वो कागज की कश्ती वो बारिश का पानी

Submitted by RuralWater on Mon, 08/10/2015 - 15:51
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नेशनल दुनिया, 9 अगस्त 2015
भारतीय परम्परा के अनुसार मूलतः छह ऋतुएँ होती हैं, पर मुख्यतः तीन ऋतुएँ ही हम सबके स्मृतिपटल में अंकित रहती हैं, ग्रीष्म, बरखा और शीत। हर ऋतु जीवन के उस सत्य को उद्घाटित करती है जिसे जानते तो हम सब हैं, पर समझने का यत्न बहुत कम लोग करते हैं और वह सत्य है ‘जीवन-चक्र’, जहाँ कुछ स्थायी नहीं है सब कुछ समय के चक्र के साथ परिवर्तित होता रहता है। मानव मन सुख-दुख, उल्लास-विषाद, प्रेम-द्वेष और न जाने कितनी भावनाओं को अपने भीतर समेटे हुए है वैसे ही प्रकृति भी शीतलता, उष्णता, शुष्कता सभी को समाहित कर सन्तुलन स्थापित करने की चेष्टा करती है। छई छपा छई छपाक छई, यह आवाज कानों में मन्दिर की घंटी सी गूँज रही है। मन मेंं सुकून भरते हुए, पवित्रता की गहरी लकीर खींचते हुए, तन-मन को महकाती मिट्टी की सोंधी सुगन्ध जैसे उसी में गुँथ जाने के लिये बुला रही हो और मन भी बादलों में छिपी बूँदों की तरह उमड़-घुमड़ कर उसमें समाने को तत्पर। कभी बचपन की चुहलबाजियाँ सी, तो कभी यौवन की मादकता सी और कभी सफेद बालों की चमकती छाँव सी, बरखा की बूँदे किसे नहीं लुभातीं। हर हृदय बरखा की पहली बूँद की ऐसे ही प्रतीक्षा करता है जैसे नौ माह के बाद माँ के गर्भ से बाहर निकल शिशु किलकारी मारते हुए नवजीवन को आमंत्रित करता है।

धरती के उस दरकते हुए हृदय से पूछो जो सूरज की तीखी किरणों से छलनी-छलनी हो चुका है कि क्या मोल है उसके लिये बरखा की पहली बूँद का, अतः हृदय को स्पर्श करती जब वह समाती है तो असीम शीतलता का अवर्णनीय एहसास दे जाती है, किसानों के तरसते नैन आसमाँ में टकटकी लगाए ईश्वर को जोर से पुकारते हुए, बूँदों की उस झड़ी का इन्तजार करते हुए जब उनकी पालनहार बन आती है तो उनके अश्रु में समाहित हो खेतों को प्राण दे जाती है। मुरझाए हुए वृक्ष लहलाने लगते हैं, चारों तरफ हरियाली रंग-बिरंगे पुष्प और उनकी सुगन्ध ‘मनमोहक अति सुन्दर’ कुछ होठ बुदबुदाते हैं तो कुछ हृदय इस दुर्लभ सुन्दरता को देख मुस्कुराते हैं।

हर आम और खास को यह मदमाती और ललचाती है। किसी के भीतर भीग जाने की इच्छा, तो कड़ाही में तलते गर्म पकौड़ों की लालसा, हर किसी के अपने मायने, पर जो भी हो क्या ऐसा इन्तजार किसी और ‘ऋतु’ का होता है? दादी की नसीहतों के बीच, कागज की कश्ती ले भागते नन्हें कदम, भीगे बालों को पोंछती हुई माँ की फटकार, छाता ले जाने की हिदायत देती पापा की आवाज, सब कुछ है इस ऋतु में भावनाओं से लबरेज।

तंग गलियों से बहता बरसात का तेज पानी, उसमें अठखेलियाँ करते बच्चे, घुटनों तक कपड़ों को समेटे, सम्भल-सम्भल कर हर छींटों से बचने की कोशिश करते सधे प्रौढ़ कदम और तभी तेजी से निकलती गाड़ी से उड़े पानी के छींटे और तब गुस्सा में तनती भृकुटी और ऊपर खिड़की से झाँकते कुछ नैनों की बरबस मुस्कान। कुछ आहें भी होती हैं, जो बरसे बादलों के बीच अपने दफ्तर जाने की विवशता पर कसमसा रही होती हैं।

