वेदना-वैत्रवती की

Submitted by Hindi on Tue, 08/04/2015 - 11:35
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शिवमपूर्णा, मार्च 2015

स्वच्छ पर्यावरण एवं प्रदूषण मुक्त करने के लिए आयोजन हुए। भाषण, वायदे हुए, रैलियाँ निकाली गई। बड़ी-बड़ी बातें हुई। आयोजनों के फोटो, समाचार अखबारों में खूब छपे। स्वच्छता के प्रति आश्वासन दिये गये। लेकिन आश्वासन तो आश्वासन लग रहा है। आयोजन के फोटो तो उनकी संतुष्टि का प्रतीक मानती हूँ। कुछ लोग वाह-वाह चाहते हैं, जनता में छाये रहें, पूछ परख निरंतर बनी रहे। किसी ने सच ही कहा है- काम करने वाला नाम नहीं चाहता।एक दिन संध्या के समय वैत्रवती (बेतवा) के घाट पर बैठा, कुछ सोच रहा था। तभी अकस्मात माँ बेतवा मेरे समीप आई। मैंने उन्हें सादर प्रणाम किया। आश्चर्य से पूछ बैठा, माँ, आप! मैं तो दर्शन लाभ से धन्य हो गया। वे दु:खी मन से बोली-बेटा! तुमसे कहना उचित समझा कि तुम मेरी व्यथा के बारे में जरूर लिख सकोगे। बहुत दिनों से सोच रही थी किससे कहूँ। ऐसा है बेटा, जब पानी सिर से ऊपर हो जाये तो मजबूरी में कहना पड़ता है। कहने से मन हल्का हो जाता है।

मैं कई वर्षों से दु:खी हूँ परन्तु मैंने कभी किसी को परेशान, दु:खी नहीं किया। माँ भला अपने पुत्रों को कभी कष्ट दे सकती है। बच्चों की इच्छाओं का हनन नहीं होने दिया।

मेरी आत्मा से पूछो-किस प्रकार नाक बंद करके नालों की गंदगी के साथ, शहर की गंदी नालियों का बदबूदार गंदे पानी को झेल रही हूँ नालों को बंद करवाने के लिये एवं मुझे प्रदूषण मुक्त करने के लिये अनेक प्रकार के प्रयत्न किये, योजनाएँ, समितियाँ बनाई गईं। सौंदर्यीकरण के नाम पर लाखों रूपये बर्बाद कर दिये। लेकिन मुझे दूषित होने से नहीं बचा सके। ये नाले सड़ांध मारते हुए बेखटक निडर होकर आज अपराधी की तरह खुले आम बह रहे हैं।

मेरे नाम पर उत्सव आयोजित कर, स्वच्छता अभियान घाट सुधार के निर्माण कार्य पर शासन से प्राप्त राशि का मन भर कर खर्च किया। हाँ, एक बात अवश्य कहूँगी कि कुछ काम तो किये गये हैं।

रचनात्मक कार्यों के लिए जागृति आई। सामान्य व्यक्ति से लेकर प्रतिष्ठित नागरिक, अधिकारी, व्यापारी वर्ग आदि के श्रमदान जनसहयोग द्वारा सफाई कार्य किया गया। आज भी सफाई कार्य जारी है। जन सहयोग कभी गति पकड़ता है तो कभी मंद पड़ जाता है।

स्वच्छ पर्यावरण एवं प्रदूषण मुक्त करने के लिए आयोजन हुए। भाषण, वायदे हुए, रैलियाँ निकाली गई। बड़ी-बड़ी बातें हुई। आयोजनों के फोटो, समाचार अखबारों में खूब छपे। स्वच्छता के प्रति आश्वासन दिये गये। लेकिन आश्वासन तो आश्वासन लग रहा है। आयोजन के फोटो तो उनकी संतुष्टि का प्रतीक मानती हूँ। कुछ लोग वाह-वाह चाहते हैं, जनता में छाये रहें, पूछ परख निरंतर बनी रहे। किसी ने सच ही कहा है- काम करने वाला नाम नहीं चाहता।

