आज बेहद जरूरी है पर्यावरण संरक्षण

Submitted by Hindi on Fri, 07/24/2015 - 10:47
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यह सही है कि पर्यावरण संरक्षण की दिशा में आज उठाये गए कदम लगभग एक दशक बाद अपना सकारात्मक प्रभाव दिखाना आरम्भ करेगा। इसलिए जरूरी है कि समस्या के भयावह रूप धारण करने से पहले सामूहिक प्रयास किये जायें और हम कुछ करें। सबसे पहले अपनी जीवन शैली बदलें और अधिक से अधिक पेड़ लगावें जिससे ईंधन के लिए उनके बीज, पत्ते, तने काम आयेंगे और हम धरती के अंदर गड़े कार्बन को वहीं रखकर वातावरण को बचा सकेंगे। तभी धरती बचेगी। अन्यथा वह दिन दूर नहीं जब इंसान क्या, जीव-जन्तु और प्राकृतिक धरोहरों तक का अस्तित्व ही समाप्त हो जायेगा।आज विश्व पर्यावरण का 60 फीसदी भाग बेहद खराब स्थिति में है। यह सब ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में दिन-ब-दिन हो रही वृद्धि का नतीजा है। संयुक्त राष्ट्र महासचिव वान की मून ने चेतावनी दी है कि इसमें 60 से 80 फीसदी कमी लानी होगी। साथ ही विश्व पर्यावरण बचाने हेतु तेजी से उपाय करने होंगे अन्यथा बहुत देर हो जायेगी। जहाँ तक हमारे देश का सवाल है, आज देश की जो हालत है, उस पर देश के कर्णधार भले ही गौरवान्वित हो अपनी पीठ थपथपाएँ, लेकिन पर्यावरण की दृष्टि से देश की जो भयावह तस्वीर है, उसका खुलासा विश्व बैंक की रिपोर्ट में किया गया है। उसके अनुसार- ‘सन 2020 तक भारत विश्व में एक ऐसा देश होगा जिसके हवा, पानी, जमीन और वनों पर औद्योगीकरण का सबसे ज्यादा दबाव होगा, वहाँ पर्यावरण बुरी तरह बिगड़ जायेगा, प्राकृतिक संसाधनों की साँसें टूटने लगेंगी और उसके लिए इस विकास की कीमत चुकाना टेढी खीर होगी।’

मौजूदा हालात हमारे पश्चिमी सभ्यता व उसके अनुरूप जीवन शैली के मोहपाश में फँस उसके अंधानुकरण करने या उसमें आकंठ डूब जाने का नतीजा है। असलियत में तो हम आज औद्योगिक सभ्यता या उत्तर औद्योगिक सभ्यता के अनुकरण की कीमत ही अदा कर रहे हैं जिसकी ध्वजवाहक पश्चिमी दुनिया और उसकी सभ्यता है। गौरतलब यह है कि इससे दूर रहने की सलाह आज से 106 साल पहले गाँधीजी अपनी पुस्तक ‘हिंद स्वराज्य’ में दे गए थे।

अपने ऐशो-आराम और स्वार्थ की खातिर किए इसी विकास का दुष्परिणाम है ‘जलवायु परिवर्तन’ जो सम्पूर्ण विश्व पर्यावरण के लिए गम्भीर चुनौती है और धरती के लिए भीषण खतरा बन चुका है। अब सब कुछ शीशे की तरह साफ हो गया है कि पर्यावरण क्षरण, जलवायु परिवर्तन के चलते ग्लोबल वार्मिंग आदि यह सब कुछ मानव जनित अंधाधुंध विकास का ही दुखद परिणाम है। यह सही है कि 1860 के बाद, जब से तापमान के रिकॉर्ड रखने की शुरूआत हुई है, आँकड़े गवाह हैं कि बीते साल गर्म बरसों में शीर्ष पर रहे हैं और उसी गर्मी में हुई बढ़ोत्तरी के चलते धरती की जलवायु में खतरनाक स्तर तक उलटफेर हो रहे हैं।

