हरियाली जरूरी है

Submitted by RuralWater on Tue, 08/11/2015 - 11:17

. हमारी जीवन पद्धति व सरकारी नीतियाँ केन्द्रित व्यवस्था को ही बढ़ावा दे रही हैं। जिसके कारण हम आत्मकेन्द्रित होते जा रहे हैं। नतीजा है कि हम अपने से ज्यादा कुछ ना सोच पा रहे हैं ना ही धरती के पर्यावरण के लिये जो कुछ बहुत आसानी से भी किया जा सकता है वो भी नहीं कर पा रहे हैं।

हमने धरती को खोद-खोदकर खनिजों के अम्बार उसकी छाती पर खड़े कर दिये हैं। जिससे ना केवल धरती को खुद भी साँस लेना दूभर हो रहा है। उसका ओजोन आवरण भी छिद्रों वाला होता जा रहा है।

धरती की हरी चादर कमतर होती जा रही है। या फिर बाजार के अनुसार बनाई जा रही है। जो पेड़ शहरी सभ्यता को पोषित करते हैं उनको बढ़ावा दिया जा रहा है। किन्तु धरती के जीवन की रक्षा करने का सोच समाप्त होता जा रहा है।

आज हमारा भोजन अत्यन्त जहरीला हो चुका है जिसका कारण हमारी जीवन पद्धति ही है। केन्द्रित जीवन और केन्द्रित फ्लैट व्यवस्था में रहने वाला समाज अपने छोटे दायरे से बाहर भी नहीं निकल पाता और दूसरी तरफ उस उच्च और मध्यम वर्ग की सेवा मे रत निर्धन समाज मात्र ‘भोजन-आवास’ चाहे जैसा मिल जाये, उसके लिये संघर्षरत है।

स्वास्थ्य सेवाओं की शिक्षा की तो बात ही दूर है। ऐसे में पर्यावरण संरक्षण की शिक्षा उन्हें देना अजीब लगेगा। किन्तु यह उनके लिये शायद ज्यादा जरूरी है चूँकि वे साधन हीन हैं।

5 जून को संसार भर में विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है। इस दिन हम सभी को यह प्रतिज्ञा करनी चाहिए कि जहाँ भी जगह होगी हम वृक्षों को लगाएँगे।

पीपल, बड़, नीम, सागौन, अर्जुन, बेहड़ा, आँवला, बेल, अमरुद, नींबू, भीमल, अमरुद, कटहल, जामुन और सब चौड़ी पत्ती के पेड़ इसके और धरती के सब जीवों के जीवन रक्षा आधार है। धरती के भिन्न स्थानों पर भिन्न जाति-प्रजाति के वृक्ष-पौधे-लताएँ लुटती-मरती धरती को प्राण देने का काम कर सकते हैं। शहरों में जलस्तर तेजी से नीचे जा रहा है। पेड़ों के लगाने से पानी भी धरती में जाएगा।

बेल, नींबू, आँवला, अमरुद व पपीता इस स्वास्थ्यरक्षक पंचवटी के साथ यदि केला और पौधों में पोदीना, तुलसी, एलोविरा तथा गिलॉय की बेल जोड़ ले तो सोने पर सुहागा हो जाता है। यह सब बहुत ही कम स्थान लेने वाले होते हैं। सड़कों के किनारे, मध्यमवर्गीय सोसायटियों में यहाँ तक की फ्लैटों की बालकनी का भी सदुपयोग हो सकता है।

यहाँ यह भी बता दूँ कि देखने में यह आया है कि इन आवासीय सोसायटियों में ज्यादातर पहले तो सीमेंट बिछा दी जाती है फिर गमलों में खूबसूरत दिखने वाले पौधों को रख दिया जाता है। जिनमें बार-बार पानी देने की जरूरत होती है। यदि रसोई के पानी को थोड़ा सा फिल्टर करके कच्ची ज़मीन में लगे पौधों की सिंचाई की जाये तो चार तरह के फायदे होंगे।

पहला गन्दे पानी की मात्रा कम हो जाएगी, दूसरा धरती को भी पानी मिलेगा, तीसरा पौधों के लिये अलग से पानी नहीं लेना पड़ेगा और चौथा की दवाईयों का खर्चा कम होगा स्वास्थ्यरक्षण होगा। इस काम के लिये कोई अलग से खर्चा नहीं होगा वरन् लोगों का खर्चा कम होकर आमदनी ही बढ़ेगी।

