मेरा भारत -जिम कॉर्बेट

Submitted by Hindi on Tue, 08/11/2015 - 13:02
Source
नैनीताल समाचार, 15 जुलाई 1985
समर्पण

जब हिटलर के साथ युद्ध समाप्ति की ओर था, मैं ब्रिटिश साम्राज्य के तीन महान लोगों के भाषणों के अंश पढ़ रहा था, जिसमें उन्होंने युद्ध-अत्याचारों की निन्दा की थी और शत्रु पर आरोप लगाया था कि उसने लड़ने वाले लोगों के बीच ‘जंगल का कानून’ लागू कर दिया है, यदि सृष्टि के निर्माता ने मनुष्य के लिए वही कानून बनाये होते, जो वन्य प्राणियों के लिये बनाये, तो कहीं कोई युद्ध नहीं होता, क्योंकि तब शक्तिशाली मनुष्य अपने से कमजोर का उसी प्रकार ध्यान रखते जैसे कि जंगल की परम्परा है।

यदि आप भारत का इतिहास खोज रहे हों या ब्रिटिश राज के उत्थान या पतन का लेखा-जोखा चाहते हों या जानना चाहते हों कि इस उपमहाद्वीप का दो परस्पर शत्रुतापूर्ण हिस्सों में विभाजन क्योंकर हुआ और इस विभाजन का दोनों हिस्सों और अन्ततः एशिया पर क्या प्रभाव पड़ेगा- वह सब आप इन पृष्ठों में नहीं पायेंगे। क्योंकि हालाँकि मैंने इस देश में पूरी जिन्दगी बितायी है, किन्तु मैं घटनास्थल के इतने निकट रहा और इन घटनाओं में सक्रिय लोगों से इतना घनिष्ठ रहा कि इस सारे मामले का निष्पक्ष विवरण प्रस्तुत करने की दृष्टि मेरे पास नहीं है।

मेरे भारत में, उस भारत में जिसे मैं जानता हूँ, लगभग चालीस करोड़ लोग हैं, जिनमें नब्बे प्रतिशत सीधे-सीधे, ईमानदार, बहादुर, वफादार और मेहनती जन हैं और जिनकी भगवान तथा सरकार, जो कोई भी सत्ता में हो, से यही प्रार्थना रहती है कि उन्हें जान और माल की सुरक्षा दे ताकि वे अपनी मेहनत का फल चख सकें। इन्हीं लोगों के बारे में, जो निश्चित रूप से गरीब हैं और जो प्रायः भारत के ‘करोड़ों फाकाकशों’ के नाम से जाने जाते हैं, जिनके बीच में मैं रहा और जिनसे मैं प्यार करता हूँ के बारे में मैं इन पृष्ठों में कुछ कहना चाहता हूँ, यह पुस्तक मैं अपने मित्रों, भारत के दरिद्रनारायणों को विनम्रतापूर्वक समर्पित करता हूँ।

जंगल का कानून


हरकुवा और कुन्ती का विवाह तब हो गया था, जब उन दोनों की आयु का योग भी दहाई के अंक तक नहीं पहुँच सका था। उन दिनों भारत में ऐसा होना आम बात थी और अभी भी ऐसा ही हो रहा होता, यदि महात्मा गाँधी और मिस मायो नहीं होते।

हरकुवा और कुन्ती दूनागिरी पर्वत के नीचे कुछ ही मीलों की दूरी पर स्थित दो गाँवों में रहते थे। एक दूसरे को उन्होंने तब तक नहीं देखा था जबकि एक महान दिन चमकदार रंगीन कपड़े पहनकर वे एक छोटे से अर्से के लिये मित्रों और सम्बन्धियों के विशाल हुजूम के आर्कषण का केन्द्र न बन गये। वह दिन उनकी स्मृति में बहुत समय तक जिन्दा रहा। क्योंकि उस शानदार अवसर पर वे अपने छोटे से पेट को हलवा-पूरी से ठूँस-ठूँस कर भर सके थे। वह दिन उनके पिताओं की स्मृति में भी बहुत दिनों तक जिन्दा रहा। गाँव के बनिये, जो उनका माई-बाप था, ने उनकी भारी जरूरत को ध्यान में रखकर उन्हें कुछ रूपये दिये थे ताकि वे अपने बच्चों का विवाह-योग्य उम्र में, गाँव के पुरोहित द्वारा निर्धारित शुभ घड़ी में विवाह कर बिरादरी में अपनी इज्जत बनाये रख सकें। बनिये ने अपने खाते में उनके नामों के आगे एक ताजा रकम अंकित कर दी। यह सही था कि बनिये द्वारा मांगा जाने वाला पचास फीसदी ब्याज बहुत ज्यादा था, मगर भगवान की मर्जी रहे तो इसका एक हिस्सा वापस दिया ही जायेगा और आगे और भी तो बच्चे ब्याहने थे। इस उदार बनिये के अतिरिक्त मदद करने वाला था भी कौन?