जलवायु में इस भीषण उलट फेर का नतीजा है कि जीव-जन्तुओं की कई प्रजातियाँ विलुप्त होने के कगार पर पहुँच गई हैं। यदि विश्व स्वास्थ्य संगठन की मानेें तो जलवायु में यह भीषण परिवर्तन मानव स्वास्थ्य के लिए बहुत बड़ा खतरा बनता जा रहा है। असलियत में ग्लोबल वार्मिंग एक ऐसी कड़वी हकीकत है जिस पर समय रहते काबू नहीं पाया गया तो दुनिया में पर्यावरण का सन्तुलन गड़बड़ा जायेगा जिसके नतीजे बहुत घातक होंगे। आईपीसीसी के लगभग 3000 वैज्ञानिकों ने भी अपनी रिपोर्ट में यह स्पष्ट कर दिया है कि यह मानव निर्मित समस्या है। इसके चलते पृथ्वी के तापमान और समुद्री जल स्तर में लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है। जिसके दुष्परिणाम प्रजातियों के नष्ट होने के रूप में सामने आएँगे। इसलिए समूची दुनिया में पर्यावरण रक्षा के लिए यथाशीघ्र सामूहिक प्रयास किये जाना बेहद जरूरी है। जरूरत तो इस बात की है कि सभी सरकारें व जनता इन खतरों को पहचानें और इस दिशा में तत्काल एकजुट होकर कदम बढ़ायें।

ब्रिटिश व स्विस वैज्ञानिकों ने खुलासा किया है कि बिजली घरों, फ़ैक्टरियों और वाहनों में जीवाश्म ईंधनों के जलने से पैदा होने वाली ग्रीन हाउस गैसें पर्यावरण विनाश या यूँ कहें कि ग्लोबल वार्मिंग के लिए जिम्मेदार हैं। ब्रिटेन की राॅयल सोसाइटी का शोध जलवायु परिवर्तन और मानव गतिविधियों के बीच सम्बन्धों पर शंका करने वालों के लिए आँखें खोल देने वाला है। हकीकत में अब मनुष्य की करतूतों से होने वाले जलवायु परिवर्तन के प्रमाण आये-दिन पुख्ता होकर सामने आ रहे हैं। यह प्रमाण जाहिर करते हैं कि ग्लोबल वार्मिंग के पीछे सूर्य नहीं मनुष्य की करतूतें ही जिम्मेवार हैं। इसलिए इससे होने वाले नुकसान को कम करने की बाबत मनुष्य को ही पहल करनी होगी।

