मानोट से कुटरई

Submitted by Hindi on Sun, 08/09/2015 - 12:06
Source
शिवमपूर्णा, अक्टूबर 2014
.मौसम साफ था और हवा शरद का स्पर्श लिए थी। ऊँचे पेड़ों से धूप छन-छनकर आ रही थी। मेरे साथियों का उत्साह उफान पर था। उन्हें यहाँ मनचाहा एकान्त और शान्ति प्राप्त हो रही थी। कुछ दिन पूर्व ही वे महानगरों की गहमागहमी, शोरगुल और आपाधापी में डूबे हुए थे। अब वे यहाँ वनों,पहाड़ों और हरे-भरे खेतों को निहार रहे थे, निस्तब्धता को आत्मसात कर रहे थे। और नदी से लगी ऊबड़-खाबड़, टेढ़ी-मेढ़ी खूबसूरत पगडंडियों पर पाँव-पाँव चलने के सुख का तो कहना ही क्या! फिर हम इक्के-दुक्के भी तो नहीं, कोई बारह लोगों का हँसता-चहकता दल था हमारा। छोटी-मोटी शोभायात्रा ही समझिए!

हर क्षण दृश्य बदलता रहता था। हर क्षण कोई नया मोड़ कोई अप्रत्याशित चट्टानी कगार या नन्हें-मुन्ने प्रपात सामने आ जाते थे। नर्मदा अपनी अथक गतिशीलता से बह रही थी और अपनी सुषमा से हमें आश्चर्यचकित कर रही थी। समूची धरती सुन्दर सपने जैसी मोहक लग रही थी। अगर हम प्रकृति से दोस्ती का हाथ बढ़ाएँ, तो वह हमें कितना कुछ देने को तत्पर रहती है।

पाँवों में दर्द और कन्धों में ऐंठन लिए शाम को सँकरी पहुँचे। भूतपूर्व सरपंच फग्गन सिंह के घर रात रहे। थककर हम लोग तो पसर गए लेकिन महिलाएँ खाना बनाने में जुट गई। डॉ. मिश्र स्टेथेस्कोप और बहुत सारी दवाइयाँ लेकर आए हैं। ज्यों ही लोगों को पता चला कि हमारे दल में डॉक्टर भी हैं तो मरीजों की भीड़ लग गई। वे न केवल उन्हें देखते थे बल्कि दवाइयाँ भी देते थे। न होती तो लिख देते। और यह सब वे नि:स्वार्थ सेवाभावना से प्रेरित होकर करते थे।

नवरात्र का आज पहला दिन है। गुजरात में पूरे नवरात्र में गरबा की धूम रहती है। चूँकि हमारे दल की तीनों महिलाएँ गुजराती हैं, इसलिए घर के खुले आँगन में उन्होंने गरबा शुरू कर दिया। थोड़ी देर तक तो घर की और पास-पड़ोस की लड़कियाँ इसे कौतूहल से देखती रहीं, फिर एक-एक करके वे भी शामिल हो गईं। बदले में गाँव की महिलाओं ने गीत-संगीत का अपना कार्यक्रम प्रस्तुत किया। सांस्कृतिक आदान-प्रदान!

सरपंच के भतीजे ने हमें एक संस्मरण सुनाया-कोई दस बरस पहले की बात है। ठंड के दिन थे। हम लोग आग ताप रहे थे। तभी एक बाबा नदी से नहाकर आया। नहाते समय पाँच रुपए का नोट भीग गया था तो वह उसे सुखाने लगा। अचानक वह हाथ से गिर गया। लोग परेशान हो उठे, किसी ने झपटकर निकाल लिया। नोट जला तो नहीं था पर काला पड़ गया था। लोगों की व्यग्रता देखकर वह बोला, ‘‘इसमें परेशान होने की क्या बात है, नोट नया आ जाएगा।’’ और वाकई उसके हाथ में नया नोट आ गया। फिर बोला, ‘‘मुझे नोट दोगुने करने की विद्या आती है।’’ लोग नोट देते तो वह राख की ढेरी में दबा देता, लोगों से आँख बन्द करने को कहता, मन्त्र पढ़ता और सबके सामने राख में से दोगुने नोट निकाल देता! ताऊजी पाँच हजार के नोट ले आए, तो उसने कहा,‘‘नहीं भाई, अब बड़ी रकम ले आओ तभी मैं अपनी विद्या दिखाऊँगा।’’ यहाँ-वहाँ से उधार लेकर ताऊजी ने उसे बीस हजार रूपए दिए। उसने वे राख में दबा दिए, आँखें बन्द करने को कहा और मंत्र पढ़ने लगा। काफी देर बाद आँखें खोलने के लिए कहा और राख में से नोट निकाले। लेकिन वे बिना रंग के सादे नोट थे। उसने कहा,‘‘एक जड़ी की कमी के कारण नोटों में रंग नहीं आ रहा। उसे लेने के लिए मुझे जंगल जाना होगा। तुम में से कोई एक मेरे साथ चलो।’’ एक युवक को उसके साथ कर दिया गया। जाते समय कहता गया, ‘‘आँखें बन्द करके बैठे रहना, नहीं तो मेरा मन्त्र काम नहीं करेगा।’’ कई घण्टों के बाद भी जब वह नहीं आया तो लोगों को शक हुआ। आँखें खोलकर ढेरी को कुरेदा तो वहाँ कुछ भी नहीं था। कुछ सादे नोट जरूर थे। वे नोटों की फोटोकॉपी थे। साथ वाले युवक को झाँसा देकर वह भाग गया। उधारी चुकाने में ताऊजी का खेत बिक गया।

