भेड़ाघाट से ग्वारीघाट (जबलपुर)

Submitted by Hindi on Sat, 08/08/2015 - 11:18
Source
शिवमपूर्णा, जुलाई 2014
शिवपुत्री नर्मदाशिवपुत्री नर्मदासमुद्र की तलाश में निकला पानी है नदी और नदी की तलाश में निकला पदयात्री है परकम्मावासी। एक न एक दिन दोनों की तलाश पूरी होती है। कल दोपहर तक मैं भी अपने गंतव्य तक पहुँच जाऊँगा। मैं उस यात्री की तरह हूँ, जो अपने घर के समीप वाले मोड़ पर पहुँच गया हो। परिक्रमा के इस अंतिम चरण में कान्ता सहयात्री बनकर चल रही है, इसका आनन्द अनोखा है। हालाँकि मुझे हमेशा लगा है कि मेरी हर यात्रा में मानो छुपती-छुपाती, मानो अँधेरे की काली चादर ओढ़े वह मेरे साथ ही चल रही है।

हमारे कुछ साथी आगे निकल गए थे, तो मैं भी चल पड़ा। आगे प्रेमदास मिले। मैंने कहा, ‘‘मैं न आगे के दल में हूँ, न पीछे के दल में। न घर का हूँ, न घाट का।’’

उन्होंने कहा, ‘‘तुमने घाट को ही घर बना लिया है।’’

उफ! कैसे मीठे बोल! सरयूकान्तजी और प्रेमदास-दोनों की वाणी में अद्भुत मिठास है। दोनों के ही विनोद में परिहास रहता है, उपहास नहीं। उनका विनोद किसी को ठेस नहीं पहुँचाता। दोनों का ही विश्वास मधुरोपासना में है। अपनी मीठी वाणी और विनोदी स्वभाव के कारण दोनों पूरे दल के चहेते हो गए हैं। इनके कारण दल में जान पड़ गई है।

कुछ आगे निकल जाते हैं, कुछ पीछे रह जाते हैं, कुछ ऊपर की पगडंडी से चलते हैं, तो कुछ नदी से लगी पगडंडी से जाना पसंद करते हैं। दल अगर बड़ा होगा तो ऐसी अफरा-तफरी होगी ही।

आगे जो गाँव पड़ा, उसका नाम है गोपालपुर। इस गाँव ने अनायास मेरे गुरू आचार्य नन्ददास वसु का स्मरण करा दिया। उड़ीसा के समुद्र-तट पर एक सुन्दर गाँव है, गोपालपुर। वॅकेशन में नन्दलाल प्राय: गोपालपुर जाते। वहाँ उन्होंने उफनते-उछलते समुद्र के अनेक दृश्यचित्र- सीस्केप-बनाए। इनके अलावा कंधों पर नाव ले जाते, नाव को तट पर उतारते, समुद्र में बहाते और समुद्र की उत्ताल तरंगों पर सवारी करते मछुआरों के अनगिनत चित्र बनाए; गोपालपुर में ही उन्होंने चैतन्य महाप्रभु के जीवन को साकार करती चित्र-श्रृंखला तूलिका के गिने-चुने, सशक्त, त्वरित आघातों से निर्मित की। ये कृतियाँ भारतीय चित्रकला की कालजयी धरोहर हैं।

मैं 1948 से 1953 तक शान्तिनिकेतन के कलाभवन में चित्रकला का छात्र रहा। सौन्दर्य को देखने की दृष्टि मुझे अपने प्रात: स्मरणीय गुरुओं से मिली। आँखों का काम है देखना। उनमें यह विवेक नहीं कि सुन्दर-असुन्दर का फर्क कर सके। उसके लिए तो सभी समान हैं। जिन भाग्यवानों को सौन्दर्य को परखने की दृष्टि मिली हो, वे ही सुन्दर-असुन्दर का फर्क कर सकते हैं। बहुधा यह दृष्टि गुरु से मिलती है। अगर वह न हो, तो सामने सौन्दर्य का पारावार हो, फिर भी हमें दिखाई न देगा। आज की भाषा में कहूँ तो हमारी आँखों में भी कई चॅनल होते हैं। अगर सौन्दर्य का चॅनल नहीं होगा, तो हम सौन्दर्य को पकड़ नहीं पाएँगे। उसे देखकर भी अनदेखा कर देंगे। हमारे भीतर सोए पड़े इस सौन्दर्य-बोध को प्राय: गुरू जगाते हैं। इस गोपालपुर गाँव ने मेरे गुरूओं का अनायास स्मरण करा दिया , इसलिए उसे हार्दिक धन्यवाद देकर ही आगे बढ़ा।

