जब जागीं महिलाएँ तो जागा कानून

Submitted by RuralWater on Tue, 06/23/2015 - 10:28

आदिवासियों को उनका हक दिलाने का यह अभियान महिलाओं की अगुआई में चला इसलिये इसका दोहरा लाभ हुआ। एक तरफ इससे महिला सशक्तीकरण हुआ तो दूसरी तरफ इससे आदिवासी समाज की वंचना दूर हुई। उससे भी आगे सरकार का वह वादा जमीन पर उतरा जो कि महज कागज पर तैर रहा था। यह गतिविधियाँ समाज में असन्तोष को कम करती हैं और उसे खुशहाली की ओर ले जाती हैं।

कानून के बारे में समाजशास्त्री कहते हैं कि वह कहीं पर उपस्थित नहीं रहता। यानी वह एक प्रकार का निराकार ब्रह्म है। लेकिन वह उस समय उपस्थित होता है जब वह टूटता है। समाजशास्त्रियों की यह उक्ति आदिवासी समाज के लिये एकदम उल्टी बैठती है। उनके लिये कानून हमेशा उनके खिलाफ या अनुपयोगी होता है जब तक वे आगे बढ़कर उसकी कमान अपने हाथ में न लें। कुछ ऐसी ही स्थिति 2005 के वन अधिकार कानून के साथ भी हुई।

अंग्रेजों के जाने के तकरीबन एक सौ साठ साल बाद 1878 के जिस काले कानून या वास्तविक अर्थों में जंगल के कानून को बदल कर नया कानून लाया गया उसे लागू होने में बहुत दिक्कतें आ रही थीं। अगर कहा जाए कि आदिवासी महिलाएँ एकजुट होकर उसे लागू किये जाने की लड़ाई न लड़तीं तो बनने के दस साल बाद भी वह कानून जस-का-तस पड़ा रहता।

यह पहल की उड़ीसा में काम करने वाली गैर सरकारी संस्था अग्रगामी ने और कुछ सालों के संघर्ष के बाद उसके परिणाम दिखाई पड़ने लगे। हालांकि आजकल विदेशी सहयोग से काम करने वाली संस्थाओं को शक की नजर से देखा जा रहा है और विकास विरोधी मानते हुए उन्हें देश की तरक्की में रोड़ा बताया जा रहा है लेकिन जर्मनी और ब्रिटेन की कुछ संस्थाओं के सहयोग से काम करने वाली अग्रगामी ने महिलाओं को संगठित करके वह काम करके दिखाया जिसकी कल्पना दुष्कर थी।

हालांकि आदिवासी समाज की महिलाएँ उतनी लाचार नहीं हैं जितनी दूसरे सभ्य समाजों की लेकिन आधुनिकता के पैमाने पर उनके पास वे औजार नहीं हैं जिनसे वे इस व्यवस्था से अपने हक हकूक हासिल कर सकें। उन्हें निरक्षरता, रोज़गार की कमी, वित्तीय और ज़मीन सम्बन्धी असुरक्षा लगातार घेरे रहती है। उन्हें मनरेगा का लाभ नहीं मिल पाता। खेतिहर मज़दूरों में 85 प्रतिशत संख्या आदिवासी महिलाओं की है और वे कृषि उत्पादन में 66 प्रतिशत योगदान देती हैं। इसके बावजूद महज 7.3 प्रतिशत महिलाएँ ज़मीन की मालकिन हैं और सिर्फ 1.5 प्रतिशत महिलाओं के पास उनका बैंक खाता है।

अग्रगामी ने ऐसी महिलाओं को बदलाव का हिरावल दस्ता बनाया। उन्होंने पहले गाँव के स्तर पर और फिर ब्लॉक और जिले के स्तर पर महिलाओं को संगठित करना शुरू किया। गाँव के स्तर पर महिला मण्डल बनाए गए और ब्लॉक के स्तर पर महिला महासंघ। उनसे आगे जाकर महिला संसाधन केन्द्रों की स्थापना भी की गई।

तकरीबन 50 घरों को मिलाकर महिला मण्डल बनाया गया जो कि एक स्थान पर महिलाओं को पढ़ाने-लिखाने से लेकर उन्हें विभिन्न प्रकार के प्रशिक्षण देता था। इसमें महिलाओं को आवेदन भरना, शिकायत लिखना और उसे हासिल करने के लिये एकजुटता सिखाई जाती थी। इस ट्रेनिंग के दौरान महिलाओं के भीतर चेतना जगी और उन्हें लगा कि ऐसे तमाम अधिकार हैं जो उन्हें मिलने चाहिए लेकिन नहीं मिल पा रहे हैं।