कभी-कभी भाग्य लोगों को कैसा तोड़-मरोड़ कर रख देता है। ग्रामीणों के अज्ञान का फायदा उठाने वाले धूर्तों की कमी नहीं। न केवल गाँवों में ऐसा होता है; शहरों में भी, शहरों की सड़कों पर, बाजारों में, रेलगाड़ियों में, फ्लैटों में-कौन सी जगह धूर्तों के चंगुल से बच सकी है! और यह सिलसिला जारी रहेगा। जहाँ लालची होंगे वहाँ धूर्त होंगे ही-क्या गाँव, क्या शहर।

सुबह हमारा कारवाँ दुपटासंगम के लिए बढ़ चला। डाँ. मिश्र का एक नौजवान मरीज उनसे इतना प्रभावित हुआ था कि अपने एक साथी को लेकर आगे का रास्ता दिखाने के लिए हम लोगों के साथ चला।

नदी के दोनों तटों पर हरियाली ओढ़े वन थे। पगडंडी बहुत मुश्किल थी। कई जगह एक ओर ऊँची तीखी चट्टानी कगार रहती और दूसरी ओर नर्मदा। इनके बीच की सँकरी और जोखिमभरी पगडंडी से दब- सिकुड़कर ही आगे जाया जा सकता था। हमारी मुश्किल तब और बढ़ जाती जब कगार से रिसते पानी के कारण पत्थरों पर काई जम जाती और पैर फिसलने लगते। रमेशभाई और हंसाबहर विलम्बित यात्री की तरह पीछे रह जाते।

सामने का वनाच्छादित तट काफी पास आ गया। लगता था हम जंगल के जबड़े में घुस आए हैं। यहाँ एक जगह सभी ने स्नान किया। महिलाएँ मुँहअँधेरे ही स्नान कर लेती हैं, लेकिन यहाँ उन्होंने दोबारा स्नान किया। हमारे देश की महिलाएँ बाहर खुले में इस तरह स्नान कर सकती हैं कि अपने तन का एक भी अंग दिखने नहीं देतीं। अच्छे गद्य में भी यही बात होती है। अपने भीतर की कविता को वह दिखने नहीं देता।

दोपहर के खाने के लिए यह ठीक जगह थी तो आग जलाने के लिए लकड़ियाँ इकट्ठी की गई। नदी-तट के ऊँचे छतनार वृक्षों के तले हमने पकाया खाया। यह था असली वनभोज!

जारंगा और बिलगड़ा होते हुए आगे बढ़े। डॉक्टर मिश्र मेरे साथ थे। वे जब स्वीकृति देते हैं, उसके बाद ही गुर्दे का प्रत्यारोपण होता है। उन्होंने कहा,‘‘शरीर उस गुर्दे को सहज रूप से स्वीकार करता है जो स्नेहपूर्वक, खुशी-खुशी दिया जाता है। पैसे के लालच में या मजबूरी में दिये गए गुर्दे को शरीर उतनी सहजता से स्वीकार नहीं करता। मानो शरीर यह जानता हो कि अपना कौन है और पराया कौन है।’’

दुपटासंगम में हमारे रहने की व्यवस्था गनपत के घर करके डॉक्टर के मरीज वापस जाने लगे। अँधेरा हो चुका था, रास्ता खतरनाक था और इस बीहड़ में से उन्हें पूरे दस किलोमीटर जाना था। लेकिन वे मजे से चले जाएँगे- तारों का उजाला जो था।

