चौमास की बारिश

Submitted by RuralWater on Mon, 08/31/2015 - 11:15
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नेशनल दुनिया 30 अगस्त 2015

बीड़ी का सुट्टा लगाते हुए मधिया देहरी पर बैठ गया। उसका मन भी बेचैन था। मधिया के चेहरे की बेचैनी भी समझ में आने वाली थी। लोगों के यहाँ मेहनत-मजदूरी के बाद जब कुछ मिलने का टाइम आया तो यह बारिश निवाला ही छिनने की तरफ है।

बादलों को घुमड़ने में देर ही न लगी। देखते-ही-देखते सरयू नदी के तट पर बसा पूर्वा गाँव अंधकार में डूब गया। नैनुआ प्रधान झरोखे से बाहर ताकते हुए बड़े ही बैचेन लग रहे थे। बड़ी आफत है, कल की धान चुटाई का जो प्रोग्राम रखा है वह कैंसिल...।

रात्रि में बारिश का अन्दाजा भाँपकर वह छत में गए और धूप लगने के लिये सुखाई धान की अठियों को एकत्रित कर समेट लिया और बालियों में पानी न जाने पाये, इसलिये बड़े-ही-जतन से तिरपाल से धान के ऊँचे से ढेर को ढँक दिया और तिरपाल के किनारों में दबाने के लिहाज से पत्थर रख लिये।

कमरे में वापस लौटते समय पाँव देहरी पर भी नहीं रख पाये थे कि बाहर झुरमुर बारिश शुरू हो गई। क्षणभर के लिये उन्होंने शून्य भाव से बाहर ताका।

अच्छा किया जो मैंने बारिश शुरू होने से पहले ही बालियों को समेट कर ढँक लिया, नहीं तो मुफ्त में समेटी फसल भी हाथ से निकल जाती...।

वह अपने विस्तार की तरफ बढ़े और दिन का बना थोड़ा भात-दाल बचा था, उन्होंने उसे ही अंगेठी में गरम करके खा लिया। सोने से पहले देहरी में आकर उन्होंने चारों तरफ नजर दौड़ाई। हिमालय की तरफ से आसमान में डरावनी बिजली चमक रही थी, जिसका संकेत तेज बारिश की तरफ था।

ओह...। यह तो झौड़ के ही संकेत लग रहे हैं। वह खुद ही कहने लगे। अगले ही क्षण उन्होंने किवाड़ बन्द किये और बैचेन मन से सो गए। बस रात भर उन्हें नींद कहाँ आती। यूँ ही मिड्गू की तरह पड़े रहे। उनके कानों में बाहर हो रही मूसलाधार बारिश की आवाज़ गूँज रही थी बस...।

वह यही सोच रहे थे कि बस दो सप्ताह भी बारिश नहीं होती तो कम-से-कम पकी फसल समेट ली जाती।

पर अब ....।

उठे नहीं क्या अभी प्रधान काका?

इसी बीच बाहर से आई आवाज से नैनुआ प्रधान चौंक गए, अचानक ओढ़े हुए कम्बल को शरीर से हटाया।

और बिस्तर पर बैठ गए।
ओह! यह तो मधिया डूम है।
बैठ-बैठ मधिया बैठ।
इतनी सुबह-सुबह…?

अब सुबह कहाँ है? दुपहर हो रही है। साढ़े आठ बज चुका है। आप ठहरे पाँच बजे उठने वाले। पर आज इतनी देर...।

मधिया ने कहा।

देख रहे हो बाहर! बारिश, अंधाकोप में टाइम का कहाँ पता चलता है? हमारे पास घड़ी तो ठैरी नहीं। नैनुआ प्रधान ने बड़े ही उजाड़ मन से कहा।

ठीक कह रहे हो प्रधान काका। ये बारिश न तो खाने देगी और न ही अनाज समेटने देगी। जब चाहिए थी, तब हुई नहीं, अब पता नहीं कब तक चलती रहेगी।

मधिया, बुजुर्गों ने कहा है चौमास की बारिश का कुछ पता नहीं चलता...।

चौमास की बारिश सात दिन भी रह सकती है, अठारह दिन भी।

नैनुआ प्रधान ने झरोखे से बाहर शून्य भाव से ताकते हुए कहा।

इतने दिन में तो सब सपाचट हो जाएगा। मधिया के चेहरे पर एक अजीब-सी उलझन छा गई।

नैनुआ प्रधान कुछ देर झरोखे से बाहर एकान्त मन से ताकते रहे। गंगाश की तरफ हो रही तेज बारिश ने जैसे उनकी उलझन कई गुना बढ़ा दी।

उन्होंने सिरहाने के नीचे दबाई बीड़ी का बंडल और माचीस की डिब्बी मधिया की तरफ बढ़ाई। वह खुद सामने रखी अंगेठी की तरफ बढ़े और केतली में चाय के लिये पानी चढ़ा दिया।

बीड़ी का सुट्टा लगाते हुए मधिया देहरी पर बैठ गया। उसका मन भी बेचैन था। मधिया के चेहरे की बेचैनी भी समझ में आने वाली थी। लोगों के यहाँ मेहनत-मजदूरी के बाद जब कुछ मिलने का टाइम आया तो यह बारिश निवाला ही छिनने की तरफ है।

प्रधान काका...। बुजुर्गों का यह किस्सा भी सच ही है-रूड़ी बारिश माव बैठी, चौमासा की हिमाव बैठी।

