किशाऊ बाँध की झील में समा जाएगा ‘धान का कटोरा’- कुवानू क्षेत्र

Submitted by RuralWater on Tue, 07/28/2015 - 12:10

जब दो दशक पहले संभर कुवानू में किशाऊ बाँध के सिलसिले में परीक्षण चल रहा था तो वहाँ बनाई जा रही परीक्षण सुरंगों को कच्चे पहाड़ होने की वजह से अधूरा ही बनाकर छोड़ा गया, लेकिन इसके बावजूद जो सैम्पल भेजे गए वे कैसे पास हो गए यह उनके लिये रहस्य का विषय बना हुआ है। उधर हिमाचल व उत्तराखण्ड के बीच प्रस्तावित बाँध स्थल के आसपास के 50 गाँव की तलहटी साल 2010 की आपदा के बाद से लगातार भू-धँसाव की चपेट में हैं।

उत्तराखण्ड राज्य को यहाँ के राजनेता ऊर्जा प्रदेश कहते थकते नहीं हैं, परन्तु राज्य की जो दुर्दशा साल 2013 में प्राकृतिक आपदा से हुई है वह जग जाहिर है। फिर भी इतनी बड़ी प्राकृतिक आपदा से सबक ना लेते हुए एक के बाद एक जलविद्युत परियोजना के निर्माण के लिये सरकार एमओयू साईन करने में तूली है। बताते चलें कि अभी हाल में उत्तराखण्ड सरकार, हिमाचल सरकार ने एक संयुक्त करारनामा किया है कि यमुना की सहायक नदी ‘टौंस’ पर किशाऊ बाँध का निर्माण 2020 तक पूरा कर लिया जाएगा। यह करारनामा उस वक्त हुआ जब ये पहाड़ी राज्य प्राकृतिक आपदाओं के डर से सहमे हुए हैं। उधर किशाऊ बाँध के इस करारनामें से उत्तराखण्ड राज्य के जौनसार-बावर क्षेत्र के जनजाती लोग विरोध की शक्ल में खड़े हो गए हैं।

ज्ञात हो कि राष्ट्रीय महत्त्व की किशाऊ बाँध परियोजना निर्माण के लिये जहाँ केन्द्र के साथ हिमाचल व उत्तराखण्ड सरकार की दिलचस्पी बढ़ती जा रही है, वहीं योजना के विरोध में 50 गाँव के लोग लामबन्द होने लग गए हैं। ग्रामीणों का कहना है कि वे इस परियोजना को अपनी काश्त की जमीन की बली नहीं चढ़ने देंगे। एक ओर उनकी इस परियोजना से ज़मीन जलमग्न हो जाएगी तो दूसरी ओर उनकी जनजातीय संस्कृति भी पानी में समा जाएगी। इसके लिये उन्होंने विशेष रणनीति तैयार कर ली है।

ग्रामीणों का आरोप है कि किशाऊ बाँध निर्माण के लिये राज्य सरकार ने कभी भी उनसे राय नहीं ली है। 660 मेगावाट की किशाऊ बाँध परियोजना के निर्माण क्षेत्र के अन्तर्गत कच्ची भूगर्भीय बनावट व परियोजना क्षेत्र में समाहित होने वाली सिंचित व उपजाऊ कृषि भूमि एवं जनजातीय जनसंख्या के विस्थापन का मुद्दा बनता जा रहा है। प्रस्तावित किशाऊ बाँध परियोजना में उत्तराखण्ड के साथ ही हिमाचल प्रदेश के बराबर की हिस्सेदारी की वजह से यह मामला आने वाले दिनों में दोनों पड़ोसी पर्वतीय राज्यों की राजनीति को भी प्रभावित किये बिना नहीं रहने वाला।

जनजातीय क्षेत्र की विशिष्ट सामाजिक व आर्थिक बनावट को देखते हुए संविधान में भी इसके संरक्षण के लिये विशेष प्रावधान किये गए हैं। जनजातीय क्षेत्र के प्राकृतिक संसाधनों की हिफाज़त इसमें एक बड़ी वजह है, क्योंकि उत्पादन कर निम्न अवस्था की वजह से जल, जंगल, और जमीन पर जनजातीय क्षेत्र की जनसंख्या अभिन्न रूप से निर्भर रहती है और विकास की मुख्य धारा के वेग के मध्य इनकी जातीय अथवा उपजातीय पहचान को बनाए रखना एक बड़ी चुनौती है।

ऐसे में जब जौनसार-बावर में वहाँ प्रस्तावित किशाऊ बाँध को लेकर आवाजें तेज होने लगी हैं तो इन्हें आसानी से खारिज नहीं किया जा सकता। हिमाचल और उत्तराखण्ड के बीच तहसील चकराता के संभर कुवानू स्थित में यह बाँध प्रस्तावित है। चूँकि बाँध का नाम किशाऊ राष्ट्रीय जल विद्युत परियोजना रखा गया है। इस पूरे जनजातीय क्षेत्र में रोज़गार के लिये किसी भी तरह का पलायन नहीं है।