अग्रगामी ने 2009-2014 के बीच रायगढ़, कोरापुट, कालाहांडी जिलों के काशीपुर, दसमंतपुर और युवामुलरामपुर ब्लाकों में 120 महिला मण्डलों, पाँच महिला महासंघों और तीन महिला संसाधन केन्द्रों की स्थापना की। डब्ल्यूआरसी की भी इस काम में प्रमुख भूमिका है। वे सलाह देने से लेकर समर्थन देने तक तमाम भूमिकाओं में मददगार होते हैं। इन केन्द्रों पर तमाम विभागों के फार्म रखे होते हैं। उन्हें भरवाया जाता है और कहाँ ले जाकर जमा करना है इसमें भी मदद की जाती है। यह केन्द्र दो से पाँच किलोमीटर के दायरे में 15 से 20 गाँवों पर निगाह रखते हैं।

जब अग्रगामी ने महिलाओं के लिये गाँव से लेकर ब्लॉक और जिलास्तर तक इस प्रकार का ढाँचा तैयार कर लिया तो फिर हक के लिये प्रयास शुरू किये गए। सबसे पहले पाँच हजार घरों से जंगल के भीतर भूमि अधिकार के लिये आवेदन तैयार कर भेजे गए लेकिन प्रशासन के कान पर जूँ नहीं रेंगी। पर महिलाओं ने हिम्मत नहीं हारी और दबाव बनाना जारी रखा।

इन लोगों के दबाव में आखिर में कलेक्टर जो किसी प्रकार की कमेटी की प्रमुख होता है उसने सुनवाई की। इस सुनवाई के तहत व्यक्तिगत वन अधिकार के 1880 मामले निपटाये गए। वन अधिकार कानून के तहत 4462.10 एकड़ ज़मीन लोगों में वितरित की गई और 494 दावे उन घरों के पक्ष में निपटाए गए जिनकी प्रमुख महिलाएँ थीं।

महिलाओं की इस जागरुकता के कारण उन्हें इन्दिरा आवास योजना के तहत घर बनाने और पाने के दावे हासिल हुए और नरेगा/मनरेगा के तहत न सिर्फ काम मिले बल्कि बकाया मजदूरी भी हासिल हुई। इतना ही नहीं जो ज़मीन वन अधिकार कानून के तहत मिली थी उसे मनरेगा के तहत विकसित भी किया गया। इस जागरुकता से न सिर्फ एफआरए लागू हुआ बल्कि मनरेगा भी जी उठा। मनरेगा में 1500 परिवारों को काम मिला और 70 परिवारों ने नौकरी माँग सम्बन्धी आवेदन दिये जिसमें 45 को उचित प्रतिक्रिया प्राप्त हुई।

आदिवासियों को उनका हक दिलाने का यह अभियान महिलाओं की अगुआई में चला इसलिये इसका दोहरा लाभ हुआ। एक तरफ इससे महिला सशक्तीकरण हुआ तो दूसरी तरफ इससे आदिवासी समाज की वंचना दूर हुई। उससे भी आगे सरकार का वह वादा जमीन पर उतरा जो कि महज कागज पर तैर रहा था। यह गतिविधियाँ समाज में असन्तोष को कम करती हैं और उसे खुशहाली की ओर ले जाती हैं। लेकिन इनके साथ आदिवासियो के जमीन के हक को छीनने और उन्हें बेदखल करने वाली वे कोशिशें भी बन्द होनी चाहिए जो विकास के नाम पर चल रही हैं और आदिवासियों को विस्थापित करके छोड़ दे रही हैं।

खनन के बहाने बड़ी तेजी से भूमि का अधिग्रहण हो रहा है। आदिवासियों के इलाके में अपार खनिज सम्पदा है। जंगल है, जमीन है जिन पर संयन्त्र लग सकते हैं और बिजली बन सकती है। लेकिन यह काम आदिवासियो को उजाड़कर या प्राकृतिक संपदा का विनाश करके नहीं होना चाहिए। आदिवासी इस बारे में जागरूक हो रहे हैं। संवाद कर रहे हैं और एकजुट होकर सरकार से अपनी बात रख रहे हैं। जरूरत है सरकारी संवेदनशीलता की ताकि आदिवासियों को उनके हक मिलें और जो हक मिलें उन्हें किसी और बहाने से छीन न लिया जाए। इससे न सिर्फ प्रकृति की रक्षा होगी बल्कि समाज के भीतर ऐसा सौहार्द्र बनेगा कि विकास को भी गति मिलेगी।

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