आजाद भारत में गुलाम आदिवासी

Submitted by Hindi on Mon, 06/22/2015 - 12:49
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इतिहास में पहली बार सरकार 144 धारा लागू कर हाईकोर्ट का शिलान्यास किया। लेकिन पूर्व से ही संगठित आदिवासियों मूलवासियों की भीड़ ने सरकार के मंसूबे में पानी फेर दिया। मुख्यमन्त्री को तीखे प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। यह कहना गलत नहीं होगा कि आदिवासी मूलवासियों का इतिहास बहुत ही गौरवपूर्ण एवं संघर्षशील रहा है। आदिवासियों ने आजादी से पहले अपने देश के दुश्मनों से लड़ाईयाँ लड़ी और आजादी के बाद अपने ही देश के स्वार्थी, दमनकारी नीति बनाने वाले प्रशासन के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे हैं।

मौजूदा दौर में सवाल ये उठता है कि आखिर विकास किसका, औद्योगिक घरानों का या फिर राज्य की जनता या फिर उन विस्थापितों का जिन्होंने राष्ट्र के विकास के नाम पर अपनी जमीन दी। जहाँ केवल जमीन लेने वालों की केवल फौज खड़ी हो। वहीं आदिवासियों ने सदियों पुराने अपनी पारम्परिक, ऐतिहासिक जमीन जिसे कभी उनके पुरखों ने अपनी मेहनत से जंगल-झाड़, पहाड़- पर्वत को काटकर घर-आँगन, खेत- खलियान एंव पूजा- स्थल बनाया। आज उनकी जमीन का सौदा हो रहा है। जमीन के असली मालिक को दूध से मक्खी की तरह निकाल कर फेंका जा रहा है।

एचइसी द्वारा अधिग्रहीत ज़मीन में आदिवासियों का 30 सरना स्थल खत्म हो रहा हैं। पर सरकार को आदिवासियों की आस्था की परवाह नहीं हैं। आधुनिक विकास का जनक भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री जवाहर लाल नेहरू ने राज्य के विकास के लिए 1960 में एचइसी- हैवी एंजिनियरिंग कारपोरेशन, की स्थापना झारखण्ड जैसेे पिछड़े इलाके राॅची जिले में की थी। ताकि आदिवासियों मूलवासियों को विकास की मुख्यधारा में लाया जा सके।

एचइसी की स्थापना का मकसद क्या था और एचइसी का विकास किसके लिए? अगर हम थोड़े एचइसी के इतिहास में जाए तो एचइसी स्थापना का मकसद गरीबी एवं बेरोजगारी उन्मूलन था। एचइसी के लिए जमीन भू्-अर्जन अधिनियम 1894 के तहत लिया गया था। जिसका अधिग्रहण 1955 से लेकर 1960 तक चला। जिसके तहत आदिवासी मूलवासियों ने अपनी खेती वाली 9,200 एकड़ हरी-भरी जमीन एचइसी को समर्पित कर दिया। 1996 में बिहार सरकार ‘डीड आॅफ कानवेन्स’ के तहत एचइसी द्वारा अर्जित जमींन का मलिकाना हक पूर्ण रूप से एचइसी को कर दिया। एचइसी ने जरूरत से तीन गुणा ज्यादा जमीन का अधिग्रहण किया और केवल 3 हजार एकड़ में ही तीन प्लांट लगाए गए। एच.एम.टी. पी., एच.एम.बी.पी. और एफ.एफ.पी. इसमें एक प्लांट एफएफपी बंद हो चुका है। बाकी अधिग्रहित भूमि में रैयत अपनी खेती बारी और पारम्पारिक बसाहट के साथ कायम रह गए। सरकार ने इस अतिरिक्त भूमि की सुध नहीं ली और एच.ई.सी. प्रबंधन मनमानी कर भूमि की बिक्री कर अंधाधुंध कमाई करता रहा। इसके विरोध में विस्थापित लोग आन्दोलन करते रहे। लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। 2010 में सरकार ने एच.ई.सी. को अतिरिक्त भूमि बेचने पर रोक लगा दी।

एच.ई.सी. ने कानूनों का उल्लंघन कर सी.आई एस.एफ को 58 एकड़, क्रिकेट स्टेडियम को 158 एकड़ और हाई कोर्ट को 158 एकड़ भूमि बेच दी और मनमाना दर से पैसा वसूला। लेकिन अतिरिक्त भूमि को बचाकर रखने के एवज में विस्थापितों को कुछ भी नहीं दिया गया। यह सब ऐसे ही चलता रहा क्योंकि 1894 के भूमि अधिग्रहण कानून के तहत विस्थापितों में खासकर आदिवासियों ने भूमि वापसी का कोई केस छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम के तहत नहीं दायर किया। इसी का लाभ उठाकर भूमि की बंदरबांट होती रही। 12 जून 2015 को आपाधापी में झाड़खंड सरकार ने विधान सभा का शिलान्यास उस धरती में किया जो कानूनी तौर पर सरकार की है ही नहीं। लगभग 55 सालों तक अधिग्रहण के बाद दखल कब्जा नहीं होने के बावूजद बिना नए सिरे से अधिग्रहण कर सरकार ने जिस तरह से जोर जबरदस्ती किया है उससे लोकतन्त्र की मर्यादा को खतरा पैदा हो गया है। आमतौर पर नई सरकार किसी मेगा प्रोजेक्ट का शिलान्यास करती है तो अखबारों में पूरा विज्ञापन प्रचारित प्रसारित करती है। लेकिन विधान सभा के मामले में बिना प्रचार प्रसार के रातों-रात ही निर्माण कार्य प्रारम्भ कर दिया गया। पूरे रास्ते को बैरीकेटिंग कर दिया गया और 16 मजिस्ट्रेट के साथ 200 पुलिसकर्मियों को ड्यूटी पर तैनात कर दिया गया ताकि परिंदा भी पर ना मार सके। लेकिन विस्थापितों ने तीखा प्रतिरोध किया।