सवेरे चल दिए। नदी से लगी पगडंडी खतरनाक हो गई। एक जगह तो वह इतनी सँकरी ऊबड़-खाबड़ और फिसलनभरी हो गई कि रमेशभाई तो उस पर से जा ही नहीं सकते थे। उनके पैर के अँगूठे में फोड़ा निकल आया था और बेहद तकलीफ दे रहा था।

संयोग देखिए कि यहीं एक डोंगी मिल गई और समस्या हल हो गई।

तपती तिपहरिया में चकदेही पहुँचे। उस दिन वहाँ साप्ताहिक बाजार था। जबलपुर से यहाँ बस भी आती है। सुबह की बस से रमेशभाई और हंसाबहन जबलपुर चले जाएँगे।

जिस कुटी में हम ठहरे थे, वह गाँव से दूर नर्मदा-तट पर थी। सामने तट से अनेक ग्रामीण नर्मदा को पैदल पार करते हुए लगातार आ रहे थे। आज बाजार जो था। शाम होते-होते मेरे मित्र प्रेमदास शर्मा हम लोगों की खोज-खबर लेने सुदूर दिल्ली से आए। एक बार पदयात्रा में साथ भी चले थे। हम लोगों के लिए ढेर सारी खाद्य-सामग्री ले आए थे। रात हम लोगों के साथ रहेंगे, सवेरे खापा तक साथ चलेंगे, फिर अपनी जीप से लौट जाएँगे। हम लोगों ने उनकी जीप में रमेशभाई और हंसाबहन को जबलपुर भेजने का निर्णय लिया। उन्हें छोड़ने संजय जाएगा। मध्य रात्रि तक तो जीप वापस भी आ जाएगी।

जाने से पहले रमेशभाई मुझसे गले मिले। उनकी आँखें छलछला आईं। मेरे हाथों को कसकर दबाया। काँपती हुई आवाज में मैं इतना ही बोल सका, आप लोगों ने मुझपर कितना भरोसा किया।

रमेशभाई हर बात के लिए हंसाबहन पर निर्भर रहते थे। जहाँ पगडंडी खतरनाक होती, हंसाबहन उनका हाथ पकड़कर उन्हें सहारा देतीं और बड़ी सावधानी से उन्हें वह जगह पार करा देतीं। एक पल के लिए भी उनका साथ नहीं छोड़ती थीं। हम उन दोनों के प्रेम और समर्पण को देखकर द्रवित हुए।

सवेरे चले तो प्रेमदास खापा तक साथ चले। वहाँ की पाठशाला में कोई उत्सव था। शिक्षक और छात्र एकत्र हुए थे। मैंने उन्हें अपने बारे में बताया और चौबीस बरस पहले जब यहाँ से निकला था, उसके बारे में भी बताया। उनके आग्रह पर अपनी पुस्तक ‘सौन्दर्य की नदी नर्मदा’ में से सम्बन्धित अंश का पाठ भी किया। मुझे यह जानकर दु:ख हुआ कि खापा में जिस लुहार के घर मैं रात रहा था, वह अब नहीं रहा।

तभी एक शिक्षक ने बड़े ही विनीत भाव से कहा कि आज के कार्यक्रम के मुख्य अतिथि महोदय किसी कारण से नहीं आ पाएँगे। क्या करें, समझ में नहीं आ रहा। मैंने कहा कि आप जरा भी चिन्ता न करें। सुदूर दिल्ली से आए मेरे मित्र और मेजर जनरल रह चुके प्रेमदास शर्मा से बढ़कर मुख्य अतिथि हो ही नहीं सकता। शिक्षकों के आग्रह पर प्रेमदास को यह आसन ग्रहण करना पड़ा। स्वाभाविक ही उनके परिचय का दायित्व मुझे सौंपा गया। ‘बहुमुखी प्रतिभा के धनी, शिक्षाविद्, संवेदनशील, मृदुभाषी, खुशमिजाज, मिलनसार’ आदि जितने भी विशेषण मेरी पकड़ में आए, उनसे मैंने अपने बालबन्धु को विभूषित किया, जो सच भी थे। (शाला-जीवन में वे बाँके अभिनेता भी रहे।) इसके बाद उनका भाषण शुरू हुआ। किन्तु जब उनका भाषण, जो निस्सन्देह बहुत ओजस्वी था, हम लोगों को अनंत लगने लगा, तो उन्हें वहीं बोलता छोड़कर हम लोग आगे बढ़ गए।

मेरा विचार है कि मुख्य अतिथियों और अध्यक्षों को भले ही वाहन पर लाया जाए परन्तु जाते समय उन्हें कोई वाहन उपलब्ध न कराया जाए, पैदल जाने के लिए छोड़ दिया जाए। तभी ये धुरन्धर लम्बे-लम्बे अछोर भाषण देने से बाज आएँगे। किन्तु अगर वे अपने ही वाहन में आएँ, जैसा कि प्रेमदास यहाँ आए थे, तो आप क्या कीजिएगा!

