विकास, स्वच्छ वातावरण और भलाई के प्रतीक : संत बलबीर सिंह सीचेवाल

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योजना, दिसंबर 2004
पवित्र काली वेईं (नदी) की कार-सेवा निर्मल कुटिया सीचेवाल के मुख्य संचालक संत बलबीर सिंह सीचेवाल की ओर से चार वर्ष पूर्व आरंभ हुई थी। वह 'वेईं वाला बाबा' के नाम से प्रसिद्ध हैं। सामाजिक-आर्थिक विकास कार्यों के साथ-साथ पारस्परिक भाईचारे के प्रतीक और प्रेरणा के केंद्र बन चुके 'बाबा जी' उनके कार्यों का ब्यौरा यहाँ प्रस्तुत है।काली वेईं (महान कोश के अनुसार सफेद वेईं) यानी निर्मल और स्वच्छ पानी की नदी। सदियों पुरानी इस नदी का स्रोत धनोआ हिम्मतपुर गाँवों (निकट—मुकेरियां, जिला—होशियारपुर) के करीब से बहते व्यास दरिया की सेम है। कहने का तात्पर्य है कि जमीन के नीचे से पानी सोते-झरनों की शक्ल में अपने-आप फूटती है जिससे पानी के बहाव की धारा बनती है और फिर एक नदी का रूप धारण करती है। दसूहा, बेगोवाल, भुलथ्थ, सुभानपुर, सुल्तानपुर लोधी और अन्य गाँवों-कस्बों के करीब से 160 किलोमीटर का रास्ता तय करके 'हरि के पत्तण' के निकट, जहाँ सतलुज और व्यास दरिया आपस में मिलते हैं, में समाहित हो जाती है।

विकास, स्वच्छ वातावरण और भलाई के प्रतीकजैसा कि ऐतिहासिक तथ्य है कि दुनिया की समूची सभ्यताएँ नदियों के किनारों पर विकसित हुई हैं और परवान चढ़ी हैं। काली नदी की भी इस प्रसंग में अपनी पृथक और न्यारी भूमिका है।

काली नदी के किनारे बसा सुल्तानपुर लोधी कस्बा अब जिला कपूरथला का सब-डिवीजन हेडक्वार्टर है, जो कपूरथला से 20 किलोमीटर दक्षिण दिशा में है।

यह उल्लेख करना उपयुक्त होगा कि गुरु नानक यहाँ अपनी बहन बीबी नानकी बी की ससुराल में आकर टिके, इस कारण इस शहर को अथाह प्रसिद्धि मिली। गुरु नानक अपने प्रवास के दौरान लगभग 14 साल वह इसी नदी में स्नान करते रहे। यहीं पर उन्होंने 'न हम हिंदू, न मुसलमान' का नारा बुलंद किया। कहा जाता है कि गुरु नानक ने 'जपुजी' का मूल मंत्र इसी नदी के तट पर उच्चारा था।

अब इस कस्बे में गुरुद्वारा संतघाट, हट्ट साहिब, कोठड़ी साहिब, गुरु का बाग, बेर साहिब आदि प्रसिद्ध ऐतिहासिक गुरुद्वारे हैं।

काली नदी : गंदे नाले का रूप


कभी निर्मल और पवित्र जल के रूप में जानी जाती काली नदी पिछले कुछ दशकों से गंदे नाले की शक्ल अख्तियार करती गई। लोग इसके प्रति गैर-जिम्मेदारी का रवैया अपनाते गए। शहरों के विस्तार के कारण इसके किनारे बसते कस्बों-शहरों, जैसे- कपूरथला, दसूहा, टांडा, बेगोवाल के सीवरों का और आसपास के गाँवों का गंदा पानी इसको मैला करता चला गया। कारखानों के प्रदूषित और रसायनों से भरपूर पानी तथा लोगों की बेसमझी और स्वार्थी भावना के चलते इस नदी के साथ अन्याय और जोर-जबर्दस्ती होती गई। गंदगी के ढेर उसकी छाती पर रखे जाते रहे। परिणामस्वरूप, स्वच्छ पानी का बहाव रुक गया और बूटी, दंभ (एक प्रकार की घास), आक-आकड़ा, नड़ी आदि उगते चले गए। पानी की सड़ांध दूर-दूर तक मार करने लगी। बरसात के दौरान मारक असर अपना जलवा दिखाने लगा। सेम के कारण आसपास के इलाके की फसले गलने-सड़ने लगीं। किसानों में रोष-विद्रोह उपजा। लोग सरकार को ज्ञापन दे-देकर थक गए।