शादी के बाद कुन्ती अपने पिता के घर लौट गई और अगले कुछ वर्षों तक वहीं सारे काम-काज करती रही, जो गरीब घरों में बच्चों के लिये करने अनिवार्य होते हैं। शादी से सिर्फ उसके पहनावे में फर्क पड़ा। अब वह कुँवारी लड़कियों की तरह वस्त्र नहीं पहनती थी, बल्कि तीन कपड़े पहनती थी। डेढ़ गज लम्बी एक चादर (पिछौड़ा), जिसका एक हिस्सा उसके घाघरे और में ठुँसा रहता था। और दूसरा उसके सर को ढँकता था, बिना बाँह का एक छोटा सा अँगिया और कुछ ही इंच लम्बा एक घाघरा।

लापरवाही से भरे कुछ घटनाहीन वर्ष बीते, जबकि यह माना गया कि कुन्ती अब अपने पति के साथ रहने योग्य हो गई है। एक बार फिर से बनिया मदद करने के लिए आगे आया और अपने नये कपड़ों में सजी-सँवरी बालिका बधू आँखों में आँसू भरे अपने बालक पति के घर के लिये रवाना हुई। एक घर से दूसरे घर में जाने का मतलब कुन्ती के लिए इतना ही था कि जो काम-काज पहले वह अपने माँ के लिये करती थी, उसे अब उन्हें अपनी सास के लिये करना होता था। भारत में किसी भी गरीब परिवार में किसी को भी काम करने से छूट नहीं मिलती। बूढ़े और बच्चे, सबके लिये अपने-अपने काम नियत हैं और वे उसे खुशी-खुशी करते हैं, कुन्ती अब इतनी बड़ी हो गई थी कि खाना बनाये, खाना खाने के बाद, जो कोई भी दिहाड़ी पर काम करने योग्य था, अपने-अपने काम चल चला जाता, क्योंकि मजदूरी भले ही बहुत कम हो, उससे घर का गुजारा चलता था। हरकुवा का बाप राजगिरी करता था और अमेरिकन मिशन स्कूल में एक गिरजाघर बनाने के काम पर लगा था।

हरकुवा की भी इच्छा थी कि वह अपने पिता के पदचिन्हों पर चले, लेकिन जब तक उसके शरीर में इतनी शक्ति आती, वह परिवार की आमदनी बढ़ाने के लिये अपने पिता तथा अन्य राज-मिस्तिरियों के लिये गारा-पत्थर ढोकर, दस घंटे काम करने की एवज में दो आना रोज कमाता था। तलाऊँ जमीन पर फसल पक रही थी। खाना बनाने के बर्तन धो- चमकाकर कुन्ती अपनी सास और अनेकों ननद-भौजाइयों के साथ गाँव के प्रधान के खेत पर काम करने के लिये चली जाती। वहाँ वह अन्य औरतों व लड़कियों के साथ अपने पति के ही बराबर घंटों तक, लेकिन उसकी आधी मजदूरी पर काम करती। दिन का काम निपटाकर शाम के धुँधलके में परिवार उस झोंपड़ी में लौटकर आता, जिसे ग्राम प्रधान ने हरकुवा के बाप को अपनी जमीन पर बनाने की अनुमति दी थी। बड़ों की अनुपस्थिति में छोटे बच्चों द्वार बटोरी गई सूखी लकड़ियाँ जलाकर शाम का खाना पकाया व खाया जाता। इस आग के अलावा झोपड़ी में किसी तरह की कोई रोशनी नहीं की जाती और जब बर्तन धोकर अलग रख दिये जाते, परिवार का हर सदस्य अपने लिये नियत स्थान पर सोने के लिये चला जाता। हरकुवा अपने भाइयों और पिता के साथ सोता तथा कुन्ती परिवार की अन्य महिला सदस्यों के साथ।

जब हरकुवा अठारह साल का हुआ और कुन्ती सोलह की, अपना थोड़ा सा सामान लेकर उन्होंने घर छोड़ दिया और रानीखेत छावनी से तीन मील दूर एक गाँव में हरकुवा के चाचा की दी हुई एक झोपड़ी में रहने लगे। छावनी में कई नई बैरकों का निर्माण हो रहा था, अतः हरकुवा को राज काम पाने में कोई कठिनाई नहीं हुई, न ही कुन्ती को खदान से पत्थर ढोकर निर्माण स्थल तक लाने की मजदूरी पाने में।

