हवा-हवाई सर्वेक्षण

Submitted by RuralWater on Sat, 09/05/2015 - 09:55
गंगा को साफ करने के लिये तीनों जोन की मैपिंग आवश्यक है और सेटेलाइट मैपिंग के अलावा कोई और तरीका नहीं है। लेकिन गंगा की पहली और प्राथमिक जरूरत उसके प्रवाह को जानना है या उसमें गिर रहे नालों को रोकना? पहले गंगा में औद्योगिक कचरा गिरना रुके, सरकारी नाले गंगा में अपना योगदान देना बन्द करें तब इस सर्वेक्षण का फायदा होगा। अन्यथा जब गंगा ठीक से बह ही नहीं पा रही है तो ये जानने का क्या तुक है कि उनका प्रवाह कहाँ और कितना है। सरकार ज़मीन से दूर होती है तो नीतियाँ और योजनाएँ भी हवाई हो जाती हैं। गंगा पर काम करने वाली महत्त्वपूर्ण एजेंसी ‘नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा’ यानी एनएमसीजी को गंगा किनारे मौजूद बूचड़खाने नजर नहीं आते। उन्हें गंगा में हर पल गन्दगी छोड़ते कपड़ा, कागज, खिलौना और ऊर्जा कारखाने भी नजर नहीं आते। उन्हें ये भी नहीं पता है कि गंगा की ज़मीन पर कहाँ-कहाँ व्यक्तियों, संस्थाओं और सरकारों द्वारा अतिक्रमण किया गया है।

गंगा के कटान से लाखों की आबादी का विस्थापन भी एनएमसीजी को अब तक दिखाई नहीं दिया है। इसीलिये अब केन्द्र सरकार गंगा का हवाई सर्वेक्षण कराने की तैयारी कर रही है।

यह हवाई सर्वे गंगा नदी के किनारों पर स्थित विभिन्न स्थानों किये गए अतिक्रमण के बारे में स्पष्ट तौर पर बताएगा। इस मैपिंग से बाढ़ वाले मैदानी इलाकों में मानकों का उल्लंघन कर निर्मित किये गए ढाँचों और उस जगह की स्पष्ट तस्वीर मिल पाएगी जो अतिक्रमण हटाने में मददगार होगी।

एमएमसीजी ने कहा है कि नमामि गंगे कार्यक्रम के तहत अब गंगा बेसिन को प्रदूषण और अतिक्रमण से मुक्त करने के उद्देश्य से शक्तिशाली कैमरों से सुसज्जित विशेष बहुउद्देशीय विमान गंगा नदी और पाँच राज्यों में उसकी धाराओं के ऊपर से उड़ान भरेगा ताकि इसके बेसिन का भू-स्थैतिक सर्वेक्षण किया जा सके।

इस काम में अच्छा-खासा खर्चा भी होगा। इस सर्वेक्षण का उद्देश्य वही है जो पहले भी कई बार दोहराया जा चुका है, अत्यन्त प्रदूषित हो चुकी इस पवित्र नदी को अविरल और साफ बनाना। अब एनएमसीजी इस बारे में सर्वे ऑफ इण्डिया और भारतीय अन्तरिक्ष अनुसन्धान संगठन के साथ विचार-विमर्श कर रहा है।

गंगा तीन बड़े ईको सिस्टम को बनाती है, उत्तराखण्ड और हिमालय का अलग-अलग ईको सिस्टम है। इसके अलावा हरिद्वार से लेकर वाराणसी तक मैदानी जोन है। यह ईको सिस्टम डेल्टा जोन में बंगाल की खाड़ी तक जाता है।

गंगा मंत्रालय से जुड़े एक अधिकारी का कहना है कि तीनों जोन की मैपिंग आवश्यक है और सैटेलाइट मैपिंग के अलावा कोई तरीका नहीं है। अगर गंगा को साफ करना है तो यह बहुत जरूरी है। बेशक ये मैपिंग इस मायने में फायदेमन्द हो सकती है कि गंगा का प्रवाह कहाँ ज्यादा और कहाँ कम हुआ।

ये भी जाना जा सकता है कि गंगा के नए विकसित डेंजर जोन कौन से हैं और उनको रोकने के लिये क्या किया जाना चाहिए। लेकिन वास्तव में गंगा की पहली और प्राथमिक जरूरत उसके प्रवाह को जानना है या उसमें गिर रहे नालों को रोकना?

पहले गंगा में औद्योगिक कचरा गिरना रुके, सरकारी नाले गंगा में अपना योगदान देना बन्द करें तब इस सर्वेक्षण का फायदा होगा। अन्यथा जब गंगा ठीक से बह ही नहीं पा रही है तो ये जानने का क्या तुक है कि उनका प्रवाह कहाँ और कितना है। इससे पहले भी कई बार गंगा के ऊपर से जहाजें उड़ान भर चुकी हैं, लेकिन परिणाम वही ढाक के तीन पात।

बहरहाल सरकार का ये सर्वेक्षण करीब 4 हजार किलोमीटर के क्षेत्र में होगा। इसमें 2525 किलोमीटर के गंगा पथ के अलावा अलकनन्दा और उत्तरी बिहार की कुछ नदियाँ भी शामिल होगी। गंगा की यह धाराएँ उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड, पश्चिम बंगाल, बिहार और झारखण्ड से होकर गुजरती हैं।

भारत सरकार 1985 से चल रहे इस काम के लिये कुल चार हजार करोड़ रुपए खर्च कर चुकी है। दरअसल इस विराट सर्वे के पीछे एक उद्देश्य जलमार्ग के निर्माण का रास्ता साफ करना भी है। गंगा में हल्दिया से इलाहाबाद के बीच के जलमार्ग को कागजों से बाहर निकाल कर मूर्त रूप देने की तैयारी चल रही है। इसके लिये एक बड़ा टर्मिनल वाराणसी में बनाया जाएगा।

इसके लिये ज़मीन की अधिग्रहण की तैयारी भी पूरी हो चुकी है। अभी तक इस रूट पर हल्दिया से फरक्का तक ही ट्रांसपोर्टेशन हो पा रहा है। गंगा में पर्याप्त पानी न होने के कारण पर्यावरणविदों और सन्तों के विरोध के बाद सरकार वाटरवेज योजनाओं पर बिना हो-हल्ले के आगे बढ़ रही है।

सबसे ज्यादा दिक्कत पटना और फरक्का में आ सकती है, क्योंकि फरक्का में एक नेविगेशन लॉक बनाया जाना है वहाँ एक पहले ही मौजूद है। और पटना में गंगा काफी उथली है और पत्थरों की संख्या भी ज्यादा है। वाटर वेज के मार्ग में सेंचुरी नहीं हो सकती और गंगा पर इस योजना के रास्ते डॉल्फिन और कछुआ सेंचुरी आ रही हैं।

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