पर्यावरण, जनसंख्या एवं आर्थिक विकास

Submitted by birendrakrgupta on Thu, 06/18/2015 - 17:35
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योजना, जून 2004
.आदिकाल से मानव और प्रकृति का अटूट सम्बन्ध रहा है। सभ्यता के विकास में प्रकृति ने महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की है। विकास के प्रारम्भिक चरण में कोई भी जीवधारी अथवा मनुष्य सर्वप्रथम प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करने के लिए उसके अनुकूल होने का प्रयास करता है, इसके पश्चात वह धीरे-धीरे प्रकृति में परिवर्तन करने का प्रयास करता है। अतः अनुकूलन की प्रक्रिया धरातल पर जीवन को बनाए रखने वाली एक कुंजी है, जो उसे विकसित होने का निरन्तर अवसर प्रदान करती है।

किसी भी क्षेत्र का विकास वहाँ के मानव संसाधन पर निर्भर करता है। मनुष्य द्वारा ही प्राकृतिक संसाधनों का सर्वोत्तम उपयोग किया जा सकता है। मनुष्य ही प्राकृतिक पर्यावरण को संवारता भी है और नष्ट भी करता है और स्वयं उससे प्रभावित भी होता है। इसलिए मनुष्य और पर्यावरण का घनिष्ठ सम्बन्ध है।वर्तमान में मनुष्य ने अपने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में इतना अधिक विकास किया है कि उसका जीवन आरामदायक हो गया है, परन्तु यह भी सत्य है कि अपनी बढ़ती हुई जरूरतों को पूरा करने के लिए मनुष्य जिस क्रूरता से पेड़ों और जंगलों को काट रहा है, दिन प्रतिदिन नई-नई इमारतें, सड़कें, भवन, कारखाने आदि बना रहा है उससे प्रकृति में असन्तुलन होने का खतरा बढ़ता जा रहा है, क्योंकि जिस प्रकार मनुष्य को जीवित रहने के लिए भूमि (आवास) की आवश्यकता होती है उसी प्रकार प्रकृति का प्रत्येक जीव-जन्तु, पेड़-पौधे प्रकृति के महत्त्वपूर्ण अंग है। यदि इनमें से एक की भी कमी हो जाए तो उसका प्रभाव दूसरे पर पड़ने लगता है।

वर्तमान में मनुष्य प्रकृति का स्वामी बनने के प्रयास में लगा हुआ है, आधुनिकता के नाम पर वह प्रकृति का शोषण करता जा रहा है। जब हम आधुनिकता की बात करते हैं तो यह जान लेना भी अत्यन्त आवश्यक है कि आधुनिकता से क्या तात्पर्य है? वास्तव में आधुनिकता का अर्थ किसी भी चीज का ऐसा नया रूप जिसमें ऐसी कोई विसंगति न हो जो कि उसकी महत्ता में कमी करती हों, परन्तु आज दिन-प्रतिदिन आधुनिकता के परिणामस्वरूप मनुष्य ने मनुष्य की ही महत्ता को समाप्त किया है। कुछ विद्वान जो आधुनिकता एवं प्रौद्योगिकी की वकालत करते हैं वे इसके पक्ष में यह तर्क देते हैं कि आज विश्व का जो नक्शा हमारे सामने है क्या आधुनिकता के बिना उसकी कभी कल्पना की जा सकती थी? परन्तु वह यह भूल जाते हैं कि आधुनिकता के नाम पर जिसे विकास कहा जा रहा है वह कितने लोगों के हिस्से में आ रहा है, क्या इसे समग्र विकास कहा जा सकता है? विकास की यह असंगति हमारे सामाजिक, सांस्कृतिक एवं पर्यावरण को प्रदूषित कर रही है।

 

भारत में विकास दर एवं प्रदूषण दबाव में वृद्धि

 

यूनिट

1975

1995

प्रतिशत वृद्धि

सकल घरेलू उत्पाद

रु. लाख में

10,49,680

27,61,320

163

यातायात प्रदूषण

मीट्रिक टन

7,71,610 (57.3)

(74.4)

650

औद्योगिक प्रदूषण

मीट्रिक टन

5,75,081 (42.7)

19,95,636 (25.6)

247

कुल प्रदूषण

मीट्रिक टन

13,46,691

77,85,266

478

 