चार साल तक नौजवान दम्पति ने रानीखेत की बैरकों में काम किया और इस बीच कुन्ती के दो बच्चे हुए, चौथे साल नवम्बर में निर्माण कार्य पूरा हो गया और हरकुवा तथा कुन्ती के सामने नये सिरे से रोजगार पाने की समस्या आ खड़ी हुई। उनकी बचत मामूली थी और वे बहुत कम दिन तक उसके सहारे रह सकते थे।

उस साल जाड़ा कुछ जल्दी शुरू हो गया और यह आशंका होने लगी कि ठंड बहुत ज्यादा होगी। परिवार के पास कोई गर्म कपड़े नहीं थे और एक सप्ताह तक नया काम ढूँढ पाने में असफल होकर हरकुवा ने पहाड़ की तलहटी में जाने का सुझाव दिया, जहाँ उसेने सुना था कि एक नहर बन रही है, अतः शुरू दिसम्बर क एक दिन उत्साह में भरा हुआ परिवार भाबर की ओर अपनी लम्बी यात्रा पर रवाना हुआ। जिस गाँव में वे चार साल तक रहे थे, वहाँ से कालाढूंगी की निर्माणाधीन नहर तक, जहाँ कि उन्हें रोजगार पाने की आशा थी, दूरी मोटे तौर पर पचास मील थी। रात में पेड़ों के नीचे सोते, दिन में अपने बच्चों तथा गृहस्थी के सारे समान को बारी-बारी से ढोते, कठिन मार्गाें पर चढ़ाई चढ़ते और ढलान उतरते हुए, पाँवों में छाले लिये, थकान में चूर, हरकुवा और कुन्ती ने यह यात्रा छः में पूरी की।

दलित जातियों के अन्य भूमिहीन लोग ऊँचाई वाले क्षेत्रों से पहले ही भाबर आ चुके थे और उन्होंने अपने लिये सामूहिक रूप से झोपड़ियाँ बनाई थीं। जिसमें तीस परिवार रह रहे थे। इन झोपड़ियों में हरकुवा और कुन्ती को स्थान नहीं मिल पाया, अतः उन्हें अपने लिये अलग से एक झोपड़ी बनानी पड़ी। बाजार से नजदीक ही जंगल, जहाँ ईधन का बाहुल्य था, के एकदम किनारे पर उन्होंने अपने लिये स्थान चुना। सुबह जल्दी उठकर और रात को देर तक लगकर उन्होंने परिश्रम किया, क्योंकि उनकी बचत में अब बहुत थोड़े रूपये बच रहे थे और आस-पास कोई परिचित बनिया भी तो नहीं था, जो उनकी मदद को आता।

जिस जंगल के किनारे पर हरकुवा और कुन्ती ने अपनी झोपड़ी बनाई थी। वह मेरा प्रिय शिकारगाह था। पहले-पहल मैं भरूआ बन्दूक लेकर जंगली मुर्गाबियों का शिकार करने इसमें दाखिल हुआ था और बाद में आधुनिक राइफल लेकर बड़े शिकार की खोज में मैंने इसका कोना-कोना छाना था। जिस वक्त हरकुवा और कुन्ती ने अपनी तीन साल के लड़के पनुवा और दो साल की लड़की पुतली के साथ उस झोपड़ी में रहना शुरू किया, मेरी जानकारी के अनुसार जंगल में पाँच चीते, आठ बाघ, चार भालू, दो काले हिमालयी भालू (जो जंगली बेरों और शहद के लिए नीचे उतर आये थे)। अनके भेड़िये (जिनका बसेरा पाँच मील दूर घास की झाड़ियों में था और जो अंधेरा घिरने के बाद बाघ और चीतों के छोड़े गये शिकार के लिए बाहर निकलते थे), अनगिनत गीदड़, जंगली बिल्लियाँ व अन्य जानवर थे, वहाँ दो अजगर, कई तरह के साँप, चील और बाज भी थे। हिरन, सुअर, बन्दर जैसे निरापद जानवरों का जिक्र मैंने नहीं किया है, क्योंकि मेरी कहानी में उनके लिये कोई स्थान नहीं है।