यह बारिश तो सात दिन बीता के ही छोड़ेगी। मधिया ने बीड़ी की लम्बी कस लेते हुए कहा।

नैनुआ प्रधान, केतली में उबली चाय को दो स्टील के गिलासों में उड़ेल चुके थे।

दोनों के चाय पीने तक तो बारिश और भी बढ़ गई।क्या करें हो मधिया, रूड़ी की फसल बारिश नहीं होने से गँवाई और इस चौमासी की इस बारिश की वजह से गँवाने वाले हैं। चाय की चुस्की लेते हुए नैनुआ प्रधान ने कहा।

क्या करें, बस यह तो हर साल का सिस्टम जैसा ही बन गया है। रूड़ी की फसल को बारिश नहीं मिल पाती है और चौमास में तब बारिश होती है जब फसल समेटने का समय होता है। यह कहने के साथ ही मधिया ने भी चाय की एक बड़ी-सी घूँट गले में उतार डाली।

देखते-ही-देखते छह-दिन छह-रात तक मूसलाधार बारिश चलती रही। सातवें दिन तक बस इतनी राहत थी कि अब दिन में कभी-कभी थोड़ी देर भर के लिये बारिश रुक रही थी। इससे अन्दाजा लग रहा था कि रात तक बारिश बन्द हो सकती है। बारिश बन्द होने तक लोगों के पास छोटे-मोटे काम को छोड़कर बस उबकाई लेने का ही काम बचा था।

जर्जर झरोखे के पास खड़े नैनुआ प्रधान खुद ही बुदबुदा रहे थे। उन्हें गाँव का दृश्य बरबस नजर आ रहा था। वह इत्मिनान से गाँव की गतिविधियों को देख रहे थे कि आखिरकार लोग क्या कर रहे हैं?

वह क्षण भर के लिये अपने सिर को खुजलाने लगे।

नहीं, नहीं...।

रात तक बारिश बन्द हो जाएगी और सुबह हल्का मौसम खुल जाएगा, तब ही कुछ सोचा जा सकता है। वह हल्का-सा सिर हिलाने लगे, जैसे उन्होंने मन-ही-मन खुद के सवाल का जवाब दिया हो। बदली से घिरे वायुमण्डल में मुश्किल से ही अन्दाज लग रहा था कि सांझ हो आई है। अक्सर, महिलाओं के सिर पर पानी से भरे बर्तन सुबह और शाम के समय ही दिखाई देते हैं जब वे नौले से ताजा पानी भरकर ले जाती हैं।

कुछ ही पलों में हल्का-सा घुप्प अंधियारा छा गया, जैसे वातावरण ने पूरी तरह काली चादर ओढ़ ली हो।

नैनुआ प्रधान भी जल्दी ही सो गए, वह स्वयं अन्दाज लगा रहे थे कि रात तक बारिश पूरी तरह बन्द हो जाएगी और कल सुबह मौसम खुल जाएगा तो ढँकी फसल को खोलने का इन्तजाम किया जा सकता है और सुबह-सुबह मधिया को भी जवाब भिजवा दिया जाएगा, तभी वह जोखिम उठाया जाएगा। फिर क्या तो सुबह तक तो सिर्फ नींद की एक टोह आई।

वह उठे भी न थे, मधिया खुद ही पहुँच गया।

पहुँचते ही उसने कहा, काका उठो हो मौसम खुलने लगा है जो ढकी फसल है कम-से-कम उसे खोल तो लें।

ओह…! मधिया तुमने ठीक किया, जो तू खुद ही आ गया, मैं भी सोच रहा था कि तुझे सुबह जवाब भिजवाऊँगा

।खैर, पूरी तरह उजाला तो होने दे।
तब तक बीड़ी-सीड़ी पी और मैं चाय के लिये पानी चढ़ा देता हूँ। नैनुआ प्रधान ने बड़ी राहत की साँस लेते हुए कहा।

देखा...। सात दिन बिता के ही छोड़े इस बारिश ने।

चौमास की बारिश है, मधिया, मैंने कहा था। चौमास की बारिश का कुछ पता नहीं...। उनके बीड़ी और चाय पीने तक पूरी तरह उजाला हो चुका था, सामने पर्वत शृंखलाओं और आसमान के निचले हिस्सों में बादल छाये हुए थे, सरयू नदी का छोर हल्का धुँधला दिखाई दे रहा था। हिमालय पर्वत की चमक फीकी लग रही थी, लेकिन यह अन्दाज आसानी से लग रहा था कि कम-से-कम धूप आएगी तो दोपहर बाद ही।

दोनों छत की तरफ बढ़े। क्षण भर बाद छत में पहुँचे तो अवाक रह गए, तेज हवा की वजह से तिरपाल का आधे से अधिक हिस्सा दूर छिटका हुआ था। इतने जतन से ढका फिर भी...। नैनुआ प्रधान ने खामोश मन से कहा।

ढकी फसल लगभग पूरी तरह भींग चुकी थी, झड़ चुके दाने पानी में तैर रहे थे, फसल के ढेर का निचला हिस्सा सड़ चुका था, ढेरों बालियाँ छत में दूर तक बिखरी हुईं थीं। नैनुआ प्रधान धान की गड्डी के भींग चुके हिस्से को बड़े ही दुःख भरे भाव से ताकने लगे और मधिया उनके चेहरे को...।

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