पगडंडी के दोनों ओर खिले जंगली फूलों की शोभा देखते हुए आगे बढ़े। शाम तक फड़कीघाट पहुँच गए। जिस कुटी में हमारा रैनबसेरा था, वह नर्मदा की खड़ी कगार पर एकान्त में थी। वहाँ चार-पाँच बाबा लाउडस्पीकर लगाकर चौपट सुर में गा रहे थे। उनका कार्यक्रम देर रात तक चलेगा और हमें लाउडस्पीकर की ऊँची घरघराहट में ही सोना पड़ेगा। जगह कम थी, दब सिकुड़कर ही सो सकते थे। मैं संजय के पास सोया था। वह जरा ज्यादा ही खर्राटे लेता है। सुबह गार्गी ने पूछा कि आप संजय के पास कैसे सो सके ? तो मैंने कहा कि वह अगर लाउडस्पीकर के पड़ोस में सो सकता है तो मैं उसके पड़ोस में क्यों नहीं सो सकता! दरअसल हम सभी लाउडस्पीकर का और उस संगीत सभा का कर्णभेदी शोर झेलने को मजबूर थे। इस शान्त मठ में तो छोटे ट्रांजिस्टर की आवाज भी शोर होती।

पर्वतों के बीच से बह रही नर्मदा ने यहाँ क्या ही नयनाभिराम दृश्य सँजोया है। इस पहाड़ी प्रदेश की पगडंडी में बेहद उतार-चढ़ाव हैं। नुकीले पत्थरों पर चलते समय गिर पड़ने का भय रहता है। एक जगह हाथ और पैरों के बल सरकते या रेंगते हुए उतरना पड़ा। महिलाएँ उतर गईं तो मैं भी किसी तरह लुढ़कते-पुढ़कते उतरा। आश्चर्य की बात यह थी कि महिलाओं ने खास असुविधा का अनुभव नहीं किया। मानों उनमें कोई दैवी शक्ति आ गई हो!

इस नीरव निर्जन संसार में हम लोगों के सिवा और कोई नहीं। न किसी का स्वर सुनाई देता है, न किसी की पदचाप। गार्गी, संजय और अखिलेश हिमालय में खूब घूम चुके हैं। वे कहते हैं कि यहाँ जैसा निभृत एकान्त है, वैसा हिमालय में नहीं मिलेगा। वहाँ हर जगह पर्यटकों की गहमागहमी रहती है। यहाँ का पर्वतीय क्षेत्र एकान्त प्रेमियों के लिए वरदान है।

दोपहर तक मोहनबाबा की कुटी पहुँच गए। बड़ा ही मनोरम स्थान था। यहीं भोजन बनाने का कार्यक्रम बना। सभी पहले नहाने गए। नर्मदा-तट पर एक नाई किसी की हजामत बना रहा था। तिवारी ने उससे कहा कि इसके बाद मेरी हजामत बना देना। उसने कहा,‘‘हम हज्जाम नहीं दोस्त हैं, एक-दूसरे की हजामत बना रहे हैं। आप भी किसी को ले आइए, कैंची-कंघा हम दे देंगे।’’

अब तिवारी से भला कौन हजामत बनवाता!