कामचलाऊ झोपड़ी पूरी होने के अगले ही दिन हरकुवा को नहर बना रहे ठेकेदार के पास आठ आने रोज पर राजगिरी का काम मिल गया। कुन्ती ने जंगल से घास, जिसे वह जानवरों के चारे के लिये बाजार में बेच देती थी, काटने के लिये वन विभाग से दो रूपये देकर परमिट प्राप्त कर लिया। लगभग चालीस किलो का घास का गट्ठर तैयार करने और बाजार तक लोने में उसे तीखे ढलानों या चढ़ाई पर दस से चौदह मील तक चलना पड़ता था। इस गट्ठर के कुन्ती को चार आने मिलते थे, जिमसें से एक आना सरकारी चौकीदार चुंगी वसूल कर लेता था, हरकुवा के कमाये आठ आनों तथा कुन्ती तीन आनों को मिलाकर परिवार आराम से निर्वाह कर रहा था, क्योंकि भोजन सस्ता और पर्याप्त था। जिन्दगी में पहली बार वे महीने में एक मर्तबा गोश्त भी खा पा रहे थे।

हरकुवा व कुन्ती कालाढूंगी में तीन महीने काटना चाहते थे, दो माह शान्तिपूर्वक कट गये। काम के घण्टे लम्बे थे और बीच में कोई विश्राम नहीं मिल पाता था। लेकिन इस बात के तो वे बचपन से अभ्यस्त थे। मौसम अच्छा था और बच्चों की तन्दुरस्ती ठीक चल रही थी। सिवाय उन थोड़े से दिनों के, जब वे झोपड़ी बनाने में लगे थे, उन्हें कभी भी भूखा नहीं रहना पड़ा था।

मैंने एक बार एक बाघनी को एक महीने भर के बकरी के बच्चे पर घात लगाते देखा था, खुला हुआ मैदान था। बकरी के बच्चे ने बाघनी को काफी दूर से ही देख लिया और चीखना शुरू कर दिया, इस पर बाघनी ने हमले का इरादा छोड़ दिया और सीधे बच्चे की ओर चली आई। बाघनी बच्चे से कुछ दूर ही थी कि बच्चा उससे मिलने चला गया। बाघनी ने अपनी गर्दन बच्चे को सूंघने लगी, कुछ पलों तक जंगल की रानी और महीने भर के बकरी के बच्चे के दिल मिले रहे और फिर रानी उसी दिशा को लौट गई, जहाँ से वह आई थी।

शुरू में बच्चों को लेकर काफी परेशानी रही, वे इतने छोटे थे कि न तो हरकुवा के साथ नहर के कार्यस्थल तक जा सकते थे और न ही घास बटोरने के लिये कुन्ती की लम्बी यात्राओं में उसका साथ दे सकते थे, तभी थोड़ी दूर पर सामूहिक झोपड़ियों में रहने वाली एक विकलांग बुढ़िया ने मदद की। वह माँ-बाप की अनुपस्थिति में बच्चों पर निगाह रखने को तैयार हो गई। दो माह तक यह व्यवस्था संतोषजनक ढंग से चलती रही। प्रत्येक शाम को जब हरकुवा चार मील दूर अपने काम पर से लौटता और थोड़ी ही देर बाद कुन्ती बाजार में घास बेचकर लौटती, वे पनुवा और पुतली को बेकरारी से अपना इन्तजार करते पाते।

शुक्रवार को कालाढूंगी में पेंठ लगती थी और उस दिन आस-पास के गाँवों से हर व्यक्ति बाजार पहुँचता, जहाँ बनी हुई अस्थाई दुकानों पर सस्ती दरों पर सब्जी, अनाज और फल बिक्री के लिये प्रदर्शित रहते थे, इन पेंठ के दिनों हरकुवा और कुन्ती भी अपने काम से नियमित समय से आधा घण्टा पहले ही लौट आते थे, ताकि रात को दुकानें बन्द होने से पहले यदि कहीं कोई सब्जी बची रह गई हो तो उसे सस्ते मूल्य पर खरीद लें।

एक शुक्रवार को, जब हरकुवा और कुन्ती सब्जी और आधा सेर बकरी के गोश्त की छोटी सी खरीददारी कर झोपड़ी में लौटे तो पनुवा और पुतली उनका स्वागत करते मौजूद नहीं थे। सामूहिक झोपड़ियों में रहने वाली विकलांग बुढ़िया से पूछने पर उसने बताया कि उसने बच्चों को दोपहर से नहीं देखा है। बुढ़िया ने कहा कि हो सकता है बच्चे बाजार में लगे झूले को देखने चले गये हों, जिसने सामूहिक झोपड़ियों के सारे बच्चों को आकर्षित किया है, बुढ़िया का ख्याल ठीक लगता था, अतः हरकुवा बच्चों को ढूँढ़ने बाजार की ओर चला गया और कुन्ती शाम का खाना बनाने में जुट गई, एक घण्टे के बाद हरकुवा बच्चों को ढूँढ पाने में असफल हो, कई लोगों के साथ लौट आया, जितने भी लोगों से उसने पूछा था, किसी ने भी बच्चों को नहीं देखा था।