काली नदी : कार-सेवा का सबब


काली नदी की पवित्रता को फिर से बहाल करने के लिए बातें आरंभ हुईं और खत्म हुईं। पर 'धरत सुहाई' नाम की गैर-सरकारी स्वयंसेवी संस्था ने 15 जुलाई, 2000 को इस नदी को प्रदूषण-रहित बनाने के मसले पर विचार-विमर्श करने के वास्ते बुद्धिजीवियों और समाज सेवा को समर्पित शख्सीयतों की बैठक जालंधर में बुलाई। विद्वानों ने पवित्र नदी की खतरनाक और नाजुक हालत पर अपने-अपने विचार पेश किए। उपस्थित जनों ने गंभीरता से चिंता प्रकट की। यह सब सुनने और विचारने के बाद संत बलबीर सिंह सीचेवाल ने इसकी पवित्रता को पुनः कायम करने का जिम्मा लिया और उन्होंने काली नदी की कार-सेवा आरंभ करने के अपने फैसले का ऐलान कर दिया। इस मानसिकता के पीछे ऋषियों-मुनियों, गुरुओं-पीरों की सफाई और पवित्रता की भावना कार्यशील थी। दूसरी बात यह कि इसके जरिए आने वाली पीढ़ियों के लिए एक विरासत छोड़नी थी ताकि वे प्रेरणा ले सकें और वर्तमान पीढ़ी अपनी गलतियों से सुर्खरू हो सकें। कुछ लोगों ने संदेह व्यक्त किया कि इस पहाड़ जैसे बड़े और अनोखे काम को कोई अकेला व्यक्ति कैसे पूरा कर सकता है! पर अगले ही दिन यानी 16 जुलाई, 2000 को संत बलबीर सिंह ने सुल्तानपुर के ऐतिहासिक गुरुद्वारा बेर साहिब को आती सड़क की कार-सेवा आरंभ की ताकि कार-सेवकों को सुल्तानपुर आने के लिए कोई कठिनाई न हो और न ही अधिक समय नष्ट हो।

बहुपक्षीय विकास कार्य और आलोचना


शहर की प्रमुख हस्तियों और लोगों के सहयोग से गुरुद्वारा संत घाट के समीप कार-सेवा शुरू की गई। निश्चय ही यह एक विशाल कार्य का आरंभ था जिसके विषय में आम आदमी सोच भी नहीं सकता। सरकारों की तो बात ही क्या! दूसरे, यह बहुपक्षीय काम अति महत्त्वपूर्ण था जैसे कि नदी के रास्ते की सफाई करना, बाँध लगाना, पेड़ और फूल-पौधे लगाना, बाँध पर पत्थर लगाना, रकबे की निशानदेही करना आदि।

इस सबके पीछे कुछ चुनौतियां भी खड़ी थीं। सरकारी, गैर-सरकारी स्तर पर कई तकनीकी कठिनाइयां सामने थीं जैसे कि अधिकारियों द्वारा सहयोग न करना या नदी के रकबे की निशानदेही करवाने से कन्नी काटना और रिकॉर्ड आदि उपलब्ध न करवाना। एक बड़ी समस्या यह थी कि जिन किसानों की जमीनें नदी के साथ लगती हैं— वे इस बात से डरकर संत सीचेवाल का विरोध करते थे कि नाजायज कब्जे वाली उनकी जमीनें कहीं उनके हाथ से चली न जाएं।

संत सीचेवाल से बातचीत


संत बलबीर सिंह सीचेवाल ने बताया कि कइयों के सामने हाथ जोड़ने पड़े, कइयों को नदी की ऐतिहासिक पवित्रता और उसके लाभों से परिचित कराना पड़ा। राजनेताओं की तरफ से खड़ी की गई रुकावटें लोगों ने स्वयं ही दूर कर लीं। हम मजबूत और दृढ़ इरादे से कार-सेवा के कामों में जुटे हुए हैं और ऐसा करते हुए हमें चार वर्ष हो गए हैं।