यदि शहरों के चौराहों के बीच बने छोटे-छोटे गोलपार्कों में चौड़ी पत्ती के पेड़ किनारों पर और बीच में यह फलदार पंचवटियों का निर्माण कर दिया जाये तो वाहनों से निकलने वाला प्रदूषण तो कम होगा ही साथ में ये लाभप्रद फल भी सरकारी मालियों को अतिरिक्त लाभ में दिये जा सकते हैं। जरूरत सिर्फ यह है कि आजकल प्रचलन में आये सीमेंट व प्लास्टिक के पेड़ों को सुन्दरता का चेहरा ना माना जाये और इस प्रकार की बड़ी सोच को लिया जाये।

आज की सरकार स्वच्छ भारत अभियान चला रही है। उसके फूहड़पन का एक उदाहरण है। उत्तराखण्ड के सुदूर पहाड़ी इलाकों में टिहरी बाँध निर्माण कम्पनी टी.एच.डी.सी. शौचालयों का ‘कम्पनी सामाजिक दायित्व’ के पैसे से मरम्मत करवा रही है। इस मरम्मत के कार्य पर प्रतिदिन कड़ी निगरानी रखी जा रही है।

हरियालीरोज शाम को व्हाट्सएप पर किये गए कार्य का चित्र कम्पनी इकट्ठा करती है और केन्द्र सरकार को भेजती है। फिर चाहे शौचालयों में पानी हो या ना हो। चूँकि पहाड़ में भी पानी का संकट है। बावजूद इसके की पहाड़ का पानी शहरों के शौचालयों तक की जल ज़रूरतों को पूरा करता है। यहाँ यह बात बतानी है कि टिहरी बाँध के सन्दर्भ में 2003 की वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार लगभग नौ हजार हेक्टेयर जंगल फेल था और लगभग आठ हजार हेक्टेयर जंगल सही नहीं लगा पाई थी।

हम बाँध पर यहाँ कोई चर्चा नहीं कर रहे हैं किन्तु जैसे शौचालय मरम्मत के लिये सरकारी व टी.एच.डी.सी. की निगरानी हो रही है काश वो जंगल लगाने के लिये भी हो जाती तो आज बाँध में पानी से होड़ लेते रेत के मैदान ना बनते। कैसे स्वयं ही उगने वाले पहाड़ के दुश्मन पेड़ चीड़ को जलसंग्रहण क्षेत्र संरक्षण के लिये लगाए गए पेड़ बताकर पहाड़ का सत्यानाश कर दिया गया। गर्मियों में आग फैलाते और किसी भी तरह के अन्य पेड़ो को ना पैदा होने देने वाले चीड़ के पेड़ उत्तराखण्ड के पहाड़ों को तेजी से ढँकते जा रहे हैं।

जरूरत है कि योजनाबद्ध रूप से चीड़ को काटा जाये और वहाँ स्थानीय लोगों को जिम्मेदार बनाकर बांज, बुरांस, भीमल जैसे मिट्टी-पानी को बाँधने वाले व चारा देने वाले पेड़ व पहाड़ी फलों के पेड़ आदि लगाए जाएँ। इसके लिये मात्र एक राजनैतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है जो स्वच्छ भारत के ढिंढोरा ज्यादा कारगार सिद्ध होगा।

हमारी शिक्षा व्यवस्था में पेड़-पौधों-लताओं के बारे में आवश्यक रूप से शिक्षण होना चाहिए। कौन से पेड़-पौधे-लताएँ कब कहाँ कैसे उगाए जा सकते हैं। उनके लाभ-हानि व हर तरह के उपयोग का शिक्षण होना चाहिए। ताकि हर बच्चा आरम्भ से ही धरती का रक्षक व अपने स्वास्थ्य के रक्षण के बारे में समझ रखें। यह मात्र सरकारी वन विभाग या शहरों के उद्यान विभाग का ही कार्य ना होना चाहिए। शिक्षकों की भूमिका इसमें बहुत ही महत्त्वपूर्ण हो जाती है।

धरती के संरक्षण के लिये सफल परिणाम के लिये कटिबद्ध सरकारी नीतियाँ तो चाहिए ही साथ ही इस कार्य को एक जनआन्दोलन बनाने के लिये जन जागृति और जन संगठन भी चाहिए।

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