आदिवासी का तात्पर्य

Submitted by Hindi on Thu, 08/06/2015 - 11:26
Source
परिषद साक्ष्य, धरती का ताप, जनवरी-मार्च 2006
बड़ी-बड़ी निराशाओं के बीच, आज भी संघर्षशील आदिवासी समाज मनुष्य और मनुष्यता के बीच के बुनियादी रिश्तों और उसके मूल्य को अपनी पारम्परिक स्वशासन व्यवस्था के परिवर्द्धित स्वरूप में कायम करने में लगा हुआ है ताकि आधुनिक विकास के दौर में भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था और मजबूत हो सके, साथ ही, वैश्वीकरण, बाजारवाद और उपभोक्तावाद के खिलाफ भारतीय समाज तन कर, पूरी मजबूती के साथ खड़ा हो सके। 'आदिवासी' का तात्पर्य क्या है? महज एक अवधारणा कि इससे आगे भी कुछ…? इसकी बुनियादी अवधारणा क्या है? आधुनिक अवधारणा क्या है? इसकी सही पड़ताल, इसका माकूल विश्लेषण आज भी जारी है। कई मान्यताएँ, अवधारणाएँ टूटती-बनती रही हैं जिसके कारण भी 'आदिवासी' के अर्थ का अनर्थ होता रहा है। कई तरह की ऐतिहासिक भूलें भी हुई हैं। पौराणिक काल से लेकर आधुनिक काल तक। भारतीय मिथक, इतिहास और आदिवासी केन्द्रित अपने विचारोत्तेजक आलेख में हरिराम मीणा ने तथ्यपरक होकर कई-कई ऐतिहासिक भूलों और भ्रांतियों की गहन पड़ताल की है। कई-कई भ्रांतिमूलक या कि गलत धारणाओं, अवधारणाओं को एक नये सिरे से खारिज करने का साहस भी दिखाया है।

'आदिवासी' को आज सीधे तौर पर अनुसूचित जनजातियों में परिभाषित और परिगणित किया जाता है, जैसा कि संवैधानिक अनुसूची में दलितों को 'अनुसूचित जातियाँ’ कहकर परिभाषित किया गया है। सवाल उठता है कि आदिवासी समाज, कबीलायी जीवनशैली में, अपनी सामूहिक ज़िंदगी के लम्बे सफर में, सघन जंगलों, पहाड़ों, नदी-झरनों और वन्य प्राणियों के संग जीते-मरते, अस्तित्व और स्थायित्व पाने की प्रक्रिया में संघर्षशील और सृजनशील रहते हुए कब 'समुदाय' से 'जाति' अथवा 'उपजाति' में तब्दील हो गये। इसका कोई ऐतिहासिक या पौराणिक दस्तावेज मौजूद है? शायद नहीं। यह आज भी सघन खोज का विषय है। हरिराम मीणा के शब्दों में कहें, 'तो सतयुग-त्रेता-द्वापर कालखंडों में आदिवासियों को असुर, दैत्य, दानव, राक्षस, प्रेत, न जाने क्या-क्या संज्ञाएं देकर मनुष्य जाति होने से नकारते रहने का दुष्चक्र रचा गया और इस कलियुग में उनकी 'आदिवासी' पहचान (इंडिजीनस आइडेंटिटी) को नष्ट करने के लिए उन्हें 'जनजाति' या 'वनवासी' कहा जाकर उनके मौलिक स्वरूप को ही तिरोहित करने का बाकायदा सरकारी एलान किया जा रहा है।’