अब तक कार-सेवा का काम कितना हो चुका है? इस प्रश्न के उत्तर में संत सीचेवाल ने बताया कि नदी में से बूटी, घास, गारा निकालने, तटबंधों को पक्का करने का काम चल रहा है। [उन्होंने कंप्यूटर पर चल रही ऑडियो-वीडियो सीडी की ओर इशारा करते हुए कहा- इधर देखो, कल (19 अगस्त, 2004) ही इस तरह कार-सेवा शुरू की गई है]। संत जी स्वयं नदी में घुसकर जोर लगाकर बूटी को धकेलते हुए बाहर निकाल रहे थे।

वैज्ञानिक विचार रखने वाले संत सीचेवाल ने कहा कि धान की निरंतर रोपाई और कुछ अधिक पानी चूसने वाले पेड़ों के कारण जमीन के पानी का स्तर काफी नीचे चला गया है। अगर धान के स्थान पर नींबू, किन्नू, नाखे, संतरे, आम, जामुन, अमरूद, अंगूर और अन्य फलों के बाग लगाए जाएं तो पानी को बड़ी हद तक बचाया जा सकता है।उनकी ओर मैंने आश्चर्य से देखा और पूछा- आप? उन्होंने मुस्करा कर कहा कि अगर हम कार-सेवा के लिए नदी में न घुसें तो इस जोखिम भरे काम में संगतें कैसे शामिल हो सकती हैं! हालांकि कार-सेवकों को सांप डसते हैं, जोंके चिपटकर सेवकों का लहू चुसती हैं, अन्य जहरीले कीड़े-मकोड़े काटते हैं, पर संगतों के हौसले बुलंद रहते हैं और जान की बाजी लगाकर गुरु नानक जी की पवित्र नदी को शुद्ध करने के लिए सेवा करते हैं। हम बातें करने में नहीं, हाथ से सेवा करने के काम को तरजीह देते हैं। कार-सेवा में बच्चों से लेकर बूढ़े, माँएं, भाई दिल से लगे हुए हैं। कुछ राजनैतिक नेता भी इस नेक कार्य में शामिल हुए। पवित्र नदी की कार-सेवा संबंधी आर्थिक सहायता प्राप्ति से जुड़े प्रश्न के जवाब में उन्होंने बताया कि संगते दिल खोलकर इस पवित्र कार्य में शामिल हैं। विदेश में बस रही संगतों का भी भरपूर सहयोग मिलता रहता है और वे पंजाब को साफ-सुथरा, सुंदर और आधुनिक रूप में देखना चाहती हैं। नदी-सुधार मिशन के अपने प्रचार के लिए हम तीन बार फिलीपीन्स और दो बार इंग्लैंड गए।

अब तक हुए खर्च के अनुमान के बारे में उन्होंने बताया कि 16 जून, 2003 से पहले करवाए गए पंजाब सरकार के एक सर्वेक्षण के अनुसार पवित्र नदी पर करवाया जा चुका कार्य लगभग 50 करोड़ रुपए से अधिक के बराबर था। जहाँ तक सरकारी योगदान की बात है, वह हमारे नदी कार-सेवा के यत्नों की प्रशंसा करती रहती है।

कार-सेवा में सैकड़ों लोगों के शामिल होने की जानकारी दी गई कि नदी के किनारे बसे गाँवों सहित दूर-दराज के गाँवों की संगत का भरपूर सहयोग और योगदान रहा। रोजाना 50 गाँवों की संगत अपनी ट्रॉलियों में बैठकर दूध और लंगर का प्रबंध करके शामिल हुईं। हम पारंपरिक पवित्र कार-सेवा के साथ-साथ आधुनिक मशीनरी को भी उपयोग में लाए।

नदी कार-सेवा की चेतना और इसके नतीजों के बारे में संत बलबीर सिंह सीचेवाल ने जानकारी दी कि मुकेरियां हाइडल नहर से पाइपों के रास्ते छोड़ा गया पानी नदी में बहना शुरू होने से इसकी सफाई में आसानी हुई और सेम (जमीन के नीचे पानी के जल-स्तर के गिरने की प्रक्रिया) खत्म हो गई। नदी के आसपास की जमीन फिर से खेती लायक बन गई। अब पानी का स्तर ऊंचा हो गया है और हैंडपम्प चलने शुरु हो गए हैं। बस, थोड़े अरसे के बाद ही खुशहाली और अधिक बढ़ जाएगी।

संत सीचेवाल ने खुलकर बातें करते हुए कहा कि 'पवणु गुरु, पानी पिता, माता धरति महतु' के सूत्र वाक्य को अपनाना ही भगवान की सच्ची पूजा है। स्वच्छ वातावरण, शुद्ध हवा-पानी और खूबसूरत धरती कायम रखना हमारी भलाई के कार्यों का मुख्य मनोरथ है। लोगों की शारीरिक और मानसिक तंदरुस्ती के लिए यत्न करना हमारा कर्तव्य है और समय की माँग भी।