पर्यावरण एवं आर्थिक विकास


विकास एवं परिवार में घनिष्ठ सम्बन्ध है। किसी भी राष्ट्र का विकास मुख्यतः इस बात पर निर्भर करता है कि उस राष्ट्र में प्राकृतिक संसाधनों की पूर्ति कितनी है व भविष्य के लिए इनकी उपलब्धता कितनी है। इसके अतिरिक्त इन संसाधनों की गुणवत्ता भी इसे प्रभावित करती है। साथ ही साथ उस देश में पर्यावरण संसाधन इस बात पर भी निर्भर करते हैं कि वहाँ की अर्थव्यवस्था का स्वरूप कैसा है वह वहाँ किस प्रकार की उत्पादन तकनीकें एवं पर्यावरण सुरक्षा सम्बन्धी नीतियाँ अपनायी जा रही हैं। विकास को प्रभावित करने वाले कारकों में जल एवं वायु प्रदूषण भी आते हैं जो आर्थिक क्रियाओं को अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करते हैं। वर्तमान समय में तेजी से बढ़ता हुआ औद्योगीकरण पर्यावरण को प्रभावित कर रहा है। तीव्र गति से बढ़ते हुए औद्योगीकरण के परिणामस्वरूप शहरीकरण, वाहनों में वृद्धि, ध्वनि प्रदूषण आदि पर्यावरण प्रदूषण के बढ़ा रहे हैं। यदि हम भारत के सन्दर्भ में पर्यावरण एवं आर्थिक वृद्धि दर की तुलना करें तो ज्ञात होता है कि पिछले 20 वर्षों में जहाँ देश में आर्थिक वृद्धि दर में 163 प्रतिशत की वृद्धि की है वहीं पर्यावरण पर प्रदूषण का दबाव इन वर्षों में 475 प्रतिशत से भी अधिक बढ़ा है। सन 1975 से 1995 की अवधि के मध्य औद्योगिक प्रदूषण में 247 प्रतिशत की वृद्धि हुई है जबकि इसी अवधि में वाहनों के कारण होने वाले प्रदूषण में 650 प्रतिशत की वृद्धि रही। 1995 में कुल प्रदूषण में औद्योगिक प्रदूषण का भाग लगभग 26 प्रतिशत था। इसके पश्चात की अवधि में भी इसमें किसी विशेष प्रकार का सुधार नहीं हुआ है। ज्ञात हो कि वाहनों की संख्या में तीव्र वृद्धि औद्योगीकरण का ही परिणाम है और ये दोनों एक-दूसरे से अप्रत्यक्ष रूप से सम्बन्धित भी हैं। कुल प्रदूषण में औद्योगिक प्रदूषण के भाग में 1975 की अपेक्षा हालांकि कुछ कमी आई है परन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि औद्योगिक इकाइयाँ प्रदूषण रहित हो गई हैं बल्कि वाहनों की संख्या औद्योगिक इकाइयों की तुलना में तेजी से बढ़ी है जिस कारण इनसे होने वाले प्रदूषण में भी वृद्धि हो रही है।

तीव्र गति से बढ़ते हुए औद्योगीकरण के परिणामस्वरूप शहरीकरण, वाहनों में वृद्धि, ध्वनि प्रदूषण आदि पर्यावरण प्रदूषण के बढ़ा रहे हैं। यदि हम भारत के सन्दर्भ में पर्यावरण एवं आर्थिक वृद्धि दर की तुलना करें तो ज्ञात होता है कि पिछले 20 वर्षों में जहाँ देश में आर्थिक वृद्धि दर में 163 प्रतिशत की वृद्धि की है वहीं पर्यावरण पर प्रदूषण का दबाव इन वर्षों में 475 प्रतिशत से भी अधिक बढ़ा है।पर्यावरण को प्रदूषित करने वाले कारकों में जल प्रदूषण का भी महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। पिछले 6 वर्षों के दौरान देश में ऐसी कोई भी नदी नहीं है जो आवश्यक मानक स्तर को पूरा कर सकी हो, जिस कारण लोगों को पीने का स्वच्छ पानी नहीं मिल पाता और लोगों को अनेक प्रकार की बीमारियों का सामना करना पड़ता है। इसका प्रमुख कारण भी औद्योगिक इकाइयाँ ही हैं जो अपने यहाँ प्रयुक्त हुए कचरे को इन्हीं नदियों में बहा देती हैं जो जल को प्रदूषित करने का कार्य करता है। एक अनुमान के मुताबिक विभिन्न प्रकार की औद्योगिक इकाइयों द्वारा दामोदर घाटी में प्रतिदिन लगभग 50 बिलियन प्रदूषित कचरा प्रवाहित किया जाता है। जो घाटी को बहुत ज्यादा प्रभावित करता है। धार्मिक अन्धविश्वास भी नदियों के प्रदूषण को बढ़ाने में एक महत्त्वपूर्ण कारक है। इसके कारण लाखों व्यक्ति प्रतिवर्ष नदियों में लकड़ी, राख, मनुष्य एवं जानवरों के शवों को प्रवाहित कर देते हैं। गाँवों में नदियों के पास रहने वाले व्यक्तियों के पास जहाँ पर्याप्त सुविधाएँ नहीं हैं वे इन्हीं नदियों का पानी पीते हैं और उनका सवास्थ्य खराब हो जाता है।