दोपहर तक लम्हेटाघाट पहुँच गए। यहाँ की चट्टानें ‘लम्हेटी रॉक्स’ के नाम से विश्व-प्रसिद्ध हो चुकी हैं। अपनी विशिष्ट रचना और प्राचीनता के कारण संसार के भू-वैज्ञानिकों के आकर्षण का केन्द्र बनी हैं।

यहाँ के मंदिर के बाहर सुस्ताने बैठे। थोड़ी देर में देखा, मेरा भानजा आनंद, उसकी नवोढ़ा पत्नी ऋतु और मेरा छोटा बेटा नीरज नदी से लगी खतरनाक पगडंडी से चले आ रहे हैं आनंद और ऋतु की शादी हुए तीन माह ही हुए हैं। कहाँ तो उन्हें हनीमून पर जाना चाहिए था और कहाँ तीर्थ यात्रा पर चले हैं!

विजय और कोष्टा दल के सबसे युवा सदस्य है और सदा बड़े-बुजुर्गों की सेवा-टहल में लगे रहते हैं। वे यहाँ सबसे बाद में आए और खबर लाए कि भेड़ाघाट में आपके छात्रा आप से मिलने आए थे लेकिन आप लोग निकल चुके थे, इसलिए यहाँ आएँगे। इतने में वे अपनी मारूति कार में आ भी गए। इन छात्रों को मैंने कोई 45 वर्ष पूर्व पढ़ाया था। तीनों बड़े इंजीनियर रहे, अभी-अभी रिटायर हुए हैं। इतने वर्षों के बाद भी अपने गुरू को भूले नहीं हैं। सभी के लिए ठंडा मीठा दूध ले आए हैं। सरयूकान्तजी से उनका परिचय कराते हुए मैंने कहा, ‘ये मेरे छात्र रहे।’

‘‘छात्र होते हैं शिक्षकों का फिक्स्ड डिपाजिट। ऐन वक्त पर काम आते हैं।’’ हाजिरजवाबी और मधुर वाणी का सही मिश्रण होता है सरयूकान्तजी की बातों में ।

आज रात्रि-विश्राम तिलवाराघाट में होगा। सरयूकान्तजी के लिए चलना बहुत मुश्किल हो रहा था। छात्रों ने इसे देखा और बोले, ‘‘चलिए, हम आपको तिलवाराघाट छोड़ देंगे।’’

भारी-भरकम डील डौल वाले सरयूकान्तजी जब मेरे छात्रों के रथ में बैठ गए तो अनायास ही मुझे रामायण की यह पंक्ति याद हो आई -रावण रथी, विरथ रद्युवीरा। किन्तु बोलने का साहस न हुआ। हाजिरजवाब सरयूकान्तजी तुरन्त कहते-सकल पदारथ या जग माहीं, कर्महीन नर पावत नाहीं! मुझे लेने के देने पड़ जाते, इसलिए चुप रहा।

सरयूकान्तजी को ‘कारावास’ मिला तो हम लोग भी चल दिए। (शब्दों से दुहरा काम लेने का एक आनंद है। मानो एक महीने की तनख्वाह देकर हमने उनसे दो महीने का काम करवा लिया!)

यहाँ से हमारा दल दो हिस्सों में बँट गया। युवा नदी के किनारे-किनारे आगे बढ़े। यह पगडंडी खतरनाक थी और ऊबड़-खाबड़ चट्टानों पर से थी। दंडी स्वामी, स्कॉट, मॉरेग, पिन्की तथा सभी युवा इस रास्ते से आगे बढ़े। अधिकांश महिलाओं ने तथा कुछेक अन्य सदस्यों ने ऊपर के आसान रास्ते से जाना ठीक समझा। मैं उनके साथ चला।

लम्हेटाघाट के ही एक आश्रम में थोड़ी देर सुस्ताने बैठे। यहाँ किसी ने कहा कि आप लोग भी नदी के किनारे-किनारे जा सकते हैं। सभी महिलाएँ उस कठिन मार्ग से जाने के लिए तैयार हो गई। मार्ग सचमुच बहुत मुश्किल था। तरह-तरह की चट्टानें अपने पूरे लाव-लश्कर के साथ फैली हुई थीं। कही तो सीधे पानी में उतर गई थीं। चढ़ते-उतरते शरीर की चूल-चूल हिल गई। मार्ग तो कठिन था ही, धूप भी थका देने वाली थी। लेकिन महिलाएँ बड़े उत्साह से नदी का किनारा थामे चल रही थीं। इतना ही नहीं, बराबर बोल-बतिया रही थीं! उनकी ऊर्जा पर हम चकित थे।

एक महिला बहुत मोटी थी। किसी ने उससे पूछा, ‘‘क्यों बहन, क्या तुम शुरू से ही मोटी रहीं या बाद में हुईं?’’