गौरतलब है कि आदिवासियों की बुनियादी पहचान और समग्र रूप से उनके सामुदायिक अस्तित्व को विनष्ट करने की कोशिशें लगातार जारी हैं, यह कहते हुए कि उन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ना उनके विकास और संवर्द्धन के लिये जरूरी है। लेकिन हकीकत में हुआ क्या? उनपर विशेष कृपादृष्टि दिखलाने, उनकी ईसाई धर्म से 'मुक्ति' अथवा 'उद्धार' करने के बहाने, उन्हें 'हिन्दू' होने का एहसास करा कर हिन्दू धर्म और संस्कृति में सुसंस्कृत और विकसित करने की गहरी साजिश रची गई, वह भी 'घर वापसी' के नाम पर। जिन कट्टर और पुनरुत्थानवादी हिन्दू जमात ने 'वनवासी' कहकर इन्हें आदिम हिन्दू जाति और धर्म के तंग दायरे में लाने अथवा घसीटने की लगातार जी तोड़ कोशिशें जारी रखी हैं, उनसे सीधा सवाल किया जाना चाहिये कि आदिवासियों की आदिम परम्परागत कौन-सी धार्मिक मान्यताएँ, विश्वास, आस्थाएँ, श्रद्धा-प्रतीक, मिथक, प्रेरणास्रोत आदि कहाँ तक तथाकथित उनके हिन्दू धर्म से मेल खाते हैं? या कि मेल खाते भी हैं या नहीं? इन सारे सवालों और संदर्भों की गहन पड़ताल और एक सम्यक दृष्टि ‘दहकता गुजरात और आदिवासी समाज' केन्द्रित विचारोत्तेजक आलेख में परिलक्षित होती है।

मानव सभ्यता और संस्कृति के विकास के लम्बे दौर में मानवीय सम्बन्धों में सामुदायिक मूल्य आधारित सामाजिक व्यवस्था वाला समाज अस्तित्व में आया, जो आदिम काल से आदिवासी समाज को विकसित, समृद्ध करता आया है और बहुत हद तक आज भी कायम है। इस मानवीय सम्बन्धों वाले समाज की कुछ अपनी बुनियादी विशिष्टताएँ रही हैं। एक तो यह कि इसमें सामूहिकता के मानवीय भूलों पर आधारित विकसित समाज (व्यवस्था) अपने में एक स्वतंत्र इकाई (स्वयंभू) होता है। दूसरे, उसमें अपने आपसी विवादों-मामलों को निपटाने की शक्ति होती है। तीसरे, प्राकृतिक और पारम्परिक संसाधनों से इसका नैसर्गिक (भावनात्मक भी) सम्बन्ध होता है और खुद को जीवित, विकसित और समृद्ध बनाये रखने के लिये अपने प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भरता बनाये रखना ताकि आत्मनिर्भरता की ताकत बढ़े। प्राकृतिक संसाधनों के साथ जीवंत और गहरे रिश्ते कायम करता हुआ ऐसा समाज स्वत: इन पर सामुदायिक-सामाजिक अधिकार प्राप्त करता गया, जो बाद में कायम संवैधानिक अधिकारों से कहीं ज्यादा बुनियादी है, नैसर्गिक है।

ऐसे विकासमान, समृद्धशाली और मानवीय सम्बन्धों की बुनियादी शर्तों पर आधारित समाज का स्वरूप आज भी वन-प्रांतरों, प्राकृतिक संसाधनों से घिरे आदिवासी जीवन समाज में ही विद्यमान है, जिसे वर्षों से पूँजीवादी, सामंतवादी, साम्राज्यवादी और अब नव बहुराष्ट्रीय साम्राज्यवादी केन्दित व्यवस्थाओं ने लूटने, विनष्ट करने और अपने अधिकार क्षेत्रों में लाने की साजिशें रचीं। नतीजतन आदिवासी गाँव-समाज पर शोषणवादी, साम्राज्यवादी, भोगवादी और उपभोक्ता बाजारवादी राज्य शासन व्यवस्था बड़ी तेजी से कायम होती चली गई। ब्रिटिश साम्राज्य के दौर में जो राज्य शासन का घिनौना और साजिशपूर्ण खेल चला, उसके कारण प्राकृतिक संसाधन और पारम्परिक स्वशासन व्यवस्था से जुड़े आदिवासी गाँव-समाज पर से नैसर्गिक अधिकार धीरे-धीरे खत्म होता चला गया। फिर तो, राज्य अथवा राज्य शासन का सम्बन्ध गाँव-समाज से नहीं, बल्कि व्यक्तियों से कायम होता चला गया। आदिवासी गाँव-समाज के नैसर्गिक एवं सामाजिक अधिकार क्षेत्रों में सुरक्षित जल, जंगल और जमीन सामाजिक दायरे से छिनते चले गये और दूसरे, इन पर व्यक्तिगत या निजी अधिकार कायम किये जाने का सोच और प्रकिया चल पड़ी। फिर तो चालू होता गया निजी अधिकार कायम करने के सोच के तहत जमीन खरीद-बिक्री का अंतहीन सिलसिला। ऐसे-ऐसे कानून लादे जाने लगे कि आदिवासी गाँव-समाज का अस्तित्व, उनकी पहचान और स्वशासन व्यवस्था ही चरमराकर रह गई। आदिवासी अपने भोलेपन, अनजानेपन में यूँ छले गये कि वे अपने ही गाँव-घर में चोर-अपराधी और घुसपैठिये करार किये जाने लगे। आज भी जंगल से कोई भी चीज लेना, नदी या तालाब से मछली आदि लेना सीधे तौर पर कानूनी जुर्म है, चोरी और अपराध है, वह भी आजाद मुल्क की लोकतांत्रिक राज्य-व्यवस्था के तहत।