अब जग जाहिर है कि पर्यावरण विनाश का बहुत बुरा असर अर्थव्यवस्था और विकास पर भी पड़ेगा और भारत भी इससे अछूता नहीं रह सकता, इसलिए हमें तेजी से कुछ करना होगा। सही है क्योंकि पर्यावरण के मामले में हमारा देश काफी पिछड़ा है और पर्यावरणीय लोकतंत्र सूचकांक में दुनिया के 70 देशों में हमारा स्थान 24वाँ है। जबकि लिथुआनिया जैसा देश इस सूची में शीर्ष पर है। दुनिया के 70 देशों में पहली बार पर्यावरण सर्तकता को लेकर किए गए आकलन में 10 शीर्ष देशों में लिथुआनिया के बाद लातविया, रूस, अमेरिका, दक्षिण अफ्रीका, ब्रिटेन, हंगरी, बुल्गारिया, पनामा और कोलम्बिया शामिल हैं। बीते दिनों वाशिंगटन के वर्ल्ड रिर्सोसेज इंस्टीट्यूट और एक्सेस इनीशिएटिव द्वारा यह सूची जारी करते हुए कहा गया है कि यह सूचकांक एक ऐसा शक्तिशाली आधार है, जो सरकारों को ज्यादा पारदर्शी बनाने और आम नागरिकों को ज्यादा अधिकारों की वकालत करने में मदद करेगा। दरअसल यह सूचकांक पर्यावरण से जुड़े निर्णय लेने की प्रक्रिया में पारदर्शिता, जवाबदेही और नागरिकों की भागीदारी को बढ़ावा देने के लिए नियमों को लागू करने में किसी भी देश की प्रगति का अंतरराष्ट्रीय मानकों के आधार पर आकलन करता है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन की मानें तो जलवायु परिवर्तन का न केवल स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा बल्कि गरीब क्षेत्रों के प्रमुख खाद्यों के उत्पादन में भी कमी आएगी और कुपोषण बढ़ेगा। वर्ष 2050 तक भारत में सूखे के कारण गेहूँ के उत्पादन में 50 प्रतिशत तक की कमी आएगी। गेहूँ की इस कमी से भारत के 20 करोड़ लोग भुखमरी के कगार पर होंगे। असलियत वातावरण में औद्योगिक काल में पहले की तुलना में कार्बन डाईआॅक्साइड का संकेन्द्रण 30 प्रतिशत ज्यादा हुआ है। इसके परिणामस्वरूप चरम गर्मी व असहनीय लू से खड़ी चट्टानों के गिरने की घटनाएँ बढ़ेगी। मौसम के उतार-चढ़ाव से लोगों के स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा। बहुत ज्यादा ठंड, बहुत ज्यादा गर्मी के कारण तनाव या हाइपोथर्मिया जैसी बीमारियाँ होंगी और दिल तथा श्वास सम्बन्धी बीमारियों से होने वाली मौतों की संख्या भी बढ़ेगी।

यह सही है कि ग्लोबल वार्मिंग अब घर के अंदर आ चुकी है। अब उससे आँखे नहीं फेरी जा सकती। विश्व परिदृश्य पर ग्लोबल वार्मिंग से निपटने का सवाल उतना आसान नहीं है जितना समझा जाता है। इसका कारगर समाधान है विकास के किफायती रास्तों की खोज, जिसका धरती और वायुमंडल पर बोझ न पड़े। यह सच है कि कुछ किए बिना भी इस समस्या से छुटकारा सम्भव नहीं। आज एक दूसरे पर दोष मढ़ने से कुछ होने वाला नहीं। खर्चीला ईंधन जलाने वाला विकास का तरीका लम्बे समय के लिए न तो उचित है, न उपयोगी ही। कारण अब धरती के पास इतना ईंधन ही नहीं बचा है। यह सही है कि पर्यावरण संरक्षण की दिशा में आज उठाये गए कदम लगभग एक दशक बाद अपना सकारात्मक प्रभाव दिखाना आरम्भ करेगा। इसलिए जरूरी है कि समस्या के भयावह रूप धारण करने से पहले सामूहिक प्रयास किये जायें और हम कुछ करें। सबसे पहले अपनी जीवन शैली बदलें और अधिक से अधिक पेड़ लगावें जिससे ईंधन के लिए उनके बीज, पत्ते, तने काम आयेंगे और हम धरती के अंदर गड़े कार्बन को वहीं रखकर वातावरण को बचा सकेंगे। तभी धरती बचेगी। अन्यथा वह दिन दूर नहीं जब इंसान क्या, जीव-जन्तु और प्राकृतिक धरोहरों तक का अस्तित्व ही समाप्त हो जायेगा।

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एक परिचय:


. 21 जनवरी 1952 को एटा, उ.प्र. में शिक्षक माता-पिता के यहाँ जन्म।

राजकीय इंटर कॉलेज, एटा से 12वीं परीक्षा उत्तीर्ण, सागर विश्वविद्यालय से स्नातक, छात्र जीवन में अंग्रेजी हटाओ आन्दोलन, समाजवादी युवजन सभा और छात्र संघ से जुड़ाव रहा। राजनैतिक गतिविधियों में संलिप्तता के कारण विधि स्नातक और परास्नातक की शिक्षा अपूर्ण।

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