मेरा मूल स्वरूप तो आज तक नहीं लौट सका। जो आदिकाल से पुराणों में उल्लेखित है। ऋषि- मुनियों द्वारा वर्णित किया गया मेरा जल अमृत-तुल्य है। मेरी पावनता पवित्र नदियों के साथ जुड़ी है, मेरे जल स्नान से पापों का नाश होता है। अनेक राजा, बादशाहों ने जल की पवित्रता, शुद्धता एवं-मिठास के बारे में लिखा है। मेरे तट पर ऋषि, मुनियों की तप, साधना करते हुए देख अत्यन्त हर्ष होता था।

तभी से अपने आप को धन्य मान रही हूँ। लोग मुझे देवी स्वरूपा मानते हुए मेरी पूजा, आराधना करते रहते हैं।

इतना होने के उपरांत भी किसी परिवार में ज्यौं बुजुर्ग माँ की जो उपेक्षा होती है, अलग-सलग पड़ी रहना जो दे दिया सो पा लिया। शिकायत करे तो किससे? ऐसी ही दशा है मेरी।

मेरे अन्दर की आत्मा यानि ये जल जन्तु मर रहे हैं। इन्हें बचाने की तरफ किसी का ध्यान नहीं गया। सच पूछो तो अपने मतलब के लिए जगह-जगह बन्दा, स्टापडेम जैसा बनाकर बहते पानी को रोका। मेरे आस-पास भव्य मंदिर बनाये गये हैं लेकिन मेरी ओर किसी ने ध्यान नहीं दिया। आज भी गाँव-गाँव, स्थान स्थान पर लोग मोटरपम्प लगाकर मेरा पानी खींच रहे हैं। मेरी क्षमता का तो ख्याल करते। गर्मी के दिनों में मेरी काया वैसे ही दुबली हो जाती है, कमजोर हो जाने पर थोड़ा बहुत पानी बचाकर अपने अस्तित्व को बनाये रखती हूँ।

कुछ लोग स्वार्थ में अंधे होकर जगह-जगह गड्ढ़े कर रहे हैं। खेतों में बोर कर धरती माँ को छेद रहे हैं ऐसी ही स्थिति मेरी भी है। बेशर्मों ने यह नहीं सोचा इसमें क्यों गड्ढ़ें छेद करें। सोचा होता कि जरा सी सुई चुभने में कितनी पीड़ा होती है इसके उपरांत भी अंग अंग छेदना जारी है।

मनमाने ढंग से पत्थर, रेत , मिट्टी भर-भर कर ले जा रहे हैं मैंने कभी एतराज नहीं किया, माँ हूँ न! मैंने देना सीखा है।

फेंकी जा रही गंदगी, पन्नियाँ ,मलमूत्र कचरा आदि अनावश्यक दूषित सामग्री जिसके कारण बेहद परेशान, दु:खी हूँ। इसे कब तक सहूँ सहने की भी एक सीमा होती है। फलस्वरूप मेरे स्वास्थ पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है। आप लोग तो टीप टॉप रहना जानते हैं मुझे टीप टॉप (स्वच्छ) प्रदूषण मुक्त नहीं देख सकते।

मेरे कष्ट, तकलीफ को किसी ने समझा नहीं। मेरी आँख के आँसू किसी ने देखे नहीं। दिल का घाव दिल ही जानता है। मूक बनी सह रही हूँ, सहती रहूँगी, सहनशील हूँ। जन मानस मेरे पुत्र हैं, माँ अपनों पुत्रों के लिए कितनी ही वेदना पीड़ा हो सब झेल जाती है। माँ, नारी ही तो है उदार, ममता की मूरत धैर्यवान गम्भीर होती है।