वातावरण को दूषित करने में जल एवं वायु प्रदूषण का प्रमुख स्थान है इस बात से तो लगभग सभी परिचित हैं परन्तु ध्वनि से होने वाले पर्यावरणीय प्रदूषण के प्रति आज भी ज्यादातर व्यक्ति अनभिज्ञ हैं। शायद इसीलिए उन्हें यह आभास भी नहीं है कि तेज ध्वनि से न केवल मनुष्य की कार्यक्षमता एवं स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ता है बल्कि इससे पेड़-पौधों, इमारतों आदि को भी नुकसान पहुँचता है। एक शोध से ज्ञात हुआ है कि शोर-शराबे वाली जगहों पर रहने वाले बच्चों की स्मरणशक्ति शान्त जगह पर रहने वाले बच्चों की तुलना में कम पाई गई। वर्तमान समय में ध्वनि प्रदूषण की तीव्रता प्रत्येक दस वर्ष में दोगुनी से ज्यादा होती जा रही है।

पर्यावरण एवं जनसंख्या


किसी भी देश में प्राकृतिक सम्पदा का समुचित विकास एवं उपयोग करने के लिए उस देश में विशिष्ट सीमा तक जनंसख्या का होना अति आवश्यक होता है लेकिन इसके उपरान्त व्यक्तियों की संख्या की अपेक्षा उनकी गुणवत्ता देश को समृद्ध बनाने में अधिक योगदान करती है। किसी भी क्षेत्र का विकास वहाँ के मानव संसाधन पर निर्भर करता है। मनुष्य द्वारा ही प्राकृतिक संसाधनों का सर्वोत्तम उपयोग किया जा सकता है। मनुष्य ही प्राकृतिक पर्यावरण को संवारता भी है और नष्ट भी करता है और स्वयं उससे प्रभावित भी होता है। इसलिए मनुष्य और पर्यावरण का घनिष्ट सम्बन्ध है। जनसंख्या वृद्धि किसी देश के लिए लाभदायक है अथवा हानिकारक यह उस देश के प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता पर निर्भर करती है। विकसित देशों में विशेषकर यूरोपीय देशों में जहाँ भूमि पर जनसंख्या का दबाव बहुत कम है एवं जहाँ प्राकृतिक संसाधनों का दोहन पूर्णतः नहीं हो पाया है जनसंख्या में वृद्धि वास्तव में मानवशक्ति में वृद्धि करती है।

आबादी के बढ़ने के कारण जंगल के पेड़-पौधें, चारे और मकान आदि के लिए काटे जा रहे हैं। यहाँ आबादी के दबाव के कारण घास तक छिल जाती है, खेती की भूमि पर दबाव बढ़ने से उसका उपजाऊपन नष्ट होता जा रहा है। खेती के योग्य भूमि धीरे-धीरे बंजर और रेगिस्तान में बदलती जा रही है। बढ़ती हुई जनंसख्या के लिए अधिक अन्न एवं अधिक अन्नोत्पादन के लिए नए-नए तरीके, रासायनिक खाद, कीटनाशक दवाओं का अधिक प्रयोग किए जाने से फसल तो बढ़ती है परन्तु इनके बार-बार प्रयोग किये जाने के कारण प्रदूषण भी बढ़ता है।

उपर्युक्त विवेचन के पश्चात कहा जाता है पर्यावरण, जनसंख्या एवं आर्थिक विकास एक-दूसरे से घनिष्ट रूप से सम्बन्धित है और एक-दूसरे पर निर्भर भी हैं। जनसंख्या वृद्धि एवं आर्थिक विकास किसी देश के पर्यावरण को किस प्रकार प्रभावित करते हैं यह जनसंख्या के आकार पर भूमि की उपलब्धता एवं प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता पर निर्भर करता है। पर्यावरण जिसका एक महत्त्वपूर्ण अंग वन है एवं वन वृक्षों से मिलकर बनते हैं। हमारे देश की परम्परा में भी वृक्षों को काटना पाप माना गया है। एक श्लोक में कहा भी गया हैः-

“एक वृक्षोहि यो ग्रामे भवेत् पर्णफलान्वितः
चैत्यो भवति निर्ज्ञातिरचनीय सूपजितः।”


अर्थात यदि गाँव में एक वृक्ष, फल और फूलों से भरा हो तो वह स्थान हर प्रकार से अर्चनीय है।

वर्तमान परिदृश्य में यह आवश्यक हो गया है कि मनुष्य को आर्थिक उन्नति के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण पर भी ध्यान देना चाहिए एवं आर्थिक उन्नति का उद्देश्य बिना पर्यावरण विनाश के विकास की धारणा होनी चाहिए जिससे विकास की गति भी न रुके और प्राकृतिक सन्तुलन को भी बनाए रखा जा सके और यह तभी सम्भव हो सकेगा जब मनुष्य खुद इसके प्रति जागरूक हो एवं पर्यावरण की महत्ता को समझे।

(लेखक लखनऊ के जयनारायण पी.जी. कॉलेज में अंशकालिक प्रवक्ता हैं)

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