आखिर अब कैसे बचेंगे हाथी

Submitted by RuralWater on Tue, 08/11/2015 - 12:38

विश्व हाथी दिवस पर विशेष


देश में हाथीदाँत की खातिर तो हाथियों को मारा ही जा रहा है, असम, अरुणाचल, मिजोरम, मेघालय, नागालैण्ड, मणिपुर और त्रिपुरा के पहाड़ी लोग मांस के लिये भी हाथियों को मार रहे हैं। यहाँ हाथी के मांस की माँग ज्यादा है और वह 300 से 450 रुपए किलो तक बिकता है। यहाँ से हाथी का मांस विदेशों में भी भेजा जाता है। अक्सर शिकारियों को हाथी के शिकार का दोहरा लाभ होता है। वे मांस के साथ-साथ उसकी खाल, दाँत तथा अन्य अंग भी मनमानी कीमतों पर बेचते हैं। हाथी के मांस से दवाई बनाई जाती है। आज आदिदेव गणेश के प्रतीक और राष्ट्रीय धरोहर पशु गजराज के अस्तित्व पर भीषण संकट है। कारण हाथी दाँत के अवैध कारोबार, सेक्सवर्धक दवाएँ, सजावट और शृंगार के सामान बनाने की खातिर आये-दिन हाथियों की हत्याएँ की जा रही हैं। सरकार दावे कुछ भी करे लेकिन असलियत यह है कि हाथी दांत का कारोबार पिछले 26 सालों से जारी प्रतिबन्ध के बावजूद थमा नहीं है।

हालत यह है कि आज समूचे विश्व में रोजाना 104 और हर साल 4 हजार अफ्रीकी-एशियाई हाथी मारे जा रहे हैं और लाख कोशिशों के बाद भी इस पर अंकुश नहीं लग पा रहा है। इसका खुलासा करते हुए पशुओं के कल्याण हेतु बनी अन्तरराष्ट्रीय कोष रिपोर्ट में कहा गया है कि अब समय आ गया है कि यूरोपियन यूनियन और कन्वेशन ऑन इंटरनेशनल टेड इन इनजेंड्स स्पाइसैंस हाथी दाँत के अवैध व्यापार व इसकी बिक्री का विरोध करें।

भले 1989 में हाथी दाँत के व्यापार पर प्रतिबन्ध लगा, कुछ समय के लिये हाथियों के शिकार में भी सामान्य स्तर पर कमी और बाजार में हाथी दाँत की कीमतों में कमी देखी गई लेकिन 90 के दशक के उत्तरार्द्ध में हाथियों के शिकार में बेतहाशा बढ़ोत्तरी हुई। इस बाबत आँकड़े कुछ भी कहें लेकिन असलियत यह है कि इनके शिकार में हुई बढ़ोत्तरी आज भी जारी है, इस सच्चाई को झुठलाया नहीं जा सकता।

हमारे यहाँ कुख्यात तस्कर वीरप्पन के मारे जाने के बाद यह आशा बँधी थी कि अब हाथियों के शिकार में कमी आएगी लेकिन हुआ इसके बिल्कुल उलट। हाथियों के मारे जाने का सिलसिला उसके बाद भी जारी है। नतीजन हाथियों के लिंग-अनुपात में भारी असन्तुलन पैदा हो गया है। आज चार हथिनियों पर एक हाथी की जगह यह अनुपात 30-40 हथिनियों पर एक हाथी का होकर रह गया है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि अफ्रीकी हाथी की तुलना में एशियाई हाथी दाँत की माँग सबसे ज्यादा है और अन्तरराष्ट्रीय बाजार में उसकी कीमत भी काफी ज्यादा है।

एशियाई हाथी के दाँत पर नक्काशी भी आसानी से हो जाती है और वह फटता भी नहीं है। इसकी चीन, जापान,थाइलैण्ड और नामीबिया आदि देशों में सबसे ज्यादा माँग है। यही कारण है कि हाथियों के झुंड-के-झुंड आये-दिन शिकारियों के शिकार बन रहे हैं। यह स्थिति भयावह है। यदि हाथी दाँत का अवैध कारोबार इसी रफ्तार से जारी रहा तो आने वाले 15 बरसों में हाथियों की पूरी प्रजाति ही खत्म हो जाएगी।

वन्य जीव विशेषज्ञों के अनुसार समूचे विश्व में आज कुल मिलाकर 45 हजार के करीब हाथी जीवित बचे हैं। इनमें सबसे ज्यादा 27 हजार तो अकेले भारत में ही हैं। इनमें वयस्क हाथियों की तादाद तकरीब 1500 के आसपास है। भारत में उत्तर-पूर्वी हिस्सों में इनकी तादाद सबसे ज्यादा है। यहाँ के जंगल इनकी शरणस्थली के रूप में विख्यात हैं। इसके बाद दक्षिण में कर्नाटक के कोडगू और मैसूर जिले के बीच 643 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला नागरहोल पार्क हाथियों का पसंदीदा आवास है। इसके दक्षिण-पश्चिम में केरल की व्यानाद सेंचुरी है।

