहीं हो पाती है। सारा इलाका राडी घास के जंगल में तब्दील होता जा रहा है।

इसका प्रभाव खेती पर भी पड़ा है। इस समय खेती करना महँगा कार्य है। बैलों का ज़माना ख़त्म हो गया, ट्रैक्टर की जुताई महँगी है, बीज भयंकर रूप से महँगे है। उर्वरक की सब्सिडी ख़त्म होने से किसानों को फसल लगाने में बहुत खर्च आ रहा है। फसल लग जाने के बाद भयंकर बाढ़ एवं जल–जमाव के कारण किसान दिवालिया हो गए हैं। किसानों को अपनी रोटी का भी जुगार नहीं हो पा रहा है। लाचार किसान यह क्षेत्र छोड़कर जीविका के लिए दूर–दराज के शहरों की तरफ भाग रहे हैं। भूतकाल का यह खुशहाल इलाका मायूसी से घिरा हुआ अँधेरी रात के समान दिखाई दे रहा है।
 

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