गहरी साँस लेकर उसने कहा, ‘‘मेरी नानी मरी थीं तब उसे आठ लोगों ने उठाया था। मेरी माँ तथा सभी मौसियाँ मोटी रहीं।’’

आगे धोबीघाट पड़ा। चट्टानों पर धोबिनें और धोबी कपड़े धो रहे थे। एक छोटा लड़का पानी से खिलवाड़ कर रहा था। हमारे दल की किसी स्त्री ने उसे गिलास देकर थोड़ा आगे जाकर साफ पानी लाने के लिए कहा। लड़का तैरता हुआ नदी में दूर तक गया और पानी भरकर ले आया। उसकी माँ एक फुलपेन्ट धो रही थी। उसने गिलास दिया ही था कि माँ ने गीला फुलपेन्ट तड़ से दे मारा। लड़का बेचारा गिरते-गिरते बचा। हमारे दल की स्त्रियाँ उस पर बहुत बिगड़ीं। ‘‘कैसी माँ हो तुम, कहीं इस तरह मारते हैं?’’

‘‘बहन, आप नहीं जानतीं। लाख मना करती हूँ, पर पानी से खिलवाड़ करने से बाज नहीं आता। कल ही डूबते-डूबते बचा है।’’ स्त्रियों ने मिठाई देकर बच्चे को चुप कराया।

आगे छोटे-छोटे प्रपातों की लम्बी कतार मिली। प्रपात से गिरते पानी को देखकर लगा मानो नदी अपने कंधों पर से बोझ उतार रही है।

तीसरे पहर तिलवाराघाट पहुँच गए। यहाँ नर्मदा-तट पर एक मंदिर और एक यज्ञशाला है। रात यहाँ रहेंगे। हम जब वहाँ पहुँचे, तब कंडों की मद्धिम आँच पर गाकड़ें सिक रही थीं। शैलेन्द्र गाकड़ और भरता बनाकर कुछेक सदस्यों को तो खिला भी चुके थे। एक सर्वथा अनजान आदमी तीन ही दिन में हमारे कुनबे का अंग बन गया था।

आज पूर्णिमा है। अधिकांश महिलाएँ हमारे परिवार की हैं। घर से तीनों बहुएँ भी आ गई हैं। इसलिए रात को गरबा हुआ। नीता सब से अच्छा गरबा करती है। मृदुला सब से अच्छा गाती है और विजय सब से अच्छा बजाता है। गरबा में पुरूष भी शामिल हुए। पुरूषों में 70 वर्षीय प्रेमदास ने सब से अच्छा गरबा किया। लगता है उनके भीतर 70 वर्ष का वयस्क और 17 वर्ष का किशोर दोनों एक साथ रहते हैं। सरयूकान्तजी ने उन्हें ‘नृत्यवीर’ घोषित किया। शांत, सौम्य और हँसमुख दासगुप्ता दल के सर्वश्रेष्ठ सदस्य घोषित किए गए।

रात्रि के आकाश में छपक-छैया करना मुझे वैसे ही अच्छा लगता है, फिर आज तो पूर्णिमा है। आकाश में बड़ा-सा शुभ्र चाँद उग आया था। मैं उसे निहारता रहा। मुझे वह महाप्रतापी परशुराम जैसा जान पड़ा जाने कितनी बार वह आकाश को नक्षत्रविहीन कर चुका है!

न, यह उपमा अब नहीं चलेगी। मुझे नए जमाने के लायक नई उपमा ढूँढनी चाहिए। लीजिए, मिल गई। धूप है अर्धनारीश्वर। चाँदनी उसका बाँया अंग है।

यह उपमा भी जमी नहीं। प्राचीन युग से मध्य युग तक तो आ गया, किन्तु मुझे आधुनिक युग में आना चाहिए मुझे अभी और कोशिश करनी चाहिए।

वाह, वाह! आधुनिक युग के अनुरूप उपमा भी सूझ गई! चाँद है सूरज का धोबी! सूरज की मैली धूप को धोकर वह इतनी उजली कर देता है कि हम उसे चाँद की चाँदनी समझ बैठते हैं। चाँदनी यानी धुली हुई धूप! भई, धोबी हो तो चाँद जैसा!