मुझ बुढ़िया को उपेक्षित कर रखा है। सोचते होंगे.... अरे ये तो यूँ ही लगी रहती है। बुढ़ापे में सठिया रही है......जैसे घर में बूढ़े व्यक्ति की बातको हाँ... हूँ कह कर टाल दिया जाता है। ऐसे ही मेरी बात टाली जा रही है। चित्रकार, फोटोग्राफर पर्यटक विभिन्न कोणों से मेरे फोटू खींच कर ले जाते हैं। पूजा- पाठ करने वाले भी मेरे इसी जल से देव प्रतिमा को जल चढ़ाते, मूर्ति को स्नान, आचमन करते। इसके लिए मैं भगवान से हाथ जोड़कर क्षमा माँग लेती हूँ। प्रभु! इस मानव ने मेरे स्वरूप को वर्तमान में जैसा बना रखा है उसी के अनुरूप आपको जल समर्पित है। इसमें मेरा दोष नहीं है।

मेरे आश्रित जलजीव त्रसित हैं, मुझसे पूछते हैं -माते! आपका वह पावन जल जिसका वेद ग्रन्थों में वर्णन है। वह जल कहाँ लुप्त हो गया। हमें बिना अन्न भोजन के आपके जल से जो तृप्ति, संतुष्टि मिलती थी वह अब नहीं है, जैसे बच्चा बिना कुछ खाये माँ का दुग्धपान कर ही संतुष्ट हो जाता है। माँ इस दूषित जल को पीकर तो हमारे कुछ साथी बीमार रहने लगे हैं, कुछ चल बसे।

प्रकृति प्रेमी, पर्यावरण के प्रेमी जनों ने मेरे किनारे वृक्षारोपण कर मेरी सुंदरता में चार चाँद लगाये उनके इस कार्य की प्रशंसा करती हूँ।

कुछ भले-व्यक्तियों ने मेरे किनारे ईटों के भट्टे लगा लिए तो कुछ ने झोंपड़ी, मकान, फार्महाउस बना लिए, जिनमें गाय भैंस, बकरी आदि जानवर पाल रखे हैं। जिनका मल-मूत्र, कचरा मिट्टी आदि मुझमें बेखटके आ रहा है। फेंक रहे हैं। भैंसे तो तबीयत से तैरती रहती हैं, मानों मैं स्वीमिंग पुल हूँ उनके लिए। अतिक्रमण के कारण मेरा आकार छोटा होता जा रहा है।

मैं सदैव भला सोचती हूँ, कभी गुस्सा आने पर उग्र रूप ले लेती हूँ, परन्तु कभी नुकसान, हानि पहुँचाना मेरा ध्येय नहीं रहता। जनमानस को स्वयं अपनी सुरक्षा करना चाहिए। मुझसे दूरी बनाकर घर, मकान बनाते तो ठीक था। कहते हैं न आग और पानी से दूर रहना चाहिये। लोगों का नुकसान हानि होने पर मुझे भी दु:ख होता है। क्या करूँ प्राकृतिक आपदा है, ईश्वर सबको ऐसी आपदा, विपत्ति से बचाये।

किनारे के वृक्ष दु:खी हैं। कभी उनकी शाखाएँ मेरे जल से अठखेलियाँ करती थी। जब कभी मेरा अवसर आता तो मैं भी उनकी डालों पर चढ़कर बैठ जाती थी; झूला-झूलती, उछल-कूद करती, दौड़ लगाती। पक्षी आते मस्ती करते उड़ते-उड़ते मुझे छू जाते, गीत गाते वो मधुर कलरव, शोरगुल आनंदित कर देता था। वे दिन याद आते हैं तो हृदय बाग-बाग हो जाता है।

आज मेरा यही परिवार मुझसे दूर होता जा रहा है। बड़ी बेरहमी से वृक्षों पर कुल्हाड़ी चलाकर पुराने संगी-साथियों को साफ कर दिया। उनके बीच मैं आनंदपूर्वक थी, वे मुझे शुद्ध, हवा, फल-फूल देते थे। पक्षियों का बसेरा था मैं भी उन्हें जल दिया करती थी। आदान-प्रदान सहयोग करने की भावना, सद्व्यवहार भारतीय संस्कार सब लुप्त हो गया।