संघर्ष और संरचना की अपनी सामुदायिक अवधारणा और सोच के तहत आदिवासी समाज ने वर्षों से 'मावा नाटे मावा राज’ यानी हमारे गाँव में हमारे राज के जीवंत नारों के साथ, आँखों में अतीत के पुराने सपनों की नई चमक लिये बदलाव और परिवर्तन की नई दिशा तलाशने के रास्तों में भारी तूफान खड़ा किया। शुरु में लोगों को (खास तौर पर उन लोगों को, जिनके निजी स्वार्थ की सत्ता पर भारी धक्का अथवा हमला लगने लगा) यह महज एक कोरी कल्पना, यूटोपिया और कुल मिलाकर बकवास लगा। उन लोगों ने प्रचारित भी किया कि यह परिवर्तनकारी आन्दोलन नहीं, विलगाववादी आन्दोलन है। लेकिन आन्दोलन ने असर दिखाया और पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम, 1996 पर महामहिम राष्ट्रपति ने अपनी स्वीकृति की मोहर लगाकर आदिवासी गाँव-समाज के पारम्परिक अस्तित्व और उसकी स्वशासन व्यवस्था के ऐतिहासिक महत्त्व को आधुनिक समाज के विकास और संवर्द्धन के लिये सार्थक और सकारात्मक सिद्ध किया है।

आधुनिक विकास की अवधारणा और सोच के खिलाफ संघर्षशील आदिवासी समाज ने इस कानूनी व्यवस्था का व्यापक स्तर पर हार्दिक स्वागत किया है और इसे जमीनी हकीकत से तब्दील करने की देशव्यापी मुहिम चला रखी है। इसे आदिवासी समाज 'हमारा गाँव, हमारा राज' व्यवस्था कायम करने की दिशा में पहला सार्थक और सकारात्मक कदम मानता है। इस परिवर्तनकारी सामाजिक आन्दोलन से गहरे रूप से जुड़े प्रख्यात समाजकर्मी और विद्वान चिन्तक ब्रह्मदेव शर्मा का विचारोत्तेजक आलेख ‘आदिवासी समाज की नई स्वशासी व्यवस्था : उपलब्धियाँ और जिम्मेदारियाँ' इस गम्भीर मुद्दे पर विस्तार से रोशनी डालता है और एक सार्थक विमर्श की दिशा तेज करता है। बड़ी-बड़ी निराशाओं के बीच, आज भी संघर्षशील आदिवासी समाज मनुष्य और मनुष्यता के बीच के बुनियादी रिश्तों और उसके मूल्य को अपनी पारम्परिक स्वशासन व्यवस्था के परिवर्द्धित स्वरूप में कायम करने में लगा हुआ है ताकि आधुनिक विकास के दौर में भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था और मजबूत हो सके, साथ ही, वैश्वीकरण, बाजारवाद और उपभोक्तावाद के खिलाफ भारतीय समाज तन कर, पूरी मजबूती के साथ खड़ा हो सके।

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