उस समय सारे भारत में यह अफवाह थी कि फकीर लोग उत्तर-पश्चिमी सीमान्त में अनैतिक कार्यों के लिये हिन्दू बच्चों का अपहरण कर रहे हैं, इन अफवाहों के पीछे क्या था, मुझे नहीं मालूम, लेकिन मैं प्रायः अखबारों में फकीरों के साथ दुर्व्यवहार और कई बार उनकी जान लेने पर उतारू भीड़ से पुलिस द्वारा उनकी रक्षा किये जाने के समाचार पढ़ा करता था। यह माना जा सकता है कि भारत भर के सभी अभिभावकों को इस बात की जानकारी थी, हरकुवा और उसके साथियों ने झोपड़ी में लौटकर कुन्ती से कहा कि उन्हें डर है कि पेंठ में आये हुए फकीरों ने ही कहीं बच्चों का अपहरण न कर लिया हो।

गाँव के निचले हिस्से पर एक थाना था, जिसमें एक हेड कांस्टेबल और दो सिपाही रहते थे, अपने हितैषियों की बढ़ती हुई भीड़ के साथ हरकुवा और कुन्ती इस थाने में पहुँचे। हेड कांस्टेबल एक सहृदय किस्म का बुजुर्ग था। जिसके अपने भी बच्चे थे। परेशान अभिभावकों की सारी कहानी सुनने और अपनी डायरी में लिख चुकने के बाद उसने कहा कि चूँकि अब रात हो गई है अतः फिलहाल कुछ नहीं किया जा सकता। सुबह होते ही वह ढिंढोरची को आसपास के सारे, पन्द्रह गाँवों में भेजेगा और बच्चों के गुम होने की सूचना देगा। फिर उसने सुझाव दिया कि यदि ढिंढोरची पचास रूपये के इनाम का भी ऐलान करे तो बच्चों के सकुशल लौटने की सम्भावना बढ़ जायेगी। पचास रूपये! इस सुझाव पर हरकुवा और कुन्ती के मुँह खुले रह गये। उन्हें मालूम नहीं था कि दुनिया में इतना ज्यादा धन है, बहरहाल, अगली प्रातः जब ढिंढोरची अपने दौरे पर निकला, वह इनाम की घोषणा करने की स्थिति में था। क्योंकि कालाढूंगी के एक व्यक्ति ने यह सुझाव सुनकर अपनी ओर से यह राशि देनी स्वीकार कर ली थी।

रात का खाना बहुत देर से खाया गया। बच्चों का हिस्सा अलग रख दिया गया और रात भर आग जलाये रखी गई। क्योंकि ठंड बहुत ज्यादा थी। बीच-बीच में रात के अंधकार में हरकुवा और कुन्ती बाहर जाकर बच्चों को आवाज लगाते रहे, जोकि उन्हें पता था कि कोई उत्तर नहीं मिलने वाला है।

कालाढूंगी में दो सड़कें एक दूसरे को समकोण पर काटती हैं, एक सड़क पहाड़ की तलहटी के साथ-साथ हल्द्वानी से रामनगर जाती है और दूसरी नैनीताल से बाजपुर, शुक्रवार की रात, स्वयं को गर्म रखने के लिये आग तापते हुए हरकुवा और कुन्ती ने फैसला किया कि यदि सुबह तक बच्चे नहीं लौटते, तो वे पहली सड़क के साथ-साथ जाकर पूछताछ करेंगे, क्योंकि इसी रास्ते से अपहरणकर्ताओं के जाने की ज्यादा सम्भावना थी। शनिवार की प्रातः थाने जाकर उन्होंने हेड कांस्टेबल को भी अपना निर्णय बतलाया, जहाँ उन्हें यह सुझाव दिया गया कि वे हल्द्वानी और रामनगर के थानों में भी रिपोर्ट दर्ज करवा लें। जब हेड कांसटेबल ने उनको बताया कि वह एक हरकारा हल्द्वानी के पुलिस इंस्पेक्टर के पास इस आग्रह के साथ भेज रहा है कि सभी रेलवे स्टेशनों को बच्चों के गुम होने की सूचना और उनका हुलिया भिजवा दें, हरकुवा और कुन्ती का हौसला बढ़ गया।