वजह साफ है कि इस क्षेत्र की कृषि भूमि लोगों को रोज़गार भी उपलब्ध करवा रही है। इस क्षेत्र के लोगों की अजीविका कृषि पर निर्भर है। एक तरफ यहाँ के बाशिंदे धान की फसल उगाते हैं दूसरी तरफ नगदी फसलों की यहाँ अच्छी पैदावार है। ऐसे में यदि यह सोना उगलने वाली कृषि भूमि बाँध की भेंट चढ़ गई तो प्रभावित लोगों को उससे होने वाली विस्थापन व पलायन की आशंका इन्हें परेशान करने लग गई।

ग्रामीण समझ नहीं पा रहे हैं कि जब दो दशक पहले संभर कुवानू में किशाऊ बाँध के सिलसिले में परीक्षण चल रहा था तो वहाँ बनाई जा रही परीक्षण सुरंगों को कच्चे पहाड़ होने की वजह से अधूरा ही बनाकर छोड़ा गया, लेकिन इसके बावजूद जो सैम्पल भेजे गए वे कैसे पास हो गए यह उनके लिये रहस्य का विषय बना हुआ है। उधर हिमाचल व उत्तराखण्ड के बीच प्रस्तावित बाँध स्थल के आसपास के 50 गाँव की तलहटी साल 2010 की आपदा के बाद से लगातार भू-धँसाव की चपेट में हैं।

यहाँ यह भी देखना जरूरी होगा कि किशाऊ बाँध निर्माण क्षेत्र में समाहित भूमि में से उत्तराखण्ड क्षेत्र की भूमि हिमाचल क्षेत्र की भूमि से कई गुना अधिक व उपजाऊ है। यही नहीं बाँध का डाउन स्ट्रीम भी उत्तराखण्ड की सीमा में ही मौजूद होगा और बाँध निर्माण के बाद इस जलाशय का पानी देश की राजधानी दिल्ली पहुँचाया जाएगा। लेकिन जौनसार-बावर जनजातीय क्षेत्र की जो आबादी बाँध निर्माण की वजह से अपने घर, भूमि व सामाजिक परिवेश से बेदखल होगी उसके विस्थापन का मॉडल उत्तराखण्ड सरकार ने अभी तक प्रभावित किसानों के सामने नहीं रखा।

जबकि मौजूदा किशाऊ जलविद्युत परियोजना निर्माण स्थल संभर कुवानू से सात किमी की दूरी पर 240 मेगावाट की ईछाड़ी जलविद्युत परियोजना है। इस परियोजना की वजह से किशाऊ, शर्ली, टिमरा, आरा, अस्टी, आमुवा, मलेथा, कुवानू, कंडियारी, चाकुरी, नेरा, मराड़, मश, कुसेणु, पार्लीफराड़, गमरी, धारीया, दौधा आदि गाँवों का तल पिछले पाँच वर्षो से टौंस नदी की ओर खिसक रहा है। ऐसे में किशाऊ बाँध का भविष्य और वहाँ के लोग किशाऊ बाँध निर्माण के बाद सुरक्षित रहेंगे यह अहम सवाल है।

धान का कटोरा कुवानू क्षेत्र


परियोजना क्षेत्र की ज़मीन धान की पैदावार के लिये विख्यात है। परियोजना क्षेत्र के आसपास की हरियाली दूर से ही आँखों को शान्ती देने लगती है। सभी गाँव आबाद और हरे-भरे नजर आते हैं। यही वजह है कि इस क्षेत्र को लोग धान का कटोरा भी कहते हैं।

और बढ़ जाएगा भूस्खलन खतरा


वैसे तो केन्द्र की रिपोर्ट के अनुसार परियोजना निर्माण से उत्तराखण्ड के आठ और हिमाचल के नौ गाँव पूर्ण और आंशिक रूप से प्रभावित होंगे। लेकिन 50 गाँव की आबादी इसलिये इस परियोजना का विरोध कर रही है कि एक तरफ सुरंग निर्माण से भूस्खलन का खतरा बढ़ेगा तो दूसरी तरफ उनकी कृषि भूमि तबाह हो जाएगी।

परियोजना एक नजर में


660 मेगावाट की क्षमता वाली किशाऊ बाँध जलविद्युत परियोजना में 236 मीटर ऊँचा व 680 मीटर लम्बा बाँध टौंस नदी पर बनाया जाएगा। इसके लिये दोनों राज्यों से 2950 हेक्टेयर भूमि की जरूरत होगी। किशाऊ बाँध की कुल जल संग्रहण क्षमता 18240 लाख घनमीटर होगी। इसके पूर्ण होने पर 18510 लाख यूनिट बिजली का उत्पादन हर साल होगा। विकासकर्ता एजेंसी उत्तराखण्ड जलविद्युत निगम लि. के एक वरिष्ठ अधिकारी ने यह भी बताया कि शुष्क मौसम में मौजूदा पाँच अन्य बिजली परियोजनाओं को इस बड़े जलाशय से पानी की आपूर्ती हो सकेगी।

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