वैज्ञानिक विचार रखने वाले संत सीचेवाल ने कहा कि धान की निरंतर रोपाई और कुछ अधिक पानी चूसने वाले पेड़ों के कारण जमीन के पानी का स्तर काफी नीचे चला गया है। अगर धान के स्थान पर नींबू, किन्नू, नाखे, संतरे, आम, जामुन, अमरूद, अंगूर और अन्य फलों के बाग लगाए जाएं तो पानी को बड़ी हद तक बचाया जा सकता है। कारखानों के पानी को स्वच्छ करके फिर से इस्तेमाल में लाया जाना चाहिए। मोटर-गाड़ियों का इस्तेमाल घटाएं और पौधों की गिनती बढ़ाएं, पॉलीथीन के लिफाफों का इस्तेमाल बंद करें तो वातावरण और पानी से संबंधित हमारी काफी समस्याएँ हल हो सकती हैं।

दुनिया की अपने किस्म की सामाजिक और आर्थिक परियोजना जिससे लोगों की सामूहिक हिस्सेदारी, पर्यावरण के प्रति मित्रभाव के साथ-साथ काली नदी की पवित्रता की पुनः बहाली से संबंधित उनकी तसल्ली आदि की जब चर्चा चली तो उन्होंने बताया कि अभी कार-सेवा का काम जारी है। सुल्तानपुर लोधी के सीवर और 29 गाँवों का पानी इसमें पड़ना बंद कर दिया गया है। संगतें नदी की कार-सेवा में तन-मन से लगी हुई हैं। सुल्तानपुर के बाद गालोवाल, सुभानपुर, भुलथ्थ, कागजी आदि जगहों पर पक्के और खूबसूरत घाटों के निर्माण का काम पूरा हो चुका है और अब बैसाखी के अवसर पर संगतें बड़ी संख्या में स्नान करती हैं। इसकी पवित्रता की देखरेख संगतें स्वयं ही करती हैं।

सड़कों वाला बाबा या वेलफेयर बाबा


पवित्र काली नदी की कार-सेवा से पहले संत बलबीर सिंह सीचेवाल को 'सड़कों वाला बाबा' या 'वेलफेयर बाबा' के रूप में जाना जाता था क्योंकि उन्होंने लोगों को रास्तों और सड़कों की सहूलियत मुहैया करवाने की कार-सेवा का बीड़ा 16 साल पहले उठाया था। परिणामस्वरूप, जालंधर-लोहिया और सुल्तानपुर लोधी के बीच का फासला बीस मील कम हो गया। काली नदी के साथ-साथ 100 किलोमीटर का कच्चा साफ-सुथरा रास्ता बनाया गया। गाँवों की दशा बदलने के लिए आधुनिक विज्ञान और टेक्नोलॉजी का उपयोग करते हुए सीवर डलवाए गए और नलों के रास्ते पीने योग्य पानी की सप्लाई प्रदान की गई। गरीब परिवारों की लड़कियों के विवाहों के समय आर्थिक सहायता पिछले कई सालों से जारी है। चैरिटेबल ट्रस्ट सीचेवाल की ओर से लोकहित और विकास कार्यों का सिलसिला अलग-अलग रूपों में जैसे कि एडवांस कंप्यूटर लैब, वाटर ट्रीटमेंट प्लांट, सुंदर पार्कों का निर्माण, लाइटें लगवाना, स्वास्थ्य सुविधाएं, स्कूल, शिक्षा आदि के कार्य निर्विघ्न चलते रहते हैं। अन्य कामों के अलावा आम लोगों के उपयोग के लिए शौचालय बनवाए गए हैं, गंदगी के ढेरों को हमेशा के लिए हटा दिया गया है। गलियों के गंदे पानी की नालियां अब नहीं रही हैं, गंदे पानी के पोखर अब पार्कों में बदल दिए गए हैं। श्मशान भूमि जैसी वीरान जगहों को सुंदर और शांत जगहों में बदल दिया गया है। संत जी इस सब कुछ के साथ-साथ गाँवों के लोगों के अंदर सफाई, वातावरण की शुद्धता आदि के बारे में चेतना का प्रचार और प्रसार निरंतर जारी रखते हैं।

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