उस शाम सूर्यास्त के आसपास कुन्ती हल्द्वानी आने-जाने की अठ्ठाईस मील की यात्रा कर लौटी और सीधे थाने जाकर अपने बच्चों के बारे में पूछताछ की। हेड कांस्टेबल को उसने बतलाया कि हालाँकि उसकी खोजबीन से कोई फायदा नहीं हुआ तो भी वह हल्द्वानी थाने में रिपोर्ट लिखा आई है, थोड़ी ही देर बाद हरकुवा भी रामनगर की छब्बीस मील की यात्रा कर लौट आया और थाने में जाकर उसने भी बताया कि वह हेड कांस्टेबल के निर्देश पूरे कर आया है। बहुत से मित्र, विशेषकर अपने बच्चों के लिये आशंकित महिलाएँ, झोपड़ी पर हरकुवा और पनुवा की माँ (भारत के रिवाज के अनुसार शादी के बाद कुन्ती का नाम गुम हो गया था। पनुवा के जन्म से पहले वह ‘हरकुवा की घरवाली’ थी और पनुवा के पैदा होने के बाद पनुवा की माँ) के प्रति सहानुभूति प्रकट करने मौजूद थे।

रविवार का दिन शनिवार को ही पुनरावृत्ति था, फर्क यह था कि कुन्ती पूर्व और पश्चिम की ओर जाने की बजाय उत्तर की ओर नैनीताल गई और हरकुवा दक्षिण की ओर बाजपुर, कुन्ती को तीस मील चलना पड़ा और हरकुवा को बत्तीस, तड़के ही रवाना होकर वे लोग रात ढलने के बाद लौटे। कई मील तक इन लोगों को घने जंगल के बीच ऐसे मुश्किल रास्तों पर चलना पड़ा, जहाँ लोग सिर्फ टोलियों में ही जाते थे और हरकुवा तथा कुन्ती भी डाकुओं और जंगली जानवरों के डर से वहाँ जाने का साहस नहीं करते यदि अपने बच्चों की इतनी चिन्ता उन्हें नहीं होती।

उस रविवार की शाम, जब नैनीताल और बाजपुर की असफल यात्राओं से लौटकर, वे दोनों भूखे और पस्त होकर अपनी झोपड़ी में पड़े थे, उन्हें बताया गया कि गाँवों में मुनादी और पुलिस की खोज के बावजूद बच्चों का कोई पता नहीं चला है, उनका दिल टूट गया और पनुवा और पुतली को दुबारा देख पाने की सारी आशा खत्म हो गई। ईश्वर का कोप जिसके कारण दिन दहाड़े फकीर उनके बच्चों को चुरा सके, उनकी समझ में नहीं आया। पहाड़ से नीचे उतरते समय उन्होंने गाँव के पुजारी से राय मांगी थी। और उसने उन्हें यात्रा शुरू करने के लिए शुभ दिन सुझाया था। मार्ग में पड़ने वाले हर मन्दिर में उन्होंने उपयुक्त चढ़ावा चढ़ाया था। एक स्थान पर सूखी लकड़ी, एक अन्य पर कुन्ती की चादर फाड़कर कपड़ा तथा तीसरे पर अपनी सीमित पूँजी से एक पैसा उन्होंने अर्पण किया। यहाँ कालाढूंगी में मन्दिर, जहाँ नीच जाति का होने के कारण उनका प्रवेश वर्जित था, के सामने से गुजरते समय वे हमेशा हाथ जोड़कर प्रणाम करते थे, उन्होंने देवताओं की सब जरूरतें पूरी की थी और किसी इन्सान का बुरा नहीं किया था, तब यह महाान विपत्ति उन पर ही क्यो आई ?

सोमवार के दिन हरकुवा दम्पति इतने थके और हतोत्साह थे कि झोपड़ी से बाहर नहीं निकले। भोजन सामग्री कुछ थी नहीं और जब तक वे काम पर नहीं लौटते, कुछ होनी थी भी नहीं, पर काम करना भी क्यों था ? जिन बच्चों की खातिर सुबह से शाम तक बगैर शिकवा-शिकायत के उन्होंने हाड़-ताड़ मेहनत की थी, वे बच्चे ही अब नहीं रहे थे। अतः हरकुवा झोपड़ी के दरवाजे पर, अपने वीरान और आशाहीन भविष्य के बारे में सोचता बैठा रहा और कुन्ती, जिसके सारे आँसू सूख गये थे, झोपड़ी के एक कोने में इधर से उधर, उधर से इधर गिरती रही।