यह हुई न कोई बात! चाँद-सी दुलहन नहीं, चाँद-सा धोबी!

भाई चाँद! इस पदयात्रा में शुरू से ही तुम मेरे अभिन्न साथी रहे हो। मैंने कई बार और कई प्रकार से तुम्हारा वर्णन किया है। आज पहली बार तुम्हारा ऐसा ऊटपटांग वर्णन कर रहा हूँ। लेकिन मेरा इरादा नेक है। मैं चाहता हूँ कि लोग तुम्हें देखें, तुम्हारी चाँदनी में नहाएँ। लोगों को आकृष्ट करने के लिए कभी-कभी ऐसी बीहड़ हरकतें करनी पड़ती हैं। तुम अन्यथा न लेना। वैसे, तुम कम खुराफाती तो नहीं। वहाँ बैठे- बैठे हमारे युवा प्रेमियों को- और हमारे समुद्रों को भी -कितना हलाकान किए रहते हो! शूलपाण झाड़ी के भील, यात्रियों को लूट लेते हैं। यात्री उन्हें ‘मामा’ कहते हैं! ताकि वे उन्हें जरा कम परेशान करें। अब समझ में आया कि हम तुम्हें ‘मामा’ क्यों कहते हैं! तुम सौरमंडल की शूलपाण झाड़ी के भील हो!

सुबह-सबेरे हमारी दो पौत्रियाँ नेहा और जूही आ गई। नानाभाई की पत्नी मंजू तो रात को ही आ गई थीं। आज आखिरी दिन वे भी साथ चलेंगी। छोटा बेटा नीरज तो है ही। आज हम तीन पीढ़ी साथ चलेंगे। मैं चाहूँगा कि नेहा-जूही अपने दादाजी की बाकी सभी बातें भले ही भूल जाएँ, आज की इस नर्मदायात्रा को कभी न भूलें।

तिलवाराघाट के गाँधी-स्मारक से होते हुए आगे बढ़े। आगे एक नाला पड़ा। इसे पार करना रोमांचक रहा। नाला काफी गहरा था और कीचड़ में घुटने तक पाँव धँसते थे। मिट्टी इतनी लसलसी थी कि सारे शरीर में सिहरन-सी दौड़ जाती। कैसा तरल, आर्द्र स्वागत था हमारा! नेहा-जूही को कंधों पर बिठाकर नाला पार कराना पड़ा। मोटी महिला नाले में गिर पड़ीं। किसी ने कहा कि इससे नाले का जल-स्तर कुछ ऊपर आ गया था।

इस यात्रा में सर्वाधिक उल्लसित हैं महिलाएँ। घर की रोज-रोज की झंझटों से उन्हें बड़ी राहत मिली है। उनमें एकाएक जान आ गई है और उनके चेहरे भी ज्यादा अच्छे लगने लगे हैं। एक महिला प्राय: पीछे रह जाती थी। कारण पूछने पर उसने बताया, ‘‘मेरे हाथ तो ठीक-ठीक हैं लेकिन पैर बहुत आलसी हैं !’’

हमारा गंतत्य जैसे-जैसे निकट आता गया, हमारी उत्तेजना भी बढ़ती गई।

आखिर ग्वारीघाट पहुँच गए। दंडी स्वामी पूरे दल की अगुआई कर रहे हैं। जबलपुर के इसी ग्वारीघाट से मैंने अपनी नर्मदा पदयात्रा का शुभारंभ किया था। यहीं पर आज उसका समापन हो रहा है। यह मेरी यात्रा का आदि भी है और अंत भी। अनेक स्नेही-स्वजन हम लोगों की अगवानी करने पहले ही आ चुके थे। यहाँ हम सभी ने देर तक स्नान किया। फिर मैंने कान्ता का हाथ अपने हाथ में लिया और दोनों ने मिलकर नर्मदा की अर्चना में एक दीप जलाया और प्रवाहित किया। हम दोनों ही आत्म-विभोर थे। मेरी 2624 कि.मी. लम्बी पदयात्रा पूरी हो गई। वर्षों से जिस शुभ्र दिवस की प्रतीक्षा कर रहा था, आखिर वह आ गया था। आनन्द से मैं छलछला उठा।

हमारी बहुओं ने मॉरेग को साड़ी पहनाई। साड़ी में उसकी आकृति खिल उठी। मानो नर्मदा में से निकली वीनस हो!

