क्यों है दालों का संकट

Submitted by RuralWater on Mon, 08/17/2015 - 09:44
मिट्टी की उर्वरता कायम रखने में दलहन की खेती बहुत महत्त्वपूर्ण होती है। इसके पौधे की जड़ें मिट्टी को नाइट्रोजनयुक्त बनाती हैं और मिट्टी को उर्वर बनाए रखती हैं। पहले इसके लिये खेतों में मिश्रित फसलें लगाते थे, ज्वार के साथ तुअर लगाते थे। तुअर के डंठल ईंधन के काम आते थे और उसका पशुओं को भूसा दिया जाता था। लेकिन ज्यादा पैदावार के चक्कर में दालों की खेती कम होती गई। जिससे ग्रामीण समाज में ईंधन व पशुओं के चारे का संकट भी पैदा हो गया। कुछ समय पहले केन्द्र सरकार ने बड़े पैमाने पर दालों का आयात करने का फैसला लिया है, यह उचित है लेकिन पर्याप्त नहीं है। यह फौरी समाधान है। दीर्घकाल में दालों का उत्पादन बढ़ाने पर जोर देना होगा तभी संकट का हल निकल पाएगा। दालों के दाम इतने महंगे हो गए हैं कि हमारी थाली से दाल की कटोरी ही गायब हो गई है।

महंगाई कम करने और अच्छे दिनों का दावा करने वाली सरकार के राज में दाल अब 120 रुपए प्रति किलोग्राम हो गई है। जबकि कुछ वर्ष पहले दाल 40 से 50 रु. किलोग्राम हुआ करती थी। सरकार ने खुद माना है कि बीते एक साल में दालों के दामों में 64 फीसदी बढ़ोत्तरी हुई है। बेमौसम बारिश से फसल चौपट होने और आगामी कमजोर मानसून की आशंका ने सरकार की चिन्ता बढ़ा दी है और इस साल दालों का उत्पादन भी कम हुआ है।

लेकिन यह स्थिति अचानक पैदा नहीं हुई है। दालों की उपलब्धता लगातार कम होती गई है। सरकार के आँकड़े बताते हैं कि वर्ष 1951 में देश में औसत व्यक्ति को खाने के लिये 60.7 ग्राम दालें उपलब्ध थी, जो घटते-घटते वर्ष 2007 में मात्र 35.5 ग्राम रह गई। दालों की कीमतें जिस तेजी से बढ़ रही है निश्चित ही गरीब और कम आय वाले लोगों के भोजन में दालों की उपलब्धता कम हुई होगी।

दालों की उपलब्धता क्यों कम हुई, इस सवाल की विवेचना करें तो पाएँगे, इसका बड़ा कारण हरित क्रान्ति पाएँगे। हमने हरित क्रान्ति से गेहूँ और चावल की पैदावार बढ़ा ली लेकिन दालों के मामले में फिसड्डी हो गए। इसी दौरान सोयाबीन, गन्ने और कपास जैसी नकदी फसलों को बढ़ावा मिला।

हरित क्रान्ति के पहले हमारे देश में कई तरह की दालें हुआ करती थी। तुअर, चना, मूँग, उड़द, मसूर, तिवड़ा खेसारी आदि कई प्रकार की दालें हुआ करती थीं। हमारे भोजन व संस्कृति का हिस्सा थी और यही प्रोटीन का मुख्य स्रोत हैं।

मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले में सोयाबीन के आने से दालों की उपेक्षा हुई। इसके पहले नर्मदा कछार की दालें बड़ी प्रसिद्ध हुआ करती थीं, और लोग खरीदकर अपने रिश्तेदारों व परिचितों को भेजते थे। पिपरिया में ही एक दर्जन से ज्यादा दाल मिलें थीं। अब दालों का उत्पादन लगभग नगण्य हो गया है। यहाँ चना और गेहूँ की मिश्रित खेती हुआ करती थी। दोनों के आटे को मिलाकर रोटी बनाते थे, जिसे बिर्रा की रोटी कहते थे। वह बहुत स्वादिष्ट होती थी।

पोषण और स्वास्थ्य की दृष्टि में दालों की कमी चिन्ताजनक है। जिन कमजोर आय के दूध, पनीर, मछली, अंडे जैसे महंगे स्रोत उपलब्ध नहीं हैं, उनके लिये दाल ही प्रोटीन का स्रोत है। दाल की कमी और उसके महंगे दामों से कुपोषण की समस्या और बढ़ जाएगी।

मिट्टी की उर्वरता कायम रखने में दलहन की खेती बहुत महत्त्वपूर्ण होती है। इसके पौधे की जड़ें मिट्टी को नाइट्रोजनयुक्त बनाती हैं और मिट्टी को उर्वर बनाए रखती हैं। पहले इसके लिये खेतों में मिश्रित फसलें लगाते थे, ज्वार के साथ तुअर लगाते थे। तुअर के डंठल ईंधन के काम आते थे और उसका पशुओं को भूसा दिया जाता था। लेकिन ज्यादा पैदावार के चक्कर में दालों की खेती कम होती गई। जिससे ग्रामीण समाज में ईंधन व पशुओं के चारे का संकट भी पैदा हो गया।

कहने को तो सरकारें दालों के उत्पादन बढ़ाने की बात करती हैं। योजनाएँ भी बनाती हैं लेकिन इसका नतीजा कुछ नहीं निकलता। जो हरित क्रान्ति के समय से आया हुआ है, वह निरन्तर बना हुआ है। हमारी परम्परागत खेती में भोजन की जरूरत के हिसाब से फसलों का उत्पादन होता था, अब नकदी फसलों को बढ़ावा दिया जाता है। इस कारण लोग दालों से बनने वाले किस्म-किस्म के व्यंजनों का स्वाद भूल गए हैं। उड़द के बड़ा और डोसा जैसे कई व्यंजन दालों से ही बनते हैं।

इसलिये दालों के उत्पादन बढ़ाने पर जोर दिया जाना चाहिए। मिश्रित खेती को अपनाने की कोशिश करना चाहिए। जिससे मनुष्य को सन्तुलित आहार मिल सके, पशुओं को चारा मिल सके और मिट्टी की उर्वरता भी बनी रह सके।

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