उसी सोमवार को मेरी जान-पहचान का एक व्यक्ति उस जंगल, जहाँ रहने वाले जंगली जानवरों और पक्षियों का जिक्र मैं कर चुका हूँ, में भैंस चरा रहा था। वह एक सीधा-साधा आदमी था और उसकी जिन्दगी का अधिकांश समय प्रतापपुर गाँव के प्रधान की भैंसे चराते हुए ही गुजरा था। वह बाघों के खतरे से वाकिफ था और सूर्यास्त के पहले ही उसने अपनी भैंसें एकत्र कीं और उन्हें गाँव की ओर के रास्ते पर ले जाना शुरू किया। यह पगडण्डी जंगल के सबसे घने इलाके से होकर गुुजरती थी। उसने देखा कि एक खास स्थान पर हर भैंस अपना मुँह दाहिनी ओर घुमाती थी और ठहर जाती थी, जब तक कि पीछे से आने वाली भैंस अपनी सींगों से उसे आगे न धकेल दे, जब उस स्थान पर पहुँचकर उसने सिर घुमाया तो देखा कि पगडंडी से कुछ ही फीट दूर एक दरार से दो छोटे-छोटे बच्चे पड़े हुए हैं।

शनिवार के दिन जब हरकारे ने गाँव-गाँव में बच्चों की खबर दी थी, तब वह अपने भैंसों के साथ जंगल में था लेकिन उस रात और उससे अगली रात भी गाँव में अलाव के आस-पास बच्चों के खोने की घअना लोगों की बातचीत का ज्वलन्त विषय थी। कालाढूंगी के आस-पास के तमाम गाँवों में यही स्थिति थी, यहाँ वे बच्चे थे, जिनके लिए पचास रूपये इनाम घोषित था। लेकिन उनको मारकर इतनी दूर क्यों फैंका गया ? बच्चे नंगे थे और एक-दूसरे की बाँहों में हाथ डाले पड़े थे, यदि सम्भव हो तो यह पता लगाने कि बच्चों की मृत्यु कैसे हुई है, चरवाहा दरार में उतरा और झुककर देखने लगा, बच्चे मरे होंगे, इस बात से वह आश्वस्त था, लेकिन जैसे ही उसने गौर से देखा तो उसे एकाएक पता चला कि वे सांस ले रहे हैं। वास्तव में वे मृत नहीं थे। बल्कि गहरी नींद सो रहे थे। वह स्वयं एक बाप था, बहुत धीरे से बच्चों को छूकर उसने जगाया। उनको छूना उसके लिए अपराध था, क्योंकि वह ब्राह्मण था और बच्चे नीची जाति के थे, लेकिन ऐसे आपातकाल में छुआछूत क्या मायने रखती है? अतः अपने जानवरों को खुद घर जाने के लिए छोड़कर उसने बच्चों को उठाया क्योंकि वह कमजोरी के कारण चलने में असमर्थ थे और प्रत्येक कंधे पर एक-एक को डालकर कालाढूंगी बाजार के लिए चल पड़ा। वह व्यक्ति स्वयं अधिक शक्तिशाली नहीं था, क्योंकि पहाड़ की तलहटी में रहने वाले अधिकांश लोगों की तरह वह भी मलेरिया से ग्रस्त रह चुका था। बच्चों का बोझ अटपटा था और उन्हें ठीक से ढोना पड़ रहा था, ऊपर से उसे गधेरों और झाड़ियों से बचने के लिये लम्बा चक्कर लगाना पड़ता था। क्योंकि जानवरों का रास्ता उत्तर से दक्षिण को थ जबकि उसे पूरब से पश्चिम को जाना था, लेकिन छः मील के रास्ते को उसने, यहाँ-वहाँ कई बार सुस्ताकर, अत्यन्त बहादुरी से तय किया। पुतली के मुँह से आवाज नहीं निकल पा रही थी। किन्तु पनुवा थोड़ा बहुत बोल सकता था। जंगल में होने का कारण उसने बताया कि वे लोग खेल रहे थे कि रास्ता भूल गये।

हरकुवा अपनी झोपड़ी के दरवाजे पर बैठा रात को गहराते देख रहा था। इधर-उधर लालटेनों और जलती हुई आग की रोशनियाँ अंधेरे में बिन्दुओं की तरह बिखरी हुई थी, तथी उसने बाजार की ओर से लोगों के एक छोटे से समूह को आते हुए देखा। जलूस के आगे एक आदमी अपने कंधों पर कुछ लादे चल रहा था। हर दिशा से लोग आकर जुलूस में जुड़ते चले जा रहे थे, और वह ‘हरकुवा के बच्चे’ ‘हरकुवा के बच्चे’ की उत्तेजित फुसफुसाहट सुन सकता था। उसे अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ, लेकिन गलती की कोई सम्भावना नहीं थी। भीड़ सीधे उसके पास घर की ओर चली आ रही थी।