ग्वारीघाट के नर्मदा-भक्त भुपेन्द्र दुबे और उनकी पत्नी विभा दुबे ने विशाल वृक्षों के मध्य स्थित मंदिर के भवन में एक सभा का आयोजन किया था। मैंने कभी नहीं सोचा था कि हमारे स्वागत-समारोह में इतने लोग उमड़ेंगे। कार्यक्रम का शुभारंभ दंडी स्वामी के भजनों से हुआ। वक्ताओं ने मेरी प्रशंसा के पुल बाँधे। मेरे छात्रों ने मुझे उपहार दिए। सरयूकान्तजी ने मानपत्र पढ़ा। मेरा विचार है कि विशेषणों को बहुत बचा-बचा कर इस्तेमाल करना चाहिए। लेकिन मानपत्र में उन्होंने विशेषणों की झड़ी लगा दी। धन्यवाद देते हुए मैंने कहा-

अभी मेरी प्रशंसा में बहुत-कुछ कहा गया। क्या ही अच्छा होता, इस समय मेरे माता-पिता यह सब देखने को जीवित होते। आपकी बातें सुनकर मेरे पिता बहुत खुश होते और मेरी माँ तो इतनी भोली थी कि वह इस पर विश्वास भी कर लेती। मुझे खुशी है कि जिस यज्ञ का आरम्भ मैंने 1977 में किया था, उसे आज 1999 में पूरा कर सका हूँ। आज जब पलट कर पीछे देखता हूँ तो खुद हैरान हो उठता हूँ कि यह सब कैसे कर सका। यही समझिए कि बस, हो गया। इसमें मेरी योग्यता की अपेक्षा भाग्य का ज्यादा हाथ रहा।

जो काम एक साल में हो सकता था, एक अयोग्य विद्यार्थी की तरह मुझे उसमें 22 बरस लग गए। कितना मंदबुद्धि हूँ मैं! एक तरह से अच्छा ही हुआ। इतने वर्षों तक नर्मदा में रमा रहा। उसी की लौ लगाए रहा। उसी के बारे में लिखता रहा और उसी के चित्र बनाता रहा। मैंने अपने जीवन के उत्कृष्ट क्षण नर्मदा-तट पर बिताए हैं। नर्मदा ने मेरे जीवन का सुवासित किया है। मेरे पात्र को अमृत-रस से छलका दिया है। परिक्रमा के दौरान मैंने कितने पहाड़ देखे, कितनी नदियाँ पार कीं, घने जंगलों में घँसा, साँप-मगर से रूबरू हुआ, ग्रामीण नारियों का आतिथ्य प्राप्त किया। अनेक साधु- संन्यासियों का सत्संग हुआ। टूटी-फटी धर्मशालाओं में रात रहा। खूबसूरत लेकिन कठिन पगडंडियों पर चला। विशाल खुला आसमान, हरियाली से लहराते खेत, छोटे -बड़े प्रपात, प्रपातों के गर्जन से गूँजती घाटियाँ, किलोल करते जलपाखी और जाने क्या-क्या देखने को मिला। कितने सुहाने थे वे दिन -एक से बढक़र एक!

नर्मदा-तट पर मैंने प्रकृति की अपूर्व भव्यता के साथ-साथ मानवता का सहज सौन्दर्य भी देखा। कितनी बार वहाँ के लोगों ने अपने घर और अपने दिल के दरवाजे मेरे लिए खोल दिए। (वैसे हर बार दरवाजे नहीं खोले। कभी दुत्कारा भी गया। फिर भी भले आदमी ज्यादा ही मिले।) इतना अधिक स्नेह दिया, जिसे पाने के लिए मैंने कुछ भी नहीं किया था। उन भोले-भाले लोगों के प्यार की अनुभूति सदा मेरे मन में बनी रहेगी।