न जाने कितने शायरों ने शायरी रच डाली, काले बादलों में अपनी प्रेमिका के केशों को ढूँढते कवि अपनी कलम के आधार ढूँढते हैं तो चित्रकार विरह में डूबी नायिका के बहते नैनों को बरखा की बूँद के बीच रंगों से भरी अपनी कूची में समाहित करते नजर आते हैं। पर नवरस, नवशृंगार से परे भी इस ऋतु का एक सत्य और भी है, क्या आपने इस सत्य को जाना है? बहुत गम्भीर संदेशवाहक सत्य, दरअसल ये ऋतुएँ जलवायु परिवर्तन की ही परिचायक नहीं हैं, इसका एक दूसरा पहलू और भी है। यह प्रकृति हर ऋतु के साथ एक संदेशवाहक के समान कार्य करती हैं।

यूँ तो एक बरस में भारतीय परम्परा के अनुसार मूलतः छह ऋतुएँ होती हैं, पर मुख्यतः तीन ऋतुएँ ही हम सबके स्मृतिपटल में अंकित रहती हैं, ग्रीष्म, बरखा और शीत। हर ऋतु जीवन के उस सत्य को उद्घाटित करती है जिसे जानते तो हम सब हैं, पर समझने का यत्न बहुत कम लोग करते हैं और वह सत्य है ‘जीवन-चक्र’, जहाँ कुछ स्थायी नहीं है सब कुछ समय के चक्र के साथ परिवर्तित होता रहता है। मानव मन सुख-दुख, उल्लास-विषाद, प्रेम-द्वेष और न जाने कितनी भावनाओं को अपने भीतर समेटे हुए है वैसे ही प्रकृति भी शीतलता, उष्णता, शुष्कता सभी को समाहित कर सन्तुलन स्थापित करने की चेष्टा करती है।

मानसूनक्या कभी आपने यह सोचा है कि अगर सूर्य की तीक्ष्ण किरणें धरती की कोख को जर्जर कर देती हैं तो वही तमस बरखा की बूँदों में परिवर्तित हो जाती हैं। इसी प्रकार हम भी जब-जब जीवन की कठोर परीक्षाओं से तपन महसूस करने लगते हैं, मन उदास और खिन्न हो जाता है और कहीं शीतलता नहीं मिलती तो मान लिजिए की तमस और बढ़ेगी परन्तु बढ़ती तमस तो बरखा की उन बूँदों को आमंत्रण है जहाँ बादलों के बरसने से पहले हवाएँ भी अपनी श्वासों को थाम लेती हैं। हम सभी की जीवनयात्रा में न जाने कितने संघर्ष हैं जो हमें शिथिल कर देते हैं पर बजाय निराश होने के यह समझें कि ये संकेत हैं सफलता के, आपके अनवरत प्रयासों के उपरान्त आशाओं के फलीभूत होने के।

दूर से काले बादलों को और बरखा की फुहारों को निहारने के बनिस्पत उनके नीचे एक बार खड़े तो हेकर देखिए कैसे हर थकान, हर उष्णता, वर्षा की बूँदों से गायब हो जाएगी और मन शीतलता का राग गुनगुनाने लगेगा। पर हाँ, भीगते तन-मन में इतना सराबेर भी मत हो जाइएगा कि मौसमी बीमारियाँ आपको जकड़ लें।

वर्षा ऋतु इस बार एक सन्देश लेकर आई है और वह सन्देश है ‘अपनी धरती को भी प्यार करो, कुछ पल उसको भी दो, जन-जन का जीवन निहाल करो’, कुछ समझे आप, नहीं न? क्या हम नहीं जानते कि कहीं इतनी बरसात है कि घर उजड़ रहे हैं और कहीं एक-एक बूँद को तरसती निगाहें, ऐसा क्यों? क्योंकि हमने अपनी धरती का ध्यान रखा ही नहीं, हजारों पेड़ काटे, धरती की जड़ों को खोखला कर दिया पर अभी भी देर नहीं हुई है, कुछ बीज नन्हें हाथों में रख उसे धरती में बो कर देखो, बरसात का पानी कैसे उनका पोषण करता है और फिर मिलेगी घने पेड़ों की छाँव, उनके फल और निर्मल वातावरण।

यकीन जानिए प्रकृति को आप जो देंगे वही आपको लौटाएगी। चाय की चुस्कियों के साथ अट्टालिकाओं में बैठे, हम प्रकृति की गोद में समाना भूल चुके हैं, यह ऋतु पुकार रही है… आओ मेरे समीप आओ और देखो कि जीवन कितना सुन्दर है तो चलें बरखा की बूँद में डूबने और फिर कहने छई छपा छई छपाक छई...।

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