देश के पश्चिमी भू-भाग में कार्बेट-सोनानदी-राजाजी क्षेत्र एशियाई हाथियों के प्रमुख इलाके के रूप में जाना जाता है। ग़ौरतलब है कि सन् 1959 में एशियाई हाथी को संकटग्रस्त वन्य जीवों की श्रेणी में शामिल किया गया था। इसी के मद्देनज़र सरकार ने इनके सरंक्षण हेतु 8वीं पंचवर्षीय योजना में अलग से प्रावधान किया था।

सरकार की माने तो वर्ष 91-92 से ही हाथी परियोजना पर काम चालू है। फिर भी लगातार इनकी तादाद कम होते चला जाना सरकार के नाकारेपन को ही दर्शाता है। फिर हाथियों की शरणस्थली-जंगलों के बीच रेल लाइन का होना भी इनके लिये अभिशाप बन गया है क्योंकि देखा गया है कि हर साल इसकी चपेट में आने से पाँच-दस हाथी तो बेमौत मर ही जाते हैं। इसके लिये किसे दोषी ठहराया जाये, सरकार या हाथियों को, यह समझ से परे है।

दरअसल हाथी एक ऐसा संवेदनशील जीव है जो आकार में तो भारी भरकम है लेकिन वह बहुत ही नाजुक मिजाज वाला है। वह न तो भूख बर्दाश्त कर सकता है और न ही थोड़ी सी थकान। वह 24 में से 18 घंटे केवल खाने में ही गुजार देता है। उसे अमूमन 100 लीटर पानी और खुराक के लिए 200 किलो पत्ते, पेड़ की छाल आदि की जरूरत होती है। यदि यह उसे नहीं मिले तो स्वाभाविक है, वह सब कुछ भूल जाता है।

उस हालत में जबकि उसके कुदरती आश्रय-स्थल यानी जंगलों से छेड़छाड़ होती है, वह बेचैन हो जाता है, बिगड़ैल हो उठता है और उस हालत में उसके सामने खेत या इंसान भी आते हैं, तो उन्हें कुचल कर मसल देता है, रौंद कर मार डालता है। सबसे बड़ी बात यह है कि वह कभी खुद अपनी ओर से हमला नहीं करता। जब उसे खतरा महसूस होता है, तभी वह हमला करता है।

देश में जहाँ-जहाँ भी जंगलों का कटान हुआ है, वह चाहे दक्षिण में बांदीपुर (कर्नाटक), मधुमलास (तमिलनाडु) हो (गौरतलब है कि यह वह क्षेत्र है जहाँ देश में पाये जाने वाले हाथियों की 40 फीसदी तादाद पाई जाती है) या उत्तराखण्ड में रामगंगा परियोजना की खातिर या फिर बाँध से विस्थापितों द्वारा अपने आवासों की खातिर 1,65,000 एकड़ वन क्षेत्र को उजाड़ा गया, उस हालत में भूख-प्यास से बेहाल हाथी आस-पास के इलाकों में उपद्रव करते ही हैं। इसे नकारा नहीं जा सकता।

देश का दक्षिणी राज्यों का इलाका जो मुख्यतः ‘हाथी प्रोजेक्ट’ के नाम से जाना जाता है, के लोग वैसे तो हाथी की मौत को बहुत ही बड़ा अपशकुन मानते हैं लेकिन हाथियों से अपने घर-खेतों को बचाने की गरज से वे गहरी खाई खोदने या फिर बिजली के करंट को छोड़ने को अपनी मजबूरी की संज्ञा देते हैं।

वे कहते हैं कि इसके सिवाय उनके पास कोई चारा नहीं है। ऐसी ही स्थिति उत्तर पूर्वी राज्यों की है। वहाँ के लोग तो अपनी धान की फसल और अपने गाँवों को बचाने की खातिर हाथियों के शिकार की ताक में रहते हैं। नागा लोग तो हाथियों को बवाल मानते हैं। इसीलिये वे हाथियों को मारते हैं।

इससे उन्हें अपने घर-खेत बचाने के साथ-साथ कई और फायदे भी होते हैं जैसे- उनकी दावत के लिये पर्याप्त मात्रा में मांस तो मिलता ही है और इलाके में प्रचलित अनेकों मान्यताओं और चिकित्सकीय जरूरतों की खातिर हाथी की हड्डियाँ व अन्य अंग भी मिल जाते हैं। यही वजहें हैं जिनकी खातिर यहाँ रहने वाले जनजाति के लोग हाथियों को मारते हैं और इसके अलावा हाथी के अंगों का कारोबार करने वाले बाहरी लोग भी इन लोगों को धन का लालच देकर हाथियों की हत्याएँ करवा रहे हैं।

इन लोगों की वह चाहे देश का उत्तरी भाग हो, पूर्वी हो या दक्षिणी भाग, कहीं भी कमी नहीं है जो ग्रामीणों के साथ-साथ हाथियों के दुश्मन बने हुए हैं।

