83 दिन और 8 पर्यावरणीय कानून

Submitted by RuralWater on Sat, 07/25/2015 - 14:18
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पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के नाम में जोड़े गये ‘जलवायु परिवर्तन’ शब्द जिसका रिपोर्ट में तीन बार जिक्र किया गया है उस जलवायु पर पड़ने वाले प्रभावों की ओर देखा तक नहीं गया है। आश्चर्य है कि परियोजनाकर्ताओं पर इतना भरोसा प्रकट किया गया है कि वन सलाहकार समिति व अन्य विशेषज्ञ समितियों द्वारा परियोजना प्रभावित क्षेत्र में परिस्थिति को जाकर देखने जैसे महत्त्वपूर्ण कार्य को परियोजनाकर्ता व एजेंसी पर अनावश्यक दवाब कह दिया गया है। 2014 में नई सरकार ने पर्यावरण एवं वन मंत्रालय में परियोजनाओं की स्वीकृति के लिये परियोजनाकर्ताओं को ऑनलाइन सुविधा देने का ऐलान किया। साथ ही पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के नाम में ‘‘जलवायु परिवर्तन” शब्द भी जोड़ा गया।

किन्तु जल्दी ही इस मंत्रालय ने एक उच्चस्तरीय समिति का गठन किया। जिसके अध्यक्ष बनाए गए पूर्व कैबिनेट सचिव टी.एस.आर. सुब्रह्मण्यम व सदस्य रखे गए भारत सरकार के पूर्व सचिव विश्वनाथ आनन्द, उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश ए. के. श्रीवास्तव और पूर्व अतिरिक्त सॉलीसिटर जरनल के.एन. भटट्। कोई पर्यावरण से जुड़ा कार्यकर्ता इसमें नहीं था। अध्यक्ष से लेकर सदस्यों का भी कोई पर्यावरण संरक्षण इतिहास नहीं है।

इस उच्चस्तरीय समिति को 6 पर्यावरणीय कानूनों जिसमें पर्यावरण संरक्षण कानून 1986, वन कानून 1980, जंगली जन्तु संरक्षण कानून 1972, जल निवारण और प्रदूषण नियंत्रण कानून 1974, वायु निवारण और प्रदूषण नियंत्रण कानून 1981 तथा वन कानून 1927 पर पुर्नविचार करने का काम दिया गया।

पर्यावरण पर काम करने वाले लोगों व जनआन्दोलनों के साथ इस समिति ने कोई संवाद नहीं किया। बल्कि मात्र 83 दिनों में ही इस उच्चस्तरीय समिति ने अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी। महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है समिति ने अपनी कार्यसीमा से आगे जाकर बरसों से लेखक के ज़मीनी व पर्यावरणीय वकील संजय पारिख, रित्विक दत्ता, राहुल चौधरी के दिल्ली उच्च न्यायालय से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक के अदालती संघर्ष के बाद बने ‘राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण’ और जन आन्दोलनों की लम्बी लड़ाई के बाद बने सूचीय आदिवासी और परम्परागत वन निवासी कानून 2006 को भी अपने लपेटे में ले लिया और उसके बारे में भी अपनी राय रख दी।

पर्यावरणीय वकील रित्विक दत्ता, नदी संरक्षण कार्यकर्ता हिमांशु ठक्कर, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्य वन संरक्षक मनोज मिश्रा ने 113 पन्नों की सुब्रह्मण्यम जी की अध्यक्षता वाली उच्चस्तरीय समिति की इस रिर्पाेट की खोजबीन की। इस खोजबीन में अनेक आश्चर्यजनक तथ्य सामने आए।

जंगलों और पहाड़ों में रहने वाले करोड़ों लोगों को पूरी तरह से नजरअन्दाज किया गया है। अदालती आदेशों को देखने के नाम पर माननीय सर्वोच्च न्यायालय के लगभग 30 बरस पुराने आदेशों का हवाला दिया गया है। ज्ञातव्य है कि उस समय पर्यावरण की इतनी चिन्ता नहीं थी। जिससे इन आदेशों में पर्यावरण संरक्षण की झलक मिल सके।समिति ने विनाशकारी परियोजनाएँ जो जगंल, जगंलवासी और जगंली जन्तुओं पर असर डालती है उनके बारे में कोई अध्ययन नहीं किया।

113 पन्नों की इस रिपोर्ट में देश के पर्यावरण को कुछ हद तक सुरक्षित रखने वाले कानूनों को कमजोर किया जाए और कैसे परियोजनाओं को स्वीकृति दी जाए, बस इसी पर ध्यान दिया गया है।

पर्यावरण कानूनपर्यावरण एवं वन मंत्रालय के नाम में जोड़े गये ‘जलवायु परिवर्तन’ शब्द जिसका रिपोर्ट में तीन बार जिक्र किया गया है उस जलवायु पर पड़ने वाले प्रभावों की ओर देखा तक नहीं गया है। आश्चर्य है कि परियोजनाकर्ताओं पर इतना भरोसा प्रकट किया गया है कि वन सलाहकार समिति व अन्य विशेषज्ञ समितियों द्वारा परियोजना प्रभावित क्षेत्र में परिस्थिति को जाकर देखने जैसे महत्त्वपूर्ण कार्य को परियोजनाकर्ता व एजेंसी पर अनावश्यक दवाब कह दिया गया है।

रित्विक दत्ता कहते है कि ईशोपनिषद् के वाक्य और ‘जवाबदेही’, ‘पारदर्शिता’ व ‘स्थायी विकास’ जैसे शब्दों का रिपोर्ट में इस्तेमाल तो खूब किया गया है किन्तु समिति की संस्तुतियाँ बिल्कुल ही अलग है। समिति की रिपोर्ट यह तक बताने में असमर्थ रही है कि उसने कितनी बैठकें की हैं। रिपोर्ट में 30-40 बैठकों का दावा किया गया है। किन्तु सूचना के अधिकार में माँगी गई जानकारी में मात्र 30 बैठकों की ही जानकारी मिली। जिसमें दिल्ली, बंगलुरु, मंगलौर, भुवनेश्वर और पटना का जिक्र है। पूरे उत्तर-पूर्वी राज्यों, राजस्थान, महाराष्ट्र, पश्चिमी बंगाल, छत्तीसगढ़ जैसे महत्त्वपूर्ण राज्यों में किसी भी बैठक का आयोजन नहीं किया गया।

यह सब मिलाकर पर्यावरणीय कानूनों व विषयों और उच्च स्थानीय लोकतांत्रिक संस्थाओं व जनता की आवाज़ को लगभग समाप्त करने का ही प्रयास लगता है। स्पष्ट रूप से वर्तमान पर्यावरण कानूनों को पूरी तरह से कमजोर करने का प्रयास किया गया है।

2104 में आई नई सरकार भूल गई कि 1992 में स्वदेशी का नारा देकर तत्कालीन सरकार की आलोचना की थी। इस तथाकथित उच्चस्तरीय समिति के माध्यम से जिस तेजी से पर्यावरण की पूरी तरह से अनदेखी करके निजी क्षेत्र को बढ़ावा देने की नीति अपनाई जाने वाली है वो अकल्पनीय।

पर्यावरण कोई फूलपत्ती की सजावट नहीं होता है। वरन, यह सीधे-सीधे देश की उस जनता के स्वास्थ्य से जुड़ी बात है। जिसके संरक्षण की जिम्मेदारी सरकार की है। रिपोर्ट को पूरी तरह से नकारा ही जाना चाहिये।

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