ऐसे ही मुझसे जुड़े कुएँ, तालाब कल तक भरपूर समृद्धशाली थे। आज उनका पानी मर रहा है, ये संगत का प्रभाव ही है। मैं भी कमजोर होती जा रही हूँ, वृद्धावस्था का शरीर है, सूख रहा है। फलस्वरूप घाटों से भी दूरी बढ़ गई है, पत्थरों के आँसू पोंछने वाला कोई नहीं है। जो मछलियाँ, कछुए मेरी गोद में उछलकूद किया करते थे आज वे भी साथ छोड़ रहे हैं। सच है विछोह की पीड़ा अकेले को ही सहना पड़ती है।

कवि कालीदास और बाणभट्ट ने क्रमश: ‘मेघदूत’ एवं ‘कादम्बरी’ काव्य ग्रन्थों में जिस प्रकार मेरे रूप सौंदर्य को मन-मोहक वर्णन किया गया है वह श्रृंगार उपमा आज अप्रासंगिक है प्रकृति समय के साथ सब कुछ बदल गया।

आने वाली पीढ़ी वर्तमान में जब कालीदास के काव्यग्रंथ ‘मेघदूत’ की निम्न पंक्तियों को पढ़ेंगी-

तेषां दिक्षु प्रथित विदिशा लक्षणां राजधानीं-
गत्वा सद्य: फलमविकलं कामुकत्वस्य लब्ध्वा।।
तीरोपान्ततस्नितसुंभगं पास्यसि स्वादुयस्मात्।
सभ्रू भङ्गं मुखमिव पयो वैत्रवत्याश्चलोर्मि।।


उपरोक्त वर्णन के आधार पर जब आज के परिप्रेक्ष में जब मुझे देखेगी तो उसको थोड़ा दु:ख तो अवश्य होगा। कल की तुलना आज से अवश्य की जाती है। इसी प्रकार बाणभट्ट ने भी मेरे रूप सौंदर्य को लिखा है। इनकी काव्य कृतियाँ तो आज भी पठनीय संग्रहणीय है; उनको मेरा धन्यवाद।

एक दिन मैं चुपचाप लेटे हुए ‘सुन’ रही थी, कुछ छात्र घाट पर बैठ कर मनोरंजन कर रहे थे तभी किसी छात्र ने अपने ही साथी से चर्चा के दौरान कहने लगा। यार, कवि कालीदास ने मेघदूत में वैत्रवती के बारे में लिखा है वह सौंदर्य तो आज से मेल नहीं खाता। उनमें से ही किसी ने विनोद में कहा नज़र लग गई है। नज़र से बचने को काजल का टीका लगा लेना था या काले धागे में ताबीज़ बाँध लेना था, यह दशा तो नहीं होती।

वर्तमान में मुझे इतना मान सम्मान दिया जा रहा है। अनेक सांस्कृतिक, सामाजिक, साहित्यिक आयोजनों के साथ-साथ धार्मिक कार्यक्रमों में धूमधाम से पूजा-पाठ, आरती करना चुनरी चढ़ाना, भंडारे आदि करना ये सब तो ठीक है, परंतु मेरी रूग्णावस्था से बचाव करना आवश्यक क्यों नहीं समझ रहे हैं? क्या ऐसे ही आप सभी के बीच दु:ख तकलीफ सहती रहूँ। ये आयोजन वगैरह तो आस्था, आत्मतुष्टि, मांगलिक भावना से जुड़े हैं। मैं तो तब प्रसन्न होऊँगी, जिस दिन मुझे गन्दगी से दूर, प्रदूषण मुक्त कर दोगे।

कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन.....। इसी में सबकी भलाई है। कर भला तो हो भला।

झूलेलाल कॉलोनी हरीपुरा विदिशा (म.प्र.) 464001

Comments

Submitted by Sachin (not verified) on Fri, 05/20/2016 - 21:00

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बहुत सुंदर लिखा है आपने. प्रेमचंद जी की रचना बेटी का धन पढ़ कर वेत्रवती मईया के बारे में जाना थ. आन यह व्यथा सुन कर। बहुत दुःख हुआ. भारत की अधिकतर जनता कचरा है यह विश्वास और दृढ़ होता है. अकाल मृत्यु मरेंगे इन कर्मों से

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