देश में हाथीदाँत की खातिर तो हाथियों को मारा ही जा रहा है, असम, अरुणाचल, मिजोरम, मेघालय, नागालैण्ड, मणिपुर और त्रिपुरा के पहाड़ी लोग मांस के लिये भी हाथियों को मार रहे हैं। यहाँ हाथी के मांस की माँग ज्यादा है और वह 300 से 450 रुपए किलो तक बिकता है। यहाँ से हाथी का मांस विदेशों में भी भेजा जाता है। अक्सर शिकारियों को हाथी के शिकार का दोहरा लाभ होता है। वे मांस के साथ-साथ उसकी खाल, दाँत तथा अन्य अंग भी मनमानी कीमतों पर बेचते हैं। हाथी के मांस से दवाई बनाई जाती है।

आये-दिन करोड़ों की कीमत का सादा हाथी दाँत व भारी मात्रा में नक्काशी किया हुआ हाथी दाँत बरामद होता है। पूर्वोत्तर में दीमापुर हाथी दाँत की खरीद-फरोख्त का प्रमुख केन्द्र है जहाँ से इस कारोबार का संचालन होता है। विडम्बना यह है कि सरकार जानते-समझते हुए भी मौन है। इसके अलावा बाढ़ से भीे हाथियों के मरने का सिलसिला कोई नया नहीं है, यह बरसों पुराना है।

1988 और 2008 की बाढ़ में भी असम में हाथियों की मौत हुई थी। लेकिन सरकार ने उससे कोई सबक नहीं सीखा। नतीजन 2012 में ब्रह्मपुत्र में आई भीषण बाढ़ के चलते अनगिनत हाथी डूबकर मर गए। पानी से घबराकर जान बचाने की खातिर जंगल की ओर भागे तकरीब 8 से 10 हाथियों को शिकारियों द्वारा मार दिया गया और उनके सींग काट लिये गए थे। उसके बाद भी सरकार का मौन समझ से परे है।

असम में तो हर साल 8-10 हाथी गाँव वालों द्वारा मार दिये जाते हैं। दक्षिण में कोई साल ऐसा जाता हो जब गर्मी के मौसम में लगभग 20-30 हाथियों के शव संदिग्ध हालात में न मिलते हों। असम में तो अक्सर हाथी बाढ़ के दौरान हिरण तथा वन्य प्राणियों के साथ-साथ ब्रह्मपुत्र के किनारे बहकर आ जाते हैं जो शिकारियों के हाथ लगने के बाद मार दिये जाते हैं। दुख इस बात का है कि सरकार ने आज तक इस समस्या की गम्भीरता को नहीं समझा।

न उसने देश के उत्तर-पूर्वी और देश का दक्षिणी क्षेत्र जो इनके आश्रयस्थल वन क्षेत्र के रूप में जाने जाते हैं, केे आसपास मानव आबादी की बेतहाशा होने वाली बसावट को ही रोका। इसमें पिछले एक दशक में तेजी से बढ़ोत्तरी हुई है। इन लोगों में से अधिकांश हाथियों के शिकार व उनके सींगों की अवैध तस्करी के कारोबार में संलिप्त हैं। खुफिया रिपोर्टें इसकी सबूत हैं। इसकी पुलिस को पूरी जानकारी है।

ग़ौरतलब है कि 1959 में एशियाई हाथी को संकटग्रस्त वन्यजीवों की श्रेणी में शामिल किया गया था। इनके संरक्षण हेतु 8वीं पंचवर्षीय योजना में अलग से प्रावधान किया गया था। 1991-92 से ही हाथी परियोजना पर काम चालू है, फिर भी इनकी तादाद कम होते जाना चिन्तनीय है। जबकि पाँच वर्ष पूर्व जब हाथी को राष्ट्रीय धरोहर पशु घोषित किया था तब गजराज संरक्षण प्राधिकरण और स्पेशल टॉस्क फोर्स के गठन का प्रस्ताव था जिस पर आज तक अमल नहीं हुआ है।

बैकांक में सम्पन्न पिछले साइटी सम्मेलन में जिसमें दुनिया के 166 देशों ने भाग लिया था, में एक स्वर से हाथियों के संरक्षण की दिशा में कारगर कदम उठाने की माँग की गई थी। यही नहीं उसके बाद भारत में गैर कानूनी हाथी दाँत के कारोबार में लिप्त लोगों की गिरफ्तारी के लिये पड़ोसी देशों से उनके सम्बन्ध और तस्करी के केन्द्रों की छानबीन का अनुरोध किया गया था। लेकिन मौजूदा हालात गवाह हैं कि उसके बाद कुछ नहीं हुआ और यह धंधा बेरोकटोक आज भी जारी है।

लगता है कि यह काम सरकार की प्राथमिकता में शामिल नहीं है। यही वजह है कि आये-दिन हाथी मर रहे हैं, उनकी तादाद घटती जा रही है, वन्य जीव विशेषज्ञ और वन्य जीव संरक्षण से जुड़ी संस्थाएँ चिल्ला रही हैं लेकिन दुख इस बात का है कि सरकार को इसकी कोई चिन्ता नहीं है।

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