इतनी कुर्बानी के बाद भी मूलवासियों और आदिवासियों के बड़े मन की बात की जा रही है। अब सवाल यहाँ ये है कि क्या आदिवासी इस देश के नागरिक नहीं या क्या इन्हें सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अधिकार नहीं। विकास के नाम पर हमेशा आदिवासियों की बलि चढ़ायी गई हैं। आजादी के बाद से पूरे देश में विकास व राष्ट्र हित के नाम पर लगभग 3 करोड़ से ज्यादा लोग विस्थापित तथा प्रभावित हुए हैं। जिनमें 40 प्रतिशत आदिवासी, 20 प्रतिशत दलित व कमजोर वर्ग के लोग हैं। यानि 60 प्रतिशत लोगों को राष्ट्रहित के नाम पर जमीन की कुर्बानी देनी पड़ी। कुल विस्थापितों में से मात्र 25 प्रतिशत लोगों का किसी तरह पुर्नवास हो सका है। तथा शेष 75 प्रतिशत विस्थापित लोग कहाँ गये इसकी जानकारी सरकार तक को मालूम नहीं हैं।

आजादी के 66 वर्षों के बाद भी पुर्नवास नीति नहीं बन पायी है। जबकि वही सरकार विशेष आर्थिक क्षेत्र के नाम पर कानून बनाने में सफल हुए हैं। जिसे लाखों लोग विस्थापन के कगार पर हैं। विकास के नाम पर लाखों लोग बेघर हो रहे, उनका अभी तक कोई विकास नहीं हो पाया है। पर औद्योगिक घरानों के लोगों का विकास जरूर हुआ है। उदाहरण के तौर पर फोब्र्स की धनवान सूची 2015 के अनुसार, धनाढ्य मुकेश अंबानी फिर इस साल भारतीयों में से सबसे अमीर व्यक्ति हुए हैं, जो 21 अरब डाॅलर के नेटवर्क के साथ अपनी शीर्ष स्थिति लगातार आठवें साल बरकरार रखी हैं। इसके बाद दिग्गज कारोबारी में दिलीप साधवी 20 लाख डाॅलर के नेटवर्क के साथ 44वें, पायदान वैश्विक स्तर से रहे। इसके बाद अजीम प्रेमजी 19.1 अरब डाॅलर के साथ वैश्विक स्तर से 18वें पायदान पर रहें। ये तो थे पूँजीपतियों का पायदान।

इन पायदानों में कहीं भी विस्थापितों का पायदान नहीं हैं। जबकि जमींन अधिग्रहण विकास के नाम पर लेते रहा गया है। जिसमें एचइसी मुख्य रूप से शामिल हैं। एचइसी स्थापना से आदिवासियों का विकास नहीं बल्कि विनाश हुआ है। एचइसी में बड़े पैमाने पर बाहरी लोगों की बहाली हुई जिसमें आदिवासियों का नाममात्र का ही बहाली हुआ। 22 हजार कर्मचारियों की बहाली की गई थी । सिर्फ दो तीन साल ही एचइसी मुनाफे में रही बाकी साल सिर्फ घाटे में ही चलते रही। 22 हजार कर्मचारी वाला संस्थान आज 2 हजार कर्मियों पर सिमट गया है। एचइसी अपना कर्ज माफ करवाने के लिए सरकार को जमीन रिज्यूम कर दे रही है। जिसमें सरकार हाई कोर्ट एंव विधानसभा का निर्माण कर रही हैं। इतिहास में पहली बार सरकार 144 धारा लागू कर हाईकोर्ट का शिलान्यास किया। लेकिन पूर्व से ही संगठित आदिवासियों मूलवासियों की भीड़ ने सरकार के मंसूबे में पानी फेर दिया। मुख्यमन्त्री को तीखे प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। यह कहना गलत नहीं होगा कि आदिवासी मूलवासियों का इतिहास बहुत ही गौरवपूर्ण एवं संघर्षशील रहा है। आदिवासियों ने आजादी से पहले अपने देश के दुश्मनों से लड़ाईयाँ लड़ी और आजादी के बाद अपने ही देश के स्वार्थी, दमनकारी नीति बनाने वाले प्रशासन के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे हैं। आजाद होते हुए भी गुलाम की जिन्दगी जीने को मजबूर हैं। भूमि अधिग्रहण कानून का दंश से कोई भू-स्वामी नहीं बच पाऐगा।

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