उन परकम्मावासियों को मैं कैसे भूल सकता हूँ जिन्हें देखकर मैं यह समझ सका कि ‘आस्था ’ किसे कहते हैं। परिक्रमा आस्था का सर्वसमर्पण का ही तो अभियान है। एक ही नदी का ध्यान करते हुए बरसों चलना-नियमानुसार परिक्रमा करने पर 3 बरस, 3 महीने 13 दिन लगते हैं- यह कोई छोटी- मोटी तपस्या नहीं। साहस भी कम नहीं। जोखिम भी है और अपरिग्रह तो है ही। क्या होता है उनके पास! फिर भी उनमें से कई में आत्मदीनता का कोई भाव नहीं। उनसे मैंने सीखा कि सुख का आरम्भ सादगी से होता है। हमारी जीवन-नौका को हमें हलका रहने देना चाहिए, उसे केवल जरूरत के सामान से ही भरना चाहिए वरना यह कबाड़ ही हमें डुबो देगा।

नर्मदा के हर मोड़ पर मुझे कुछ नया दिखाई दिया। हर बार मन में नर्मदा-सौन्दर्य की अमिट छाप लिए घर लौटता। नर्मदा ने अपने सौन्दर्य से मुझे आकंठ भर दिया। यह भराव मुझ पर दबाव डालता रहा। मैं अपने आपको अभिव्यक्त करने के लिए विवश हो जाता। फलस्वरूप अपनी कृतियों में नर्मदा-सौन्दर्य को व्यक्त करता रहा। काश, मैं इसे ढंग से व्यक्त कर सका होता! उसके सौन्दर्य की बहुत थोड़ी, बहुत मामूली-सी झलक ही दिखा पाया हूँ। वैसे यह तो शुरूआत है। भविष्य में अनेक समर्थ लेखक और चित्रकार आएँगे और नर्मदा-सौन्दर्य को शाश्वतता प्रदान करेंगे। सज्जनों, इसके साथ ही नर्मदा के साथ मेरा अनुबंध पूरा हो रहा है और अब मैं घर लौट रहा हूँ।

इस अंतिम वाक्य के साथ मेरे स्वर में उदासी उतर आई। मैंने बोलना बंद कर दिया।

सभा समाप्त हुई। इसके बाद विशाल भंडारा हुआ। इतने सारे लोगों को खिलाने-पिलाने की जिम्मेदारी बहुओं ने अपने ऊपर ले ली थी। बेटों ने भी किसी बात की कमी नहीं रहने दी। फिर घर आ गए।

नर्मदा की रेत पर मैं अपने निशान छोड़ आया था। मुझे सेवानिवृत्त कर दिया था!

अब खास कुछ कहने को नहीं रहा। साहित्य के व्याकरण के मुताबिक मुझे कुछ कहना भी नहीं चाहिए। फिर भी बिना कहे रहा नहीं जाता। अब केवल दो इच्छाएँ बाकी हैं। एक तो यह कि अपनी घड़ी आने पर मैं खाट पर पड़े-पड़े मरने की जगह नर्मदा-तट की किसी पहाड़ी ढलान पर प्राण देना ज्यादा पसंद करूँगा। और जब मेरा देहांत हो जाए तब-

नर्मदा तट की हवाओ! तुम मुझे कंधा देना। नर्मदा-तट के पक्षीगण! तुम उत्फुल्ल कंठ से अपने गीतों की तान छेड़ना। नर्मदा-तट के अर्जुन वृक्ष! तुम मेरी चिता सजाना। दोपहर की चिलचिलाती धूप! तुम चिता को अग्नि देना। नर्मदा की चट्टानों! चिता जब तक जल न जाए, तब तक तुम वहीं रहना भला! नर्मदा की लहरो! जब अस्त हो रहे सूर्य की सिंदूरी आभा तुम्हारे ऊपर पडऩे लगे, तब तुम मेरी अस्थियों को नर्मदा में प्रवाहित कर देना। और माँ नर्मदे! तू हमेशा के लिए मुझे अपनी गोद में ले लेना!

बस, अब मुझे एक भी शब्द नहीं कहना चाहिए। वरना वह साहित्य के नियमों का घोर उल्लंघन होगा। परन्तु आज मैं साहित्य के किसी नियम को, कला के किसी व्याकरण का मानने वाला नहीं। अपने मन की बात कहके ही रहूँगा। मेरी दूसरी इच्छा यह है कि कयामत के दिन जब पुकार हो, तो मेरी पुकार इस तरह से हो-कहाँ गया वो नर्मदा-सौन्दर्य वाला!

बस।

- 1836 राइटटाऊन, जबलपुर-2 (म.प्र.)

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