कुन्ती अपने विषाद और शारीरिक सहनशक्ति की सीमा तक पहुँच कर झोपड़ी के कोने में गड्ड-मड्ड होकर सोयी पड़ी थी, हरकुवा ने उसे झिंझोड कर जगाया और जैसे ही वह उसे दरवाजे तक लाया, चरवाहा पुतली और पुनवा को लेकर वहाँ पहुँच गया।

जब अश्रुपूर्ण अभिवादनों, आशीषों और बचाने वाले के प्रति आभार का दौर खत्म हुआ और मित्रों-परिचितों की शुभकामनाओं का शोर कुछ थमा, चरवाहे को पुरस्कार देने की बात उठ खड़ी हुई एक गरीब आदमी के लिए पचास रूपये की रकम असीमित सम्पत्ति थी, इससे चरवाहा तीन भैंस खरीद सकता था या दस गाय और जीवन भर के लिय आजाद हो सकता था। लेकिन चरवाहा लोगों की उम्मीद से कहीं अधिक उदार व्यक्ति था, उसने कहा कि उसे जो आशीष और आभार मिला है, वह उसके लिए किसी भी पुरस्कार से ज्यादा मूल्यवान है और वह पचास रूपये से एक पैसा भी नहीं लेगा। न ही हरकुवा और कुन्ती ने पुरस्कार राशि उपहार या ऋण के रूप में लेनी स्वीकार की। अपने जिन बच्चों को दुबारा देख पाने की आशा उन्होंने छोड़ दी थी, वे उन्हें मिल गये थे और जैसे ही उनके शरीर में शक्ति आयेगी वे अपने काम पर दुबारा जाने लगेंगे, इस बीच उपस्थित लोगों में से जो अनेक लोग अपने हृदय की उदारता के अनुरूप दूध, मिठाई या पूरियाँ लेने बाजार चले गये थे, उनकी लायी सामग्री से ही उनका निर्वाह हो जायेगा।

दो साल की पुतली और तीन साल का पुनवा शुक्रवार की दोपहर को गुम हुए थे और सोमवार की शाम पाँच बजे के लगभग चरवाहे ने उन्हें खोजा - पूरे सतहत्तर घण्टे बाद, जिस जंगल में बच्चों ने ये 77 घण्टे गुजारे, उसके वन्य जीवन का वर्णन मैं पहले ही कर चुका हूँ, यह असम्भव है कि किसी भी पशु या पक्षी ने बच्चों को देखा, सुना या सूँघा न होगा, इसके बावजूद जब चरवाहे ने पुतली और पनुवा को उनके माँ-बाप को सौंपा, उनके शरीर पर दाँत या पंजों का एक भी निशान नहीं था।

मैंने एक बार एक बाघनी को एक महीने भर के बकरी के बच्चे पर घात लगाते देखा था, खुला हुआ मैदान था। बकरी के बच्चे ने बाघनी को काफी दूर से ही देख लिया और चीखना शुरू कर दिया, इस पर बाघनी ने हमले का इरादा छोड़ दिया और सीधे बच्चे की ओर चली आई। बाघनी बच्चे से कुछ दूर ही थी कि बच्चा उससे मिलने चला गया। बाघनी ने अपनी गर्दन बच्चे को सूंघने लगी, कुछ पलों तक जंगल की रानी और महीने भर के बकरी के बच्चे के दिल मिले रहे और फिर रानी उसी दिशा को लौट गई, जहाँ से वह आई थी।

जब हिटलर के साथ युद्ध समाप्ति की ओर था, मैं ब्रिटिश साम्राज्य के तीन महान लोगों के भाषणों के अंश पढ़ रहा था, जिसमें उन्होंने युद्ध-अत्याचारों की निन्दा की थी और शत्रु पर आरोप लगाया था कि उसने लड़ने वाले लोगों के बीच ‘जंगल का कानून’ लागू कर दिया है, यदि सृष्टि के निर्माता ने मनुष्य के लिए वही कानून बनाये होते, जो वन्य प्राणियों के लिये बनाये, तो कहीं कोई युद्ध नहीं होता, क्योंकि तब शक्तिशाली मनुष्य अपने से कमजोर का उसी प्रकार ध्यान रखते जैसे कि जंगल की परम्परा है।

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