पदयात्रा में मैं दाढ़ी नहीं बनाता। चार दिन के बाद दाढ़ी-मूँछ के सफेद बाल ऐसे लग रहे थे मानो चेहरे पर फफूँद लगी हो।

मोहन बाबा की कुटी में कंडे मिल गए तो फगनू और घनश्याम ने गाकड़ बनाए। महिलाओं ने दाल-सब्जी जरूर बनाई लेकिन आज के भोजन का प्रतिनिधि पकवान तो गाकड़ ही रहा।

तीसरे पहर चल दिए। यहाँ से हमें एक लम्बी और तीखी चढ़ाई चढ़नी पड़ी। कच्ची धूलभरी सड़क जरूर थी पर कँकरीली सड़क पर पैर फिसलते थे और बहुत सावधान होकर चलना पड़ता था।

पहाड़ी पर होने के कारण इसे टिकरा कुटरई कहते हैं। यहाँ रहने के लिए पाठशाला मिल गई। सामने ही दुर्गा प्रतिमा की स्थापना की गई है और मंच भी बनाया गया है। यहाँ रोज रामलीला होती है। आज ताड़का-वध होगा। गाँव के लड़के ही अपने कामचलाऊ साज-सामान के सहारे यह कार्यक्रम प्रस्तुत करते हैं।

रात में हमारे दल के सदस्यों ने भी इसका आनंद लिया। थोड़ी देर के लिए मैं भी गया। दर्शकों को विदूषक की बीहड़ हरकतों पर बड़ा मजा आ रहा था। जो राम बना था, वही दशरथ भी बना था। जो ऊँचा-पूरा लड़का ताड़का बना था। वही बीच-बीच में दानदाताओं के नामों की घोषणा भी करता था-फलाँ की ओर से दो रूपए, अमुक की ओर से चार रूपए। तभी एक धमाका हुआ-मुंबई से आये मेहमानों की ओर से डेढ़ सौ रूपए। यद्यपि यह पुरस्कार दिल्ली के डॉ. मिश्र ने दिया था, लेकिन ताड़का ने इसे मुंबईवालों के खाते में डाल दिया। डॉक्टर वहीं बैठे थे किन्तु उन्होंने भूल-सुधार की कोई आवश्यकता नहीं समझी।

कार्यक्रम अभी आधे में ही था कि बिजली चली गई तो ताड़का का वध रद्द कर देना पड़ा। दूसरे दिन सुबह डॉक्टर ने इस कार्यक्रम का बेहद रोचक वर्णन सुनाया- एकदम मँजे हुए साहित्यकार की तरह। डॉक्टर गार्गी और संजय यहाँ से घर चले जाएँगे। उनका वापसी का रिजर्वेशन है। उनके साथ कान्ता भी जाएगी। उसे एक शादी में जाना है।

ये मेरे बेहद अच्छे साथी रहे। डॉक्टर मिश्र कभी फौज में कर्नल थे। दादा बन चुके हैं पर आज भी युवा लगते हैं। बड़े ही जिन्दादिल और हँसमुख। चलने में हमेशा आगे रहते और बाद में आनेवालों का ताली बजाकर स्वागत करते। शाम को उनका सेवा -यज्ञ शुरू हो जाता। न जाने किस तरह वे हर मरीज के लिए समय निकाल लेते और दवाई भी देते। हमारे देश को ऐसे ही मानवतावादी चिकित्सकों की जरूरत है। डॉक्टर और संजय पहले दिन से ही अभिन्न हो गए थे। उनके बीच सहज मैत्री हो गई थी। दोनों बहुत अच्छे तैराक थे, एक घंटे से पहले पानी से नहीं निकलते थे। संजय ‘आर्ट ऑफ लिविंग’ को समर्पित है और पूरे देश में इसकी क्लास लेता है। छत्तीस का है फिर भी अविवाहित है। हम लोगों को इस बात की प्रतीक्षा है कि उसे किसी से प्रेम हो जाए और उसकी कुँआरी जिंदगी खत्म हो जाए। दुबली-पतली गार्गी में गजब की फुर्ती है। वह तितली की तरह उड़ती रहती थी। हम लोग जब थककर निढाल हो जाते तो वह खाना बनाने के कार्य में जुट जाती। यही नहीं, दिन में कई बार वह हमें खाने के लिए कुछ न कुछ देती रहती। उसका हर काम बड़े ही व्यवस्थित ढंग से होता था।

ये सभी यहाँ से चले जाएँगे। ये वे लोग हैं जिन्हें एक सप्ताह पहले हम जानते तक न थे। पराए लोग थे लेकिन छह दिनों में ही कितने अपने हो गए थे। मुझे गुरूदेव के गीत की एक पंक्ति का स्मरण हो आया- ‘दूर के कोरिले निकट, पर के कोरिले भाई।’(दूर को पास ला दिया, पराए को भाई बना दिया।) यही तो नर्मदा कर रही है।

उनकी बस को आने में काफी देर थी इसलिए मैंने कान्ता को चोरी-चोरी देखा और चल पड़ा।

- 1836 राइटटाऊन, जबलपुर-2 (म.प्र.)

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